Book Title: Shrutsagar 2015 07 08 Volume 01 02 03
Author(s): Hiren K Doshi
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ISSN 2454-3705 • श्रुतसागर | श्रुतसागर www.kobatirth.org SHRUTSAGAR (MONTHLY) July-Aug 2015, Volume: 02, Issue: 2-3, Annual Subscription Rs. 150/- Price Per copy Rs. 15/EDITOR: Hirenbhai Kishorbhai Doshi SPO ER वरि ॥ मग्यनभः ॥ मुक्तमुपदिषु ममिवलंभ ॥ धूभनव मनं पुण्यच विधमन्ये ॥ भि यः ॥ भचविष् लिउड पिथउयेनभः ॥ जिं शारदालिपिबद्ध सुशोभित हस्तप्रत आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर For Private and Personal Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Krishna पू. गुरुभगवंतश्री के चातुर्मास प्रवेश के कुछ सुनहरे पल For Private and Personal Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org श्रुतसागर आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर का मुखपत्र શ્રુતસાગર वार्षिक सदस्यता शुल्क रू. १५०/ अंक शुल्क - रू. १५/ SHRUTSAGAR (Monthly) वर्ष -२, अंक-2-3, कुल अंक-15, जुलाई-अगस्त २०१५ Year-2, Issue-2-3, Total Issue-15, July-August-2015 Yearly Subscription - Rs.150/Issue per Copy Rs. 15/ आशीर्वाद राष्ट्रसंत प. पू. आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. * संपादक * हिरेन किशोरभाई दोशी एवं जैन Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ज्ञानमंदिर परिवार १५ अगस्त, २०१५, वि. सं. २०७१ श्रावण सुद- १ SINTENT ISSN 2454-3705 वि प्रकाशक आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा, गांधीनगर-३८२००७ For Private and Personal Use Only फोन नं. (०७९) २३२७६२०४, २०५, २५२ फेक्स: (०७९) २३२७६२४९ Website : www.kobatirth.org Email: [email protected] Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra 1. संपादकीय 2. गुरुवाणी 3. Beyond Doubt 4. शारदा लिपि : एक अध्ययन 5. पुस्तक समीक्षा 6. समाचार सार प्राप्तिस्थान : www.kobatirth.org अनुक्रम हिरेन के. दोशी आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरिजी Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Acharya Padmasagarsuri डॉ. उत्तमसिंह डॉ. हेमन्त कुमार डॉ. हेमन्त कुमार आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर तीन बंगला, टोलकनगर परिवार डाईनिंग हॉल की गली में पालडी, अहमदाबाद- ३८०००७ फोन नं. (०७९) २६५८२३५५ For Private and Personal Use Only 3 4 8 30 32 Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org संपादकीय हिरेन के. दोशी पर्युषण पर्व की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ श्रुतसागर का यह अंक आपके करकमलों में सादर समर्पित करते हुए अपार आनन्द की अनुभूति हो रही है। इस अंक में प्रथम लेख गुरुवाणी शीर्षक के तहत आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरीश्वरजी म.सा. कृत कर्मयोग कर्णिका से प्रकाशित किया जा रहा है जिसमें भयत्याग एवं भयोत्पत्ति के विविध प्रकारों का वर्णन किया गया है। द्वितीय लेख के रूप में 'श्रुतदेवीने' शीर्षक के तहत योगनिष्ठ आचार्य भगवन्त श्री बुद्धिसागरसूरिजी म.सा. कृत भजन पद संग्रह भाग-८ में से प्रस्तुत किया गया है तो तृतीय लेख राष्ट्रसंत आचार्य भगवंत श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म.सा कृत पुस्तक Beyond Doubt से संकलित किया गया है । आशा है चातुर्मास के इस पावन अवसर पर इन लेखों के माध्यम से समाज को एक नई दिशा व प्रेरणा मिलेगी। Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir चतुर्थ लेख के रूप में भारतीय प्राचीन लिपियों के संरक्षण-संवर्धन हेतु श्रुतसागर के माध्यम से चली आ रही श्रृंखला के तहत इस बार शारदा लिपि का परिचय प्रस्तुत् किया जा रहा है। इस लेख में शारदा लिपि के उद्भव एवं विकास तथा संपूर्ण वर्णमाला व लेखनशैली का विशद् विवेचन प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक अंक में प्रकाशित होनेवाली पुस्तक समीक्षा श्रृंखला के तहत इस बार जिनशासन आराधना ट्रस्ट, मुंबई द्वारा वि.सं. २०७० में प्रकाशित कृति 'जिनालय निर्माण मार्गदर्शिका' की समीक्षा प्रस्तुत् की जा रही है। शिल्प एवं स्थापत्य में रुचि रखनेवाले विद्वानों के लिए यह एक अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण व उच्च कोटि का संदर्भ ग्रन्थ है । समाचार श्रेणी में राष्ट्रसन्त आचार्य भगवन्त श्री पद्मसागरसूरिजी म.सा. एवं उनके शिष्य-प्रशिष्यों के चातुर्मासिक आराधना हेतु मंगल प्रवेश विषयक समाचारों का संकलन किया गया है। आशा है इस अंक में संकलित सामग्री द्वारा हमारे वाचक अवश्य लाभान्वित होंगे व अपने महत्त्वपूर्ण सुझावों से अवगत कराने की कृपा करेंगे। .. For Private and Personal Use Only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org गुरुवाणी आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरिजी भीतिनो सदंतर त्याग करवो. Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ज्यां सुधी भीति छे त्यां सुधी आत्मा एक क्षुद्र जंतु समान छे. आ विश्वमां सात प्रकारनी भीति राखनाराथी कोई जातनुं पण महान कार्य बन्युं नथी, बनतुं नथी अने भविष्यमा बनशे नहि. शरीरनी ममता अने प्राणनी ममता ए बे जेना मनमां नथी ते ज मनुष्य कर्तव्यकार्यनो अधिकारी बने छे. संयोगे जेटली वस्तुओनो आत्मानी साथै संबंध थयो छे तेटली वस्तुओ खरेखर आत्मानी नथी तेथी संयोगी वस्तुओनो वियोग थवानो छे एवो पूर्ण निश्चय करीने आत्माद्वारा जे जे कर्तव्य कार्यो होय तेमां सर्व प्रकारनी भीतिनो त्याग करीने प्रवर्ततुं जोईए. आत्मा विना अन्य कशुं आत्मानुं थयुं नथी, धतुं नथी, थशे नहि एवो निश्चय छे; तो नकामी भ्रान्ति धारीने भीतियो शा माटे धारण करवी जोईए? जे जे वस्तुओ आत्मानी वस्तुतः नथी एवी पौगलिक वस्तुओनी ममताथी भीति उत्पन्न थाय छे, भीतिथी आत्मा परभवमां रहीने नपुंसक जेवो पामर कायर - निःसत्व बने छे. तेथी शुंए श्रेय स्वपरनुं करी शकातुं नथी. कोई पण संयोगनो वियोग थवानो छे, छे ने छे ज; एमां कदापि अन्य फेरफार थवानो नथी, तो शा माटे बीवुं जोईए? स्वाधिकारे विवेकपूर्वक कार्यमां प्रवर्ततां सर्वस्वार्पण करवामां भीतिनो एक विकल्प पण न थाय एवो निर्भय आत्मा ज्यारे थाय छे त्यारे आत्मामां स्थिरता थाय छे अने अस्थिरता टळी जतां सद्वर्तनना शिखरे आत्मा विराजमान थाय छे - एम अनुभवदृष्टिथी अवबोधवं. भीति कर्तव्यभ्रष्ट बनावे छे. जे मनुष्य नामरूपनी अहंवृत्तिना ताबे थईने मृत्यु वगेरे भीतियोथी व्हीवे छे अने तेथी कर्तव्यभ्रष्ट थाय छे तेओ विश्वमां दासत्वकोटीमा रहेवाने उत्पन्न थएला छे. तेओनुं भाग्य एक गरीब पशुना जेवुं दयापात्र देखाय छे. For Private and Personal Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra SHRUTSAGAR www.kobatirth.org 5 શ્રુતદેવીને પદો ત્હારાં સદા પૂજું, અવજ્ઞા ભીતિથી ધ્રૂજું; સદા સેવક બન્યો તારો, કૃપા લાવી ગણો મ્હારો. ભલી પૂજા કરૂં ત્હારી, હૃદય મૂર્તિ બની મ્હારી; હૃદયને ઠારનારી તું, ઉપાધિ ટાળનારી તું. હને દેખે સકલ રોમો, ખડાં થાતાં હૃદય હર્ષે; હૃદયમાં વાસ કરવાથી, અનુભવ વૃષ્ટિયો વર્ષે. ન્હને સેવે મળી શાન્તિ, હૅને સેવે ટળી ભ્રાન્તિ; થયું અદ્ભુત આનન્દે, પડું ના દ્વૈતના ફન્દે. અહો તું પ્રાણથી પ્યારી, જઉ તુજ પર સહુવારી; અભયનિઃખેદ ધરનારી, સહજ આનન્દ કરનારી. સદા મશ્કુલ થયો તુજમાં, અનન્ય પ્રેમ છે તુજમાં; સદા એ મન્ત્રથી ધ્યાવું, સ્મરણમાં તેજને લાવું. ધરે તું બ્રહ્મલીપીને, નિરક્ષર ભાવ જીપીને; સદાની શાન્તિ કરનારી, હૃદયક્ષેત્રે વિચરનારી. સહજ સમ્યક્ત્વ દેનારી, મધુરા બોલ કહેનારી; થઈ પ્રત્યક્ષ તું દેવી, હૃદયથી મ્હેં તને સેવી. અનુપમ વર્ણ ધરનારી, કરી ત્હારી ભલી યારી; અનુપમ ધર્મની ક્યારી, ધરી પ્રીતિ સદા ત્હારી. સદાનો તુજ પૂજારી, ખુમારી ચાખતો ન્યારી; ઉલટ આંખે સહુ દેખું, અલખનિજ વ્યક્તિને પેખું. સદાની બ્રહ્મ ખુમારી, ચઢી તે નહિ ઉતરનારી; બુધ્યબ્ધિ હર્ષ કલ્લોલે, સ્તવે શ્રુતદેવતા બોલે. Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir આચાર્ય શ્રી બુદ્ધિસાગરસૂરિજી For Private and Personal Use Only July-Aug-2015 ૧ ૨. ૩ ૪ ૫ ૬ ૮ ૯ ૧૦ ૧૧ Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Beyond Doubt Acharya Padmasagarsuri The steadfastness, concentration and unity of all parts of the body is tremendous and unique. But only when one descends from the elephant of pride and egoism, such steadfastness and concentration is possible in one's life. One who is egoistic and proud can never realize the greatness of Lord Arihantal. As it has also been said: "लघुता से प्रभुता से मिल THAT À While walking both the right foot and the left foot co-operate with each other to reach their destination. Both are indispensable and supplementary to each other. Such co-operation and adoration is worth practising by one and all. One can be virtuous and great only when one gives up false pride. But for Indrabhuti pride proved to be a great advantage. It was only pride that introduced Indrabhuti Gautama to the Supreme Lord. Without total surrender, pride cannot be overcome. One cannot achieve anything without being humble and noble in thought, word and need. To fill water from the tap, you have to place the pot below the tap and not above it. To fill a bucket of water, it has to be lowered into the well and only when the bucket bends, water flows into it, not otherwise. The train heads towards the station only when the signal bends and only when the switch of the fan or bulb is pressed, electricity flows and the room is brightened. The i.e. mind also works like the switch. For Private and Personal Use Only Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org 7 SHRUTSAGAR July-Aug-2015 The reverse of is i.e. humility. Only when one knows to i.e. darkness can be destroyed. Ony when one learns to do 'Namaskar' i.e. reverence, ignorance can be destroyed and it is only when ignorance is got rid of, the Atman is enlightened and is credited with infinite knowledge, faith and power. It is only in this light of knowledge that Atman experiences infinite bliss. Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir As long as Indrabhuti was not prepared to be humble, he was devoid of knowledge and true glory. As soon as he learnt the lesson of Vinaya i.e. humility, he became respectable. He could achieve this, owing to simplicity and humility alone. CHAPTER 4 Indrabhuti, at last reached the samavasarana. As mentioned earlier he had a doubt in his mind based on the Vedas, which he did not present it before anyone for clarification. His doubt was genuine for it arose in his mind, when he was contemplating over the scriptures. Only those questions having depth will lead to answers which will be effective and impressive. That was the reason for Indrabhuti to have renounced everything and become Lord Mahavira's disciple at once. Some people have doubts that are either incomplete, incorrect or borrowed. They do not get satisfactory answers for their questions, because they themselves are not clear about their doubts as such. One cannot make out head or tail of the questions. For Private and Personal Use Only (Countinue...) Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir शारदा लिपि: एक अध्ययन डॉ. उत्तमसिंह शारदा लिपि हिन्दुस्तान की पुरातन लिपियों में से एक है। इसका उद्भव लगभग छठी शताब्दी के उत्तरार्ध से आठवीं सदी के अन्तराल में गुप्तकालीन उत्तरी ब्राह्मी तथा कुटिल लिपियों से हुआ है। इस लिपि का चलन मुख्यतः अफगानिस्तान, गान्धार, पाकिस्तान के उत्तरी-पश्चिमी भाग, लद्दाख, जम्मु-काश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा एवं दिल्ली के क्षेत्रों में रहा है। इन सभी प्रदेशों से प्राप्त शारदा लिपिबद्ध शिलालेख एवं विविध ग्रन्थों की पाण्डुलिपियाँ इसके प्रमुख साक्ष्य हैं। इनमें से ही शारदा लिपिबद्ध एक पुरातन लेख सराहाँ की प्रशस्ति है। जिसकी लिपि लगभग नौवीं शताब्दी के आस-पास की है। मार्तण्ड का शिलालेख भी अति विस्तृत और प्राचीनतम है। यह लेख महाराजा अवन्तिवर्मा के शासनकाल का है जो लगभग आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लिखा गया है। इसकी लिपि अत्यन्त सुन्दर और पूर्ण विकसित लिपि है। जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि पठन-पाठन में शारदा लिपि का चलन बहुत पहले ही प्रारम्भ हो चुका होगा। इस लिपि का प्रयोग तत्कालीन मुद्राओं में भी खूब हुआ है। काश्मीर के संग्रहालय में शारदा लिपिबद्ध राजकीय प्राचीन मुद्राओं का अपार कोश विद्यमान है। पाश्चात्य पुरातत्त्वविद श्री वोगेल ने भी अपनी पुस्तक 'ऐंटिक्विटीज ऑफ चंबा स्टेट' में शारदा लिपि के कुछ शिलालेखों, पुरातन ताम्रपत्रों और प्रशस्तियों की प्रतिलिपियाँ संकलित ही हैं। इनकी लिपि के स्वरूप तथा लेखनशैली से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि यह लिपि सहस्रों वर्ष पूर्व अस्तित्व में आ चुकी थी। हालाँकि इस लिपि के उत्पत्तिकाल का निश्चित अनुमान लगा पाना कठिन है, लेकिन अद्यावधि पर्यन्त उपलब्ध शिलालेखों, ताम्रपलों, मुद्रालेखों आदि के आधार पर प्रसिद्ध पुरातत्त्वविदों के अलग-अलग मन्तव्य हैं। ब्युलर ने कांगडा से प्राप्त अभिलेख 'बैजनाथ प्रशस्ति' के आधार पर शारदा लिपि का समय आठवीं शताब्दी माना है। किल्हॉर्न बारहवीं शताब्दी मानते हैं। हॉर्नेल ने सातवीं शताब्दी माना है तो १. Buhler, G, Kashmir Report, Calcutta, १९६१, P.७६. २. J.PH.Vogel, Antiquities of Chamba State, pt.l.p. ४४. ३. JASB, Vol. LX, p. ९०. For Private and Personal Use Only Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR July-Aug-2015 डी.