Book Title: Upasakdasha Shrutam
Author(s): Abhaydevsuri
Publisher: Atmanand Jain Sabha

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Page 92
________________ दाङ्गम. क18 पोलासपुरस्स नयरस्स बहिया पञ्च कुम्भकारावणसया। तत्थ णं तुब्भे पाडिहारियं पीढ जाव संथारयं ॥४५॥ ओगिण्हित्ताणं विहरह ॥ १९३ ॥ तए णं समणे भगवं महावीरे सद्दालपुत्तस्स आजीविओवासगस्स एय मटुं पडिसुणेइ, रत्ता सदालपुत्तस्स आजीविओवासगस्स पञ्चकुम्भकारावणसएसु फासुएसणिज्जं पाडिहारियं पीढफलग जाव संथारयं ओगिहिसाणं बिहरहा ॥१४॥ तए णं से सहालपत्ते आजीविओवासए अन्नया कयाइ वायाहययं कोलालभण्डं अन्ता सालाहिती बाहिया नीणेई. २त्ता आयसि दलयइ ॥ १९५ ॥ 'वायाहययं नि' वाताहतं वायुनेपच्छोषमानीनमित्यर्थः । कोलालभाई ति' कुलाला: कुम्भकाराः नेपामि कौलाल-तच्च तद्भाण्ड च-पण्यं भाजनं या कौलालभाण्डम् ॥ ११५ ॥ तए सतणे भगवं महावीरे सदालपुत्तं आजीविओवासयं एवं वयासी । सदालपुत्ता ! एणं कोलालभण्डे कओ ? ।। १९६ ॥ तए णं से मदालपुत्ते आजीविओवासए समणं भगवं महावीरं एवं वयासी, एस णं भंते! पुत्रि मट्टिया आसी. तओ पच्छा उदएणं निमिजइ, रना छारण य करिमेण य ग2 ओ मीसिज्जड, स्ना चक आरोहिजड़, तओ वहवे करगा य जाव उट्टियाओ य कजन्ति ॥ १९ ॥

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