Book Title: Dharm Pravarttan Sara Granth
Author(s): Surchandbhai Swarupchand Shah
Publisher: Ratanchand Laghaji Shah

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Page 329
________________ श्री शु३मतिना रास. १ ॥निज पदमां रे, झान ध्यान रंग ते मची ॥ मूळ रूपेरे, धर्म अनंतो रह्यो जदा ॥ तेमां वसीये रे, ते सेवा पूजा तदा ॥ त्रुटक ॥ अनंत गुण पर्याय धारे, तेनो संग बोमे है नही ॥ परद्रव्य पक्ष अग्राहक, चेतन धर्म रह्यो नही ॥ १ & आनंद वृद्धि व्यक्ति फूरणा, लहेर डे उपयोगमां ॥ ते । सेवा में जाणी प्यारी, प्रमोद ने मुज अंगमां ॥ ७॥6 & किरिया सातमी रे, चेतन शमता नावमां ॥ पंथ शोधेरे, ा समिति अदोषमां ॥ पुद्गलमां रे, प्रवेश ते सावद्य कह्यो । निजव्यमां रे, प्रवेश ते निर्वद्य लह्यो ॥ त्रुटक ॥ नाषा समिति विवेक करवो, पुद्गल पांचमी वर्गणा ॥ ते वस्तु नही थापणी, निजगुण नास मुज लक्षणा ॥ एषण। समिति त्रीजी, आहार लेवो निर्वद्य ए॥ केवळ झानी सावद्य देखे, निर्वद्य निज गुण माहिए ॥ ७ ॥ चोथी समितिरे, आदान निखेपणमां कही ॥ आदानते रे, चेतन गुण लेवे सही ॥ निषेपण रे, परवस्तु पुद्गलनुं ॥ श्म कीजे रे, ग्रहण निज खेपण परनुं ॥ त्रुटक ॥ पारित वणिया पांचमी, समिति चेतन रक्षणा ॥ रागद्वेष विन्नाव सरवे, तजवि कार्मण वर्गणा ॥ ए समिति शीवपद आपे, मळ रहित चेतन करे ॥ ते दिवस मंगलिकनी माळा, परमानंद पदने वरे ॥ ए ॥ किरिया आठमीरे, ध्यान करे स्वनावमां, चेतन गुण रे, निर्मळ शक्ति नावमां। मुज व्यE क्तिरे, परसंगे परने लगें ॥ ते अघटितरे, परधर्मीपणो । का तजु ॥ त्रुटक ॥ निजव्य स्वन्नाव धर्मे, उपयोग स्थिर है Prasairamananews GrearrangeGIRGARGIRGAR PROGraGorakGRAGardGGAGruare Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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