Book Title: Mahabandho Part 1
Author(s): Bhutbali, Sumeruchand Diwakar Shastri
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 470
________________ पर्याडबंधा हियारो ३४५ 1 तेजाक० बंध० जीवा विसे० । सव्वत्थोवा वेउन्वि० अंगो० बंधगा जीवा । ओरालि० अंगो० बंधगा जीवा असंखेज० । दोण्णं अंगो० बंधगा जी० विसेसा० । अबंधगा जीवा असंखेज ० । परघादुस्सा० अबंध० जीवा थोवा । बंधगा जीवा असंखेज० । अगु० उप० बंधगा जीवा विसेसा० । आदावुञ्जव-देवोघं । सव्वत्थोवा सुहुमादितिणि बंधगा जीवा । तप्पडिपक्खाणं बंधगा जीवा असंखेजगुणा । दोष्णं बंधगा जीवा -विसेसा० । आभि० सुद० अधि० - सव्वत्थोवा पंचणा० अबंधगा जीवा । बंधगा जीवा असंखेज ० । एवं अंतराइगं । सव्वत्थोवा चदुदंस० अबं० जीवा । णिद्दापचलाअबं० जी० विसेसा० । बंधगा जीवा असंखेज्जगु० । चदुदंस० बंध० जीवा विसेसा० । दोवेदणी० देवोधं । सव्वत्थोवा लोभसंज० अबं० जीवा । मायासंज० अ० जीवा विसेसा० । माणसंज० अ० जीवा विसेसा० । कोधसंज० अ० जीवा विसेसाहिया । पच्चक्खाणावर०४ अबंध० जीवा संखेज० । अपच्चक्खाणावर०४ अबंध० जीवा असंखेजगु० | बंध० जीवा असंखेज ० । पच्चक्खाणा०४ बंध० जीवा विसेसा० । कोधसंज० बंध० जीवा विसेसा० । माणसंज० बंध० जीवा विसे० । मायासंज० बंध० हैं। कर्मण के बन्धक जीव विशेषाधिक हैं । वैक्रियिक अंगोपांगके बन्धक जीव सर्वस्तोक हैं । औदारिक अंगोपांगके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। दोनों अंगोपांगके बन्धक जीव विशेषाधिक हैं । अबन्धक जीव असंख्यातहैं। विशेषार्थ - आहारकद्विकका बन्ध अप्रमत्त गुणस्थान में होनेसे यहाँ उनका वर्णन नहीं किया गया है । परघात, उच्छ्वासके अबन्धक जीव स्तोक हैं । बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । अगुरुलघु, उपघातक बन्धक जीव विशेषाधिक हैं। आतप, उद्योतके विषय में देवोघवत् जानना चाहिए । सूक्ष्मादि ३ के बन्धक जीव सर्वस्तोक हैं। इनके प्रतिपक्षी बादरादि ३ के बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। दोनोंके बन्धक जीव विशेषाधिक हैं । आभिनिबोधक, श्रुत, अवधिज्ञान में ५ ज्ञानावरणके अबन्धक जीव स्तोक हैं। बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं। ऐसा ही अन्तराय वर्णन जानना चाहिए अर्थात् अबन्धक जीव सर्वतोक है और बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । ४ दर्शनावरण के अबन्धक जीव सबसे कम हैं। निद्रा, प्रचलाके अबन्धक जीव विशेषाधिक हैं। इसके बन्धक जीव असंख्यातगुणे हैं । ४ दर्शनावरणके बन्धक जीव विशेषाधिक हैं । दो वेदनीयके बन्धक, अबन्धक जीवों में देवोघवत् जानना । लाभ-संज्वलन के अबन्धक जीव सबसे स्तोक हैं । माया-संज्वलन के अबन्धक जीव विशेष अधिक हैं। मान-संज्वलन के अबन्धक जीव इनसे कुछ अधिक हैं । क्रोध-संज्वलन के अबन्धक जीव विशेष अधिक हैं । प्रत्याख्यानावरण ४ के अबन्धक जीव संख्यातगुणे हैं । अप्रत्याख्यानावरण ४ के अवन्धक जीव असंख्यात गुगे हैं तथा बन्धक जीव असंख्यात गुणे हैं । प्रत्याख्यानावरण ४ के बन्धक जीव विशेषाधिक हैं । क्रोध-संज्वलन के बन्धक जीव विशेषाधिक हैं । मान-संज्वलनके बन्धक जीव विशेषाधिक हैं । माया-संज्वलनके बन्धक जोव ४४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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