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जिनभाषित
वीर निर्वाण सं. 2529
TERDOOOD
कुण्डलपुर-बड़े बाबा के निर्माणाधीन
नवीन मन्दिर की आकृति
श्रावण, वि.सं. 2060
अगस्त 2003
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संवेग
आचार्य श्री विद्यासागर जी
जिस प्रकार ललाट पर तिलक के अभाव में स्त्री का सम्पूर्ण श्रृंगार अर्थहीन है, मूर्ति के नहीं होने पर जैसे मंदिर की कोई शोभा नहीं है, वैसे ही बिना संवेग के सम्यग्दर्शन कार्यकारी नहीं है। संवेग सम्यग्दृष्टि साधक का अलंकार है।
संवेग का मतलब है संसार से भयभीत होना, डरना।। ये 'संवेग' अधिक घनीभूत होता है। संवेग अनुभव और श्रद्धा आत्मा के अनन्त गुणों में यह संवेग भी एक गुण है। पूज्यपाद के साथ जुड़ा हुआ है। इस संवेग की प्राप्ति अति दुर्लभ है। स्वामी लिखते हैं कि सम्यग्दर्शन दो प्रकार का है- सराग वीतरागता से पूर्व यह प्रस्फुटित होता है और फिर वीतरागता सम्यग्दर्शन और वीतराग सम्यग्दर्शन। संवेग, सराग सम्यग्दर्शन उसका कार्य बन जाती है। संवेग के प्रादुर्भूत होने पर सभी के चार लक्षणों में से एक है। जैसे ललाट पर तिलक के अभाव बाहरी आकांक्षायें छूट जाती हैं जहाँ संवेग होता है वहाँ विषयों में स्त्री का श्रृंगार अर्थहीन है, मूर्ति के न होने पर मंदिर की कोई की ओर रुचि नहीं रह जाती, उदासीनता आ जाती है। शोभा नहीं है। वैसे ही बिना संवेग के सम्यग्दर्शन कार्यकारी भरत चक्रवर्ती का वर्णन सही रूप में प्रस्तुत नहीं किया नहीं है। संवेग सम्यग्दृष्टि साधक का अलंकार है।
जा रहा है। उनके भोगों का वर्णन तो किया जाता है किन्तु संवेग एक उदासीन दशा है जिसमें रोना भी नहीं है, | उनकी उदासीनता की बात कोई नहीं करता। एक व्यक्ति अपने हँसना भी नहीं है, पलायन भी नहीं है, बैठना भी नहीं है, दूर भी बारह बच्चों के बीच रहकर बड़ा दुःखी होता है। उसकी पत्नी नहीं हटना है और आलिंगन भी नहीं करना है। यह जो आत्मा उससे कहती है, “भरत जी इतने बड़े परिवार के बीच कैसे की अनन्य स्थिति है वह सद्गृहस्थ से लेकर मोक्ष-मार्ग पर रहते होंगे। जहाँ छयानवै हजार रानियाँ, अनेकों बच्चे और आरूढ़ मुनि महाराज तक में प्रादुर्भूत होती है। मुनि पग-पग पर अपार सम्पदा थी। उनके परिणामों में तो कभी क्लेश हुआ हो डरता है और सावधान रहकर जीवन जीता है। वह अपने ऐसा सुना ही नहीं गया।" वह व्यक्ति भरत जी की परीक्षा लेने आहार-विहार में, उठने, बैठने और लेटने की सभी क्रियाओं में पहुँच जाता है, भरत जी सारी बात सुनकर उसे अपने रनिवास सदैव जाग्रत रहता है, सजग रहता है। यदि ऐसा न हो तो वह में भेज देते हैं। उस व्यक्ति के हाथ पर तेल से भरा हुआ कटोरा साधु न होकर स्वादु बन जायेगा। साधु का रास्ता तो मनन और | रख दिया जाता है और कह दिया जाता है कि "सब कुछ देख चिंतन का रास्ता है। उसकी यात्रा अपरिचित वस्तु (आत्मा) से | आओ, लेकिन इस कटोरे में से एक बूंद भी नीचे नहीं गिरनी परिचय प्राप्त करने का उत्कृष्ट प्रयास है। ऐसे संवेग समन्वित चाहिये अन्यथा मृत्यु दण्ड दिया जायेगा।" वह व्यक्ति सब साधु के दर्शन दुर्लभ हैं। आप कहते हैं कि हम 'वीर' की कुछ देख आया पर उसका देखना न देखने के बराबर ही रहा, सन्तान हैं। बात सही है। आप 'वीर' की सन्तान तो अवश्य हैं, सारे समय बूंद न गिर जाने का भय बना रहा। तब भरतजी ने किन्तु उनके अनुयायी नहीं। सही अर्थों में आप 'वीर' की। उसे समझाया, 'मित्र जागृति लाओ. सोचो, समझो। ये नव सन्तान तभी कहे जायेंगे जब उनके बताये मार्ग का अनुसरण | निधियाँ, चौदह रत्न, ये छयानवें हजार रानियाँ ये सब मेरी नहीं करेंगे।
हैं। मेरी निधि तो मेरे अंतरंग में छिपी हुई हैं, ऐसा विचार करके संवेग का प्रारम्भ कहाँ ? जब दृष्टि नासाग्र हो, केवल | ही मैं इन सबके बीच शांत भाव से रहता हूँ।' अपने लक्ष्य की ओर हो और अविराम गति से मार्ग पर चले। रत्नत्रय ही हमारी अमूल्य निधि है । इसे ही बचाना है। आपने सर्कस देखा होगा, सर्कस में तार पर चलने वाला न ताली | इसको लूटने के लिये कर्म चोर सर्वत्र घूम रहे हैं । जाग जाओ, बजाने वालों की ओर देखता है और न ही लाठी लेकर खड़े | सो जाओगे तो तुम्हारी निधि ही लुट जायेगी। आदमी को देखता है। उसका उद्देश्य इधर-उधर देखना नहीं है | "कर्म चोर चहुँ ओर सरबस लूटें सुध नहीं" उसका उद्देश्य तो एकमात्र संतुलन बनाये रखना और अपने संवेगधारी व्यक्ति अलौकिक आनन्द की अनुभूति करता लक्ष्य पर पहुँचना होता है। यही बात संवेग की है।
है। चाहे वह कहीं भी रहे। किन्तु संवेग से रहित व्यक्ति स्वर्गिक सम्यग्दर्शन के बिना पाप से डरना नहीं होता। संसार से | सुखों के बीच भी दुःख का अनुभव करता है और दुखी ही 'भीति' सम्यग्दर्शन का अनन्य अंग है। वीतराग सम्यग्दर्शन में | रहता है।
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रजि. नं. UP/HIN/29933/24/1/2001-TC
डाक पंजीयन क्र.-म.प्र./भोपाल/588/2003
अगस्त 2003
जिनभाषित
मासिक
वर्ष 2, अङ्का
सम्पादक प्रो. रतनचन्द्र जैन
अन्तस्तत्त्व
कार्यालय ए/2, मानसरोवर, शाहपुरा भोपाल-462039 (म.प्र.) फोन नं. 0755-2424666
प्रवचन : संवेग
आ.श्री विद्यासागरजी
आवरण पृष्ठ 2
आपके पत्र: धन्यवाद सम्पादकीय : खेद जनक लेख
. लेख
सहयोगी सम्पादक पं. मूलचन्द्र लुहाड़िया, मदनगंज किशनगढ़ पं. रतनलाल बैनाड़ा, आगरा डॉ. शीतलचन्द्र जैन, जयपुर डॉ. श्रेयांस कुमार जैन, बड़ौत प्रो. वृषभ प्रसाद जैन, लखनऊ डॉ. सुरेन्द्र जैन 'भारती', बुरहानपुर
शिरोमणि संरक्षक श्री रतनलाल कँवरीलाल पाटनी (मे. आर.के.मार्बल्स लि.)
