Book Title: Prachin Madhyakalin Sahitya Sangraha
Author(s): Jayant Kothari
Publisher: L D Indology Ahmedabad

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Page 712
________________ ६९७ शब्दार्थ [वच्चेना क्रमांकमां पहेलो क्रमांक पृष्ठसंख्या तेमज दशांशचिह्न पछीनो क्रमांक ते पृष्ठ परनो पंक्तिक्रमांक सूचवे छे. पुस्तकना संपादक जयंत कोठारीनुं अवसान थतां, तेमणे तैयार करेल शब्दकोश (जे अधूरो छे) ज अहीं प्रसिद्ध कर्यो छे. सं. जयंत कोठारीए शब्दकोशमां लीधेला शब्दोमांथी केटलाकना अर्थ अनिर्णीत जणावाथी अर्थ नोंधवानुं बाकी राखेखें. एवा शब्दोने अहीं अर्थ विना ज समाव्या छे. केटलाक शब्दोना अर्थो एमणे प्रश्नार्थ साथे नोंधेला. तेवा शब्दोना अर्थ अहीं प्रश्नार्थचिह्न साथे आप्या छे.] अइ २७०.१६ अति, खूब अच्छेराभूत ३५.३ आश्चर्यभूत, विस्मयकारक अइसइ १६८.२९ अतिशय, चमत्कारिक अच्युत १४९१० विष्णु, (अहीं) कृष्ण (सं.) प्रभावक लक्षण अछइ ८.२५ छे (सं. आक्षेति) अउखरि ७२.१४ अजिय २१०.४ तीर्थंकर अजितनाथ अकामी १८३.१७ कामना वगरना (सं.) अजी २५०.२५ हजी (सं. अद्यापि) अकोटा १५२.२८ कानमा पहेरवानुं एक | अजीय १२०.६ हजी (सं. अद्यापि) आभूषण (सं. अर्कपत्र) अजुक्त २३.६ अजुगतुं, अयोग्य (सं. अयुक्त) अक्षय-ठांम १६.९ जेनो नाश नथी एवं मुक्तिधाम अजू २३८.२८ अद्य, हमणां ? अक्षित २२९.२३ अक्षत, अखंड अज्ज २०४.९ आज (सं. अद्य) अखय ४३.२६ अक्षय, अखूट १८८.५ नाश न | अज्जव २६४.१५ आर्जव, ऋजुता, सरलता पामे एवं अटक २८.१२ अख्यांणां १९९.११ मंगळ प्रसंगे भरवामां आवतुं | अटक १४०.१६ आकुंतेमु, मनफावतुं ? अखंड अनाज- पात्र (सं. अक्षतवायन) अटप-९६.२९ अगीतारथ २४४.२३ धर्मतत्त्वने नहीं जाणनार, अटाण ११०.२० संभवत: झीणा वस्त्रनो एक अविद्वान (साधु) प्रकार अगूरु-लघु ४३.२२ जे भारे नथी ने हलकुं पण | अटारडो १३५.८ अटकचाळो, तोफानी नथी तेवू अटारो ३६.१ अटकचाळो, वांको अग्र महिषी ४७.१२ पटराणी (सं.) अटालि ५४.२६ अटारी अघाडी २०.१६ अगाडी, आगळ, पासे अट्ठमट्ठम २७७.६ अट्ठम अने अट्ठम (त्रण अचिल ७१.५ अचल सळंग उपवासनुं तप) अचंभ २३७.४ आश्चर्यकारक (सं. अत्यद्भुत) | अट्ठावय २०२.२४ अष्टापद (पर्वत) अचेरा २८०.११ आश्चर्यकारक अठम २११.१३ आठमुं (सं. अष्टम) अच्चब्भुअ २१८.३० अत्यंत विस्मयकारक (सं. | अठोतर २६७.१८ (अमुक उपरांत) आठ अत्यद्भुत) अठोतर सो १६५.२१ सो उपर आठ, एकसो Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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