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बैठा नम्र हो सन्मुख जी । कथा सुणन चित दीन ॥ भवि ॥ ९॥ परिषद भरी जोयनेजी। दे मुनीवर उपदेश ॥ भव निवारण कारणेजी । समज्यो धर्म कीरेस ॥ भवि ॥ १०॥ धर्म | अनेक प्रकारका जी । पण मुख्य छे दो भेद ॥ पुद्गलीने आत्मिक लखोजी । पुद्गली देवे खेद ॥ भवि ॥ ११ ॥ पुद्गल के परिषय थकी जी। भमियों अनंत संसार ॥ जेह वमन कर आवियो | जी । तस भख्यो अनंत वार ॥ भवि ॥ १२ ॥ तो पण तृप्ती नहीं भइ जी। अधिक २ भइ चहाय ॥ अग्नीनी परे तृष्णाजी । सर्व भक्षवा जाय ॥ भवि ॥ १३ ॥ नटवाकी परे नाचियो |
जी । करी अनंता रूप ॥ पुद्गलकी ममता थकीजी। पड्यो भवांतर कूप ॥ भाव ॥ १४ ॥ २ रोगी | शुद्ध लहो हिवे तेहंनी जी। थावो मा गिल्याण ॥ बमण भोग इच्छा तजो जी । येही
| खरो विन्नाण ॥ भवि ॥ १५ ॥ आत्मिक धर्म ते जाणिये जी । धरेन पुद्गल प्रेम ॥ पूरे
गले मिल वीछडे जी। तेह थकी किसी क्षेम | भवि ॥ १६ ॥ अनंतकालकी संगती जी। | सहजे नहीं तजाय ॥ सम्यक्य देशवृती लही जी । अणगारी जब थाय ॥ भवि ॥ १७
॥ मयांदा संकोचता जी। अहार वस्त्रने योग ॥ भावे कषाय घटावता जी । जेह * अनादी रोग ॥ भवि ॥ १८ ॥ इम गुणस्थान रोहता जी । आत्म ध्यान लगाय ।। 1 लीन होवे निज रूपमें जी । सहू विकल्प मिटाय ॥ भवि ॥ १९ ॥ धर्म ए आत्म
ओलखी जी । तजी कर्मनो भर्म ॥ निष्फल श्रम जे नीपजेजी । वरो उंचो ए वर्म ॥