किशनगढ़ (राज.) श्री गणेश कुमार राणा, जयपुर
• सिद्धांत समन्वयसार : ब्र. शांतिकुमार जी वर्तमान में अहिंसा की उपयोगिता
: डॉ. श्रेयांसकुमार जैन चतुर्विध आराधना पर्व चातुर्मास : ब्र. संदीप 'सरल' जैन ग्रहस्थाचार परंपरा का.... : डॉ. शीतलचन्द्र जैन काव्य, दर्शन और अध्यात्म की अन्यतम उपलब्धि : मूकमाटी : डॉ. के.एल. जैन ज़रा सोचिये !
: पद्मचन्द शास्त्री सिद्धतीर्थ कुण्डलपुर : कैलाश मड़बैया चतुर्विध संघ शांति : जैन सुधीर कासलीवाल वाग्वर क्षेत्र का सुन्दर सृजन... : नरेन्द्र जैन सांगानेर का सच
: निर्मल कासलीवाल जिज्ञासा-समाधान
: पं. रतनलाल बैनाड़ा
प्रकाशक सर्वोदय जैन विद्यापीठ 1/205, प्रोफेसर्स कॉलोनी,
आगरा-282002 (उ.प्र.) फोन : 0562-2151428, 2152278
. बोधकथा
सौदा न पटा
कपट का फल
: लघुलोक कथाएँ : दो हजार वर्ष पुरानी कहानी 20
29 - 31
समाचार
सदस्यता शुल्क शिरोमणि संरक्षक 5,00,000 रु. परम संरक्षक
51,000 रु. संरक्षक
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• वर्षायोग : चातुर्मास 2003
32 - 36
वार्षिक
जापान में प्रचलित येनमत और जैनधर्म
आवरण पृष्ठ 3
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आपके पत्र, धन्यवाद : सुझाव शिरोधार्य
आपका
"जिनभाषित" प्रायः मिल जाता है, जून 2003 का अङ्क | है? कृपया सूचित करें। भी मिला। आपका सम्पादकीय - 'द्रव्य और तत्त्व में भेदाभेद'
भवदीय
कमलेश कमार जैन पढ़ा। द्रव्य और तत्त्व के आगम परक सूक्ष्म विवेचन हेतु अनेकशः
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी धन्यवाद।
सम्पादकीय का 3/4 अंश पढ़ने के पश्चात् सम्पादकीय "जिनभाषित" माह मई, 2003 का अंक मध्य जून को लेखन का स्रोत ज्ञात हुआ।
प्राप्त किया था। सम्पादकीय, पठनीय और मननीय था। श्री युत प्रो. 'उपयोगो लक्षणम्' जीव का यह लक्षण पूज्य आचार्य
निहालचंद का 'जैनधर्म की वैज्ञानिकता' विज्ञान की कसौटी पर उमास्वामी ने अपने तत्त्वार्थ सूत्र में लिखा है। उपयोग दो प्रकार | | पूरी तरह खरा उतरता है। का है- ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग। यह जीव का सामान्य लक्षण अन्य सभी सामग्री अति उत्तम है। पपौरा जी क्षेत्र के दर्शन है, परन्तु है जीव का ही लक्षण। फिर चाहे वह अपना ज्ञानदर्शन | पत्रिका हाथ में आते ही (परोक्ष से ही सही) हो गए। हो अथवा दूसरे का। जिसमें भी ज्ञानदर्शन होगा, वह नियम से
ज्ञानमाला जैन, भोपाल जीव होगा, अजीव नहीं।
आपकी निष्ठा, श्रम और समर्पण के कारण "जिनभाषित" जीव, अजीव, आश्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष- |
- | ने जैनधर्म, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में प्रमाणिक ख्याति इन सात तत्त्वों का विवेचन आचार्यों ने जीव के अध्यात्मिक
अर्जित की है। आशा है यह क्रम उत्तरोत्तर जारी रहेगा। विकास की दृष्टि से किया है तथा जहाँ जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन छह द्रव्यों का विवेचन किया है, वहाँ
प्रो. के.एल. जैन, टीकमगढ़ भौतिक दृष्टि से लोक और अलोक के स्वरूप को बतलाने के लिये
आपके मनीषाप्रधान हाथों से शिल्पित एवं गरिमाप्रधान किया है। जीव दोनों स्थानों पर परिगणित है। क्योंकि जीव के
मनीषा से सिंचित "जिनभाषित" का जून अंक मिला है, पढ़ने में विकास की ही सारी कहानी अभीष्ट है और वह कहाँ-कहाँ पाया
अच्छा लगा। जाता है तथा उसका विरोधी तत्त्व कौन सा है ? इसकी भी जानकारी
डॉ. कपूरचंद, डॉ. नीलम जैन, डा. स्नेहरानी जैन, श्री अपेक्षित है। ___ जब जीव के अध्यात्मिक विकास की चर्चा की जाती है
सुरेश जैन आई.ए.एस., डॉ. सुरेन्द्र भारती एवं ब्र. संदीप जी सहित
अनेक पृष्ठों की सामग्री, विविधवर्णी, रस/ज्ञान दे गई। तब वही जीव जीवतत्त्व के नाम से जाना जाता है और जब
आपका सम्पादकीय 'द्रव्य और तत्व में भेदाभेद' पढ़कर, भौतिक सत्यापन किया जाता है तो वही जीव जीवद्रव्य के नाम से
अब तक के मेरे अध्ययन को दिशा मिली, धन्यवाद। पं. रतन सम्बोधित होता है, किन्तु दोनों ही परिस्थितियों में जीव को अपने
लाल बैनाड़ा भारी सूझबूझ के साथ शंकाओं के समाधान प्रस्तुत और पराये ज्ञान दर्शन के आधार पर "जिसमें मेरा ज्ञानदर्शन हो
करते नजर आये, उन्हें विनम्र अभिवादन। वही जीवतत्त्व है। जिसमें मेरा ज्ञानदर्शन नहीं है, वे अजीव तत्त्व हैं।" ऐसा विभाजन करना जैन सिद्धान्त के सर्वथा विपरीत है।
| पूरे अंक का सरताज लेख 'निरंतर ज्ञानोपयोग' सर्वाधिक परम पद में जो स्थित हो, उसे परमेष्ठी कहते हैं । परमेष्ठी पाँच |
| महत्वपूर्ण है, मैं उसके लेखक, संतशिरोमणि आचार्य विद्यासागरजी
को नमोस्तु लिखता हूँ। हैं-- अरिहन्त परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी और साधु परमेष्ठी। यह संज्ञा गुणों के आधार पर अवश्य है,
पृष्ठ-5 पर उनका उप-लेख भी शिक्षापूर्ण है। किन्तु पञ्च परमेष्ठियों में इन्हीं पाँच को नामाङ्कित किया गया है।
सुरेश जैन सरल, जबलपुर सम्प्रति तीर्थंकर परमेष्ठी, गणधर परमेष्ठी आदि शब्दों का
जून का अंक आद्योपांत पढ़कर प्रथम पृष्ठीय आवरण भी प्रचलन हो गया है। परम पद में स्थित होने के कारण ये भी
