Book Title: Shrutsagar 2017 03 Volume 10
Author(s): Hiren K Doshi
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir RNI:GUJMUL/2014/66126 ISSN 2454-3705 । श्रतसागर। SHRUTSAGAR (MONTHLY) Mar-2017, Volume : 03, Issue:10, Annual Subscription Rs. 150/- Price Per copy Rs. 15/EDITOR: Hiren Kishorbhai Doshi BOOK-POST / PRINTED MATTER SYOYOY जिन स्थापना पट्ट का एक अंश आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर For Private and Personal Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir शांतिग्राम (टाउनशीप) मध्ये जिनबिंब प्रवेशोत्सव के पावन पल •न माना नाममा विषागरम जारी राष्ट्रसंत पूलवावर आचार्य श्री पनसागरसूरीश्वर महाराज आरिप्रभल-धमाशी शालिगाम शांतिग्राम टाउनशीप में शिष्य-प्रशिष्यों के साथ बिराजमान पूज्य गुरुभगवंतश्री जिनबिंब प्रवेशविधि में उपस्थित पूज्य गुरुभगवंतश्री Kur fashagavagar मिरा-ममा पूज्य गुरुभगवंतश्री को कामळी अर्पित करते हुए श्री गौतमभाई अदाणी For Private and Personal Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir RNI : GUJMUL/2014/66126 ISSN 2454-3705 (आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर का मुखपत्र श्रुतसागर श्रुतसागर SHRUTSAGAR (Monthly) वर्ष-३, अंक-१०, कुल अंक-३४, मार्च-२०१७ Year-3, Issue-10, Total Issue-34, March-2017 वार्षिक सदस्यता शुल्क-रु. १५०/- * Yearly Subscription - Rs.150/अंक शुल्क - रु. १५/- * Issue per Copy Rs. 15/ आशीर्वाद राष्ट्रसंत प. पू. आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. * संपादक * * सह संपादक * *संपादन सहयोगी * हिरेन किशोरभाई दोशी रामप्रकाश झा भाविन के. पण्ड्या एवं ज्ञानमंदिर परिवार १५ मार्च, २०१७, वि. सं. २०७३, फाल्गुन-कृष्ण-३ न आराध बा कन्भ दहावीर श्री काबा 1 अमृतं तु विद्या সুকাকু आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर (जैन व प्राच्यविद्या शोध-संस्थान एवं ग्रन्थालय) श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा, गांधीनगर-३८२००७ फोन नं. (079) 23276204, 205, 252 फैक्स : (079) 23276249, वॉट्स-एप 7575001081 Website : www.kobatirth.org Email : [email protected] For Private and Personal Use Only Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir अनुक्रम रामप्रकाश झा 7 1.संपादकीय 2. पूजा हेतु 3. Beyond Doubt 4. शिक्षाशतबोधिका 5. छिन्नू जिनवरांरौ स्तवन 6. पुस्तक समीक्षा 7. जैन न्यायनो विकास आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरिजी Acharya Padmasagarsuri गणि सुयशचंद्रविजयजी आर्य मेहुलप्रभसागर भाविन के. पण्ड्या मुनि श्री धुरंधरविजयजी भाविन के. पण्ड्या 8. समाचार सार * प्राप्तिस्थान आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर तीन बंगला, टोलकनगर, होटल हेरीटेज़ की गली में डॉ. प्रणव नाणावटी क्लीनिक के पास, पालडी अहमदाबाद - ३८०००७, फोन नं. (०७९) २६५८२३५५ * सौजन्य * स्व. श्री पारसमलजी गोलिया व स्व. श्रीमती सुरजकँवर पारसमल गोलिया की पुण्य स्मृति में हस्ते : चाँदमल गोलिया परिवार की ओर से बीकानेर - मुम्बई KISRm-MEED For Private and Personal Use Only Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir संपादकीय रामप्रकाश झा श्रुतसागर का यह नवीन अंक आपके करकमलों में सादर समर्पित करते हुए अपार आनन्द की अनुभूति हो रही है। इस अंक में गुरुवाणी शीर्षक अन्तर्गत योगनिष्ठ आचार्यदेव श्रीमद बुद्धिसागरसूरीश्वरजी म. सा. का लेख “पूजा हेतु” का प्रथम अंक प्रकाशित किया जा रहा है। इस लेख में जिनेश्वर वीतराग प्रभु के पूजन करने का उद्देश्य स्पष्ट किया गया है, इस लेख से “देवं भूत्वा यजेत् देवम्” सूक्ति आध्यात्मिक रूप से चरितार्थ हो रही है। द्वितीय लेख राष्टसंत आचार्य भगवंत श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. के प्रवचनांशों की पुस्तक 'Beyond Doubt' से क्रमबद्ध श्रेणी के अंतर्गत संकलित किया गया है। __ अप्रकाशित कृति प्रकाशन स्तंभ के अन्तर्गत इस अंक में दो कृतियाँ प्रकाशित की जा रही है। प्रथम कृति कवि हंसरत्नप्रणीत “शिक्षाशतबोधिका” नामक एक आलोचनात्मक काव्य जिसमें कर्ता ने सरल भाषा में धर्म-अधर्म, सुगुरु-कुगुरु, ज्ञान-अज्ञान आदि विषयक आत्मप्रतिबोधात्मक शैली में उपदेश दिया है। इसका संपादन गणिवर्य श्री सुयशचन्द्रविजयजी म. सा. ने किया है। द्वितीय कृति खरतरगच्छीय उपाध्याय श्री लक्ष्मीवल्लभजी म.सा. द्वारा रचित “छिन्नं जिनवरारौ स्तवन" है जिसका सम्पादन आर्य मेहलप्रभसागरजी म. सा. ने किया गया है। इस कृति में कर्ता ने ४ ढालों में २४ अतीत, २४ अनागत, २४ वर्तमान, २० विहरमान व ४ शाश्वत इस तरह कुल ९६ जिनवरों की स्तुति-वंदना की है। पुस्तक समीक्षा के अन्तर्गत आर्य श्री मेहुलप्रभसागरजी द्वारा २ भागों में संकलित उपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी की कृतियों का संकलन “क्षमाकल्याणजी कृति संग्रह” नामक पुस्तक का समीक्षात्मक विवरण प्रस्तुत है । उपाध्याय क्षमाकल्याणजी के द्विशताब्दी स्वर्गारोहण वर्ष के उपलक्ष्य में प्रकाशित पुस्तक की समीक्षा ज्ञानमंदिर के पंडित श्री भाविनभाई पण्ड्या ने लिखी है, यह पुस्तक विद्वानों एवं संशोधकों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। __ पुनःप्रकाशन श्रेणी के अन्तर्गत इस अंक में आचार्य श्री धुरंधरसूरीश्वरजी द्वारा लिखित लेख “जैन न्यायनो विकास” गतांक से आगे का अंश प्रकाशित किया जा रहा है. इसमें जैन दार्शनिक ग्रन्थकारों में से श्री वीराचार्य, श्री मुनिचंद्रसूरि, श्री चंद्रसूरि, मलधारी श्री हेमचंद्रसूरि जैसे महापुरुषों के जीवन-कवन का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। ___आशा है इस अंक में संकलित सामग्री द्वारा हमारे वाचक लाभान्वित होंगे व अपने महत्त्वपूर्ण सुझावों से अवगत कराने की कृपा करेंगे, जिससे अगले अंक को और भी परिष्कृत किया जा सके। For Private and Personal Use Only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir पूजा हेतु आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरिजी संवत् १९६७ जिनेश्वर प्रभुनां नव अंगे पूजा करवानां हेतुओ शास्त्रोमां दर्शाव्यां छे. प्रभुनां गुणो लेवाने माटे प्रभुनी पूजा करवानी जरूर छे. वीतराग देव पर शुद्ध प्रेम प्रगटवाथी वीतराग प्रभुनी दशा प्राप्त करवा विचारो प्रगट्या करे छे. वीतरागनी प्रतिमा देखीने वीतराग दशानुं स्मरण करवू अने प्रभुनां जेवी पोतानामां वीतराग दशा प्रगटाववा प्रयत्न करवो. प्रभुनी प्रतिमा देखीने वारंवार तेमनां जीवन चरित्रनु स्मरण थाय छे अने तेथी तेमनां गुणोनुं वारंवार स्मरण थाय छे. शुद्ध प्रेम पूर्वक गुणोनुं स्मरण करवाथी हृदयमां गुणोना संस्कार पडे छे अने अन्ते वीतरागना जेवा गुणो पोताना आत्मामां प्रकटी नीकळे छे. कारण पामीने वीतरागनां गुणोनुं स्मरण थाय छे. प्रभुनां गुणोनुं स्मरण करवाने माटे प्रभुनी प्रतिमानी आवश्यकता छे. कारण के प्रभुनी प्रतिमारूप आलंबन पामीने भक्तो प्रभुनां गुणोनुं स्तवन, मनन, स्मरण करी शके छे. प्रभुनी प्रतिमामां प्रभुनो आरोप करवामां आवे छे अने प्रभुनी आगळ भक्तो दोषो टाळीने गुणो लेवाना विचारो करे छे. प्रभुनां गुणो स्मरण करीने पोतानामां रहेलां दुर्गुणो काढवाने माटे दृढ प्रतिज्ञाओ करे छे. प्रभुनां गुणो प्राप्त करवा माटे प्रभुनी प्रतिमानी पूजा करे छे. पूजानां अनेक भेदो वडे प्रभुने पूजे छे. प्रभुनां सेवक बनीने भक्तो पोताना हृदयना उभराओ बहार काढे छे अने प्रभुने हृदयमां स्थापन करे छे. जेटली वखत सुधी प्रभुनां गुणोनु कीर्तन करवामां आवे छे तेटली वखत सुधी आत्मा पोताना स्वभावमा रमणता करे छे अने तेनाथी हृदयमां गुणोनां बीजो वावे छे के जे कालान्तरे वृक्ष रूपे देखाय छे. संसारी जीवो जेवां जेवां कारणो पामे छे तेवां तेवां प्रकारना विचारो करवामां तत्पर थइ जाय छे. संसारी जीवो बाह्य अनेक कारणोने प्राप्त करीने दीवसनो मोटो भाग संसारमा व्यतीत करे छे तेवां जीवोने जिनप्रतिमान आलंबन मळे छे तो प्रभुनां