Book Title: Karmagrantha Part 2
Author(s): Devendrasuri, Shreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
Publisher: Marudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
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कर्मस्तव : परिशिष्ट
५=१४ का उदय बारहवें गुणस्थान के अन्तिम समय तक ही रहता है। अतः ५५–१४ =४१ तथा तीर्थंकर नामकर्म का उदय सम्भव है अतः ४१+१-४२ प्रकृतियों का उदय सम्भव
१४. अयोगिकवली मुल ४
उ० १२ औदारिकद्विक (औदारिकशरीर औदारिक-अंगोपांग) अस्थिरद्विक (अस्थिरनाम, अशुभनाम), खगतिद्विक (शुभविहायोगति, अशुभविहायोगति) प्रत्येकत्रिक (प्रत्येकनाम, शुभनाम, स्थिरनाम) संस्थानषट्क (समचतुरस्र, न्यग्नोध, सादि, वामन कुम, हुंड) अमुलपातुम्का (अगुरुलथु, उपघात, पराघात, उच्छ्वास नाम) वर्णचतुष्क (वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श) निर्माणनाम, तंजसशरीर, कार्मणशरीर, वजऋषभनाराचसंहनन दुस्वर, सुस्वर, साता या असातावेदनीय में से कोई एक, यह ३० प्रकृतियाँ तेरहवें गुणस्थान के अन्तिम समय तक ही उदय को पा सकती है । अतः इनको घटाने पर शेष ४२.३० = १२ प्रकृतियों चौदहवें गुणस्थान में रहती हैं। शेष जिन १२ प्रकृत्तियों का उदय चौदहवं गुणस्थान के अन्तिम समय तक रहता है, वे यह हैंसुभगनाम, आदेयनाम, यश:कोतिनाम, साताअसाता में से कोई एक वेदनीय कर्म, सत्रिक (सनाम, बादरनाम, पर्याप्तनाम) पंचेन्द्रिय