सोनागिर जी देख-देख कर मन को अपार शांति मिली, परमेष्ठी हैं, इसमें कहीं भी और किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं
"जिनभाषित" नहीं होता तो घर बैठे गगन चुम्बी मंदिरों, जैन है। फिर भी जब उपर्युक्त प्रकार से पञ्चपरमेष्ठी निर्धारित हैं और
संस्कृति का 60 प्रतिशत लोगों को आभास ही नहीं होता, उनका उनमें तीर्थंकर परमेष्ठी, गणधर परमेष्ठी भी परिगणित हैं, तब फिर
सोच ही नहीं जाता। अतः प्रबुद्ध वर्ग के लिये पत्रिका अच्छी इनकी परमेष्ठी के रूप में पृथक पहचान बनाने का औचित्य क्या
खुराक है।
सुरेश जैन मारौरा, शिवपुरी
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सम्पादकीय
खेद जनक लेख
जैन गजट 3 जुलाई के अंक में श्री गुणवंतजी टोंग्या बड़नगर का लेख 'एक निरर्थक प्रयास आगम एवं पुरातन आचार्यों के अवर्णवाद का' प्रकाशित हुआ है। लेख में प्रो. रतनचन्द जी, भोपाल द्वारा लिखित लेख'पूजा पाठ संग्रहोक्त और शास्त्रोक्त पूजा विधियों में अंतर' की आलोचना की गई है। इस लेख में आलोच्य लेख के लेखक सम्मान्य प्रोफेसर साहब के प्रति स्थान-स्थान पर जिस प्रकार के अनादरपूर्ण भाषा में निंदा जनक हल्के शब्दों का प्रयोग किया है वह अत्यंत अंवाछित, अशिष्ट और आपत्तिजनक है। लेखक के विचारों से असहमत होकर उनकी आलोचना करने का अधिकार एक पवित्र विचार स्वातन्त्र्य का अधिकार है, किंतु वह आलोचना शिष्ट शब्दों में प्रामाणिक, तथ्यात्मक एवं आलोच्य लेख के लेखक के प्रति समुचित शिष्टाचार प्रदर्शित करते हुए होनी चाहिए। लेख में आलोच्य लेख के विषय की आधार पूर्वक आलोचना की जानी चाहिए न कि लेखक की व्यक्तिगत निंदा। श्री टोंग्या जी ने कहीं कहीं तो प्रोफेसर साहब के प्रति इतने हल्के शब्दों का प्रयोग किया है कि जिनको पढ़ते हुए पाठक को लज्जा का अनुभव होता है। आश्चर्य है लेखक महोदय की लेखनी कैसे इतनी अशिष्ट एवं निष्ठर हो गई? जब लेखक के पास ठोस आधारभूत विषय लेखन के लिए नहीं रहता है तभी वह खिसियाकर ऐसे अपशब्दों का सहारा ले लेता है। किंतु माननीय श्री टोंग्या जी को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके द्वारा प्रयुक्त अपशब्दों के उत्तर में कोई उनके लिए भी दो चार गुने अपशब्दों का प्रयोग कर सकता है। किंतु प्रोफेसर साहब की गरिमामय सहिष्णुता एवं शालीनता ने श्री टोंग्या जी की अशिष्ट भाषा पर न ध्यान दिया और न उसे स्वीकारा ही है। अत: माननीय श्री टोंग्या जी की निदांत्मक भाषा स्वयं उनके पास ही रह गई है।
प्रो. रतनचन्द्र जी समाज के सम्मान्य मूर्धन्य विद्वान हैं। वे प्रतिष्ठित जैन पत्रिकाओं के संपादक एवं शोधपूर्ण प्रामाणिक आलेखों और पुस्तकों के लेखक हैं। श्री टोंग्या जी के द्वारा प्रयुक्त अपशब्दों से उनके ही अपने परिणाम दूषित हए हैं। प्रोफेसर साहब की प्रतिष्ठा ऐसे हल्के शब्दों से अप्रभावित रहेगी।
___इस लेख में श्री टोंग्या जी आगे बढ़कर जैन आगम के मर्मज्ञ विद्वान कविवर पं. बनारसी दास जी पर भी आक्रमण करने से नहीं चूके हैं। श्री पं. बनारसी दास जी ने भ्रष्ट मुनियों के रूप में मठाधीश बने भट्टारकों द्वारा मध्यकाल में प्रचारित मिथ्या परिपाटियों एवं मिथ्या देवी-देवताओं की पूजा आदि क्रिया कांडों का विरोधकर श्रावकों में तत्व ज्ञान के आधार पर धर्म के भाव पक्ष को स्थापित किया था। यदि कभी समाज में अज्ञान के कारण धार्मिक क्रियाओं में कोई असत् परिपाटी ने स्थान ले लिया तो आचार्य अथवा विज्ञजन सदुपदेश द्वारा उस परंपरागत प्राचीन विकृति को दूर करते हैं । ऐसा ही कुंदकुंद प्रभृति आचार्यों ने किया। ऐसा ही आचार्य शांतिसागर जी ने भी किया। उन्होंने श्रावकों के घरों से ढेरों मिथ्या देवी-देवताओं की मूर्तियों को निकलवाया और सच्चे देव-गुरु-शास्त्र का श्रद्धान कराया। इस प्रकार मिथ्या धार्मिक क्रियाओं और मान्यताओं में श्री पं. बनारसी दास जी ने सुधार कराया, अतः वे जैन समाज के आचार्य सदृश आदर के पात्र हैं । महान् आचार्य नेमीचन्द सिद्धांत चक्रवर्ती ने लिखा है कि सम्यग्दृष्टि जीव अज्ञान के कारण अथवा अल्पज्ञानी गुरुओं के उपदेश के कारण असत् पदार्थ का श्रद्धान कर लेता है किंतु जब विशेष ज्ञानी गुरुओं के संयोग से वस्तु के समीचीन स्वरूप का परिचय मिल जाता है तो पूर्व की श्रद्धा को बदलकर समीचीन स्वरूप की श्रद्धा कर लेता है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह मिथ्यादृष्टि हो जाता है। (गोम्मटसारजीवकांड गाथा 27-28)सचित्त-अचित्त द्रव्यों से पूजा करने की
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तुलना करने पर तो मानना ही पड़ेगा कि सचित्त द्रव्यों की तुलना में अचित्त द्रव्यों के प्रयोग में कम हिंसा होती है और 'सावध लेशो' के सिद्धान्त के अनुसार अचित्त द्रव्य से पूजा श्रेष्ठ सिद्ध होती है। अहिंसा की पालना में आगे बढ़ते हुए श्रावक सचित्त पदार्थों के प्रयोग का त्याग कर देता है। दूसरी प्रतिमा में भी अतिथि संविभाग व्रत व भोगोपभोग परिमाण व्रत के अतिचारों में सचित्त संबंध, सचित सम्मिश्र, सचित्त निक्षेप व सचित्तापिधान को बताया गया है। पूजा