गुणो प्राप्त करवा तरफ तेओर्नु मन वळे छे. प्रभुनां जमणा पगना अंगुठे पूजा करीने मनमां एवं विचारवं के भगवान् पगना बळ वडे देशोदेश विचर्यां छे. अनेक जीवोने बोध आपीने तारवामां पगनी साहाय लीधी छे माटे प्रभुनां जमणा पगने पूजीने आपणे पण प्रभुनां जमणा पगनी पेठे धर्मनां कार्यो करवां जोइए. चरण कमल पूजीने सेवाधर्म स्वीकारवो जोइए. आखा For Private and Personal Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR March-2017 शरीरमां पग सेवकनुं कार्य करे छे. आखा शरीरनो आधार पग पर छे तेम सर्व धर्मनो आधार सेवाधर्म छे. जेओ प्रथम सेवक बने छे तेओ पश्चात् स्वामी बनवाने लायक बने छे. जेओ सेवाधर्मनो जाते अनुभव ग्रहण करतां नथी तेओ स्वामी थइ शकता नथी. सेवाधर्म प्रथम शिखवो जोइए अने सेवाधर्म प्रथम करवो जोइए. प्रभुए पगनो जगत् जीवोनुं श्रेयः करवा उपयोग कर्यो छे ते प्रमाणे आपणे पण तेमनां चरण कमळ पूजीने तेमनां चरण कमलनो सेवा धर्म स्वीकारशुं त्यारे खरेखरा सेवक बनी शकीशु. मोटा थq होय तो सेवाधर्म स्वीकारो. एम प्रभुनां चरणकमल पूजननो सार ग्रहण करो. प्रभुनां चरणकमल पूजीने सेवाधर्म स्वीकारीने आपणे ते प्रमाणे वर्तीए तो पोतानुं अने जगत- केटलुं बधुं कल्याण करी शकीए ? तेनो ख्याल करवो जोइए. प्रभुनां चरणकमल पूजनारे पोतानी शक्ति वडे सेवा धर्म करवो जोइए. जैनधर्मनी सेवामां दररोज भाव अने आचार वधे तो समजवू के प्रभुनां चरणकमलनी खरेखरी पूजा करवामां आवे छे. सेवक बनीने जैनोए प्रत्येक धर्मकार्यो करवां जोइए, अने बाह्य पदवी वगैरेनी इच्छाओनो त्याग करवो जोइए एम चरण कमलनी पूजा जणावे छे. सेवाधर्म करवामां युगलिकोनी पेठे विनयनी जरूर रहे छे. जैनशासननी उन्नति करवी होय वा जगतनुं कल्याण करवू होय तो प्रभुचरणनां सेवक बनीने प्रभुचरणनां गुणो ग्रहण करी ते प्रमाणे वर्तो. जानु बळे प्रभु कायोत्सर्गमा रह्यां हतां. कायोत्सर्गमां जानुए सहायआपी हती आपणे पण जानुनो गुण ग्रहण करीने अन्योने धर्मकार्योमां सहाय आपवी जोइए. जानुने पूजीने प्रत्येक जीवोने सुकार्यमा सहाय आपवानो आत्मामां गुण प्रगटाववो जोइए. जानुना जेवा गुणो प्रगटाववा माटे दररोज प्रयत्न करवो जोइए. प्रभुनां हस्तनी पूजा करीने आपणे प्रभुनां हस्तनी पेठे प्रवृत्ति करवी जोइए. पूर्वे गृहस्थावासमां तीर्थंकरोए सांवत्सरिक दान आप्यु हतुं, तद्वत् संसारमा रहेनारा मनुष्योए पण प्रभुनां हस्तनी पूजा करीने पोताना हस्त वडे सुपात्रोमां दान देवू जोइए. प्रभुना हस्ते अनेक पारमार्थिक कार्यो कर्यां छे माटे ते पूज्य बन्यो छे, अने तेनी पूज्यताना हेतुओने आपणे पण ग्रहण करीने आपणां हस्तने पूज्य बनाववो जोइए. प्रभुनां हस्तनो गुण लेवा माटे प्रभुनां हस्तनी पूजा करवामां आवे छे. वीतराग देवनां हस्तनी पेठे पोताना हस्त वडे दान देवां आदि अनेक शुभ कार्यो थवां जोइए. लक्ष्मी सत्ता आदिनो परमार्थ कार्योनी उन्नतिमां उपयोग करवो जोइए. प्रभुए हस्त वडे जेवां कार्यो कर्यां तेवां कार्यो करवाने माटे हस्त पूजती वखते द्रढ संकल्प धारण करवो. जे हाथे ते साथे सारांश के जे हस्त वडे दानादि शुभ धर्म करवामां आवशे ते ज अन्ते For Private and Personal Use Only Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR March -2017 परभवमां साथे आवशे. प्रभुनां हस्तनी पूजा करतां छतां जेओ कंजुसना शिरदार रहे छे तेओ खरेखरी रीते प्रभुहस्तनी पूजा करी शकतां नथी. प्रभुना हस्तनी पूजा कर्या बाद पोताना हस्ते दानादि उत्तम शुभ कार्यो थवां जोइए. प्रभुए अनेक जनोने पोताना हस्ते दीक्षा आपी तेवी रीते आपणे पण प्रभुनां हस्तनुं अनुकरण करवा प्रयत्न करवो जोइए. प्रभुनां हस्तनां गुणो लेवाने माटे ज आपणे प्रभुनां हस्तनी पूजा करीए छीए एम खास ध्यानमा राखवू जोइए. पोताना हस्ते कोइपण बाबतमां कंइ वपराय छे पण याद राखq के शुभ कार्यमा हस्तनो उपयोग करवानो छे. मनुष्योमां दान गुण प्रथम खीलवो जोइए. दान गुणथी त्याग दशा उत्पन्न थाय छे, अने त्याग दशाथी खरो संन्यास प्राप्त थाय छे. दररोज पोताना हस्ते दान करवानो अभ्यास पाडवो. मूर्छानो त्याग थया विना दान दइ शकातुं नथी. हस्तथी जेओ दान करे छे तेओ परभवमां सुखी थाय छे. प्रभुनु मस्तक पूजीने प्रभुनां जेवू ध्यान धरवा भाव राखवो जोइए. प्रभुए ध्यान बळ वडे कर्मनो नाश कर्यो हतो, तेवी रीते प्रभुनु मस्तक पूजीने ध्याननां सद्विचारो करवा जोइए. प्रभुए कंठ वडे देशना दइ अनेक जीवोने तार्यां. तेमनां कंठे पूजा करीने कंठनो गुण प्राप्त करवा प्रयत्न करवो जोइए. प्रभुनां कंठनी जेम पोताना कंठनो सदुपयोग करवामां आवे तो ज कंठनी पूजा सफळ थाय. प्रभुना कंठे पूजा करती वखते प्रभुए कंठ वडे देशना दीधी तेनुं चित्र पोताना हृदयपटमां खड़े करवं. पोताना कंठमांथी पोतानु अने अन्य जीवोनुं श्रेय थाय ए शब्दो बहार काढवा. कंठ वडे प्रभुनां गुणोनुं गान करवू. प्रभुनी परमार्थदेशनानुं स्मरण करवू. (वधु आवतां अंके...) क्या आप अपने ज्ञानभंडार को समद्ध करना चाहते है ? पुस्तकें भेंट में दी जाती हैं आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, कोबा में आगम, प्रकीर्णक, औपदेशिक, आध्यात्मिक, प्रवचन, कथा, स्तवन-स्तुति संग्रह आदि विविध प्रकार के साहित्य तथा प्राकृत, संस्कृत, मारुगुर्जर, गुजराती, राजस्थानी, पुरानी हिन्दी, अंग्रेज़ी आदि भाषाओं की भेंट में आई बहुमूल्य पुस्तकों की अधिक नकलों का अतिविशाल संग्रह है, जो हम किसी भी ज्ञानभंडार को भेंट में देते हैं. ___यदि आप अपने ज्ञानभंडार को समृद्ध करना चाहते हैं तो यथाशीघ्र संपर्क करें. | पहले आने वाले आवेदन को प्राथमिकता दी जाएगी. For Private and Personal Use Only Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Beyond Doubt (Continue...) Acharya Padmasagarsuri Mandita then asked the Lord to resolve his doubt and enlighten him on the subject. The Lord then said, “Oh Mandita, you have not made a note of the words “Viguna” and “Vibhu' in the vedic verse. Viguna is one who does not have any deceptive gunas and is at the same time endowed with remarkable qualities and is also ‘TRIGUNATIT'' i.e. beyond the three qualities viz. Satva?, Rajas?. and Tamas4. This verse establishes the greatness of the perfect Siddhas, because they only are “Vibhu's; as they have gained Kevala Jnana. They do not get bound by karma and hence they have liberated themselves from the cycle of birth and death. They also do not shower any favours on anyone and make them perfect. They preach the path to Moksha and the living beings tread on the path and become free as they have become. But the souls embodied with karma i.e. the worldly souls, owing to their meritorious and evil deeds take birth in this world and when they free themselves from karma get salvation. Hence it is said that both bondage and salvation exist and if these were not to exist all the holy scriptures, ethical codes of living and pious activities will bear no significance. Pleasure and pain that are the resultant experience of punya and papa will become untrue if bondage and Moksha were denied. Since time immemorial the relation of the soul and the karmic bondage is like the relation of the seed and the sprout. The atman gets a body according to his karma and when he gets a body, by attachment and aversion he builds up a karmic body. This is a never ending process until one pierces this circle, with right faith, right knowledge and right conduct. A spider weaves a web around itself and gets caught in it, in the same way the jivatman 1 Trigunatit- beyond stava, rajas & tamas 2 Satava- sublime qualities 3 Rajas- qualities for enjoyment & pleasure 4 Tamas- evil qualities 5 Vibhu- God 6 Kevala Jnana- Omniscience For Private and Personal Use Only Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR March-2017 is caught in the web of the karmas and when it learns to be devoted to Sudeva, Suguru and Sudharma', he gets liberated from the bondage”. Thus Mandita along with his group of students became the Lord's disciple and created the Dvadashangi after hearing the Tripadi from Lord Mahavira. CHAPTER 11 The seventh great scholar Mauryaputra followed the six scholars who had got their doubts cleared one after another. He brought with him his family of 350 students. He too was looking forward to meet the Lord like the senior scholars. As soon as he reached the Samavasarana the Lord Said 'In the Vedas there is a verse" " GHI मायोपमान् गीर्वाणान् इन्द्रयमकुबेर वरूणादीन्” “which means that who has seen the heavenly gods namely Indra?, Yama’, Kubert, Varun' and others?' You have interpreted the verse to beas follows- “Because no one knows about these Gods, they do not exist at all. They are all only illusionary beings and are like a mirage formed in the desert. Although in another place in the Vedas it is said “स एष यज्ञायुधो यजमानोऽञ्जसा tasida soola" "Because heaven is the abode of the heavenly beings it is proved that there is the existence of such beings called Devas. Oh Mauryaputra: Isn't this your doubt?”'. There upon Maurayaputra said “True, my Lord, what you say is true. Please clarify my doubt and bless me: Lord Mahavira then replied, “Oh Mauryaputra: Your doubt regarding the existence of Devas is baseless because you can see the devas with your own eyes in this Samavasarana. What you see Pratyaksha does not need Pramana? __“मायोपमान्.. | This adjective applied to the Devas in the Vedic Verse signifies that the pleasure of the heaven are not eternal but transito 1 Sudeva, Suguru & Sudharma- They guide the soul/aspirant to tread on the path to emancipation 2 Indra- King of heaven 3 Yama- God of death 4 Kuber- God of wealth 5 Varun- The wind God 6 Pratyaksha- Direct Perception 7 Pramana- Proof For Private and Personal Use Only Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR March-2017 ry; because” aitat quet Hafallo facint" “when the meritorious Karmas begin to exhaust the Devas have to leave their abode of heaven and take birth in the human world. As an illusion is momentary, so also the heavenly pleasures are transitory. The minimum age limit of the heavenly beings is 10,000 years and the maximum age limit is 33 Sagaropama!. 'On the completion of the life span the Devas have to leave their abode. But a handful of people make note of this. In order to go to heaven, most people keep performing all kinds of righteous deeds as explained in the scriptures unaware of the transitory happiness in the heavenly abode. Very few, who know this, try to make it hard for Moksha, which is eternal happiness and infinite bliss. What are the acts that will enable one to attain heaven? This too has been clearly explained in the Vedas. This explanation of the ways to go to heaven also proves the existence of heavenly existence. There is happiness as well as sorrow in this world. Happiness is the resultant of Punya and sorrow is the effect of Papa. Hellish creatures are always experiencing pain, against this the heaven exists where the jivatman experiences the fruits of its meritorious deeds.” Mauryaputra then enquired from the Lord, why the Devas very rarely visited the human world though they were at total liberty to come often? The Lord Said, “Oh Mauryaputra! There are many reasons, for the Devas not visiting the Earth very often. The occassions on which the Gods desire to come here on this Earth are very rare and this mortal world when compared to heaven is not at all a beautiful place and is full of sorrow and misery. (Continue...) 1 Sagaropama- a huge measure of time . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . सुभाषित जमा देख कीजे खरच व्याधि देख उपचार। हित देखी हित मांनीये समयो देख विचार । जो कछु भली न करी सके, तो बुरे पंथ मत जाय । अमृतफल चख्यां नहीं, तो विष के फल मत खाय॥ ह.प्र.-८९१२४ For Private and Personal Use Only Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir शिक्षाशतबोधिका-एक आत्मबोधक काव्य गणि सुयशचंद्रविजयजी हमणां थोडां समय पूर्वे कवि अखानां चाबखा नामर्नु पस्तक जोवां मळ्यु. आम तो तेमां कवि अखाए बनावेलां पदोनो संग्रह ज हतो. साथे ते पदोमां गर्भित रीते तत्कालीन सामाजिक दूषणोनी कडक समालोचना पण हती, ते वांची त्यारे थयु प्रायः दरेक समाजमां थोडा थोडां काळे नाना-नानां दोषोनो प्रदुर्भाव थतो हशे. पछी ते ज दोषो विस्तार पामी दूषण स्वरूपे परिवर्तित थई जतां हशे. अंते आवां समये कोई ने कोई संतपुरुष द्वारा ते प्रवृत्तिओ डामवा फरी प्रयत्नो शरु करातां हशे. खरेखर के, भयंकर विषचक्र. ___जो के आ चक्र फक्त वैदिक संप्रदायो पुरतुं सिमित न हतुं. मोटां भागनां धर्म-संप्रदायो आ चक्रमां फसायेलां हतां. ते-ते काळे घणां संतो, महात्माओ, स्वधर्मानुरागीओ पोत-पोतानां धर्मनां उत्कर्ष माटे पोतानां अनुयायीओ वधारवा माटे हुंसा-तुसी करतां. परमात्मतत्त्व शुं छे? मोक्षप्राप्तिनी आराधना केम करवी? ते समजाववां करतां पोतानी मान्यताओने समाज पर ठोकी बेसाडवामां ज तेमने रस हतो. आवां समये समाजमा प्रवेशेलां दूषणोने अटकाववा माटे अन्य कविओनी जेम प्रस्तुत कृतिकार कवि हंसरत्नविजयजीए पण कलम उपाडी छे. कवि भलेने जैन मुनि छे पण तेमनां विचार सांप्रदायिक नथी. तेमणे जे साचे तत्त्व छे, तेने ज प्रस्तुत काव्यनां माध्यमे बताडवानो प्रयत्न कर्यो छे. परमात्मतत्त्वनी ओळख, सुगुरु-कुगुरुनो भेद, सद्धर्मनुं स्वरूप जेवां विषयो पर प्रकाश पाथरी तेणे मोक्षार्थी जीवोने मोक्षमार्गअनुसंधान तो करी ज आप्यु छे, साथे-साथे जगत्कर्तृत्व, वीतरागना जेवां सिद्धांतो परनो जैन धर्मनो उदार दृष्टिकोण पण लोकभोग्यशैलीमां बाळजीवोनी समक्ष रजु कर्यो छे. कृति गुजराती भाषामा होइ वाचको ते वांचीने विशेष पदार्थावबोध पामे तेवी आशा. आ कृतिनी प्रतो प्रायः १९मी सदीनां लेखननी ज आधिकांश प्राप्त थाय छे, तेथी कृतिमां इ, उ, अनुस्वारादिनां घणां सुधारा करवां द्वारा वाचकोने कृति समजतां वधु तकलीफ पडशे. तेम विचारी अमे कृतिनां अशुद्ध पाठो सुधारी कृतिने जेटली बने तेटली वधु सुधारी अहीं रजु करी छे. प्रत परिचय कृति संपादन माटे हस्तप्रतनी झेरोक्ष आपवा बदल भावनगर श्री आत्मानंद For Private and Personal Use Only Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir भोठ विभु SHRUTSAGAR March-2017 सभानां व्ववस्थापकोनो तथा पाठभेदो मेळववा माटे प्रत आपवा बदल श्रीकैलाससागरसूरिजी ज्ञानभंडार कोबानां व्यवस्थापकोनो पण खूब खूब आभार. पाठ मेळवणी माटे नीचे प्रमाणे लेखमां जे-ते स्थाने देवनागरी आंकडाओमां क्रमांक अंकित करेल छे. गाथांक मूळ प्रतमां कोबानी प्रतमां सर्व वस्तु सर्वस्व आपथी संगथी रूप चिदानंद चिन्मय स्यो विष्णु सारी भार शो आतम स्यो तुम भाम ताति भर्या छक्या कथे कहे अतानी अग्निनी कृपा संवेग वैरागना, शम दम श्रद्धा प्रांहि, जसु घर प्रगट्यो बोध-रवि, ए लक्षण हुइ त्यांहि. (आ पद्य कोबानी प्रतमां उमेरायेलुं छे.) १४ ९२ सात्त्विक तात्त्विक १५ ९९ छेल्लां ८ पद्यो कोबानी प्रतमां नथी. For Private and Personal Use Only Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 12 ॥२॥ ॥३॥ ॥४॥ March -2017 ॥शिक्षाशत बोधिका सार॥ अहँ नमः ॥ ॥६॥ श्रीपार्श्वनाथाय नमः ॥ श्रीगुरुभ्यो नमो नमः ॥ ऐं नमः ॥ सकल शास्त्र जे वर्णव्यो, वर्णन मात्र अगम्य; अनुभवगम्य ते नित्य नमुं, परमरूप परब्रह्म ॥१॥ सोपाधिक दृष्टि ग्रह्यो, दिसे जेह अनेक; निरूपाधिक पद चिंतता, जे अनेक थइ एक भवर्णादिक संगथी, जिम जल नाना भाति; पण स्वाभाविक गुण थकी, जलता छे एक जाति नाना कर्म उपाधिवश, तिम आत्मा चिद्रूप एक रूप पण आपथी, धरे विविध गुण रूप वादळमां पण झलहले, जिम आदित्य-उजास; तिम आत्मा कर्माभ्रमां, न तजे ज्ञानप्रकास ॥५॥ ध्यानानलि अनादि मल, दही सहज सौभाग्य; कनक परि जसु झलहल्यो, ते वं, वीतराग राम कहो शंकर कहो, कहो अनेकविध नाम; वीतराग अकलंक शिव, एक सर्व गत धाम ॥७॥ राम कृष्ण महादेव शिव, पुरुषोत्तम परब्रह्म; बुद्ध जिनादिक नामथी, एक ज तेह अगम्य ॥८॥ कोटि कल्प' लगे तप तपे, सीखे शास्त्र अनेक; पण अनुभव विण परम ते, लिख्यो न जाये अलेख उक्तं च - अनुभव अमृत कुंड के, रहेत किनारे जोहि; पंडित सब पढ पढ मरे, बुंद न पावे तोहि देव निरंजन अति अलख, घट मे रह्यो समाय; इत-उत हि भटकीत फीरै, मूरख जाने नाही ॥ २॥ ॥६॥ ॥९॥ ॥१॥ 1 चार युग जेटलो समय. (सत्युग- १७२८००० वर्ष, त्रेतायुग- १२९६००० वर्ष, द्वापरयुग- ८६४००० वर्ष व कलियुग- ४३२००० वर्ष= ४३२०००० वर्ष= १ कल्प. संदर्भ- शब्दरत्नमहोदधि, भाग-३, पृष्ठसंख्या- १७५२) For Private and Personal Use Only Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir March-2017 ॥३॥ ॥१०॥ ॥११॥ ॥१२॥ ॥१३॥ ॥१४॥ SHRUTSAGAR जिणि खोज्या तिनि पाईया, उंडे पाणी पेंत; मूढ विचारा क्या केर, रह्या किनारे बैठ निर्विकार निर्दोष शुचि, सांत सदा निरूपाधि; परमात्मा पूरण परम, सहेज अनंत समाधि एह स्वरूप ईश्वर तणुं, जोता तत्त्वविवेक; वीतराग मुद्रा विना, अवर नथी किहां एक पण तसु गुरुकृपा थकी, अनुभव दृष्टि अनंत; लही अनुकुल अद्रष्ट वशि, पेखे कोई पुन्यवंत स्नान करो संध्या करो, भस्म लगावो देह; परमात्मा जाणो नहीं, सरवे अनारथ तेह सद्गुरुनी शिक्षा विना, तप तीरथ व्रत दांन; अबल डालिका रोप परे, निष्फल होए निदान सद्गुरुनी सेवा विना, मूढ धरमने ध्याये; खेवढ(षढ) विहुणी नाव जिम, जिहां तिहां झोला खाये मोह पडल उतारियुं, ज्ञान शलाका लेय; अंतर नेत्र उधाडीओ, नमोस्तु सद्गुरु तेह सो युग लगे करे सेवना, सर्व वस्तु मुंकी पाइ (अ); तो पण गुरुना गुण तणो, ओसीकल' नवि थाये (य) गुण अनंत श्रीगुरु तणां, कह्यां केही परे जाये; जिणे अगाध भव-सिंधु ए कीधो गोपद प्राय भवदुःख शिवसुख गुरु अपणा, गयण गुणह भगवंत; खल कुचरित उपगार गुरु, किण ही कह्या न जंति(त) धन्य संत जे आपथी, सदा सुगुण आवास; बली श्रीखंड जिम आपथी, परने करे सुवास तुंबीफल प्रवहण समा, सद्गुरु तारणतरण; कुगुरु बोलण आप परि, लोहशिला-अनुहरण 1 ऋणमुक्ति 2 गाय पगलां जेवो नानो. ॥१५॥ ॥१६॥ ॥१७॥ ॥१८॥ ॥१९॥ ॥२०॥ ॥२१॥ For Private and Personal Use Only Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir March-2017 ॥२२॥ ॥२३॥ ॥२४॥ ॥२५॥ ॥२६॥ SHRUTSAGAR कलिमां कुगुरु फांसिया, निरदय घणुं निठोर; कुमति-फांसी दे(इ) लोकने, नाखे नरके अति घोर गुरु लोभी चेला बठर(बरड), नहीं विवेक दोइ मांहि; अंधे अंधा लाइया, पडे खाडमे जाय(इ) आप समा जग जीवडा, मात समी परनारि(र); पर धन धूलि समो गणे, ते देखता संसार परधन ने परकामिनी, हरवा करे बहु धंध'; जे पीडे पर जंतुने, ते देखता पण अंध बांधी जाल करोलिये, हरइ मसकना प्राण; तिम कुगुरु माया रची, पाडे लोक अजाण आप लोहा पर लोकना, जिणे विणसाड्या काम; हुं जाणु ते नरकथी, जासे आधेरे ठाम हुं जाणु मूरिख भला, हियडे भोलम जास; जे मन कलि कावलि भर्या, बलो डाह्या पण तास कलिमां कुमतिवाह्या फिरइ, लोक तजी कुलवट्ट; कुआरे' आवी पड्या, धण जिम थया दहवट्ट' कुगुरु फंदमां जे पड्या, ते बूझव्या न जाय; भल्या पहेली रातना, ते किम आवे ठाय कुगुरु पाखंडे भोलव्या, भूला पड्या अनंत; नाथे ताण्या बलद जिम, भोला जन भटकंत जिम असाध्य सन्निपातने, औषध नावे काम; तिम उपदेश अजोग्यने, केवल क्लेसनो ठाम दुष्ट मंत्र वसि विकल जन, करे अमेद्य आहार; तिम जन कुमते भोलव्या, लहे असार ते सार ॥२७॥ ॥२८॥ ॥२९॥ ॥३०॥ ॥३१॥ ॥३२॥ ॥३३॥ 1 झगडा. 2 मायाथी. 3 खराब काळमां. 4 जळमूळथी नाश थवो. 5 अकल्प्य. For Private and Personal Use Only Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 15 March-2017 ॥३४॥ ॥३५॥ ॥३६॥ ॥३७॥ SHRUTSAGAR कूप-झंपथी वारता, खीजे जिम क्रोधंध; तिम मतिवाडा लोक ते, सीख देता करे धंध उक्तं च - जेसो लीपण छार को, जेसों ऊखर' खेत; ज्यों अंधे कुं आरसी, त्यों मूरख को हेत जिम पय पाता पण वधे, विषधरने विष रूप; तिम हित पणे कहता धगुं, क्रोध करे जन क्रूर खल जन सथे न बोलसो, खीख सुणो रे संत; विषधरनी परे विष भर्या, ते कोपसे अत्यंत शास्त्र मात्र माने नही, केई हियाना अंध; साखी' उखाणा संग्रही, निंदे सकल प्रबंध काग सरोवर छोडीने, पेसे छीलर मांहि; तजी शास्त्र तिम मूढ ते, कुमति कुमतिमां ध्याये संबल सबलु शास्त्र छे, दीवो अने अंधार; उफरां छाजे शास्त्रथी, तेहनथी उद्धार शिक्षा स्धी दाखीने, तारे भवजल जेह; राखे पडता नरकथी, शास्त्र कहीजे तेह वर्या कुमति रोगे करी, तेहने मति विपरीत; भलु कहेता उठ्यो भसी, हडकवायानी रीत श्वान भसे पन्नग डसे, अग्नि प्रजाले अंग; तिम सहजसुंनीचने, परनिंदासुंरंग अमेद्य बहु परि ढांकीये, तो पण करे कुवास; तिम नमता पण नीच जण, मखथी कहे कुभास जलो चालणी का पुरुष, मांखी एक स्वभाव; सार सार ते परिहरे, धरे असारसुं भाव ॥३८॥ ॥३९॥ ॥४०॥ ॥४१॥ ॥४२॥ ॥४३॥ ॥४४॥ 1 क्षारवाळी जमीनमां खेती. 2 देशी दोहा. For Private and Personal Use Only Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir March-2017 ॥४५॥ ॥४६॥ ॥४७॥ ॥४८॥ ॥४९॥ ॥५०॥ ॥५१॥ SHRUTSAGAR 16 हंस सुपडो सापुरुष, ए त्रिहुं एक प्रकार; सार सार ते संग्रहे, अलगो तजे असार हांसु ठग निंदा करे, कर्ता(रता) धर्म विचार; ते पोताना हाथसुं. मस्तके घाले छार तो पण सहेजे संतने, करवा पर उपगार; इम जाणीने सीखना, कहेवा बोल बि-च्यार शुद्ध शास्त्र प्रकासता, ओलपता' नही लगार; ध्वज बांधीने धर्मनो, कहेवो सर्वाचार विवाह ढोले वाजते, जीरी काली रात; शास्त्र सभामां वांचीइ, खूणे धूतारा घात दया दमन ने दान सम, देव-गुरुनी भक्ति; क्षमा सरलता धर्म ए, आदरवो निज शक्ति क्षमा अहिंसा सत्य तप, शम दम विनय ने ब्रहम; ज्ञानादिक गुण जिहां नही, तिहां किम कहीये धर्म तप तीरथ व्रत आदरो, दीयो दान कसो देह; एक ज जीवदया विना, धूआ धवलहल' (र) तेह जटा वधारो जंगल वसो, नग्न विभूति लगाओ; जीवदया जाणी नही, तो सब विधि जल जाओ जिम कोई विष भक्षण करे, अमर थवानी आस; तिम हे साथी ! मूढमति, वांछे धर्म विलास घात करे पर जंतनी, धरे धर्मनी चाह; अहो अज्ञानी लोकमां, गाडरीयो प्रवाह कंद भखो काया कसो, जटा भस्म धरो अंग; क्षमा दयानी राश' विण, किम लहेसो शिव-संग छार लगाया नही मुगति, नही मुगति वनवास; एक ज अंग छे मुक्तिनु, तत्त्वज्ञान अभ्यास 1 छुपावq. 2 धूमाडाना महेल जेवं. 3 संपत्ति. ॥५२॥ ॥५३॥ ॥५४॥ ॥५५॥ ॥५६॥ ॥५७॥ 4राख. For Private and Personal Use Only Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir March-2017 ॥५८॥ ॥५९॥ ॥६०॥ ॥६॥ ॥६२॥ ॥६३॥ SHRUTSAGAR 17 चिदानंद माया रचे, गुरु पण करे कुकर्म; अहो ! डाह्या पण लोकनो, जीव-हिंसा पण धर्म "चिदानंद किम माया रचे, गुरु किम करे कुकर्म; जुवो क्षणिक दिल खोलीने, हिंसामा 'भोठ' -धर्म दोष रहित देव ते भजो, गुरु ते जे निःसंग; धर्म विवेक दया सहित, ए त्रण मुक्तिना अंग ज्ञान तिहां माया नही, माया तिहां नही ज्ञान; तिमिर उद्योत तणी परे, ए अंतर असमान चिदानंद पूरण परम, 'विभु सदा अविकार; ते कहो किम माया रची, उतारो भू "सारी विविध अंश भेदे करी, वली विविध अवतार; एक ज ते परमात्मना, छे विभूति विस्तार जे जे अंश विभूतिने, ग्रही भली ते जाण; तेह तेहथी उद्धरे, ए पण नही प्रमाण इम तो भव-जंतु थस्ये, सर्वे ते भजवा-जोग्य; भेद नही विभु अंशमा, कहेस्ये कुण अजोग्य समल कनक पिण कननक छे, तथापि ते तदवस्थ'; कनक कार्यने साधवा, नही सर्वथा समर्थ तिम रागादि उपाधिसुं, मिलित कलुष जे ब्रहम; ध्याइये तो पिण तत्त्व विण, मीटे नही भव-भर्म जो ते सर्व उपाधिथी, परहां कहो पद्मनाभ; तो ते अमलने मलिन करी, गाता ‘शो आतम लाभ भूत-पतिने शिव कहे, दशरथसुतने राम; परमातम कहे कृष्णने, अहो ! मूढना काम निर्विकारने शिव कहो, घट-घट रमण ते राम; सिद्ध स्वरूप परमात्मा, इम मति आणेइ ठास ॥