Book Title: Jain Hiteshi 1913 Ank 09
Author(s): Nathuram Premi
Publisher: Jain Granthratna Karyalay

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Page 57
________________ ५६५ अर्थात-मनुष्यके शरीरमें जो साढ़े तीन करोड़ रोम हैं उतने ही तीर्थ हैं। दूसरे शरीर पर जो स्नान जल रहता है उसे मस्तक परसे देव, मुखपरसे पितर, शरीरके मध्यभाग परसे यक्ष गंधर्व और नीचेके भाग परसे अन्य सब जन्तु पीते हैं। इस लिए शरीरके अंगोंको पोंछना नहीं चाहिए। : जैनसिद्धान्तसे जिन पाठकोंका कुछ भी परिचय है, वे ऊपरके इस कथनसे भलेप्रकार समझ सकते हैं कि, त्रिवर्णाचारका यह तर्पण. विषयक कथन कितना जैनधर्मके विरुद्ध है। जैनसिद्धान्तके अ नुसार न तो देव पितरगण पानीके लिए भटकते या मारे मारे फिरते हैं और न तर्पणके जलकी इच्छा रखते या उसको पाकर तृप्त और संतुष्ट होते हैं। इसी प्रकार न वे किसीकी धोती आदिका निचोड़ा हुआ पानी ग्रहण करते हैं. और न किसीके शरीर परसे स्नानजलको पीते हैं। ये सब हिन्दूधर्मकी क्रियायें हैं । हिन्दुओंके यहाँ साफ लिखा है कि, जब कोई मनुष्य स्नानके लिए जाता है, तब प्याससे विह्वल हुए देव और पितरगण पानीकी इच्छासे वायुका रूप धारण करके उसके पीछे पीछे जाते हैं। और यदि वह मनुष्य स्नान करके वस्त्र (धोती आदि) निचोड़ देता है तो वे देव पितर निराश होकर लौट जाते हैं। इसलिये तर्पणके पश्चात् वस्त्र निचोड़ना चाहिए, पहले नहीं। जैसा कि निम्न लिखित वचनसे प्रगट है: " स्नानार्थमभिगच्छन्तं देवाः पितृगणैः सह । बायु भूतास्तु गच्छन्ति तृषार्ताः सलिलार्थिनः ॥ " निराशास्ते निवर्तन्ते वस्त्रनिष्पीडने कृते। अतस्तर्पणान्तरमेव वस्त्रं निष्पीडयेत् ॥" -स्मृतिरत्नाकरे वृद्ध वसिष्ठ" । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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