Book Title: Aavashyak Niryukti
Author(s): Fulchand Jain, Anekant Jain
Publisher: Jin Foundation

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Page 256
________________ आवश्यकनियुक्तिः २. स्थापना-कायोत्सर्ग परिणत प्रतिमा । ३. द्रव्य–सावद्यद्रव्य सेवन से उत्पन्न दोष के नाशार्थ कायोत्सर्ग करना, अथवा कायोत्सर्ग प्राभृतशास्त्र को जानने वाला जो उसमें उपयुक्त न हो वह पुरुष और उसके शरीर को, भावीजीव, उसके तद्व्यतिरिक्तकर्म और नोकर्म-इनको द्रव्यकायोत्सर्ग कहते हैं । ४. क्षेत्र—पापयुक्त क्षेत्र से आने पर दोषों के नाशार्थ किया जाने वाला अथवा कायोत्सर्ग में युक्त व्यक्ति जिस क्षेत्र में बैठा है वह क्षेत्र कायोत्सर्ग है । ५. काल-सावद्यकाल के दोष परिहार के लिए किया जानेवाला कायोत्सर्ग, अथवा कायोत्सर्ग में युक्त पुरुष जिस काल में है वह काल कायोत्सर्ग ६. भाव-मिथ्यात्व आदि अतिचारों के परिहारार्थ किया जाने वाला कायोत्सर्ग अथवा कायोत्सर्ग प्राभृतशास्त्र के ज्ञाता और उपयोग युक्त आत्मा तथा आत्मप्रदेश भाव कायोत्सर्ग है । भगवती आराधना की विजयोदया टीका में योग के सम्बन्ध से मन, वचन और काय की दृष्टि से कायोत्सर्ग के तीन भेद बताये हैं-१. "ममेदं" -यह शरीर मेरा है इस भाव की निवृत्ति मन:कायोत्सर्ग है । २. मैं शरीर का त्याग करता हूँ-इस प्रकार के वचनों का उच्चारण करना वचनकृत कायोत्सर्ग है । ३. प्रलम्बभुज (बाहु नीचे लटकाकर) होकर, दोनों पैरों में चार अंगुलमात्र का अन्तर कर समपाद निश्चल खड़े होकर कायकृत कायोत्सर्ग है ।' ___ आवश्यचूर्णिकार के अनुसार कायोत्सर्ग के दो मुख्य भेद-द्रव्य और भाव । इनमें द्रव्यकायोत्सर्ग का अर्थ का काय चेष्टा का निरोध अर्थात् शरीर की चंचलता एवं ममता का त्याग एवं जिनमुद्रा में निश्चल खड़े होना है । भावकायोत्सर्ग से तात्पर्य है धर्मध्यान एवं शुक्लध्यान में रमण करना । ___द्रव्य और भाव दृष्टि से भेद-इन द्रव्य और भाव इन दोनों दृष्टियों से भेद समझाने के लिए मूलाचारकार ने कायोत्सर्ग के चार भेद किये हैं । १. २. भगवती आराधना विजयोदया टीका-५०९, पृष्ठ ७२८ । सो पुण काउस्सगो दव्वत्तो भावतो य भवति । दव्वतो कायचेट्ठानिरोहो भावतो काउस्सग्गो झाणं ॥ आवश्यक चूर्णि उत्तरार्द्ध १५४८ । मूलाचार ७।१७६, भगवती आराधना वि०टी० ११६ । ३. Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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