और पूजा के द्रव्यों के बारे में लम्बी चर्चा की जा सकती है, किंतु अभी इस लेख में, मैं तो केवल यह कहना चाहता हूँ कि क्या हम धार्मिक विषयों पर आगम, तर्क और अनुमान के आधार पर बिना व्यक्तिगत आक्षेपों के केवल विषय प्रतिपादन के अभ्यासी नहीं बन सकते? जैन धर्म अनेकांत सिद्धांत के आधार पर हमें विशेषतौर पर विचार सहिष्णु, विनयशील एवं मृदुभाषी होना सिखाता है। विचार भिन्नता संभव है, किंतु उसके आधार पर मन में द्वेष भावना उत्पन्न कर विरोधी विचार वालों के प्रति अपनी भाषा को विकृत कर अपशब्दों का प्रयोग सर्वथा अनुचित है।
दिगम्बर जैन समाज की प्रमुख प्रतिनिधि संस्था दि. जैन महासभा के मुख पत्र जैन जगट में ऐसा एक मूर्धन्य विद्वान के प्रति व्यक्तिगत निंदात्मक लेख छापा जाना खेदजनक है। विषय के पक्ष विपक्ष में शालीन भाषा में खोज परक लेख पत्रिका की शोभा बढ़ाते हैं, किंतु ऐसे निंदात्मक लेखों से न केवल पत्रिका किंतु संस्था की भी छवि धूमिल होती है।
विशेष बात तो यह है कि उक्त लेख जैन गजट को लेखक के द्वारा नहीं भेजा गया है। अपितु जैन गजट ने "आदित्य संदेश" पत्रिका से साभार उद्धृत कर छापा है। दूसरी पत्रिका से लेकर लेख छापने से स्पष्ट सिद्ध होता है कि जैन गजट परिवार ने उस लेख को महत्वपूर्ण और संस्था की रीति-नीति के अनुकूल समझकर विशेष रूचि लेकर छापा है।
तथापि मेरा विश्वास है कि जैन गजट के सुधी संपादक जी की दृष्टि में लाए बिना यह लेख छापा गया होगा। मेरा तो सभी जैन पत्र पत्रिकाओं के संपादकों से यह आग्रह पूर्वक निवेदन है कि वे सम्पादकीय नैतिक एवं व्यावहारिक उत्तरदायित्वों को ध्यान में रखते हुए किसी भी विद्वान लेखक अथवा साधुओं की आलोचना में निंदात्मक हल्के शब्दों के प्रयोग वाले लेखों का, जो पूरे समाज की छवि को धूमिल करे, अपनी पत्र-पत्रिकाओं में स्थान नहीं देवें एवं पारस्परिक शालीन व्यवहार को प्रोत्साहित करें।
मूलचन्द लुहाड़िया
पाठकों के सुझावों पर टिप्पणी
कुछ सुधी पाठकों ने दिगम्बर प्रतिमा की पहिचान विषयक लेख, प्रति लेखों को व्यक्तिगत सलाह, टीका टिप्पणी मानते हुए पत्रिका में प्रकाशित किया जाना उचित नहीं माना है। इस संबंध में निवेदन है कि लेखों में कोई व्यक्तिगत विषयों की चर्चा नहीं की गई है। दिगम्बर प्रतिमा के स्वरूप संबंधी लेख सम्यग्दर्शन के कारण सच्चे देव के स्वरूप से संबंध रखता है तथा दिगम्बर जैन संस्कृति के संरक्षण की प्रेरणा देता है।
अत: अपनी श्रद्धा की दृढ़ता एवं संस्कृति के संरक्षण के लिए जिन प्रतिमा के स्वरूप की जानकारी, भगवान् जिनेन्द्र के स्वरूप की जानकारी के समान ही अत्यंत उपयोगी, प्रयोजनभूत तथा महत्वपूर्ण है । यह ठीक है कि लेखों में किसी के मत की समीक्षा करते समय शालीन, शिष्ट और विनय पूर्ण भाषा का प्रयोग होना चाहिए। किसी भी स्थिति में निदांत्मक शब्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
संपादक
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वर्तमान में अहिंसा की उपयोगिता
डॉ. श्रेयांसकुमार जैन, बड़ौत
अहिंसा ही जैनधर्म की आधारशिला है। द्रव्य द्रष्टि से | भ्रूण हत्या जैसे जघन्य कृत्य का पूर्णरूप से अंत हो जाएगा। सभी शुद्ध जीव तत्त्व एक समान हैं। परन्तु कर्मों के आवरण से | प्रसाधन सामग्री का विवेक : अहिंसा का ही प्रभाव चार गतियों की चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते हैं, फिर | होता है कि मानव अपनी साज सज्जा हेतु अहिंसक उपकरणों का भी कोई प्राणी चाहे वह छोटे से छोटा हो या बड़े से बड़ा हो, चाहे | ही प्रयोग करता है, किन्तु अहिंसा से अपरिचित प्राणी क्रूरता पूर्ण वह नाली का कीडा ही क्यों न हो. यह नहीं चाहता कि उसे कोई ढंग से तैयार की गई प्रसाधन सामग्री का उपयोग करते हैं । अहिंसा कष्ट दे। सभी प्राणी कष्टों से भयभीत रहते हैं, अपने प्राणों की रक्षा | की लोक जीवन में व्यावहारिकता का ही परिणाम होता है कि चाहते हैं। अतः यह भी आवश्यक है कि प्रत्येक प्राणी पर दया हिंसक संसाधनों से तैयार की हुई औषधियों/प्रसाधन की सामग्री करनी चाहिए।
का उपयोग कम होता है या बिलकुल भी नहीं किया जाता है। अहिंसा का विस्तार अनेक सन्दर्भो में होता है, जिनमें से | अहिंसा सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार के फलस्वरूप आज कुछ ऐसी कुछ ज्ञातव्य हैं
संस्थाएँ बनी हैं, जो अमेरिका, यूरोप, भारत आदि देशों में पूर्ण आत्महत्या न करना : वर्तमान में मानव अनेक उलझनों | सक्रिय हैं और वे इस बात पर बल दे रहीं हैं- क्रूरता पूर्ण प्रसाधन में उलझकर तनावग्रस्त हो जाता है जिससे वह आत्महत्या जैसे | सामग्री के निर्माण को बन्द किया जाय और कोई भी उनका प्रयोग जघन्य पाप को करने के लिए उद्यत हो जाता है, किन्तु जिसके न करे। हृदय में अहिंसा के बीज होते हैं, वह कितनी भी विपत्तियाँ आयें पर्यावरण विज्ञान का रहस्य : अहिंसा सिद्धान्त को जीवन फिर भी आत्महत्या जैसे निघृण कार्य में प्रवृत्त नहीं होता है। यही | में अपनाने पर ही पर्यावरण विशुद्ध रह सकता है। अनर्थक हिंसा प्रवृत्ति हिंसा की विस्तारक है।
