Book Title: Tulsi Prajna 1994 10
Author(s): Parmeshwar Solanki
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 14
________________ रामस्नेही सन्त रामचरणजी पर भीखणजी का प्रभाव लोकेश्वर प्रसाद शर्मा अठारहवीं शताब्दी ई० का उत्तरार्ध विविध घटनाओं से परिपूर्ण एक अति विशिष्ट काल है । १७५७ ई० में भारत के भाग्य परिवर्तन की सूचक प्लासी की लड़ाई बंगाल में लड़ी जा चुकी थी। इसका प्रभाव प्रत्यक्षतः राजस्थान पर चाहे दष्टिगोचर न हुआ हो परन्तु अच्छी संख्या में मारवाड़ी व्यवसायी बंगाल में बसते थे अतः युद्ध की धमक यहां भी अनुभव की गई । दूसरी ओर अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण एवं इसी क्रम में १७६१ ई० में पानीपत के तीसरे युद्ध का भीषण विनाश भारतीय जन-मानस को भीतर तक झकझोर चुका था। राजस्थान की राजनीति के आकाश में मराठे एक घूमकेतु के समान उदित हो चुके थे। राजपूताना की सभी रियासतों की राजनीति तथा विशेष रूप से जयपुर, जोधपुर एवं मेवाड़ की राजनैतिक व्यवस्था को इनके आक्रमकों ने आक्रांत कर रखा था। इसकी पराकाष्ठा हुई जब सन् १७५० ई० में जयपुर के तत्कालीन शासक ईश्वरी सिंह को मल्हारराव होल्कर के आतंक स्वरूप विषपान करके आत्महत्या करनी पड़ी।' इधर १७५६ ई० में जोधपुर के शासक विजय सिंह को एक अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े। उपरोक्त उदाहरणों से हम राजस्थान के जनमानस की निराशा का अंदाज सरलता से लगा सकते हैं। ___ असमंजस एवं हतोत्साह की मनःस्थिति में समाज का ध्यान सर्वशक्तिशाली परमात्मा की ओर प्रकाश एवं मार्गदर्शन हेतु जाना स्वाभाविक लगता है। दूसरी ओर यह भी अपेक्षित है कि सामाजिक-धार्मिक नेतृत्व समाज की मूल कमियों को दूर करने हेतु समाज-सुधार एवं धर्म-सुधार के आंदोलन प्रारम्भ करे । ___ इस समय धर्म की स्थिति किसी भी प्रकार से सन्तोषजनक नहीं थी। बत, उपवास, तीर्थ, पूजा, प्रतिष्ठा आदि के नाम पर धर्मभीरू जनता को ठगा जा रहा था। ऐसे वातावरण को समाप्त करने के लिए ऐसी विभूतियों की आवश्यकता थीजो युग की आवश्यकता को समझे तथा समाज को मार्ग दिखाएं। सम्भवतः इसी क्रम में धार्मिक क्षेत्र में ईश्वर के साकार अथवा निराकार स्वरूप, मूर्तिपूजा, मन्दिर प्रतिष्ठा तीर्थ-यात्रा, नदियों-सरोवरों की तथाकथित पवित्रता से लेकर अनेकानेक धार्मिक आडम्बरों आदि पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता प्रतीत हुई। इसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र में भी कई समस्याओं यथा-जातिगत ऊंच नीच, सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता, नारी जाति की हीन दशा, निरर्थक लोकाचार, आदि की मीमांसा व समसामयिक उपयोगिता पर पुनचिन्तन आवश्यक हो गया। इस आत्म-चिन्तन एवं विद्रोही खण्ड २०, अंक ३ १५७ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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