Book Title: Shraman Parampara Ki Ruprekha
Author(s): Jodhsinh Mehta
Publisher: Bhagwan Mahavir 2500 Vi Nirvan Samiti

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Page 92
________________ विराय मूले धम्मे पन्नत्तं । -ज्ञात धर्म कथा 115 सव्वे पारणा पिच उश्रा, सुहसाया दुक्ख पडिकूला, प्रप्पियवा पिय जीविगो, जीविउ कामा सव्वेसि जीवियं पियं नाइवाएज्ज कंचरणं । - आचारांग 11213 श्रायंकदंसी न करेइ पावं । मुच्छा परिग्गहो वृत्तो । भासियव्वं हियं सच्चं । बहं लधुं न निहे, परिग्गहा अप्पाणां श्रवसविकज्जा । [78] - आचारांग 11312 - दश वैकालिक 6121 चरितं सम भावो सच्चमि घिs कुव्विहा । - प्राचारांग 11215 श्रादिन्नमने सुयरणो गहेज्जा । -उत्तराध्ययन 19120 - सूत्रकृतांग 1012 नो तुच्छर नोय विकत्थइज्जा | -सूत्रकृतांग 1114121 तवेसु वा उत्तम बंभचेरं । - पंचास्तिकाय 107 - आचारांग 11213 — सूत्रकृतांग 116123 कत्तारमेव श्रणुजाइ कम्मं । - उत्तराध्ययन 13123 दारणारण सेट्ठ अभयप्पयाणं । - सूत्रकृतांग 116113 Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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