| से बचो। यह माना कि हिंसा से बचना सरल नहीं है किन्तु मनुष्य परहत्या न करना : कभी-कभी क्रोधादि के निमित्त से | विवेक से काम ले तो अनर्थक हिंसा से बहुत कुछ बचा जा सकता ऐसे अवसर आ जाते हैं कि मनुष्य विवेक खो देता है और दूसरों | है। जहाँ अनर्थक हिंसा की बात आती है, वहाँ पर्यावरण प्रदूषण को मार डालता है। विवेक खोकर जो दूसरों के प्राणों तक का | की बात भी आ जाती है। यह पर्यावरण की समस्या अनर्थ हिंसा हरण कर लिया जाता है, वह महा पाप है उससे बचना ही आवश्यक | से उपजी समस्या है। अहिंसा के अपनाने से ही अनर्थ हिंसा से
मानव बच सकता है। वातावरण को प्रदूषित होने से बचाने कि भ्रूण हत्या न करना : आज विश्व में भ्रूण हत्या अत्यधिक | लिए अहिंसा ही कार्यकारी है, यही इसकी व्यावहारिकता है। तेजी से बढ़ रही है, वह एक गम्भीर स्थिति है, अत्यधिक आधुनिक | आधुनिक परिप्रेक्ष्य में अहिंसा की उपयोगिता को उक्त उपकरणों के निर्माण ने इस समस्या को विकराल रूप प्रदान कर विविध सन्दर्भो में समझना आवश्यक है। शुद्ध जीवन शैली में दिया है, क्योंकि उनके परीक्षण के द्वारा भ्रूण हत्या का चक्र सा | विश्वास रखने वाला अहिंसा को इस रूप में अपनाए की हिंसा की चल रहा है। अमेरिका में एक फिल्म बनी है, सायलेंट क्रीज। ज्वालाएं अहिंसा की शीतल फुहार से शान्त हो जायें। अहिंसा के इसने तहलका मचा दिया। उसमें यह दिखाया गया है कि भ्रूण द्वारा हिंसा के शमन का क्रम यदि अनवरत चले तो इक्कीसवीं हत्या का क्या परिणाम होता है। तीन माह के भ्रूण/गर्भस्थ शिशु | शताब्दी में श्वांस लेने वाला मनुष्य अहिंसक समाज की संरचना को जब मारा जाता है, तब वह रोता है, चीखता और चिल्लाता है। | करने में सफल होगा। इतना करुणाप्रद दृश्य होता है कि देखते ही मानस में तीव्र बैचेनी विज्ञान ने संहारक अस्त्र-शस्त्रों और युद्ध के उपकरणों पैदा हो जाती है। दृष्टा पूर्णरूप से विचलित हो जाता है। इसके | का आविष्कार करके विश्व में अशान्ति को बढ़ावा दिया है।
आधार पर अमेरिकी सरकार ने भ्रूण हत्या पर प्रतिबन्ध लगा अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्रों की होड़ बढ़ती जा रही है, इनके बल दिया, किन्तु भारत में आज भी इस विकृति से लोग अपने को नहीं पर लोगों को आंतकित किया जा रहा है। पुरातन काल से ही बचा पा रहे हैं। इस विकृति का मूल कारण अहिंसा को जीवन | अहिंसा का अवलम्बन लेकर मानव शांति के लिए प्रयत्न कर रहा दर्शन का अंग न बनाना है, जो संस्कृति से जुड़े हुए लोग हैं वे | था किन्तु विज्ञान ने हिंसक संसाधनों के निर्माण के माध्यम से अहिंसा को जीवन का अभिन्न अंग मानकर चलते हैं, जिस कारण | अशान्ति और संघर्ष को बढ़ाने में योगदान किया है। यह वास्तविकता
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है, शस्त्रास्त्र होंगे तो मनुष्य उन्हें चलाने और प्रयोग करने का | सहज सुखद हो जायेगा। भौतिक उन्नति के साथ आत्मोन्नति भी प्रयत्न करेगा ही, जैसा भारत में ही पोखरन में परमाणु परीक्षण | संभव होगी। विज्ञान से प्राणियों की सुरक्षा संभव नहीं किन्तु किया गया, तो समस्त विश्व में हलचल पैदा हो गयी। पोखरन में अहिंसा प्राणियों में वात्सल्य उत्पन्न करने वाली है, अत: पारस्परिक हुए परमाणु परीक्षण के विरोध में पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण | सौहार्द की वृद्धि भी इसके द्वारा होती है, जिससे एक दूसरा परस्पर कर अपनी वृत्ति का परिचय दिया। भारतीय मानस में अहिंसा में भक्षक न बनकर एक दूसरे का रक्षक बनेगा। इसी कारण विश्व विद्यमान होने के कारण यद्यपि हिंसक उपकरण भी मार काट के | के समस्त प्राणियों की सुरक्षा हो सकती है। अहिंसा के माध्यम से लिए प्रायः प्रयोग नहीं किये जाते हैं तथापि क्रूर प्रकृति वाले लोगों मनुष्य स्वयं जीवित रहकर दूसरों को जीवित रहने में सहयोग कर के द्वारा तो शस्त्रास्त्रों का प्रयोग अपनी अहंपुष्टि और स्वार्थपूर्ति के | सकता है। अहिंसा का प्रेम, करुणा, दया एवं सेवा के रूप में लिए किया ही जाता है। अत: विज्ञान प्रदत्त हिंसक उपकरण प्रयोग किये जाने से आनन्द प्राप्त होता है। हृदय में प्रसन्नता की संघर्ष के निमित्त होते ही होते हैं।
अनुभूति होती है। बैर-विरोध, द्वेष-घृणा का समापन होता है। विज्ञान का महत्त्व अहिंसा के साथ ही है क्योंकि अहिंसा | इसका सहारा लेकर स्थायी रूप से सुख-शांति और जीवन की के साथ विज्ञान की शक्ति जुड़ जायेगी तो सम्पूर्ण संसार स्वर्ग | सुरक्षा प्राप्त की जा सकती है।
चतुर्विध आराधना का पर्व : चातुर्मास
ब्र. संदीप 'सरल'
श्रमण जैन परम्परा में अनादिकाल से वर्षायोग / चातुर्मास । प्राप्त करते हुए स्व को प्राप्त करना ज्ञानाराधना कहलाती है। की परम्परा अनवरत रूप से चली आ रही है। चातुर्मास का | चातुर्मास के दौरान साधु, त्यागी, व्रतियों का सानिध्य प्राप्त होते प्रमुख उद्देश्य अहिंसा धर्म का पालन करना है। पूर्ण अहिंसा | ही ज्ञान की गंगा बहने लगती है। अत: हमारा परम कर्तव्य धर्म के पालन करने वाले साधक गण वर्षावास के अर्न्तगत एक | बनता है कि हम उसका पूरा-पूरा लाभ उठाएँ। अपने मंदिर में स्थान पर रहकर चार प्रकार की आराधना करते हुए स्व-पर | स्थित ग्रन्थों का संरक्षण-संवर्द्धन करना यह भी ज्ञानाराधना है। कल्याण में संलग्न रहते हुए कल्याणेच्छुक श्रावक जनों को भी | (स)चारित्राराधना - पाँच महाव्रत, पाँच समिति और कल्याण का रास्ता प्रशस्त किया करते हैं। .