आर. साहनी ने पाकिस्तान से प्राप्त अभिलेख के आधार पर छठी शताब्दी माना है। भूषणकुमार कौल डेंबी सातवीं शताब्दी का उत्तरार्ध मानते हैं। जापान के होरयुजी विहार में विद्यमान 'उष्णीषविजय-धारिणी' नामक ताडपत्रीय ग्रन्थ के अन्तिम पत्र पर शारदा लिपि की संपूर्ण वर्णमाला लिखी हुई मिलती है। अनुमान है कि यह पत्र लगभग पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से छठी शताब्दी के पूर्वार्ध में लिखा गया होगा। 'गिलगिट' एवं 'तुर्फान' आदि स्थानों से प्राप्त शारदा लिपिबद्ध अत्यन्त प्राचीन हस्तप्रतों से इसकी प्राचीनता एवं व्यापकता स्वयं प्रमाणित है। साथ ही जो शिलालेख तथा अभिलेख प्राप्त हुए हैं उनसे भी इस लिपि की प्राचीनता, मान्यता एवं लेखनशैली की विविधता के साक्षात दर्शन होते हैं। इनमें चांबा अभिलेख, कांगडा का अभिलेख, अटक शिलालेख, कष्टवार शिलालेख, जयसिंह कालीन शिलालेख, तापर का प्रस्तर शिलालेख, विजयेश्वर का शिलालेख, कपटेश्वर शिलालेख, खुनमूह शिलालेख, उस्कर का शिलालेख आदि प्रधान हैं, जो श्रीनगर के संग्रहालय में संग्रहीत हैं। इन शिलालेखों से ज्ञात होता है कि शारदा लिपि लगभग पन्द्रवीं शताब्दी के आसपास सर्वत्र प्रचलित थी और राजकीय कार्यों में भी प्रयुक्त होती थी। ___ यह लिपि विशेषरूप से काश्मीर में विकसित हुई। यहाँ प्रायः समस्त संस्कृत वाङ्मय शारदा लिपि में ही लिखा गया। काश्मीर को 'शारदा देश' या 'शारदा मण्डल' के नाम से भी जाना जाता है। आज भी यहाँ के ग्रन्थागारों में इस लिपि में निबद्ध हस्तप्रतों को संजोकर रखा गया है। समय-समय पर भारत आनेवाले विदेशी विद्वान इस लिपि में निबद्ध अनेकों ग्रन्थों को अपनी-अपनी लिपियों में लिप्यन्तर कर अपने साथ ले जाते रहे हैं। इन लिप्यन्तरित प्रतियों के साथ मूल प्रतियाँ भी एक स्थान से दूसरे स्थान या एक देश से दूसरे देश तक गई हैं। वर्तमान में ऐसे कई ग्रन्थों के साक्ष्य हमारे सामने विद्यमान हैं जिनकी शारदा लिपि से अन्य लिपियों में लिप्यन्तरित प्रतिलिपियाँ तो उपलब्ध हैं लेकिन उनकी मूल शारदा लिपिबद्ध प्रतें अनुपलब्ध हैं। ये प्रतें अब कहाँ होंगी और किस दशा में होंगी यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं विचारणीय विषय है। एक योजनाबद्ध सर्वेक्षण द्वारा अन्धकार में निमग्न इन पाण्डुलिपियों को खोजने की आवश्यकता है। 8. El, Vol. XX88, p.919-96 And Plate. २. Deambi B.K. Kaul, Crops of Sharda Inscriptions of Kashmir, p. ६०. For Private and Personal Use Only Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 10 श्रुतसागर जुलाई-अगस्त-२०१५ हिन्दुस्तान के ग्रन्थागारों में आज भी शारदा लिपिबद्ध हस्तप्रतों की संख्या लगभग एक लाख से अधिक है। यदि योजनाबद्ध सर्वेक्षण किया जाये तो इस संख्या में और भी वृद्धि होने की निश्चित संभावना है। विदेशी भण्डारों में भी कुछ प्रतियाँ होने के साक्ष्य मिल रहे हैं। इस लिपि में निबद्ध हस्तप्रतें पाठ शुद्धता की दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण मानी गई हैं। इतिहासकार कल्हण अपनी राजतरङ्गिणी में प्राचीनतम शारदा लिपि का साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए कहते हैं दृष्टैच पूर्वभूभर्तृप्रतिष्ठावस्तुशासनैः। प्रशस्तिपट्टैः शास्त्रैश्च शान्तोऽशेषभ्रमक्लमः।।' अर्थात् 'प्राचीन राजाओं के द्वारा निर्माण करवाये गये देवमन्दिर, नगर, ताम्रपत्र, शासन तथा प्रशस्तिपत्र एवं सामायिक काव्यादि ग्रन्थों के अध्ययन से मेरा भ्रम नष्ट हो चुका है। इससे इतना तो सिद्ध हो ही जाता है कि उपरोक्त अभिलेखों में से सब नहीं तो, कुछ की लिपि तो अवश्य ही शारदा रही होगी। लेकिन कालान्तर में इन साक्ष्यों का क्या हुआ एवं कब, कहाँ और कैसे लुप्त हो गये यह एक गहन शोध का विषय है। चीनी यात्री ह्वेनसांग एवं फाह्यान ने अपने याला वर्णन में काश्मीर में शारदा लिपि के गहन अध्ययन और पठन-पाठन की परम्परा का उल्लेख किया है। भिक्षु हेनसांग तो वर्षों तक काश्मीर के 'जैनेन्द्र विहार' में रहकर शारदा लिपिबद्ध ग्रन्थों का अध्ययन, चिन्तन, लिप्यन्तर एवं चीनी भाषा में अनुवाद करते रहे। निश्चय ही इन ग्रन्थों में संस्कृत, पालि, प्राकृत एवं अपभ्रंश का एक अपार साहित्य रहा होगा। कश्मीरी शैवदर्शन का आधारभूत ग्रन्थ शैवसूत्र भी आचार्य वसुगुप्त की कठिन तपस्या और खोज के उपरान्त ही 'महादेव घाटी में शंकर उत्पल' पर शारदा लिपि में अंकित मिला, जिस पर ८७ सूत्र निबद्ध हैं। 'अलहिन्द' ग्रन्थ के रचनाकार अल्बेरूनी (१०वीं शताब्दी) ने भी अपने इतिहास में काश्मीर की लिपि शारदा का उल्लेख सिद्धमातृका नामकरण से किया है। इनका मानना है कि यह लिपि काश्मीर, मध्यदेश तथा वाराणसी में प्रचलित थी एवं मालवा में 'नागर लिपि' का चलन था। उस समय काश्मीर तथा वाराणसी शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे। चीन देश के तआंग साम्राज्य के इतिहास' में भी काश्मीर की लिपि शारदा का उल्लेख हुआ है, जो इसे अत्यन्त प्राचीनता की ओर ले जाता है। १. राजतरङ्गिणी, तरङ्ग-१, श्लोक-१५ For Private and Personal Use Only Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR July-Aug-2015 शारदा लिपि के समकालीन या कुछ उत्तरवर्ती लिपि देवनागरी है। इन दोनों लिपियों में वर्णविन्यास एवं लेखनपरंपरा की दृष्टि से आपसी साम्य भी दिखाई पडता है। अतः देवनागरी को शारदा लिपि की लघु भगिनी कहा जा सकता है। इस पर शारदा लिपि का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पडता है। कालान्तर में शारदा सिर्फ काश्मीर तथा उसके आसपास के क्षेत्रों तक ही सीमित रही जबकि नागरी लिपि धीरे-धीरे संपूर्ण उत्तर भारत में प्रयुक्त होने लगी। ___टाकरी, डोगरी, गुरुमुखी, पंडवानी, चंदवानी, भटाक्षरी, पाबुची, महाजनी तथा तिब्बत की भोट लिपि भी शारदा लिपि से ही विकसित हुई हैं। अतः इस लिपि को उपरोक्त समस्त लिपियों की जननी कहा गया है। लेकिन यहाँ बडे ही अफ़सोस पूर्वक यह लिखना पड रहा है कि आज शारदा लिपि का चलन हिन्दुस्तान में पूर्णतः बन्द हो चुका है। इस लिपि को जाननेवाले भी गिने-चुने ही बचे हैं, जो बेहद् चिन्ता का विषय है। सदियों से भारतीय पुरातन ज्ञानसंपदा को अपने वर्गों में संजोकर हम तक सुरक्षित पहँचाने वाली इस लिपि को आज संरक्षण की महती आवश्यकता है। अतः विद्वानों से नम्र निवेदन है कि इस लिपि के पठन-पाठन में यथा योग्य सहयोग प्रदानकर इसका संरक्षण एवं संवर्धन करें; जो हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। शारदा लिपि नामकरण विषयक अवधारणा : शारदा लिपि के नामकरण के विषय में स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन अनुमान के आधार पर कह सकते हैं कि इस लिपि का उदय काश्मीर प्रान्त में हुआ। काश्मीर की आराध्य देवी भगवती शारदा हैं। इसी कारण इस प्रदेश को शारदा देश भी कहा जाता है। अतः शारदा देश की लिपि होने के कारण इसे शारदा लिपि के रूप में प्रसिद्धि मिली। पाश्चात्य पुरातत्त्वविद एस.