Book Title: Samaysara Kalash
Author(s): Amrutchandracharya, Rajmal Pandey, Fulchandra Jain Shastri
Publisher: Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust

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Page 230
________________ Version 001: remember to check http://www.AtmaDharma.com for updates કહાનજૈનશાસ્ત્રમાળા ] સર્વવિશુદ્ધજ્ઞાન અધિકારી ૨૧૭ (७५.ति) समस्तमित्येवमपास्य कर्म त्रैकालिकं शुद्धनयावलम्बी। विलीनमोहो रहितं विकारैश्चिन्मात्रमात्मानमथावलम्बे।। ३७-२२९ ।। डान्वय सहित अर्थ:- ''अथ विलीनमोहः चिन्मात्रम् आत्मानम् अवलम्बे'' (अथ) अशुद्ध परितिन। भ241 3५२॥न्त (विलीनमोह:) भूगथी भटयो छ मिथ्यात्५५२९॥ ४नो मेयो हुं (चिन्मात्रम् आत्मानम् अवलम्बे) निस्१३५ ®यवस्तुने निरंत२. आस्वादु छु. वी. सास्वाई छु? विकारैः रहितं'' ४ २॥२॥-द्वेषमो६३५ अशुद्ध ५२तिथी रहित छे भेवी. डेपो छु इं? ''शुद्धनयावलम्बी'' (शुद्धनय) शुद्ध वस्तुने (अवलम्बी) अj j-सेवो छु. शुं २तो थो अयो छु? "इत्येवम् समस्तम् कर्म अपास्य'' (इति एवम् ) पूवोऽत प्रा२. ( समस्तम् कर्म) ४६i छ नव२९६ द्रव्य, २६ भाव, तमने (अपास्य) 4थी भिन्न ने-स्वा२नो त्या रीने. पुंछ २॥२॥ धर्भ ?' त्रैकालिकं' मतात-अनागतवर्तमान 5 संबंधी छ. 3७-२२८. (माया) विगलन्तु कर्मविषतरुफलानि मम भुक्तिमन्तरेणैव। सञ्चेतयेऽहमचलं चैतन्यात्मानमात्मानम्।।३८-२३०।। डान्वय सहित अर्थ:- ''अहम् आत्मानं सञ्चेतये'' कुं शुद्ध विद्रूपनेपोताने सास्थाई छु. पो छ सात्म॥ अर्थात, पोते ? "चैतन्यात्मानम्''नस्५३५मात्र छ. 4जी डेपो छ ? 'अचलं'' पोतन। स्व३५थी स्पासित नथी. अनुभव- ३०१ हे छ"कर्मविषतरुफलानि मम भुक्तिम् अन्तरेण एव विगलन्तु' (कर्म) १२९॥ पुद्रपिंऽ३५ ४ (विषतरु) विषतुं वृक्ष-डेम : यैतन्य प्रानुंघात -तेन (फलानि) ३१ अर्थात यानी सामग्री ( मम भुक्तिम् अन्तरेण एव) म॥२॥ भोगव्या विन॥ ४ ( विगलन्तु) भूगथी सत्ता सहित नष्ट हो. भावार्थ मा छ । Please inform us of any errors on rajesh@ AtmaDharma.com

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