तीन गुप्तियों को तेरह प्रकार का चारित्र बतलाया है, इस प्रकार । . धन्य हैं वे नगर के गौरवशाली पुण्यशाली श्रावकजन | के चारित्र को प्राप्त करने की भावना से चारित्रारूढ़ साधकों की जहाँ पर इस चातुर्मास पर्व में गुरूओं का पावन सामीप्य प्राप्त | सेवा करना चारित्राराधना है। श्रावक भी अपने यथायोग्य नियमों हुआ है। चातुर्मास के इस पावन अवसर पर अनेक प्रकार के का पालन करते हुए चारित्राराधना के क्षेत्र में आगे बढ़ता है। आयोजन-विधान, संगोष्टियाँ, पुस्तक प्रकाशन, सम्मान समारोह आज का युवावर्ग नैतिकता, सदाचार, श्रावकाचार से काफी आदि महत्वपूर्ण कार्य प्रारम्भ होंगे।
गिर गया है। अत: संतों का कर्त्तव्य बनता है कि बाह्य आडम्बर चातुर्मास के चार चरण
पूर्ण प्रदर्शनकारी खर्चीले आयोजनों की अपेक्षा युवावर्ग को (अ) दर्शनाराधना - दर्शन अर्थात् सम्यग्दर्शन के | सदाचार से जोड़ा जाए तो चातुर्मास की सबसे बड़ी सफलता विषयभूत देव-शास्त्र-गुरु की उपासना जीवादि सात तत्वों का स्वरूप समझते हुए उस पर अटूट श्रद्धान करना। हम धर्म के (द) तपाराधना - इच्छाओं का निरोध करना, माध्यम से रागी द्वषी देवताओं की उपासना करते हुए अपनी | अनशनादि बारह प्रकार के तप करना तपाराधना कहलाती है। विराधना तो नहीं कर रहे हैं। दर्शन गुण से युक्त सम्यग्दृष्टि की
इस पर्व पर साधक भी निस्पृह भाव से आत्म कल्याण की इच्छा भी यथायोग्य अनुशंसा करना दर्शन आराधना है।
से शक्ति के अनुसार व्रत-उपवास आदि कर तपाराधना में संलग्न (ब) ज्ञानाराधना - स्वाध्याय के माध्यम से ज्ञान को | रहते हैं।
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जैन गृहस्थाचार परम्परा का क्रमिक विकास
डॉ. शीतलचन्द्र जैन
श्रावक या गृहस्थ के लिए प्राकृत ग्रन्थों में सावय, सावग । कहलाता है। और उपासग तथा संस्कृत ग्रन्थों में श्रावक, उपासक और सागार ___ अन्तरंग में रागादिक के क्षय की हीनाधिकता के अनुसार शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
प्रकट होने वाली आत्मानुभूति से उत्पन्न सुख का उत्तरोत्तर अधिक उक्त आधार पर गृहस्थ के धर्म को सावयधम्म, श्रावकाचार, अनुभव होना ही है स्वरूप जिनका ऐसे और बहिरंग में त्रसहिंसा उपासकाचार, सागार धर्म आदि नाम दिये गये तथा गृहस्थाचार आदिक पांचों पापों से विधिपूर्वक निवृत्ति होना है स्वरूप जिनका विषयक ग्रंन्थों के श्रावकाचार, उपासकाध्ययन, उपासकाचार, ऐसे ग्यारह प्रतिमाओं को क्रमश: देशविरत नामक पंचम गुणस्थान सागारधर्मामृत आदि नाम रखे गये हैं। कुछ अन्य ग्रन्थ जिनमें के दार्शनिक आदि स्थानों-दरजों में मुनिव्रत का इच्छुक होता श्रावकाचार का वर्णन किया गया है, इनसे भिन्न नामों से भी हुआ जो सम्यग्दृष्टि व्यक्ति किसी एक स्थान को धारण करता है लिखे गये। जैसे समन्तभद्र का रत्नकरण्डक, अमृतचन्द्र का उसको श्रावक मानता हूँ अथवा उस श्रावक को श्रद्धा की दृष्टि से पुरुषार्थ-सिद्धयुपाय और पद्मनन्दि की पंचविंशतिका ।
देखता हूँ। श्रावक शब्द की व्युत्पत्ति -
श्रावक के भेद श्रावक शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए आशाधर ने लिखा है
जैन वाङ्गमय में श्रावक के भेदों का विवेचन मुख्यतया शृणोति गुर्वादिम्यो धर्ममिति श्रावकः ।
निम्नलिखित चार आधारों पर प्राप्त होता हैअर्थात् जो श्रद्धापूर्वक गुरु आदि से धर्म श्रवण करता है
1. गुणस्थानों के आधार पर। वह श्रावक है।
2. व्रतों के आधार पर। सागारधर्मामृत में सागार की परिभाषा देते हुए आशाधर 3. प्रतिमाओं के आधार पर। • कहते हैं कि सागार-गृहस्थ अनादिकालीन अविद्या के दोष से
4. आशाधर के आधार पर। उत्पन्न चार संज्ञाओं-आहार, निद्रा, भय, मैथुन के ज्वर से पीड़ित, इस प्रकार श्रावक के भेद निम्नप्रकार से किये जा सकते हैंसदा आत्म ज्ञान से विमुख तथा विषयों में उन्मुख होता है। | 1. गुणस्थानों के आधार पर दो भेदअनादि अविद्या के साथ बीज और अंकुर की तरह
1. अविरत सम्यग्दृष्टि अर्थात् चतुर्थ गुणस्थानवर्ती। परम्परा से चली आयी ग्रन्थसंज्ञा को छोड़ने में असमर्थ प्रायः
2. देशविरत अर्थात् पंचम गुणस्थानवर्ती । विषयों में मूर्छित होता है।
| 2. व्रतों के आधार पर तीन भेदश्रावक के लिए सम्यक्त्व की अनिवार्यता
1. व्रत रहित या अव्रती श्रावक। आचार्यों ने श्रावक के लिए सम्यक्त्व के लिए अनिवार्य 2. अणुव्रती श्रावक। बताते हुए कहा है कि इस अविद्या या मिथ्यात्व का पर्दा हटा तो
3. व्रती अर्थात् बारह व्रतों का पालन करने वाला श्रावक। आत्मज्ञान का उज्ज्वल प्रकाश होने लगता है। पर यह इतना |3. प्रतिमाओं के आधार पर ग्यारह भेदआसान नहीं है। इसके लिए आसन्न भव्यता, कर्महानि, संज्ञित्व,