वी. शातदा ने अपनी पुस्तक कश्मीर वोकाबुलरी' (लंदन संस्करण) में कहा है कि 'शारदानन्दन नामक किसी विद्वान् ने कश्मीरी भाषा को लिखने में इस लिपि का प्रयोग किया, अतः इसका नाम शारदा लिपि पडा। यह अनुमान ऐसा ही है जैसा कि नागरी लिपि के नामकरण के विषय में नागर ब्राह्मणों के द्वारा लेखनकार्य किये जाने के कारण नागरी नाम पडना। लेकिन शारदालिपि नामकरण विषयक इस अनुमान के सिद्ध होने की संभावना बहुत ही कम है। For Private and Personal Use Only Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर जुलाई-अगस्त-२०१५ रायबहादुर पं. श्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'भारतीय प्राचीन लिपिमाला' में शारदा देश में उत्पन्न एवं विकसित होने के कारण ही इस लिपि का शारदा नाम से प्रसिद्ध होना लिखा है जो उचित प्रतीत होता है। पाश्चात्य विद्वान् डॉ. ब्यूलर तथा डॉ. एम.ए. स्टॉन ने भी इस लिपि के शारदा देश में प्रचलित तथा उत्पन्न होने के कारण इसका नाम शारदा के रूप में प्रसिद्ध होने की संभावना व्यक्त की है। जब तक स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते तब तक शारदा देश में उत्पन्न व प्रचलित होने के कारण तथा शारदा देश की सर्वमान्य लिपि होने के कारण ही इसका नाम शारदा लिपि के रूप में प्रसिद्ध होना सर्वसम्मत प्रतीत होता है। शारदा लिपि की विशेषताएं: * यह लिपि ब्राह्मी, नागरी, ग्रंथ तथा अन्य भारतीय लिपियों की तरह ही बायें से दायें लिखी जाती है। * इस लिपि में नागरी लिपि की तरह शिरोरेखा लगाकर लिखने का विधान है, जो हमें ब्राह्मी तथा ग्रंथ लिपियों में नहीं मिलता। * शारदा तथा देवनागरी लिपियों में अत्यन्त साम्य दृष्टिगोचर होने के कारण इन दोनों लिपियों को सगी बहेनों की संज्ञा प्राप्त है। * इसका स्वरूप अत्यन्त नेलाकर्षक एवं किंचित स्थूलाक्षरात्मक है। अतः इसे स्थूलाक्षर लिपि भी कह सकते हैं। * मोटी कलम द्वारा अक्षरों के लेखन की परंपरा होने के कारण इस लिपि में निबद्ध हस्तप्रतों को स्पष्टतया पढा जा सकता है। जिस कारण लिप्यन्तर या संपादन आदि में अशुद्धि होने की संभावना कम हो जाती है। * यह लिपि हस्तनिर्मित कागजों पर लिखने के लिए उपयोगी लिपि है। हालाँकि इस लिपि में निबद्ध ताडपत्नीय पाण्डुलिपियाँ भी उपलब्ध हैं, लेकिन इसके अक्षरों का आकार स्थूल होने के कारण तथा ताडपलों में कागज के मुकावले स्थानाभाव के कारण इसे कश्मीरी कागजों पर लिखने हेतु महत्त्वपूर्ण लिपि माना गया है। * यह लिपि काश्मीर तथा पंजाब के राजकीय कार्यालयों में भी प्रयुक्त होती रही है। अतः इसे तत्कालीन राजकीय कार्यकाज़ की लिपि होने का गौरव प्राप्त है। For Private and Personal Use Only Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 13 July-Aug-2015 * गिलगिट से प्राप्त प्राचीनतम पाण्डुलिपियाँ इसी लिपि में निबद्ध हैं, जिसे शारदा लिपि का गौरव कहा जा सकता है। इस लिपि में संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाबद्ध साहित्य को शतप्रतिशत शुद्ध लिखा जा सकता है। यह लिपि लेखन एवं वाचन की दृष्टि से सरल एवं सुगम है। अर्थात् जो बोला जाता है वही लिखा जाता है और फिर वह लिखित पाठ उसी पूर्वोच्चारित ध्वनि का बोध कराता है। इस लिपि में समस्त उच्चारित ध्वनियों के लिए स्वतन्त्र एवं असंदिग्ध लिपिचिह्न विद्यमान हैं। अतः इसे पूर्णतः वैज्ञानिक लिपि कहा जा सकता है। * प्राचीन ग्रन्थों के समीक्षात्मक संपादन एवं अध्ययन हेतु विद्वानों द्वारा इस लिपि में निबद्ध हस्तप्रतों के पाठों को शुद्धता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण और उपयोगी माना गया है। • अपने समय की श्रेष्ठ लिपि होने के कारण तत्कालीन ग्रन्थकारों एवं लहियाओं ने इसे सर्वाधिक आश्रय प्रदान किया । * इसकी वर्णमाला में स्वर एवं व्यंजन वर्णों का वर्गीकरण ध्वनि-वैज्ञानिक पद्धति से व्याकरणसम्मत उच्चारण स्थान एवं प्रयत्नों के आधार पर किया गया है। * इस लिपि का प्रत्येक वर्ण स्वतन्त्ररूप से एक ही ध्वनि का उच्चारण प्रकट करता है, जो सुगम और पूर्णतः वैज्ञानिक विधान है। * इस लिपि में ब्राह्मी की तरह पडीमात्रा का प्रयोग भी देखने को मिलता है। इस लिपि में अनुस्वार, अनुनासिक एवं विसर्ग हेतु स्वतन्त्र लिपिचिह्न प्रयुक्त हिए हैं, जो उत्तरवर्ती लिपियों में भी यथावत् स्वीकृत हैं । * इस लिपि में संयुक्ताक्षर लेखन हेतु अक्षरों को ऊपर-नीचे लिखने का विधान मिलता है। अर्थात् जिस अक्षर को आधा करना होता है उसे ऊपर तथा दूसरे अक्षर को उसके नीचे लिखा जाता है। * ब्राह्मी, नागरी तथा ग्रंथ लिपियों में भी संयुक्ताक्षर लेखन हेतु यही परंपरा मिलती है । कालान्तर में नागरी लिपि में संयुक्ताक्षर लेखन परंपरा में परिवर्तन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप संयुक्ताक्षरों को एक ही शिरोरेखा के नीचे प्रथम अक्षर For Private and Personal Use Only Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर जुलाई-अगस्त-२०१५ को आधा तथा दूसरे अक्षर को पूरा समानान्तर लिखा जाने लगा। आधुनिक नागरी तथा अन्य आधुनिक लिपियों में अब इसी प्रकार समानान्तर संयुक्ताक्षर लेखनविधान देखने को मिलता है। * इस लिपि में कुछ अक्षरों का संयुक्त विधान उपरोक्त ब्राह्मी, ग्रंथ, नागरी आदि लिपियों से अत्यन्त भिन्न है। अर्थात् कुछ अक्षरों के आपस में संयुक्त होने पर एक तीसरा ही नया स्वरूप उभर कर सामने आता है जिसे गहन अध्ययन के बाद ही समझा जा सकता है। * इस लिपि में संयुक्ताक्षर लेखनविधा अति विस्तृत और वैविध्यपूर्ण है। जिसके कारण इसमें निबद्ध हस्तप्रतों को पढने अथवा लिप्यन्तर करने वालों को अधिक परिश्रम करना पडता है। लेकिन संयुक्ताक्षरों की यह प्रक्रिया कुछ नियमों के तहत चलती है और जिनको इन नियमों का सम्यक् ज्ञान हो उनके लिए इसे समझना बहुत ही आसान हो जाता है। * इस लिपि में रेफ युक्त वर्गों के लेखन हेतु एकाधिक विधान देखने को मिलते हैं, जिनमें से कुछ अति सरल हैं तो कुछ अति कठिन। * उत्तरी भारत की प्राचीन तथा आधुनिक लिपियों, दक्षिणी भारत की द्राविड लिपियों तथा भारत के पार्श्ववर्ती देशों की लिपियों का शारदा से बहुत कुछ सादृश्य है। इनमें वर्णमाला, स्वर-व्यंजन भेद, स्वर-क्रम, व्यंजनों का वर्गीकरण, माला नियम आदि सब लगभग समान ही हैं। किसी में कुछ ध्वनियाँ कम हैं तो किसी में अधिक। * ब्राह्मी के अलावा सर्वाधिक लिपियों की जननी होने का गौरव इस लिपि को प्राप्त है। * गुरुमुखी, टाकरी, डोगरी, मोडी, महाजनी, रामजानी, पावुची, भटाक्षरी, तिब्बती आदि अनेक लिपियाँ इसी लिपि से उदित हुई हैं। । * यह लिपि लेखन, प्रतिलिपिकरण तथा लिप्यन्तरण के पर्याप्त अनुकूल लिपि है। * इस लिपि का ज्ञान प्राचीन हस्तप्रतों को सरलतापूर्वक पढने, लिप्यन्तर करने, 'प्रतिलिपि करने एवं ऐतिहासिक तथ्यों को जानने में अतीव सहायक सिद्ध होता For Private and Personal Use Only Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 15 SHRUTSAGAR July-Aug-2015 * इस लिपि के जानकार प्राचीन नागरी लिपि को आसानी से सीख सकते हैं। * आज भी इस लिपि में निबद्ध हस्तप्रों की संख्या लगभग एकलाख से अधिक है, जो भारतीय ग्रन्थागारों के गौरव में अभिवृद्धि करती है। शारदा लिपि की वर्णमाला : शिलाखण्ड, ताम्रपत्र, लोहपत, ताडपत्र एवं हस्तनिर्मित कश्मीरी कागजों आदि पर निबद्ध प्राप्य साक्ष्यों में प्रयुक्त इस लिपि के स्वर एवं व्यंजन वर्गों की संरचना तथा लेखन विधान निम्नवत है स्वर वर्ण लेखन प्रक्रिया अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ अउ जाता ल ल ए ऐ ओ औ अं अः TE TENNउमः विदित हो कि शारदा लिपिबद्ध पाण्डुलिपियों में दीर्घ 'ई'कार के दो प्रयोग प्राप्त होते हैं जो उपरोक्त तालिका में प्रदर्शित किये गये हैं। 