६४॥ ॥६५॥ ॥६६॥ ॥६७|| ॥६८॥ ॥६९॥ ॥७०॥ 1 अभण व्यक्तिनो. 2 तेनी ते अवस्था For Private and Personal Use Only Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 18 March -2017 ॥७१॥ ॥७२॥ ॥७३॥ ॥७४| ॥७५॥ ॥७६॥ SHRUTSAGAR गान तान नाचण रमण, पिंड-पोषण पर- भाम; इम आचरता प्रभु मिले, जोवो निसूगनी' वात थया वैरागी घर तजी, लीला गाये सराग; करे भवाइ नारीमां, अहो ! फूल्यो वैराग अभक्ष भखो मदिरा पीवो, करो अगम्य व्यवहार; एकाकारथी मुक्ति छे, धिर धिग् कलि-आचार देह जेह अशुचि भर्यो, अशुच थकी उतपन्न; मनि मेला जल स्नानथी, शुच माने ते तन्न देह आतमने मेल स्यो ? ते धोया शुं थाय ? आत्म जिम निर्मल होये, खोजो तेह उपाय कोईक जाति-मदे भर्या, कोई कामार्ति मगन्न; कोई कुविद्या बले करी, तृण जिम गणे भवन्न दोष कही कही टोकतां, नाहक निंदा थाय; लागे दुःख ते लोकने, तेहमां गुण नही काय इणि परे ए कलिकालनी, लीला कही न जाये; कोटि वर्ष लगे जो "कथे, तो पिण पूरी न थाये अथवा ए कलिकालनो. नथी कोई इहां वांक; अजोग्य जीव ते सर्वदा, होइ निर्लज निःसंक पण आत्मार्थि जे होय, ते देखे निज दोस; दोष तजी गुण संग्रहे, न धरे रागने रोस प्राणी बेखबरी पणे, खोया जन्म अनंत; तत्त्वज्ञान तलास विण, आव्यो नही हुए अंत केई पशु पंखी वृक्षनी, करे १२अज्ञानी भक्त; इम न लहे जे एहथी, थासे केही परे मुक्ति(क्त) सकल शास्त्र कहे मुक्तिनु, साधन ज्ञान प्रमाण; तो पिण मिथ्या धंधमां, भूला भमे अजाण ॥७७|| ॥७८॥ ॥७९॥ ॥८०॥ ॥८१॥ ॥८२॥ ॥८३॥ 1 निर्दय. For Private and Personal Use Only Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 19 March-2017 ॥८४॥ ॥८५॥ ॥८६॥ ॥८७॥ ||८८॥ ॥८९॥ SHRUTSAGAR भोला कां भूले करी, बाउलि घाले बाथ; खोटइं भव खोइ पछै, घणु घसे शो हाथ नरभव गयो न आवस्ये, छे वली थोडा दिन्न; गाफिल माहे मत गमो, मूढ विमासो मन्न जिम भांगी अरहट घडी,, फोगट फेरा खाय; तिम अविवेकी लोकनो, जनम अनारथ जाय तजी ममत्व धीर करी, निरखे अंतर-नेत्र; पल एकमां पेखस्यो(?), पंथ पाधरो' नेत्र जोइ तपासी जन ग्रहे, सावरणी पण सार; संबल जे संवर तणुं, ते परखो कां न लगार? मन आग्रह जेहने नही, शास्त्र-अभ्यास समर्थ; तत्त्व दृष्टि जसु निर्मली, ते साधे परमार्थ सकल शिक्षानो सार ए, सर्व शास्त्रनो चोज; शुद्ध देव गुरु धर्मनी, सुधी करजो खोज २ कुलवर्णाश्रम चाल जे, तेह न जाणो धर्म; ओलखवो आत्मार्थने, ए एह धर्मनो मर्म सिद्ध नरे जिम संग्रहयो, विष पिण अमृत थाय; तिम "सात्त्विक दृष्टे ग्रह्या, शास्त्र सकल शिवदाय पण ते तो दुर्लभ घणु, सम्यग् ज्ञान विवेक; इम मिथ्या अभिमानथी, अरथ सरइ नहीं एक श्रद्धा जिम ज्ञान(ना) बलें, सदगुरु-चरणपसाय; ते पिण दृढ अभ्यासथी, लहे थोडा दिनमांहि स्वातिबंदथी सुक्तिमां, जिम मुक्ता उपजंत; स्वल्प शिक्षाथी संतने, तिम अनंत गुण हुंत इम ए संक्षेपे कही, हित-शिक्षा लवलेस; स्वल्प बुद्धि जन सर्वनइ, ए अमृत उपदेस ॥९०॥ ॥९ ॥ ॥९२॥ ॥९३॥ ॥९४॥ ॥९५॥ ॥९६॥ 1 सरल. For Private and Personal Use Only Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra SHRUTSAGAR 20 स्वमत कदाग्रह ईहां नही, नही पर निंदा बुद्धि; केवल हित-करणी कही, मोक्षमारगनी शुद्धि www.kobatirth.org छे मणि माला तुल्य; दुषण रहित अनेक गुण, ज्ञाता ग्राहक कर चड्या, थासे एह अमूल्य प्रीते जे पुन्यातमा, कंठे धरस्ये एह; शिववधु वरसे तेहनइं, लहस्ये सौख्य अछेह१५ जिम मथवाथी उमटे, गोरसमां नवनीत; तिम सम्यक् आलोचता, संत पामसे प्रीत अक्षर एक पण एहनो, छे चिंतामणि प्राय; पण मूरख मन सर्व ए, वाय वायानी न्याय यद्यपि खलजन एहमां, अछता देसे दोष; तो पण संत अनेक मन, उपजस्ये महा तोष सूर्य मे ही धूने, जलद 'जवासा गात्र; तो पिण महिमा तेहनो, न घटे एक तिल मात्र जे अयुक्त भाख्यु ईहां, में कांई मंदबुद्धि; ते समदृष्टि संत जन, शोधी करजो शुद्धि नय-प्रमाण - रत्ने भर्यो, जे गंभीर अगाध; जिनमत - रत्नाकर जयो, अवितथ-वाक्य अबाध सत्तरसे छ्यांसी (१७८६) समे, ए शिक्षाशत सार; फागुण वदि पांचम गुरु, रच्यु एह दिल्ली मझारि (र) ए शिक्षाशत जे सुगुण, भणे धरी मन भाव; हंसरत्न कहे तास घर, जय-कमला थीर थाय 1 घूवडने. 2 एक छोड़. Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ॥ इति श्री शिक्षाशतबोधिका संपूर्णम् ॥ For Private and Personal Use Only March -2017 ॥९७॥ ॥९८॥ ॥९९॥ 1180011 ॥१०१॥ ॥१०२॥ ॥१०३॥ 1130811 ॥१०५॥ ॥१०६॥ ॥१०७॥ Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir छिन्नू जिनवरांरौस्तवन आर्य मेहुलप्रभसागर कृति परिचय प्रस्तुत कृति उपाध्याय प्रवर श्री लक्ष्मीवल्लभजी महाराज द्वारा मारुगुर्जर भाषा में निबद्ध तेरह गाथा की स्तुतिमय रचना है। लगभग सवा तीन सौ वर्ष प्राचीन व अद्यपर्यन्त प्राय: अप्रकाशित इस लघुकृति में छियानवे परमात्माओं की नामोल्लेख पूर्वक वंदना की गई है। जिनमें इस अवसर्पिणी काल के जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र के आश्रयी वर्तमान श्री ऋषभदेवादिक २४ तीर्थंकर, अतीत काल के श्री केवलज्ञानी आदि २४ तीर्थंकर, अनागत काल के श्री पद्मनाभादि २४ तीर्थंकर एवं महाविदेह क्षेत्र में विचरण कर रहे विहरमान श्री सीमंधरस्वामी आदि २० तीर्थंकर तथा श्री ऋषभ-चंद्रानन आदि शाश्वत ४ जिनेश्वरों का परिगणन किया गया है। इस तरह २४+२४+२४+२०+४ =९६ तीर्थंकरों की स्तुति की गई है। स्तवन के प्रारम्भ में सकल जिनवरों को प्रणाम कर श्रुतदेवता का ध्यान किया गया है तथा अंत में इन सभी तीर्थंकरों के नाम स्मरण के फलस्वरूप भव-भव के पाप दूर चले जाते हैं, यह बताया गया है। कलश में कर्ता ने अपने गुरुवर श्री लक्ष्मीकीर्ति उपाध्याय के चरणकमलों का मधुकर बतलाकर अपनी विनयशीलता उजागर की है। कृति में रचना संवत् का उल्लेख नहीं है। फिर भी रचनाकार की साहित्योपासना काल उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर वि.सं. १७२१ से वि.सं. १७४७ तक का माना जा सकता है। उसी काल में इस कृति की भी रचना हुई है। प्रस्तुत कृति में प्राकृत और अपभ्रंश भाषा के अनेक पदों का प्रयोग दर्शनीय है। कर्ता परिचय ___यश:पुंज तृतीय दादागुरुदेव आचार्य श्री जिनकुशलसूरि के शिष्य गौतमरास के रचयिता विनयप्रभ उपाध्याय से एक पृथक् साधु परम्परा चली जो एक स्वतंत्र शाखा न होकर मुख्य परम्परा की आज्ञानुवर्ती रही। विनयप्रभ उपाध्याय के शिष्य विजयतिलक उपाध्याय हुए। उपाध्याय क्षेमकीर्ति इन्हीं के शिष्य थे। प्रचलित मान्यतानुसार उपाध्याय क्षेमकीर्ति ने एक साथ ५०० धावड़ी(बाराती) For Private and Personal Use Only Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 22 SHRUTSAGAR March -2017 लोगों को दीक्षा दी थी इसीलिए यह परम्परा क्षेमकीर्ति' या क्षेमधाड़ शाखा के नाम से जानी जाती है। प्रस्तुत कृति के रचनाकार उपाध्याय लक्ष्मीवल्लभजी महाराज ने कल्पसूत्र की कल्पद्रुमकलिका टीका की प्रशस्ति में लिखा है श्रीमज्जिनादिकुशल: कुशलस्य कर्ता गच्छे बृहत्खरतरे गुरुराड् बभूव। शिष्यश्च तस्य सकलागमतत्त्वदर्शी श्रीपाठकः कविवरो विनयप्रभोऽभूत् ॥१॥ विजयतिलकनामा पाठकस्तस्य शिष्यो भुवनविदितकीर्तिवाचकः क्षेमकीर्तिः। प्रचूरविहितशिष्य: प्रसृता तस्य शाखा सकलजगति जाता क्षेमधारी ततोऽसौ ॥२॥ अपने उदय से लेकर बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक यह परम्परा अविच्छिन्न रूप से पहले साधुओं के रूप में और बाद में वही यतियों के रूप में चलती रही। इस शाखा में गीतार्थ विद्वानों की लम्बी और विशाल परम्परा रही है। इसमें अनेक दिग्गज विद्वान् एवं साहित्यकार हुए हैं, जिनमें से कुछ के नामोल्लेख इस प्रकार हैं- उपाध्याय तपोरत्न, महोपाध्याय जयसोम, महोपाध्याय गुणविनय, मतिकीर्ति, उपाध्याय श्रीसार, उपाध्याय लक्ष्मीवल्लभ, वाचक सहजकीर्ति, विनयमेरु, महाकवि जिनहर्ष, लाभवर्धन, उपाध्याय रामविजय, भुवनकीर्ति, अमरसिंधु इत्यादि। जिनके द्वारा रचित सहस्रों कृतियों से न केवल जैन साहित्य अपितु समग्र भारतीय वाङ्मय समृद्ध है। प्रस्तुत कृति के रचनाकार उपाध्याय लक्ष्मीवल्लभजी महाराज हैं। ये खरतरगच्छीय क्षेमकीर्ति शाखा के उपाध्याय लक्ष्मीकीर्ति के शिष्य थे। इनका मूल नाम 'हेमराज' और उपनाम 'राजकवि' था। इनकी जन्म-दीक्षा आदि तिथि और स्थलों की जानकारी गवेषणीय है। संस्कृत, राजस्थानी और हिन्दी तीनों भाषाओं में इन्होंने अनेक रचनायें की हैं। कल्पसूत्र की कल्पद्रुमकलिका टीका आपकी प्रसिद्ध कृति है। साथ ही संस्कृत भाषा में कुमारसंभव महाकाव्य की टीका, उत्तराध्ययन टीका, धर्मोपदेश काव्य स्वोपज्ञ टीका, पंचकुमार कथा, जिनकुशलसूरि अष्टक सहित For Private and Personal Use Only Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra SHRUTSAGAR www.kobatirth.org 23 Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir स्फुटक कृतियाँ भी प्राप्त होती हैं। प्राकृत में चौबीस दंडक विचार कुलक उपलब्ध होता है। मारुगुर्जर रचनाओं में अभयंकर-श्रीमती चौपाई, अमरकुमार रास, भावना विलास, भर्तृहरि कृत शतकत्रय स्तबक, नेमि राजुल बारहमासा, विक्रमादित्य पंचदंड चौपाई, कृष्ण-रुक्मिणी वेली बालावबोध, संघपट्टक बालावबोध, नवतत्त्व भाषाबन्ध, वर्तमान जिन चौवीसी, बत्तीसी साहित्य, बावनी साहित्य सहित विविध स्तवनों की रचना कर इन्होंने श्रुतज्ञान की सेवा की है। वैद्यक सम्बन्धी भी दो रचनायें मिलती हैं- (१) मूत्र परीक्षा और (२) कालज्ञान । ध्यांन श्रुतदेवता तणो हियडै धरी सयल जिनरायना पाय प्रणमी करी । छिन्नवै जिनतणा नाम हुं भाषिसुं विमल सद्गुरु वचन मेलि श्रुतसाषितुं वट्टमाणा जिणा इत्थ चौवीस ए तीय काले तहा जिण तहा णागए । विहरता वीस जिणराय वलि जाणीयै सासता च्यारी नामेण वखाणीयै March-2017 छिन्नू जिनवरांरौ स्तवन नामक कृति खरतरगच्छ साहित्य कोश में क्रमांक ६००९ पर अंकित है। प्रति परिचय छिन्नू जिनवरांरौ स्तवन नामक हस्तलिखित कृति की प्रतिलिपि राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर संग्रहालय से महेन्द्रसिंहजी भंसाली (अध्यक्ष, जैन ट्रस्ट, जैसलमेर) के शुभप्रयत्न से प्राप्त हुई है। एतदर्थ वे साधुवादार्ह हैं। जोधपुर में पुस्तकनुमा हस्तलिखित प्रति क्रमांक - २९८१३ में अनेक लघु-दीर्घ रचनाओं के साथ प्रस्तुत कृति पृष्ठ संख्या- १५० पर लिखी हुई है। प्रति के प्रत्येक पृष्ठ पर प्राय: २७ पंक्तियाँ तथा प्रत्येक पंक्ति में लगभग २० अक्षर हैं। अक्षर सुंदर व स्पष्ट हैं। छिन्नू जिनवरांरौ स्तवन ।। ढाल-१ ।। ॥८०॥ (ढाल-कडखानी ए देशी) For Private and Personal Use Only 11211 11211 Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra SHRUTSAGAR www.kobatirth.org 24 रिसहजिण अजित संभव अभिनंदणं सुमति पदमप्रभुं तिम सुपासं जिनं । चंदप्रभु सुविधि शीतलह श्रेयांस ए वासुपूज विमल जिन अनंत सुप्रशंस ए धर्मजिन शांतिजिन कुंथु अरिदेव ए मल्लि मुणिसुव्वयं नमिजिणं सेव ए। मि वलि पासजिण वीर वर्धमान ए नमुं चौवीसजिण एह वर्तमान ए ॥ ढाल -२ ॥ केवलज्ञानी तिम निरवाणी ए सागर महायश विमल वखाणी ए । सर्वानुभूति श्रीधर दत्त देव ए दामोदर श्रीसुतेजा सेव ए॥ (तर्ज- अष्टापदे श्री आदिजिनवर) सेवए स्वामि मुनिसुव्रत सुमति शिवगति नाम ए अस्ताघ जिनवर वलि नमीसर अनल जसधर साम ए प्रणमुं कृतारथ श्री जिणेसर शुद्धमति जिन शिवकरू स्यन्दन अने संप्रति सुनामै अतीत कालै जिनवरू ॥ ढाल -३ ॥ (ढाल वीर जिणेसर नी) पदमनाभ सूरदेव सुपास स्वयंप्रभु सुनिहालि सरवानुभूति देवश्रुती उदय देव पेढाल । पोटिल शतकीरति रति वखाणि सुव्रतसेवी जै अमम नि:कषाय नि:पुलाक निर्मम निरखीजइ चित्रगुप्त नमीयै समाधि संवर श्रीयशोधर विजय मल्लि जिनदेव दोइ अनंतवीर्य भद्रंकर । एह अनागत काल हुसी चौवीस तिथंकरु त्रिकरण वंदीजइ सदीव परतखि ए सुरतरु For Private and Personal Use Only Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir March-2017 11311 ॥४॥ 11411 ॥६॥ 11611 Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 25 March-2017 ॥८॥ ॥९॥ ॥१०॥ ॥ ढाल-४॥ (राग-चोपई) सीमंधर युगमंधर सामि बाहु सुबाहु नमुं सिरनामी श्रीसुजात देवसेन वखांणि, स्वयंप्रभु ऋषभानन वलि जाणि सूरप्रभु तिम सामि विसाल, वज्रधर चंद्रानन सुनिहाल चंद्रबाहु तिम देव भुजंग, ईसर नेमिप्रभु मनरंग वीरसेन महाभद्र देवयशा, अनंतवीरय नमतां सुभदशा विहरमान ए जिनवर वीस, भावें प्रणमीजै निसदीस ऋषभानन चंद्रानन देव, वारिषेण वधमान ससेव ए चिहुं नामे जिन सासता, प्रणमीजै आणी आसता ए च्यारे चउवीसी करी, छिन्नूं जिनवर भवजलतरी जपतां एहना मनसुध जाप, जायै सहु भवभवना पाप कलश इम भविय सुहकर सयल जिणवर च्यारी चउवीसी तणा छन्नवे संख्या हुवै सहुनी नमो भो भवियण जणा उवझाय वर श्री लक्ष्मीकीरति चरणपंकज मधुकरू श्री लच्छीवल्लभ भाव शुद्धै जपै अहनिसि जिनवरू ॥ इति छिन्नू जिनवरांरौ स्तवन समाप्तम् ॥ ॥११॥ ॥१२॥ ॥१३॥ प्राचीन साहित्य संशोधकों से अनुरोध श्रुतसागर के इस अंक के माध्यम से प. पू. गुरुभगवन्तों तथा अप्रकाशित कृतियों के ऊपर संशोधन, सम्पादन करनेवाले सभी विद्वानों से निवेदन है कि आप जिस अप्रकाशित कृति का संशोधन, सम्पादन कर रहे हैं या किसी पूर्वप्रकाशित कृति का संशोधनपूर्वक पुनः प्रकाशन रहे हैं अथवा महत्त्वपूर्ण कृति का अनुवाद या नवसर्जन कर रहे हैं, तो कृपया उसकी सूचना हमें भिजवाएँ, इसे हम श्रुतसागर के माध्यम से सभी विद्वानों तक पहुँचाने का प्रयत्न करेंगे, जिससे समाज को यह ज्ञात हो सके कि किस कृति का सम्पादन कार्य कौन से विद्वान कर रहे हैं? यदि अन्य कोई विद्वान समान कृति पर कार्य कर रहे हों तो वे वैसा न कर अन्य महत्त्वपूर्ण कृतियों का सम्पादन कर सकेंगे. निवेदक- सम्पादक (श्रुतसागर) For Private and Personal Use Only Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir पुस्तक समीक्षा भाविन के. पण्ड्या पुस्तक नाम : क्षमाकल्याणजी कृति संग्रह कुल भाग संपादक : आर्य मेहुलप्रभसागरजी प्रकाशक : आचार्य श्री जिनकान्तिसागरसूरि स्मारक ट्रस्ट, मांडवला पृष्ठसंख्या : ३४४ (दोनों भाग के) प्रकाशन वर्ष : वि.सं. २०७३ (ई.स. २०१६) मूल्य : १००/-(सेट की कीमत) विषय : खरतरगच्छीय वाचक श्री अमृतधर्म गणि के शिष्य महोपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी विरचित कृतियों का एक विरल संग्रह खरतरगच्छाधिपति परम पूज्य आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी के शिष्य आर्य मेहुलप्रभसागरजी द्वारा संकलित एवं संपादित क्षमाकल्याण कृति संग्रह' जैन साहित्य जगत के लिए एक अनुपम उपहार स्वरूप है। आर्य मेहुलप्रभसागरजी ने महोपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी म.सा. के स्वर्गारोहण द्वि-शताब्दी प्रसंग को एक प्रेरणा रूप में ग्रहण किया तथा भारतभर के विभिन्न ज्ञानभंडारों में संगृहीत संबंधित कृतियों का संग्रह करके पूरी मनोज्ञता से संपादित किया और महोपाध्याय क्षमाकल्याणजी के द्विशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में पौष कृष्ण १४ विक्रम संवत् २०७३ को ग्रंथ का विमोचन कराकर विद्वद्जगत के समक्ष प्रस्तुत किया। महोपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी की कृतियों का संपादन मुख्यरूपसे पाँचज्ञानभंडारों की हस्तलिखित प्रतियों के आधार से किया गया- (१) आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, कोबा, गांधीनगर, (२) श्री जिनहरिसागरसूरि ज्ञानभंडार, पालीताना, (३) श्री जिनभद्रसूरि ज्ञानभंडार, जैसलमेर, (४) राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुरबीकानेर, (५) लालभाई दलपतभाई भारतीय प्राच्यविद्या संस्थान, अहमदाबाद। महोपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी का समय वि.सं. १८०१ से वि.