1. दार्शनिक या प्रथम प्रतिमाधारी श्रावक । विशुद्धि तथा देशना आवश्यक है।
2. व्रतिक या दूसरी प्रतिमा को धारण करने वाला श्रावक । श्रावक की पूर्ण आचार संहिता
इस प्रकार शेष नव प्रतिमाओं के आधार पर आगे के नव आशाधर ने एक सूत्र में पूरे श्रावकाचार को इस प्रकार | भेद किये जा सकते हैं। कहा है
| 4. आशाधर के आधार पर तीन भेद"सम्यक्तवममलममलान्यणुगुणशिक्षाब्रतानिमरणान्ते।
1. पाक्षिक श्रावक। सल्लेखना च विधिना पूर्ण सागारधर्मोऽयम्॥'
2. नैष्ठिक श्रावक। अर्थात निर्मल सम्यग्दर्शन, निरतिचार अणुव्रत, गुणव्रत,
3. साधक श्रावक। शिक्षाव्रत और मरण समय विधिपूर्वक सल्लेखना, यह सम्पूर्ण
प्राचीन ग्रंथों का विवेचन गुणस्थानों, व्रतों और ग्यारह सागारधर्म है।
प्रतिमाओं के आधार पर ही मिलता है। आशाधर ने इस विवेचन आगे लिखा है कि पंच परमेष्ठी का भक्त प्रधानता से दान को अधिक व्यापक और व्यवस्थित करने की दृष्टि से श्रावक के और पूजन करने वाला भेद ज्ञान रुपी अमृत को पीने का इच्छुक | उपर्युक्त पाक्षिक आदि तीन भेद किये। तथा मूलगण और उत्तरगुणों को पालन करने वाला व्यक्ति श्रावक । पाक्षिक श्रावक संयम के लिये उद्यमी होता है, करता
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नहीं, नैष्ठिक करता है और साधक पूर्ण करता है प्रमुख रूप से | श्रावक का विस्तार से विवेचन किया गया है। यहाँ पर पाक्षिक श्रावक की आचार संहिता पर विचार करते हैं। । सामान्यतया पाक्षिक श्रावक को चौथे गुणस्थान वाला
पाक्षिक श्रावक का क्या आचार है, इसका विवेचन आशाधर । अव्रती सम्यग्दृष्टि कहा जाता है।अप्रत्याख्यानावरण चारित्रने सागार धर्मामृत के द्वितीय अध्याय में किया है।
मोहनीय कर्म का क्षयोपशम न होने के कारण यद्यपि यह व्रत नैष्ठिक श्रावक प्रतिमाधारी श्रावक कहलाता है और | धारण नहीं कर सकता तथापि उसका आचरण सर्वथा अनियन्त्रित, सल्लेखना धारण करने वाला साधक श्रावक।
उच्छंखल और सामाजिक दृष्टि से अहितकर नहीं होता। ऐसा __गृहस्थ की आचार संहिता का उपर्युक्त विवेचन एकदूसरे
प्रतीत होता है कि ऐसे श्रावक को ध्यान में रखकर ही आचार्यों ने से सर्वथा निरपेक्ष नहीं है।
अष्टमूलगुणों के पालन तथा सप्तव्यसन-त्याग आदि का विवेचन ग्यारह प्रतिमाओं के अन्तर्गत बारह व्रत समाहित हो जाते
किया है। हैं । पाक्षिक आदि भेदों के अन्तर्गत बारह व्रत और ग्यारह प्रतिमाएँ भी समाहित हो जाती हैं। गुणस्थानों की दृष्टि से भी इसमें कोई
श्रावक के मूल गुण - विरोध उपस्थित नहीं होता।
जैन वाङ्गमय के पर्यालोचन से श्रावक के मूलगुणों के गृहस्थाचार विषयक साहित्य के पर्यालोचन से ऐसा प्रतीत |
सम्बन्ध में जो जानकारी मिलती है उसे संक्षेप में इस प्रकार व्यक्त होता है कि विकासक्रम की दृष्टि से ग्यारह प्रतिमाओं तथा पाक्षिक
किया जा सकता हैआदि के रूप में श्रावक का जो वर्गीकरण किया गया है, वह
- 1. कई प्राचीन ग्रन्थों में श्रावक के व्रतों, नियमों आदि का श्रावकाचार को व्यवस्थित रूप देते समय किया गया है । मूलतः
उल्लेख तो किया गया है, किन्तु स्वतन्त्र रूप से मूलगुणों का श्रावक के लिए नियम और व्रताचरण का ही विधान था। यद्यपि
उल्लेख या वर्णन नहीं किया गया। श्वेताम्बर आगमों में भी मूलगुणों आचार्य कुन्दकुन्द द्वारा किये गये ग्यारह प्रतिमाओं के उल्लेख से
का वर्णन नहीं मिलता। यह भी स्पष्ट प्रतीत होता है कि ग्यारह भेदों का वर्गीकरण बहुत
2. मूल गुणों के सम्बन्ध में प्राचीनतम सन्दर्भ से लेकर 17 प्राचीन समय में हो चुका था। -
वीं एवं 18 वीं शताब्दी तक के ग्रन्थों में जो विवरण प्राप्त होता है बारह व्रतों के अन्तर्गत पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और
उसके अनुसार मूलगुणों की निम्नलिखित चार परम्पराएँ प्राप्त होती चार शिक्षाव्रतों का समावेश किया जाता है। अणुव्रतों के अन्तर्गत अहिंसाणुव्रत, सत्याणुव्रत, अचौर्याणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत और परिग्रह
1. पांच अणुव्रतों का पालन तथा तीन मकार का त्याग । परिमाणाणुव्रत बताये गये हैं। इनके विषय में प्राचीनतम सन्दर्भ से
2. पांच अणुव्रतों का पालन तथा मांस, मद्य और मधु त्याग। लेकर आज तक विशेष प्रकार का मतभेद दृष्टिगोचर नहीं होता।
3. पांच उदुम्बर फलों तथा तीन मकारों का त्याग। गुणव्रतों और शिक्षाव्रतों के अन्तर्गत जिन व्रतों की गणना की गयी
4. आतनुति, दया, जलगालन, अरात्रिभोजन, उदुम्बर फलों है, उनमें नामों में भेद प्राप्त होता है।
का त्याग और तीन मकारों का त्याग। सामान्य गृहस्थ या पाक्षिक श्रावक की आचार संहिता -
इस विवरण को निम्न प्रकार अंकित किया जा सकता हैसमन्तभद्र और जिनसेन अमृत, अमितगति