'अनुस्वार' चिह्न भी दो तरह से प्रयुक्त होता है, एक उस अक्षर के ऊपर लगाकर नागरी लिपिवत् तथा दूसरा उस अक्षर के पीछे लगाकर ब्राह्मी व ग्रंथ लिपिवत्। "विसर्ग' चिह्न अन्य लिपियों की तरह ही अक्षर के पीछे लगाने की परम्परा मिलती है। यह विसर्ग चिह्न कभी-कभी पूर्णविराम चिह्न का भ्रम भी उत्पन्न करता है। अतः शारदा लिपिबद्ध हस्तप्रतों के पठन-पाठन या लिप्यन्तरण करते समय इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। For Private and Personal Use Only Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर जुलाई-अगस्त-२०१५ व्यंजन वर्ण लेखन प्रक्रिया - - - - - काय ग य क रजक 44व - - - ८05उघ7 थ कडाचा भयावल व स - - घमनका कार, रस इन वर्गों में 'म'कार शिरोरेखा बिना लिखा जाता है जो हस्तप्रत पढते समय नागरी लिपि के 'भ' वर्ण का श्रम करता है। 'श'कार नागरी लिपि के 'म' वर्ण जैसा होने के कारण 'म'कार का भ्रम उत्पन्न करता है। मूर्धन्य 'ष'कार शिरोरेखा के बिना लिखा जाता है तथा 'स'कार नागरी लिपि के 'भ' वर्ण की तरह लिखा जाता है। विदित हो कि 'स'कार तथा 'म'कार दोनों ही एक समान दिखते हैं, लेकिन इन दोनों में सूक्ष्म अन्तर है जिसे ध्यान में रखना चाहिए। वह अन्तर सिर्फ इतना ही है कि 'म'कार के नीचे की ओर का भाग गोलाकार होता है जबकि 'स'कार के नीचे का भाग लिभुजाकार होता है। 'थ' वर्ण नागरी लिपि के मूर्धन्य 'ष' की तरह लिखा जाता है। इसी प्रकार 'ब' तथा 'व' वर्गों में भी साम्य दिखाई देता है। इन दोनें में अन्तर सिर्फ इतना ही है कि 'व' की खडीपाई नीचे तक निकली हुई होती है जबकि 'ब' की खडीपाई बाईं ओर मुडकर त्रिकोणाकार गोल हो जाती है। 'घ' वर्ण भी नागरी लिपि के 'घ' वर्ण का भ्रम उत्पन्न करता है। 'छ' वर्ण ब्राह्मी के 'छ' तथा नागरी के 'ळ' वर्ण जैसा होता है। 'उ'कार एवं 'त'कार भी एक-जैसे For Private and Personal Use Only Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 17 SHRUTSAGAR July-Aug-2015 होने के कारण परस्पर एक-दूसरे का भ्रम उत्पन्न करते हैं। अतः हस्तप्रत पढते समय इन वर्गों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। हलन्त-चिह्न लेखन प्रक्रिया इस लिपि में हलन्त के लिए (१) चिह्न प्रयुक्त हुआ है, जो अन्तिम वर्ण की शिरोरेखा के साथ जोडकर ऊपर से नीचे की ओर किंचित दाईं ओर घुमाकर लगाया जाता है। यह चिह्न कभी-कभी पूर्णविराम अथवा 'आ' की मात्रा का श्रम भी उत्पन्न करता है। उदाहरण स्वरूप यहाँ कुछ वर्षों में हलन्त चिह्न लगाकर इस प्रक्रिया को निम्नवत् समझा जा सकता है क ट् । त् । न् । म् कराउन भर - - - विदित् हो कि हलन्त चिह्न युक्त वर्गों के साथ जब 'र' जोडते हैं तो उस वर्ण के नीचे की ओर (1) इस प्रकार का चिह्न लगाकर लिखा जाता है। यथा - to ६ क 7 s +Hartal amasomeomkuwarnimes otto tot he - - - - - अवग्रह चिह्न लेखन प्रक्रिया इस लिपि में अवग्रह के लिए (s) चिह्न प्रयुक्त हुआ है जो आधुनिक देवनागरी में अद्यपर्यन्त प्रचलित है। यथा- केऽथि For Private and Personal Use Only Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 18 श्रुतसागर जुलाई-अगस्त-२०१५ अनुनासिक चिह्न लेखन प्रक्रिया । यह चिह्न नागरी लिपि में प्रयुक्त चन्द्रबिन्दु जैसा ही होता है, जो वर्ण की शिरोरेखा पल लगाया जाता है। कहीं-कहीं यह उलटा भी लिखा हुआ मिलता है। दोनों ही प्रकार निम्नवत् हैं - । पँ ॐ चैं उग, य य,ये मात्रा लेखन प्रक्रिया इस लिपि में प्रयुक्त मालाओं के लेखन हेतु निम्रोक्त चिह्नों का प्रयोग हुआ है उ ऊ ऋ 4.७. J | अनुस्वार विसर्ग औ mecamera - इनमें से 'आ' स्वर की माला के तीन प्रकार मिलते हैं। यह माला व्यंजन की शिरोरेखा के अन्त में कभी एक छोटी सी बिन्दी, कभी छोटा दण्ड और कभी त्रिकोणाकार के रूप में प्रयुक्त होती है। विदित हो कि स्वतन्त्र 'आ' लिखते समय हस्व 'अ'के नीचे एक छोटा सा गोलाकार चिह्न लगाकर लिखने का विधान है जो ह्रस्व 'उ'कार की मात्रा जैसा दिखता है। ह्रस्व 'इ' एवं दीर्घ 'ई' की मालाएँ देवनागरीवत् ही प्रयुक्त हुई हैं। ह्रस्व 'उ' एवं दीर्घ 'ऊ की माताओं के अनेकविध प्रयोग देखने को मिलते हैं, जिनका उल्लेख हम आगे करेंगे। “ए' व 'ऐ की मात्राएँ शिरोरेखा पर क्रमशः एक व दो पडीपाई के रूप में लगती. For Private and Personal Use Only Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 19 July-Aug-2015 हैं। 'ओ' व 'औ' की मालाओं में सिर्फ इतना ही अन्तर है कि 'ओ' की मात्रा के पीछे एक छोटीसी 'आ' की मात्रा लगा देने से वह 'औं' की मात्रा बन जाती है। ऋ की माला लगभग नागरीवत् ही है। यहाँ 'क' वर्ण के साथ सभी मात्राओं का प्रयोग निम्नवत् है क | का | कि की | कु कू कृ क| काकि की कु कुक कृ के | कै | को कौ कं । कः का के केक का केक का विदित हो कि 'ङ, ज, ट तथा ण' के साथ जब 'आ' की मात्रा लगती है तो इसके आकार में किंचित् परिवर्तन हो जाता है, जो निम्नवत् है - - - - - र रस | ह्रस्व 'उ'कार एवं दीर्घ 'ऊ'कार की मात्राओं के विविध प्रयोग 'उ' एवं 'ऊ' की मात्राओं के ब्राह्मी, ग्रंथ, नागरी आदि लगभग सभी लिपियों में एकाधिक वैकल्पिक प्रयोग देखने को मिलते हैं। शारदा लिपि भी इस नियम से अछूती नहीं रही। यहाँ हस्व 'उ'कार मात्रा के लगभग तीन प्रयोग व दीर्घ 'ऊ'कार की माला के दो प्रयोग प्रदर्शित किये जा रहे हैं, जो व्यंजन वर्गों के नीचे की ओर लगाने ' का विधान है। यथा कु । कू । छु । डू क.कुछ ,कक, कु ऊ. For Private and Personal Use Only Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 20 श्रुतसागर जुलाई-अगस्त-२०१५ विदित हो कि शारदा लिपि में जब 'क' वर्ण के साथ हस्व या दीर्घ 'उ'कार की मात्रा का प्रयोग होता है तो इसका स्वरूप किंचित् परिवर्तित हो जाता है जैसा कि ऊपर दर्शाया गया है। इसी प्रकार जब 'के' के साथ हस्व या दीर्घ 'ऋ'कार की माला का प्रयोग होता है तो भी इसका स्वरूप परिवर्तित होता है। यथा कृ सह रेफसूचक चिह्न इस लिपि में रेफ के लिए ग्रंथ या नागरीवत् अलग से कोई चिह्न प्रयुक्त नहीं हुआ है। लेकिन रेफ के अनेकविध प्रयोग अलग-अलग वर्गों की प्रकृति अनुसार देखने को मिलते हैं। कुछ वर्गों को 'र' के नीचे लिखकर रेफ का प्रयोग किया जाता है तो कुछ वर्णों के साथ ऊपर की ओर रिक्त स्थान छोडकर इसका प्रयोग दर्शाया जाता है। कुछ वर्णों का तो रेफ लगने के कारण स्वरूप ही बदल जाता है और वे एक तीसरा ही नया स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। यहाँ रेफ के समस्त प्रयोगों को क्रमानुसार