सं. १८७३ तक का माना जाता है। उन्होनें अपने जीवनकाल में अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियों की रचना की। आचार्य श्री जिनहरिसागरसूरिजी ने जैसलमेर व जयपुर के ज्ञानभंडारों में For Private and Personal Use Only Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR March-2017 संगृहीत हस्तलिखित प्रतियों में उपलब्ध कृतियों में से ६० गेय कृतियाँ व महोपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी के जीवनचरित्र का प्रकाशन करवाया था। इस ग्रंथ में संपादक आर्य मेहुलप्रभसागरजी के गुरु गच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी द्वारा लिखित विशिष्ट प्रस्तावना (वंदे क्षमाकल्याणम्) में महोपाध्यायजी के जीवनचरित्र को विस्तारपूर्वक वर्णित किया गया है। साधनाकाल, व्यक्तित्व, कृतित्व आदि का वर्णन करते हुए भक्तिपरक, विधि-विधानपरक, सैद्धांतिक, इतिहासपरक व कथासाहित्य आदि विषयक कृतियों का परिचय दिया गया है। प्रथम भाग के अंतर्गत महोपाध्यायजी की भक्तिपरक जैसे चैत्यवंदन, स्तुति, स्तवनादि ११४ कृतियों का संग्रह दिया गया है. जिसमें उनकी २ स्तुतिचतुर्विंशिका वाचकों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं, उसके साथ ही विभिन्न ऐतिहासिक शत्रुजयादि तीर्थमंडन तीर्थंकरों की स्तुतियाँ, स्तवन व जिनदत्तसूरि, जिनकुशलसूरि, जिनभक्तिसूरि, जिनलाभसूरि, वाचनाचार्य अमृतधर्मादि गुरुभगवंतों के विविध अष्टक भी समाविष्ट हैं। परिशिष्ट में उनके गुणों को दर्शाने वाली तथा व्यक्तित्व को उजागर करती हुई ५ कृतियाँ भी द्रष्टव्य हैं। द्वितीय भाग में सर्वप्रथम महोपाध्यायजी द्वारा वि.सं. १८३० में रचित इतिहासपरक संस्कृतभाषा में निबद्ध अतिविस्तृत कृति “खरतरगच्छीय पट्टावली” दी गई है, फिर चतुर्विधसंघ के लिए आवश्यक ऐसे दो प्रकरण “साधुविधिप्रकाश प्रकरण” व “श्रावकविधिप्रकाश प्रकरण” को समाविष्ट किया गया है, जिसमें प्रतिक्रमणादि विधियों का सुंदरतम निरूपण किया गया है। श्रावकविधि प्रकाश के अंत में कठिन शब्दों की सूचि भी अर्थसहित दी है। महोपाध्यायजी द्वारा प्रतिक्रमण की हर विधि के कारण को स्पष्ट करके उसकी उपयोगिता को निरूपित करने वाली कृति “प्रतिक्रमण हेतवः” को सम्मिलित किया गया है। अंत में महोपाध्यायजी प्रणीत “सूक्तरत्नावली” के रूप में जैनसिद्धांतों को आवेष्टित करती सूक्तियों को स्थान दिया गया है। प्रस्तुत ग्रंथ समस्त जैनसंघ के लिए बहुत ही उपादेय व श्रेयस्कर सिद्ध होगा। आर्य श्री मेहुलप्रभसागरजी ने इस ग्रंथ को प्रकाशित कराकर संशोधक वर्ग के लिए सामग्री तो उपलब्ध कराया ही है साथ ही जैन साहित्य को समृद्ध भी किया है। उनके प्रयास के कारण ही आज महोपाध्याय श्री क्षमाकल्याणजी की कृतियों का संग्रह हमें प्राप्त हुआ है। आर्य श्री मेहुलप्रभसागरजी भविष्य में भी इसी तरह श्रुत की सेवा करते रहें तथा युगयुगांतर तक उनके द्वारा रचित, संपादित, संगृहीत कृतियाँ सुरक्षित रहे व समग्र जैनसमाज लाभान्वित होता रहे, ऐसी शासनदेव के श्रीचरणों में प्रार्थना सह शुभेच्छा। For Private and Personal Use Only Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir जैन न्यायनो विकास (गतांक से आगे...) मुनि श्री धुरंधरविजयजी १३. श्री वीराचार्यजी तेओ विक्रमनी १२मी शताब्दिना उत्तरार्धमां थयां. पाटणनां सार्वभौम राजा सिद्धराजने तेमनां प्रत्ये बहु मान हतुं. एक वखत राजाए मश्करीमां तेमने का के 'अमारा जेवा राजानां आश्रयथी आपश्री दीपो छे!' आनां प्रत्युत्तरमा आचार्यश्रीए जणाव्यु के 'पूर्वपुण्यथी प्रतिभा प्रसरे छे. राजाए वळी कधुः ‘आ सभा सिवाय अन्य देशमा फरशो त्यारे बीजा बावानी जेम अनाथता समजाशे. सूरिजीए कही दीधुं के अमुक समये पोते अहींथी विहार करशे. सिद्धराजे नगरद्वारो बंध कराव्यां. विद्याबळथी आचार्यश्री बहार निकळीने पल्लीपुर पहोंच्या, त्यांथी महाबोध नगरमां जई बौद्धोने वादमा हराव्यां. गोपालगिरि (गवालियर) मां राजाए घणु सन्मान आप्यु ने त्यां पण अन्य वादीओने जीत्यां, राजाए चामर छत्र वगेरे राजचिह्नो आप्यां. नागोर जई जैनदर्शननी शोभा वधारी. सिद्धराजना आमंत्रणथी पुनः पाटण तरफ विहार कर्यो. चारुप आव्या त्यारे तेमने मळवा सिद्धराज त्यां आव्यो हतो. पाटणमां एक सांख्यवादी वादिसिंह आव्यो हतो. सिद्धराजे ते वादीने हराववा गोविंदाचार्य के जेओ कर्ण महाराजना बालमित्र हतां अने वीराचार्यजीना कलागुरु हतां तेमने करी. तेओए का के तेने तो वीराचार्यजी हरावशे. पछीथी वीराचार्यजीए गोविंदाचार्यजी साथे जई तेनुं सर्व मान गाळी नाख्यु हतु. ते वादमां वीराचार्यजी पोतानो पक्ष मत्तमपूर छन्द अने अपहृति अलंकारमां बोल्यां हतां. सर्वानुवादनी शरत प्रमाणे सांख्यवादी ते प्रमाणे बोली शक्यो न हतो. ए प्रमाणे वीराचार्यजी विजयमाळ वर्या हता. वळी सिद्धराजनी सभामां कमलकीर्ति नामना दिगम्बरवादीने हरावी स्त्रीमुक्तिनी सिद्धि करी हती अने विजय मेळव्यो हतो. १४. श्री मुनिचंद्रसूरिजी तेमनो स्वर्गवास वि. संवत् ११७८ मां थयेल छे, एटले तेओ विक्रमनी बारमी शताब्दिमां थयां. तेओ अखंड ब्रह्मचारी अने उग्र तपस्वी हता. तेओ कांजी पीने ज रहेतां तेथी ‘सौवीरपायी' तरीके प्रसिद्ध थया हतां. श्री हरिभद्रसूरिजीकृत 'अनेकान्तजयपताका' पर टिप्पण अने 'ललितविस्तरा' पर पंजिका, वगेरे तेमनी न्यायरचना छे. बीजा पण कुलको, वृत्तिओ, प्रकरणो वगेरे लगभग २० थी २५ ग्रन्थो For Private and Personal Use Only Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 20 SHRUTSAGAR ___March-2017 तेमणे रच्यां छे. तेओ वादनिपुण हतां. 'मुद्रितकुमदचंद्र' नाटकमां तेमणे अर्णोराजनी सभामां एक शैववादीने जीत्यो हतो तेम उल्लेख छे. तथा गुणचंद्र नामना दिगम्बर महावादी साथे वाद करवानो हतो ते समये वादि देवसूरिजी तेमनी साथे हतां ने तेमनी शैशव वय हती. ते वखते ते वादीने देवसूरिए जीत्यो हतो. वादि देवसूरिजीना तेओ गुरु हतां. १५. श्री चन्द्रसूरिजी तेमनो सत्तासमय वि.सं. ११६९ नी आसपासनो छे. मुनि अवस्थामां तेओ श्री पार्श्वदेव गणि' ए नामथी प्रसिद्ध हतां ने आचार्य थया पछी श्री चंद्रसूरिजी कहेवायां. तेमणे बौद्धाचार्य दिङ्नागकृत न्यायप्रवेशक' पर जे हारिभद्रीवृत्ति छे ते पर 'पंजिका' रची छे. ___अन्यान्य विषयोना ग्रन्थो पर वृत्ति, टीका, व्याख्या तेओए सारी रची छे. १६. मलधारी श्री हेमचन्द्रसूरिजी तेओबारमी सदीना अंतनी लगभगमां थयां. एमना गुरु मलधारी अभयदेवसूरिजी छे. पूर्वावस्थामां तेओ प्रद्युम्न नामना राजमंत्री हता. तेमनी व्याख्यानशक्ति अपूर्व हती. सिद्धराज जयसिंह कलाकोना कलाको सुधी तेमना व्याख्यानमां बेसतो अने केटलीक वखत सांभळवानी उत्कंठाथी एकलो तेमनी पासे आवतो. अमुक स्थळ सुधी सिद्धराज जयसिंह तेमनी स्मशानयात्रामां गयो हतो तेथी समजी शकाय छे के सिद्धराजने तेमना उपर घणुं ज मान हतुं. तेओए एक लाख श्लोक प्रमाण विविध ग्रन्थोनी रचना करी छे. तेमां न्यायग्रन्थ तरीके गणावी शकाय तेवी विशेषावश्यक परनी बृहद्दवृत्ति छे. तेनुं प्रमाण २८ हजार श्लोक जेटलुं छे. गणघरवाद, निह्नववाद, शब्द, नय, निक्षेप, ज्ञान वेगेरे अनेक विषयो तेमां न्यायशेलीथी सारी रीते चा छे. आर्हतदर्शनना मौलिक विचारोनुं तर्कपद्धतिमय स्वरूप आ टीकामां मळे छे. ए टीकामां १ अभयकुमार गणि, २ धनदेवगणि, 3 जिनभद्रगणि, ४ लक्ष्मणगणि, ५ विबुधचंद्रमुनि, ए पांच मुनिओ अने आणंदश्रीजी तथा वसुमतिश्रीजी ए बे साध्वीओ, एम सात जणे मदद करी हती. १७. वादी देवसूरीजी तेमनो जन्म सं. ११४३ मां मदाहृत गाममां थयो हतो. ते गाम आबुनी आसपास आवेल छे. ११५२ मां दीक्षा, ११७४ मां आचार्यपद, अने १२२६ मां श्रा. व. ७ ने गुरुवारे तेओ स्वर्गस्थ थयां. तेमना गुरु मुनिचंद्रसूरिजी शान्तिसूरिजीना ज्ञानखजानाना वारसदार हता. तेमणे वादि देवसूरिजीने प्रमाण वगेरे शास्त्रनो सारो अभ्यास कराव्यो For Private and Personal Use Only Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR March-2017 हतो. दीक्षा लीधा बाद बे-पांच वर्षमा ज तेमनी ख्याति चोतरफ प्रसरी गइ हती. ते समयमां तेमणे बन्ध नामना शैवदर्शनी द्वैतवादीने धोळकामां जीत्यो, साचोरमां वाद कर्यो ने जीत्या, गुणचंद दिगम्बरने नागोरमां पराजित कर्यो. भागवत शिवभूतिने चित्तोडमां, गंगाधरने ग्वालीयरमां, घरणीधरने धारामां, कृष्ण नामना वादीने भरूचमां, एम एनेक वादीओ उपर जीत मेळवी हती. ____ आचार्य थया पछी तेमणे सिद्धराजनी सभामां दिगम्बर महावादी कुमुदचंद्रने वादमां हराव्यो हतो. कुमुदचंद्रनो ते समये प्रबल प्रताप हतो. पोतानी शक्ति माटे एने खूब अभिमान हतुं, ८४ वादी तेणे जीत्या हतां. वादीदेवसूरीजी साथे वाद करवानी तेने खूब इच्छा हती. देवसूरिजी तेवा तुच्छप्रकृतिना वाद साथे वाद करवा इच्छा धरावता न हतां, पंरतु ज्यारे ते दिगम्बरे अनेक नागाई करी, छेवटे श्वेताम्बर मतनी साध्वीनी छेडती करी एटले देवसूरिजीए वादनुं आमंत्रण आपीने वाद को. ते वादमां मुख्यपणे केवळी-भुक्ति अने स्त्री-मुक्ति ए बे विषयो चर्चाया हतां. शरत प्रमाणे वादमा हार थवाथी दिगम्बरोने गुजरात छोडी चाल्या जवु पड्यु हतुं. आ विजय बाद तोओ ‘वादीदेवसूरिजी' ए नामथी विख्यात थयां. आ विजयथी सिद्धराजे तेओश्रीने विजयपत्र अने एक लाख सुवर्णमुद्राओ अर्पण करी हती. मुनिधर्मना आचार प्रमाणे ते एक लाख सुवर्णमुद्राओ ग्रहण करी न हती. महामंत्री आशुकनी संमतिथी ते मुद्राओनो व्यय करी सिद्धराजे एक जिनप्रासाद बंधाव्यो हतो. तेमां श्री आदिनाथना बिम्बनी ११८३ ना वैशाख शुक्ल द्वादशीने दिवसे प्रतिष्ठा करवामां आवी हती. तेमां चार आचार्यो संमिलित हतां. तेमना आ वादनी अनेक आचार्योए सुन्दर प्रशंसा करी छे. तेमां ते समये हेमचंद्रसूरिजी त्यां विद्यमान हतां, तेमणे 'श्री सिद्धहेमव्याकरण'मां लख्यु के यदि नाम कुमुदचन्द्रं, नाजेष्यद् देवसूरिरहिमरुचिः॥ कटिपरिधानमधस्यत, कमतः श्वेताम्बरो जगति ? ॥ 'जो देवसूरिजी रूपी सूर्ये कुमुदचन्द्रने न जीत्यो होत तो जगतमां क्यो श्वेताम्बर कटि पर वस्त्रने धारण करत ?' श्री जैन सत्यप्रकाश वर्ष-७, दीपोत्सवी अंकमांथी साभार (क्रमशः...) For Private and Personal Use Only Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir समाचारसार भाविन के. पण्ड्या प. पू. राष्ट्रसंत आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म.सा. की पावन निश्रा में त्रिदिवसीय त्रिवेणी महोत्सव सम्पन्न परम पूज्य राष्ट्रसंत आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म.सा. की पावन निश्रा में श्री सीमंधरस्वामी जिनमंदिर महेसाणातीर्थ में दिनांक १० से १२ फरवरी २०१७ तक त्रिदिवसीय महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया था जो विविध कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न हुआ. दिनांक १० फरवरी २०१७ के शुभदिन प. पू. राष्ट्रसंत जैनाचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म.सा. आदि साधु-साध्वीजी भगवन्तों का महेसाणीतीर्थ में विशाल जनसमूह के साथ मंगलगीतध्वनी पूर्वक पावन पदार्पण. पूज्य आचार्यश्रीजी के मंगल प्रवचन के पश्चात् श्री सीमंधरस्वामीजी की पंचकल्याणक पूजा आदि का कार्यक्रम पूर्ण धार्मिक वातावरण में सम्पन्न हुआ. __दिनांक ११ फरवरी को विहरमान तीर्थंकर श्री सीमंधरस्वामीजी का विशिष्ट वर्धमान शक्रस्तव अभिषेक व महाविदेह भावयात्रा का आयोजन किया गया. दिनांक १२ फरवरी को श्रमणोपासिका तुलसीबेन मिश्रीमलजी नथमलजी कटारिया परिवार द्वारा नवनिर्मित श्री सीमंधरस्वामी जिनमंदिर पेढ़ी के नूतन कार्यालय के उद्घाटन समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें विशिष्ट अतिथि के रूप में गुजरात राज्य के माननीय उपमुख्यमंत्री श्री नितिनभाई पटेल उपस्थित हुए. कार्यक्रम के मध्य श्री नितिनभाई पटेल ने परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. आदि साधु-साध्वीजी भगवन्तों का आशीर्वाद प्राप्त कर धन्यता का अनुभव किया. त्रिदिवसीय कार्यक्रम के अन्तिम चरण में योगनिष्ठ आचार्य श्रीमद बुद्धिसागरसूरीश्वरजी म. सा. के समुदाय की साध्वीवर्या श्री कल्पशीलाश्रीजी म. सा. की अर्धशताब्दी संयम अनुमोदना, धर्मसभा, लाभार्थी परिवार का बहुमान व पूज्यश्री का मांगलिक प्रवचन आदि कार्यक्रम आयोजित किये गये. सभी कार्यक्रम बडे सुंदर वातावरण में पूर्ण हर्षोल्लासपूर्वक सम्पन्न हुए. इस अवसर पर पधारे हुए श्रद्धालुओं के लिए बहुत ही सुन्दर आवास-भोजनादि की व्यवस्था की गई थी. For Private and Personal Use Only Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org SHRUTSAGAR 32 March -2017 शांतिग्राम में नवनिर्मित जिनप्रासाद में श्री आदिनाथ प्रभु आदि जिनबिंबों का प्रवेश महोत्सव सम्पन्न Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir परम पूज्य राष्ट्रसंत आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. की पावन निश्रा में अहमदाबाद, वैष्णवदेवी मंदिर समीप, सरखेज-गांधीनगर महामार्ग पर अवस्थित शांतिग्राम में नवनिर्मित जिनालय में दिनांक २४ फरवरी, २०१७ को मूलनायक आदिनाथ प्रभु आदि जिन बिम्बों का प्रवेश महोत्सव सम्पन्न हुआ. इस जिनालय का निर्माण जिनभक्तििरत शांताबेन शांतिलाल भुदरमल अदाणी परिवार द्वारा कराया गया है. नवनिर्मित जिनप्रासाद में मूलनायक श्री आदिनाथ प्रभु आदि जिनबिंबों का प्रवेश महोत्सव परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज साहब तथा उनके आज्ञावर्ति प. पू. आचार्य श्री हेमचन्द्रसागरसूरिजी, गणिवर्य श्री प्रशान्तसागरजी आदि पूज्य साधु-साध्वीजी भगवंतों की निश्रा में संपन्न हुआ. इस शुभ अवसर पर अदाणी ग्रूप ऑफ इन्डस्ट्रीज के चेरमेन श्री गौतमभाई अदाणी ने सपरिवार राष्ट्रसंत आचार्यश्री से आशीर्वाद प्राप्त किये. मधुपुरीतीर्थ में तीन मुमुक्षुओं का भव्यातिभव्य दीक्षा महोत्सव सम्पन्न १ प.पू.राष्ट्रसंत आचार्यश्रीपद्मसागरसूरीश्वरजी की पावन निश्रा में श्रीमद्बुद्धिसागरसूरि विरति वाटिका, महुडी(मधुपुरी) में मुमुक्षु श्री हिरेनभाई, मुमुक्षु जयश्रीबहन व मुमुक्षु विधिकुमारी ने वि.सं.-२०७३ फाल्गुन शुक्ल - १-३ तदनुसार दिनांक- २७ फरवरी से मार्च २०१७ तक आयोजित त्रिदिवसीय दीक्षा महोस्तव में संयम ग्रहण किया. मुमुक्षु हिरेनभाई राष्ट्रसंत आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म.सा. के पट्टशिष्य समतासुधानिधि आचार्य श्री वर्धमानसागरसूरिजी म.सा. के शिष्य मुनि श्री हृदयपद्मसागरजी के नाम से प्रसिद्ध हुए. मुमुक्षु जयश्रीबहन साध्वीवर्या श्री अनंतदर्शनाश्रीजी म.सा. का शिष्यत्व ग्रहण किया व साध्वी श्री जितयशाश्रीजी के नाम से प्रसिद्ध हुई. ये दोनों मुनि श्री कल्याणपद्मसागरजी के शिष्य मुनि श्री यशपद्मसागरजी के सांसारिक माता-पिता हैं. मुमुक्षु विधिकुमारी ने अपनी संसारी बहन साध्वीवर्या श्री हंसदर्शिताश्रीजी म.सा. का शिष्यत्व साध्वी श्री वीतरागदर्शिताश्रीजी के रूप में ग्रहण किया.. इस पावन प्रसंग पर राष्ट्रसंत एवं उनकें शिष्य-प्रशिष्य तथा देश के विभिन्न भागों से पधारे अनेक श्रद्धालु उपस्थित थे. सभी कार्यक्रम आनंदमय वातावरण में सम्पन्न हुए. For Private and Personal Use Only Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir महेसाणातीर्थ महोत्सव के मंगलकारी क्षण महेसाणातीर्थ में पूज्य गुरुभगवंतश्री का मंगल प्रवेश वर्धमान शक्रस्तव पूजन में बिराजमान पूज्य गुरुभगवंतश्री महेसाणातीर्थ परिसर में नूतन ऑफिस का उद्घाटन नायब मुख्यमंत्रीश्री नितीनभाई के साथ चर्चामग्न पूज्य गुरुभगवंतश्री For Private and Personal Use Only Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Registered Under RNI Registration No. GUJMUL/2014/66126 SHRUTSAGAR (MONTHLY). Published on 15th of every month and Permitted to Post at Gift City So, and on 20th date of every month under Postal Regd. No. G-GNR-338 issued by SSP GNR valid up to 31/12/2018. जिन स्थापना पट्ट का एक अंश ASOS BOOK-POST / PRINTED MATTER प्रकाशक श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र आचार्य श्री कैलाससागरसरि ज्ञानमंदिर, कोबा जि. गांधीनगर 382007 15 . (069) 2326EUR 208, 204, 242 फेक्स (079) 23276249 Website : www.kobatirth.org email: [email protected] Printed and Published by HIREN KISHORBHAI DOSHI, on behalf of SHRI MAHAVIR JAIN ARADHANA KENDRA New Koba. Ta.&Dist. Gandhinagar, Pin-382007. Gujarat. And Printed at NAVPRABHAT PRINTING PRESS, 9, Punaji Industrial Estate, Dhobighat, Dudheshwar, Ahmedabad-380004 and Published at SHRI MAHAVIR JAIN ARADHANA KENDRA, New Koba, Ta.&Dist. Gandhinagar, Pin-382007, Gujarat. Editor HIREN KISHORBHAI DOSHI For Private and Personal Use Only