Book Title: Bhagvati Sutram Part 02
Author(s): Sudharmaswami, 
Publisher: Hiralal Hansraj

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Page 219
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir व्याख्याप्रज्ञप्ति ॥५४१॥ ७ शतके उद्देशः८ . नेरइयाणं भंते ! पावे कम्मे जे य कडे जे य कज्जइ जे य कजिस्सइ सम्वे से दुक्खे, जे निजिने से सुहे?, हंता गोयमा ! नेरइयाणं पावे कम्मे जाव सुहे, एवं जाव वेमाणियाणं (सूत्रं २९४)॥ [प्र०] हे भगवन् ! नारकोवडे जे पापकर्म करायेलं छे. कराय के अने कराशे ते सघळु दुःखरूप ले, अने जे निर्जीण (क्षीण) ययुं ते सुखरूप छे ? [उ०] हा, गौतम! नारकोवडे जे पापकर्म करायं (ते दुःखरूप छे, अने जे निर्जीण थयु) ते यावत् सुखरूप छे, ए प्रमाणे यावत् वैमानिकोने जाणवू. ॥ २९४ ॥ कति णं भंते ! सन्नाओपन्नत्ताओ?, गोयमा ! दस सन्नाओ पन्नत्ताओ, तंजहा-आहारमन्ना १ भयसन्ना २ नेहुणसन्ना ३ परिग्गहमन्ना ४ कोहसन्ना ५ माणसन्ना ६ मायासन्ना ७ लोभसन्ना ८ लोगसन्ना ९ ओहसन्ना १०, एवं जाव वेमाणियाणं । नेरइया दसविहं वेयणिज्जं पच्चणुभवमाणा विहरंति, तंजहा-सीयं उसिणं खुहं पिवासं कंडु परज्झं जरं दाहं भयं सोगं ॥ (सूत्रं २९५)॥ [प्र०] हे भगवन् ! संज्ञाओ केटली कहेली छे ? [उ०] दश संज्ञाओ कही छे. जेम, १ आहारसंज्ञा, २ भयसंज्ञा, ३ मैथुनसंज्ञा, | ४ परिग्रहसंज्ञा, ५ क्रोधसंज्ञा, ६ मानसंज्ञा, ७ मायासंज्ञा, ८ लोभसंज्ञा, ९लोकसंज्ञा, अने १० ओघसंज्ञा. ए प्रमाणे यावत् वैमानिकोने जाणवू. [प्र०] नारको दश प्रकारनी वेदनानो अनुभव करता होय छे ते आ प्रमाणे-१ शीत, २ उष्ण, ३ क्षुधा, ४ पिपासा-तरस, ५ कंडू-खरज, ६ परतन्त्रता, ७ ज्वर, ८ दाह, ९ भय, १० शोक. ।। २९५॥ से नूणं भंते ! हथिस्स य कुंथुस्स य समा चेव अपञ्चक्खाणकिरिया कजति ?, हंता गोयमा! हथिस्स य 44444494%%%% For Private and Personal Use Only

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