प्रदर्शित किया जा रहा है मध्यस्थ हलन्त 'र' वर्ण प्रायः अपने अग्रिम वर्ण के आरम्भ में शीर्ष पर लिखकर रेफ चिह्न के रूप में प्रयुक्त होता है। अर्थात् ऊपर 'र' लिखकर उसके नीचे दुसरा वर्ण जिस पर रेफ का प्रयोग दर्शाना हो वह लिख दिया जाता है। इसके अलावा एक प्रयोग ऐसा भी मिलता है जिसके तहत जिस वर्ण पर रेफ लगाना हो उस वर्ण को लिखकर, उसके आगे एक गोलाकार चिह्न बना दिया जाता है; जो रेफ के रूप में उच्चारित होता है। यहाँ इन दोनों ही प्रकारों को निम्नवत् दर्शाया जा रहा है र् + क = र्क निलक र् + क = के नाक % arm ananews १. ग्रंथ, प्राचीन नागरी एवं आधुनिक देवनागरी लिपियों में भी यह परिवर्तन देखने को मिलता है। २. ब्राह्मी लिपि में भी यही प्रयोग देखने को मिलता है। For Private and Personal Use Only Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR July-Aug-2015 अर्क मानक वार्ता वाव जब भी 'ख, ग, च, ज, ध एवं श' इन छः वर्गों में रेफ लगता है तो हलन्त र का सीधा प्रयोग न कर केवल उस स्थान को रिक्त अथवा खाली रखकर नीचे की ओर द्वितीय अक्षर को लिख दिया जाता है। ऐसी स्थिती में उपरोक्त इन छः वर्णों की पृष्ठ माला (खडीपाई) ऊपर की ओर से, अर्थात् शिरोरेखा से नीचे की ओर स्पष्टतः रिक्त दिखाई पड़ती है। अतः यदि इन वर्गों को ध्यान में रखा जाये तो उपरोक्त शिरोरेखा से संलग्न ऊपर से नीचे की ओर खडीपाई वाले रिक्तस्थान को देखते ही इस प्रक्रिया का बोध हो जाता है। यथा र+ख छ - सुर्ख, सुर्खियाँ + ग = " - मार्ग, दुर्गा T+य च-भचभाबमा रग-ज-मनायज र+च = र्च - अर्चना, चर्चा | र+ज = र्ज - आर्जव, अर्जुन राज-अजमान -स.भुलव असुन +ध = - उत्तरार्ध, ऊर्ध्व | र+श = र्श - दर्शन, विमर्श +--उपसअचम्म म-रमन,विभन्न ३. 'ण' पर रेफ लगाकर 'ण' लिखते समय ये दोनों वर्ण आपसमें मिलकर एक तीसरा ही नया स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं, जो देखने में तो लगभग 'ल' वर्ण जैसा होता है लेकिन उसे 'ण' पढा जाता है। यथा + ण = र्ण ल For Private and Personal Use Only Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra आर्य वर्य www.kobatirth.org श्रुतसागर जुलाई-अगस्त- २०१५ कर्ण कल कर्णाटक कल क इसी प्रकार जब 'य' वर्ण पर रेफ लगता है तो भी 'र्' और 'य' दोनों संयुक्त होकर एक नया स्वरूप धारण कर लेते हैं, जो देखने में तो नागरी लिपि के 'द' वर्ण जैसा होता है लेकिन 'र्य' पढा जाता है। हस्तप्रत लिप्यन्तर एवं पठन-पाठन के समय 'र्य' का यह स्वरूप सदैव 'द' का भ्रम करता है। अतः इस चिह्न को विशेरूप से ध्यान में रखना चाहिए। यथा 22 र् + य = र्य तस्य = द अद धार्य वद सर्व भच चतुर्वर्ग उचज एद कार्यालय कदन्तय जब भी अग्र हलन्त 'र्' के बाद 'व' वर्ण आता है तो भी 'र्व' लिखने के लिए एक नये आकार का संयुक्ताक्षर उभरकर आता है, जो देखने में तो नागरी लिपि के 'च' वर्ण जैसा होता है लेकिन पढा जाता है 'र्व' । यथा र् + व = र्व बर+व= च Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir गर्वित पूर्वी For Private and Personal Use Only ਸਥਿਤ थु ची Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 23 July-Aug-2015 जब भी हलन्त 'र' के बाद 'थ' वर्ण आता है तो 'र्थ के लिए एक नये आकार का संयुक्त व्यंजन उभरकर आता है। यह वर्ण लगभग नागरी लिपि के दीर्घ 'ऊ'कार सदृश होता है, जो शारदा लिपि में सर्वदा 'थ' का बोध कराता है। यथा र + थ = र्थ पार्थ सार्थ यऊ । कार्यार्थम् कादऊभर भाऊ पुरुषार्थ धुरुधाऊ शारदा लिपि में अंक लेखन ||3|BFभाउ 60. ha शारदा लिपि में संयुक्ताक्षरों की स्थिति शारदा लिपिबद्ध पाण्डुलिपियों में प्रयुक्त संयुक्ताक्षरों का ज्ञान संपादनकार्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। जैसा की हम उपरोक्त प्रक्रिया में देख चुके हैं कि इस लिपि में कुछ अक्षर ऐसे हैं जो दूसरे वर्गों के साथ संयुक्त होनेपर पूर्णतः परिवर्तित हो जाते हैं। यदि उस परिवर्तित स्वरूप का ज्ञान न हो तो हस्तप्रत पढते समय या लिप्यन्तर करते समय अनेकविध अशुद्धियाँ होने की संभावना बढ़ जाती है। यहाँ हम उरोक्त संयुक्ताक्षरों के अलावा मिलनेवाले संयुक्त वर्णों की प्रक्रिया एवं उनके स्वरूप का उल्लेख करेंगे। जब हलन्त स्' के साथ थे वर्ण जुडता है तो स्थ' लिखने के लिए 'स' को पूरा लिखकर उसके नीचे शारदा लिपि में 'र्थ' के लिए प्रयुक्त नागरी लिपि के 'ऊ कार सदृश वर्ण को लिखा जाता है जिसका उच्चारण 'स्थ होता है। १. प्राचीन देवनागरी लिपि में भी स्थ, ज्ज व ज्झ के लिए नये ही परिवर्तित स्वरूप वाले संयुक्ताक्षर प्रयुक्त हुए हैं। For Private and Personal Use Only Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 24 श्रुतसागर यथा जुलाई-अगस्त-२०१५ स् + थ= स्थ भाव: स्थान स्थानीय सुनीया स्थापना प्रस्थान धूिमुना इसी प्रकार जब हलन्त 'त् एवं न्' वर्गों के पश्चात् 'थ' वर्ण आता है तो त्थ' एवं 'न्थ' लिखने के लिए 'त' व 'न' वर्गों को पूरा लिखकर उनके नीचे उपरोक्त 'ऊ'कार सदृश वर्ण लिखा जाता है। यथा - - त् + य = त्य न् + थन्थ उघऊना+च-ऊ. अश्वत्थ भनऊ, ग्रन्थागार गगन उत्थान ऊन आत्ममन्थन अङमजन आत्ममन्थन जब 'द' के साथ 'ध' वर्ण जुडता है तो 'द' लिखकर उसके नीचे एक (8) ऐसा चिह्न लगाकर लिखा जाता है जिसका उच्चारण 'द्ध होता है। यथा For Private and Personal Use Only Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 25 SHRUTSAGAR July-Aug-2015 समृद्ध सभवृद्धिवार । श्रद्धा सिद्धि भियूि 'द' के साथ 'य'वर्ण जोडकर 'द्य' लिखने के लिए पूरा 'द' लिखकर उसके नीचे आधा 'य' जोडा जाता है जो नागरी लिपि में प्रचलित 'ऋ'कार की मात्रावत दिखता है। यथा द् + य = द्य चिय: भट्ट विद्यालय विलय । विः । विद्योपासना विधाभन अद्य विद्या विदित हो कि अन्य हलन्ताक्षरों में भी जब 'य' वर्ण जुडता है तो इसका स्वरूप उपरोक्त नागरी लिपि के ऋकार की मात्रावत् ही हो जाता है। यथाध्यान पन आदित्य भरि । रम्य तभ masam अभ्यास भभ मूर्धन्य 'ए' के साथ जब 'ट' या 'ठ' वर्ण जुडते हैं तो दो प्रकार से लिखने का विधान मिलता है। एक तो 'ष' के नीचे 'ट' या 'ठ' वर्ण को यथावत लिख दिया जाता है। जबकि दूसरी प्रक्रिया के तहत मूर्धन्य 'ष' लिखकर उसके नीचे नागरी लिपि में प्रचलित दीर्घ 'ऊ'कार की मात्रा सदृश चिह्न लगाया जाता है जो 'ष्ट' एवं 'ठ' दोनों के लिए एक समान प्रयुक्त होता है। इस कारण यह एक दूसरे का श्रम भी उत्पन्न करता है। ऐसी स्थिती में हस्तप्रत पढते समय आनुपूर्वी-अनानुपूर्वी विधान का प्रयोग कर १. ग्रंथ लिपि में भी यकार जोडकर लिखने के लिए लगभग ऐसा ही चिह्न और यही प्रक्रिया देखने को मिलती है। For Private and Personal Use Only Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 26 श्रुतसागर जुलाई-अगस्त-२०१५ योग्य पाठ का अवगाहन करना चाहिए। विदित हो कि शारदा लिपिबद्ध पाण्डुलिपियों में 'ष्ट' या 'ष्ठ लिखने के लिए यह द्वितीय प्रयोग ही अधिक देखने को मिलता है। अतः इसे ध्यान में रखना चाहिए। ये दोनों प्रयोग निम्नवत हैं - ष् + ट = ष्ट घट,धू - ष् +ठ = ष्ठ घर+0:धू.