Book Title: Pandav Purana athwa Jain Mahabharat
Author(s): Ghanshyamdas Nyayatirth
Publisher: Jain Sahitya Prakashak Samiti

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Page 354
________________ पाण्डव-पुराण हिस्सेका आधा राज्य दिया और न अब भी अपना दुराग्रह छोड़ते हैं। इसीका यह फल है कि इस युद्धमें आपके सौ भाइयोंका सर्वनाश हो गया। और अन्यसेनाका तो इतना संहार हुआ कि उसका तो कुछ पता ही नहीं है। अतः नाय, अव आप स्थिर होकर रहें तो अच्छा है, जिससे कुछ और उपद्रव खड़ा न हो। सुन कर दुर्योधनने उससे कहा कि कायर ! तू यह क्या कहता है । देख, मैं तभी मरूँगा जब पांडवोंकी सत्ता भी संसारसे उठा दूंगा; और तरह मैं कदापि मरनेका नहीं । यह कह कर वह प्रचंड पांडवोंकी सेनाके साथ फिर युद्ध करनेको चला । दोनों ओरकी सेनायें महान अहंकारसे भरी हुई दौड़ी। तलवारें हाथमें लिये हुए उनके शूरवीर योद्धा ' मारो मारो कहते हुए परस्परमें भिड़ गये । वे एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। उस समय एक योद्धा दूसरेसे कहता था कि वीरो, या तो अपना शरीर हमें सौंपदो या युद्धकी लालसाका शमन करो। और तरह तुम्हारी भलाई न होगी। इसी समय युधिष्ठिर मद्राधिपके साथ और भीम महान् युद्ध करनेवाले दुर्योधन के साथ भिड़ पड़ा । उधर कर्णके तीन पुत्र नकुलके साय युद्ध करने लगे । वीर नकुलने थोड़े ही समयमें अपनी तलवारको आठ योद्धाओंका खून पिला कर उन्हें धराशायी कर दिया। उसने कर्णके पुत्रोंके साथ भी डटके युद्ध किया । इसी समय बुद्धिमान् दुर्योधनने भीमके धनुषको छेद डाला । तब भीमने हाथमें शक्ति ली और दुयोधनके वक्षःस्थलमें एक ऐसा प्रहार किया कि वह मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा । इसके बाद वह थोड़ी देरमें जब होशमें आया तब उसे बड़ा भारी क्रोध आया और वह एक दम भीम पर टूट पड़ा । फल यह हुआ कि उसने जलचर, नभचर और थलचर बाणोंके द्वारा भीमको बिल्कुल ही पूर दिया और उसका कवच छेद डाला। - अपना यह हाल देख भीमके क्रोधका कुछ पार न रहा और गदा हाथमें लेकर उसने कोई बीस हजार योद्धाओंको यमपुर भेज दिया और आठ हजार रथोंको चूर डाला; तथा असंख्य हाथी-घोड़ोंको माण-रहित कर दिया । सच तो यह है कि भीम जहाँ जहाँ जाता था वहाँ वहाँ उसके डरके मारे कोई भी राजा न ठहरता था-सव अपने अपने मनोरथ व्यर्थ समझ कर भागते थे । अथवा यो कहिए कि भीम जिस किसीके, ऊपर अपनी दृष्टि डालता था वही यमलोकका शरण लेता था।

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