पू वृष्टि -- तीर्थकर अरिहन्त सिद्ध आचार्य ब्राह्मी शारदा 5 रूपू ओष्ठ धुडवू वधि काबू पृष्ठभ , मधू । शारदा लिपि में लेखन अभ्यास जीजर | पूजा अर, पुर द्विारा कृष्ण ज भि निरञ्जन झियाद मल, मुल मदन उल, जुल सुचना मदासुद सुन्दरी स्वच्छ मुग्ध चर्चा अर्जुन - - सूक्ष्म मक, मुझ मय, मुया - - | शून्य प्रार्थना अर्चना मिलन घाऊन अन्ना स्थूल ओष्ठ उधू, उधू इच्छा लज्जा For Private and Personal Use Only Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 27 July-Aug-2015 शारदा लिपि में नमस्कार महामंत्र लेखन अभ्यास में अनि मैं भी mमें अयरियास मैं उवरस्या मैले मतभा एभे धंभकर,भव भी। मंगल' D भवभि, थम्म सब मंगले॥ शारदा-लिपिबद्ध पाण्डुलिपि जिमीगलमयमा डिलीला अनपरागभनी गनिम ग्जूझपिलापिललकाने मन-मत्रिका काडीउदगिरिजमाना हुवनानिसामयियं लमिटलिभमानमभिः भयमक कला कल्पल गणीभक्षमभुमरकीभवभीन मनासिर गोगर अमर ० हायनमभनि मलमविनामविम्यानपास डिसेमिराजनियमिक भलपमळANrs लयली मनायी जमीभीम समाहित उनभर ग यम गर्ग ५ भलामरि भिमक्षतिमा भइय र नीविषमसंग गमावि कहाधियाय मष्ट | १७ पयशाली मूल मक For Private and Personal Use Only Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर जुलाई-अगस्त-२०१५ 28 शारदा-लिपिबद्ध शिलालेख (काश्मीर संग्रहालय की वेबसाईट से साभार) भारतीय प्राचीन श्रुतसंपदा को जीवित रखने में इस लिपि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। प्राचीन इतिहास के पुनर्लेखन में भी शारदा लिपिबद्ध शिलालेखों, दस्तावेजों, सिक्कों, पाण्डुलिपियों, अभिलेखों एवं अन्य साक्ष्यों की अहम भूमिका रही है। काश्मीर सहित भारतीय विविध संग्रहालयों में संगृहीत शारदा लिपिबद्ध इन पुरालेखों के गहन अध्ययन की आवश्यकता है, जिसके माध्यम से अवश्य ही प्रगति के नये पथ प्रकाशित होंगे। इस लिपि में निबद्ध पाण्डुलिपियों के पाठ अत्यन्त शुद्ध प्राप्त होते हैं, जिस कारण इस लिपि में उपलब्ध प्रतें आज भी आधुनिक समीक्षकों की प्रथम पसन्द बनी हुई हैं। हालाँकि वर्तमान में भारतीय ग्रन्थागारों में प्राप्य शारदा लिपिबद्ध पाण्डुलिपियों की संख्या लगभग एक लाख के करीब है। लेकिन जो भी है वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और हमारे ग्रन्थागारों की शोभा में अभिवृद्धि करनेवाला है। यदि एक सुनियोजित सर्वेक्षण किया जाये तो इस संख्या में वृद्धि होने की भी पूरी संभावना है। मुझे पूरा विश्वास है कि एकदिन गिलगिट व तुर्फान की तरह अन्य स्थानों पर भी शारदा लिपिबद्ध प्राचीन खजाना अवश्य मिलेगा, जो हिन्दुस्तान के इतिहास को नई दिशा प्रदान करेगा। इस लिपि ने अपने समान कई अन्य लिपियों को जन्म दिया है, जिनमें से गुरुमुखी, डोगरी, तिब्बती आदि कुछ लिपियाँ तो आज भी प्रचलित हैं। कुछ लिपियाँ For Private and Personal Use Only Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 29 July-Aug-2015 शारदा की तरह ही लुप्त हो चुकी हैं और आज उनको जाननेवाले विद्वान भी नहीं रहे हैं, जो चिन्ता का विषय है। शारदा लिपि के पठन-पाठन की परंपरा को जारी रखने के उद्देश्य से राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन द्वारा आयोजित 'पाण्डुलिपि एवं पुरालिपि अध्ययन कार्यशालाओं' में इस लिपि को भी पढाया जा रहा है, जो सराहनीय है। मुझे भी इन कार्यशालाओं में अध्ययन एवं अध्यापन हेतु समय-समय पर सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त होता रहा है, जिसे मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ। इस अवसर पर मैं काश्मीर प्रान्तीय शारदालिपि विशारद गुरुवर प्रों टी.एन. गञ्जू महोदय को सादर स्मरण करना चाहता हूँ, जिन्होंने विविध कार्यशालाओं के माध्यम से हमें इस लिपि का गहन अध्ययन कराया। प्रो. गञ्ज महोदय अस्सी वर्ष की उम्र में भी एक नौजवान की तरह शारदा लिपिके संरक्षणार्थ आजीवन कृत संकल्पित हैं। इस संकलन में यहाँ जो कुछ भी मैं संकलित कर सका हूँ वह सब उनके ही आशीर्वाद का फल है। यह संकलन उन्हें सादर समर्पित करते हुए भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि उनको सुदीर्घ आयुष्य प्रदान करे, जिससे शारदा लिपि के गूढ रहस्यों को प्रकाश में लाया जा सके। मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस संकलन के माध्यम से समाज में शारदा लिपि के प्रति जागृति आयेगी और इसे पढने-पढाने वालों की संख्या एवं रुचि में अभिवृद्धि होगी। आशा है गणमान्य विद्वज्जन इस लिपि को जीवित रखने के लिए योग्य प्रयास करते रहेंगे और हमारी यह प्राचीन थाती युग-युगान्तरों तक पुष्पित-पल्लवित होती रहेगी। धन्यवाद्॥ संदर्भ ग्रन्थ १. भारतीय प्राचीन लिपिमाला, संपा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा। २. प्राचीन भारतीय लिपिशास्त्र एवं मुद्राशास्त्र, लेखक-ए.पी.त्यागी एवं आर.के.रस्तौगी। ३. भारतीय पुरालिपि विद्या, लेखक-दिनेशचंद्र सरकार। ४. शारदा-लिपि-प्रावेशिका, लेखक-प्रो. टी.एन. गङ्गे। ५. शारदालिपि मञ्जूषा, लेखक-डॉ. अनिर्वाण दश। ६. भारतीय प्राचीन लिपिबोधिनी, लेखक-डॉ. उत्तमसिंह। For Private and Personal Use Only Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra पुस्तक नाम संकलन सहयोग प्रकाशक प्रकाशन वर्ष मूल्य : : : www.kobatirth.org P पुस्तक समीक्षा Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir डॉ. हेमन्त कुमार जिनालय निर्माण मार्गदर्शिका श्री दिनेशभाई महासुखलाल, श्री फेनीलभाई झवेरी जिनशासन आराधना ट्रस्ट, मुंबई. विक्रम संवत् २०७० ५००/- भाषा: गुजराती/हिन्दी मंदिरों, प्रतिमाओं एवं तीर्थों की पवित्र भूमि भारत में अनेक जैन और जैनेतर मंदिर हैं. उनमें जैनमंदिरों का शिल्प, स्थापत्य और उनकी कलाकृति आदि अपूर्व और अनोखी है. मंदिर और तीर्थ भारतीय संस्कृति के प्रचारक एवं संदेशवाहक हैं. आदिकाल से संस्कृति की परम्परा को अविच्छिन्नरूप से मानव को अवगत कराते मंदिर हमारी आस्था के केन्द्र हैं. मंदिर, प्रतिमाएँ एवं तीर्थ हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं जो हमारे अतीत का परिचय देते हुए हमारी सांस्कृतिक प्राचीनता को सिद्ध करते हैं. जिनमंदिर, जिनप्रतिमा और उनकी पूजा का विधान आत्मोन्नतिकारक एवं आत्मविकास के अद्वितीय साधन हैं. जिनमंदिर आध्यात्मिक शुद्धि का अद्भुत केन्द्ररूप पवित्र स्थल है. प्राचीन जैनमंदिरों के शिल्प स्थापत्य, कलाकृति के साथ अनुपम महिमा का सुन्दर वर्णन अनेक शास्त्रों में किया गया है. जिसकी इतनी अधिक महिमा हो, जो हमारे जीवन को एक ऊर्जा प्रदायक हो एवं जहाँ की भूमि हृदय में अलौकिक धर्मोल्लास जगाने की क्षमताधारक हो उसके निर्माण में यदि सावधानी नहीं रखी गई तो इसका विपरीत असर होता हैं. इसलिए जिनालय, जिनप्रतिमा आदि के निर्माण में पूरी सावधानी रखना अति आवश्यक है. For Private and Personal Use Only प्रस्तुत पुस्तक “जिनालय निर्माण मार्गदर्शिका " जिन मंदिर एवं प्रतिमा निर्माण करने-करवाने वालों के लिए बहुत ही उपयोगी ग्रंथ है. इस पुस्तक में जिनालय निर्माण करने -करवाने से होने वाले लाभ, पुण्य आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है. इस ग्रंथ में यह बताया गया है कि मंदिर संबंधी कार्यों के माध्यम से परमात्मा के प्रति अनुरागप्रेम सहज हो जाता है, जिनशासन के साथ विशिष्ट कोटि का ऋणानुबंध होता है जिससे भवान्तर में भी भवोभव जिनशासन की प्राप्ति सहज होती है. जिनशासन के इस क्षेत्र में की गई सेवा भक्ति दीर्घकालीन एवं चिरंजीव होती है. Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 31 July-Aug-2015 इस ग्रंथ में जिनमंदिर निर्माण करने के पूर्व किन-किन बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है, उसका विस्तृत विवरण दिया गया है. इतना ही नहीं मंदिर निर्माण से संबंधित छोटी से छोटी बातों के संदर्भ में संबंधित विषय का सूक्ष्मता पूर्वक उल्लेख किया गया है. जैसे मंदिर निर्माण से पूर्व पूरा प्लान तैयार करना, एस्टीमेट निकालना, शिल्पी से नक्शे तैयार करवाना, खातमुहूर्त के लिए उत्तम समय निर्धारण, आवश्यक सामग्री की व्यवस्था, कारीगरों के साथ पूर्व चर्चा आदि का व्यावहारिक विवरण वर्णित है. किस कार्य के बाद कौनसा कार्य करना, कौन-कौन से कार्य हेतु पूर्व में कैसी तैयारी करनी आदि का खूब स्पष्ट विवरण दिया गया है. किस क्षेत्र में किस प्रकार के सीमेंट, पत्थर, ईंट आदि का प्रयोग करना उपयोगी होगा इस विषय में भी स्पष्टता पूर्वक विवरण दिया गया है. प्रस्तुत प्रकाशन भारतभर में ही नहीं बल्कि संपूर्ण दुनिया में बनने वाले जिनमंदिरों के निर्माण में बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा. जिनशासन आराधना ट्रस्ट एवं उसके मार्गदर्शकों ने प्रस्तुत ग्रंथ को गुजराती एवं हिन्दी भाषा में प्रकाशित करवाकर गुजरात एवं गुजरात के बाहर हो रहे जिनालय निर्माण में आने वाली कठिनाईयों के लिए मार्ग प्रशस्त किया है. जैसा कि पुस्तक में यह वर्णन है कि यह ग्रंथ शीघ्र ही अंग्रेजी भाषा में भी उपलब्ध होने वाला है, तो यह ग्रंथ संपूर्ण विश्व में हो रहे जिनमंदिर के निर्माण में मार्गदर्शक की भूमिका अदा करेगा. पुस्तक की छपाई बहुत सुंदर ढंग से की गई है. आवरण भी कृति के अनुरूप बहुत ही आकर्षक बनाया गया है. विस्तृत विषयानुक्रमणिका, कार्यों एवं उपयोगी वस्तुओं का विवरण, आवश्यक चित्र आदि भी बहूपयोगी सिद्ध होंगे. यह ग्रंथ मंदिर निर्माताओं के लिए तो अत्यन्त उपयोगी है ही, साथ ही ग्रंथालयों में संग्रहणीय भी है. जिनशासन आराधना ट्रस्ट की ओर से मंदिर निर्माण संबंधी मार्गदर्शिका के रूप में मुनि श्री सौम्यरत्नविजयजी म. सा. द्वारा संकलित एवं संपादित “जैन शिल्प विधान" भी प्रकाशित किया गया है. पूज्य श्री सौम्यरत्नविजयजी ने शिल्प संबंधी अनेक शास्त्रों का तलस्पर्शी अध्ययन कर मंदिर निर्माण हेतु एक मार्गदर्शक ग्रन्थ समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है जो मंदिर निर्माण कार्य में बहुत उपयोगी सिद्ध होगा. आचार्य श्री हेमचंद्रसूरीश्वरजी महाराज साहब श्रुतसेवा का अनुपम कार्य कर रहे हैं. संघ, विद्वद्वर्ग तथा जिज्ञासु इसी प्रकार के और भी उत्तम प्रकाशनों की प्रतीक्षा में है. सर्जनयात्रा जारी रहे ऐसी अपेक्षा है. पूज्य आचार्यश्रीजी के इस कार्य की सादर अनुमोदना के साथ कोटिशः वंदन. साथ ही जिनशासन आराधना ट्रस्ट के अधिकारीगण तथा कार्यकर्तागण भी धन्यवाद के पात्र हैं. For Private and Personal Use Only Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir राष्ट्रसन्त आचार्यदव श्री पद्मसागरसूरिजीका चातुर्माप्सिक साधना हेतु मंगलप्रवेश सम्पन्न ___ डॉ. हेमन्त कुमार परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्यभगवन्त श्रीमद पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज साहब ने अपने शिष्य-प्रशिष्यों के साथ दिनांक २५ जुलाई, २०१५ को अहमदाबाद के सेटेलाइट जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ में चातुर्मास आराधना हेतु मंगलप्रवेश किया. इस पावन अवसर पर विशाल शोभायात्रा का आयोजन किया जिसमें हाथी, घोड़े, ऊँट, ध्वज-पताकों से सुसज्जित रथ, विभिन्न प्रकार के बैंड-बाजों के साथ देशविदेश के विभिन्न भागों से पधारे गुरुभक्तों, श्रद्धालुओं एवं स्थानीय लोगों ने भाग लिया. शोभायात्रा जैनधर्म एवं परम पूज्य आचार्यश्रीजी की जय-जयकार करते हुए शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरती हुई सभा स्थल पर पहुँची. मार्ग के दोनों ओर श्रद्धालु नर-नारी नतमस्तक होकर पूज्यश्रीजी को नमन कर रहे थे. विशाल जनसमूह की उपस्थिति में परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्यदेव श्रीमद पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. ने भगवान महावीर के उपदेशों का वर्णन करते हुए कहा कि मानव जीवन का परम लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति. हमें अपने जीवन में लक्ष्य को लेकर ही चलना चाहिए. एक लक्ष्य लेकर चलेंगे तो हमारा मानव जीवन धन्य बनेगा. नहीं तो अब तक हमने कितने मानव तन पाए होंगे किन्तु संयम नहीं करने के कारण संसार में भ्रमण कर रहे हैं. संसार के चक्र से अपनी आत्मा को निकालना है. परमात्मा महावीर ने हमें यही बताया है कि मानव तन मिला है तो इसका सदुपयोग करें. वर्षावास का महत्त्व समझाते हुए कहा कि यह समय हमारे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण है. इस समय में एक स्थान पर स्थिर होकर आत्मकल्याण हेतु साधना करते हुए अपने चरम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु प्रयास करना चाहिए. इस अवसर पर आचार्य श्री देवेन्द्रसागरसूरिजी म. सा., आचार्य श्री हेमचंद्रसागरसूरिजी म. सा., आचार्य श्री विमलसागरसूरिजी म. सा., गणिवर्य श्री प्रशान्तसागरजी म. सा. आदि ने भी जन समूह को अपने प्रवचन से लाभान्वित किया. उपस्थित सभी श्रद्धालुओं हेतु नवकारशी एवं भोजन की उत्तम व्यवस्था की गई थी. सभी कार्यक्रम पूर्ण धार्मिक वातावरण में सम्पन्न हुए. For Private and Personal Use Only Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra सेक www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir शुद्ध का महापर्व पू. गुरुभगवंतश्री के चातुर्मास प्रवेश के कुछ सुनहरे पल For Private and Personal Use Only Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir TITLE CODE: GUJ MUL 00578. SHRUTSAGAR (MONTHLY). POSTAL AT. GANDHINAGAR. ON 15TH OF EVERY MONTH. PRICE: RS. 15/-DATE OF PUBLICATION JULY-AUG-2015 Photo - चातुर्मास प्रवेश प्रसंग के शुभावसर पर आशीष प्रदान करते पूज्यश्री प्रकाशक आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोवा, गांधीनगर 382 फोन नं. (079)23276204,205, 252, फेक्स (079) 23276249 Website : www.kobatirth.org email: [email protected] PRINTED, PUBLISHED AND OWNED BY : SHRI MAHAVIR JAIN ARADHANA KENDRA, PRINTED AT : NAVPRABHAT PRINTING PRESS. 9-PUNAJI INDUSTRIAL ESTATE, DHOBHIGHAT, DUDHESHWAR, AHMEDABAD-380004 PUBLISHED FROM : SHRI MAHAVIR JAIN ARADHANA KENDRA, NEW KOBA, TA. & DIST. GANDHINAGAR. PIN : 382007. GUJARAT EDITOR : HIRENBHAI KISHORBHAI PO Private and Personal Use Only