आशाधर पाक्षिक श्रावक संयम के लिये उद्यमी होता है, करता।
शिवकोटि चामुण्डराय आशाधर, श्रावकधर्मदोहा नहीं, नैष्ठिक करता है और साधक पूर्ण करता है। प्रमुख रूप से
सोमदेव देवसेन, मेघावी, सकलकीर्ति यहाँ पर पाक्षिक श्रावक की आचार संहिता पर विचार करते हैं
आशाधर राजमल्ल, सोमसेन आशाधर ने सामान्य गृहस्थ को पाक्षिक श्रावक नाम दिया है। पांच अणुव्रत पांच अणुव्रत पांच उदुम्बर तथा तीन मकार आप्तनुति, दया, उनके अनुसार पाक्षिक श्रावक जिनेन्द्र भगवान् की आज्ञा को
तीन मकार मांस विरति त्याग
जलगालन, त्याग मद्य विरति
अरात्रिभोजन शिरोधार्य करके, हिंसा को छोड़ने के लिए मद्य, मांस, मधु और
मधु विरति
पांच उदुम्बर पांच उदुम्बर फलों के सेवन का त्याग करता है। पांच पापों और
त्याग, तीन सात व्यसनों को छोड़ने का यथाशक्य अभ्यास करता है। यथाशक्ति
मकार त्याग जिन भगवान् की पूजा करता है। जिनबिम्ब, जिनमंदिर, मुनियों के श्रावक के मूल गुणों का विवेचन करते हुए आचार्यों ने लिए वसतिका, स्वाध्यायशाला, भोजनशाला, औषधालय आदि मद्य, मांस, मधु, द्यूत के दोषों का विस्तार से वर्णन किया है। का निर्माण कराता है। गुरुओं की सेवा करता है। अपने सुयोग्य रात्रिभोजन, अगालित जल तथा उदुम्बर फलों के सेवन में हिंसा साधर्मी श्रावक को ही अपनी कन्या देता है। मुनियों को दान देता होने के कारण इनके त्याग की भी गणना मूल गुणों के अन्तर्गत है इस बात का प्रयत्न करता है कि मुनियों की परम्परा बराबर | की गयी है। चलती रहे और गुणवान हो। रात्रि में केवल पानी, औषधि और उदुम्बर फलों के अन्तर्गत बड़, पीपल, उमर, कठूमर तथा पान, इलायची आदि मुख-शुद्धिकारक पदार्थ ही लेता है। ऐसा | पाकर फल के त्याग की बात कही गयी है। इन्हें क्षीरीवृक्षफल कोई आरम्भ नहीं करता जिसमें संकल्पी हिंसा हो। तीर्थयात्रा | | अर्थात जिन वृक्षों से दूध निकलता है, ऐसे वृक्षों के फल भी कहा आदि करता है। सागार धर्मामृत के दूसरे अध्याय में पाक्षिक | गया है। फलों के नामों में सामान्य अन्तर होने पर भी सभी
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ग्रन्थकारों ने इन्हें हिंसा का कारण होने से त्याज्य बताया है। । प्रतिमाओं का निरूपण किया गया है। पहली प्रतिमा का स्वरूप
आशाधर ने मधु की तरह नवनीत को भी जीव-बहुल | बतलाते हुए लिखा है कि जो बहुत त्रस जीवों से युक्त मद्य, मांस होने के कारण त्याज्य बताया है। यह भी कहा है कि पाक्षिक आदि निन्दित वस्तु का सेवन नहीं करता, वह दर्शन प्रतिमा का श्रावक को स्थूल-हिंसा, अनृत, स्तेय, मैथुन तथा परिग्रह त्याग | धारी श्रावक है। का भी अभ्यास करना चाहिए।
इसी तरह पहली प्रतिमा वाले के लिए त्याज्य रूप से मद्य, ऐतिहासिक दृष्टिसे मूलगुणों के सम्बन्ध में विचार करने | मांसादिक का उल्लेख किया गया है, किन्तु मूलगुण का स्पष्ट पर निम्नलिखित विवरण प्राप्त होता है
उल्लेख नहीं है। आचार्य कुन्दकुन्द ने चारित्रपाहुड़ में चारित्र को सागार वसुनन्दि श्रावकाचार 12 वीं शती अनुमानित में पहली और निरागार के भेद से दो प्रकार का बतला कर सागार को सग्रन्थ प्रतिमा का स्वरूप बतलाते हुए पांच उदुम्बर और सात व्यसन के और निरागार को परिग्रह रहित कहा है।
त्यागी को दर्शन प्रतिमा का धारी श्रावक बतलाया है। आगे सात देशविरत श्रावक के ग्यारह भेदों का उल्लेख करके । व्यसनों का विवेचन करते हुए मद्य, मांस की बुराईयाँ बतायी हैं। कुन्दकुन्द ने पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रतों को साथ ही मधु की भी बुराईयाँ बतलायी हैं । इस प्रकार अष्ट मूलगुण सागार का संयमाचरण बतलाया है। आगे कहा गया है कि इस का निर्देश तो नहीं तथापि ग्रन्थकार को पहली प्रतिमा धारी के द्वारा प्रकार हमने सावयधम्म संयमाचरण का पूर्ण निरूपण किया है। पांच उदुम्बर और तीन मकारों का त्याग इष्ट है, यह स्पष्ट है। कुन्दकुन्द ने श्रावक के मूलगुणों का उल्लेख नहीं किया। मूलगुणों का उल्लेख और उनका विवेचन
गृद्धपच्छ उमास्वामी कृत तत्वार्थसूत्र में श्रावक के बारह श्रावक के अष्टमूलगुणों का सर्वप्रथम स्पष्ट निर्देश स्वामी व्रतों का तो विवरण है। किन्तु उसमें भी मूल गुणों का उल्लेख । समन्तभद्र रचित रत्नकरण्डक में मिलता है। उसमें लिखा है नहीं है।
जिनेन्द्रदेव मद्य, मांस और मधु के त्याग के साथ पांच अणुव्रतों को तत्वार्थसूत्र के टीकाकार पूज्यपाद ने सर्वार्थसिद्धि में, भट्ट | गृहस्थ के अष्टमूलगुण कहते हैं। अकलंक ने तत्वार्थराजवार्तिक में और विद्यानन्द ने
चामुंडराय 11 वीं शती ने चारित्रसार में तथा "चोक्तं तत्वार्थश्लोकवार्तिक में मूलगुणों का कोई उल्लेख नहीं किया। ।
महापुराणे" लिख कर निम्नलिखित श्लोक उद्धृत है-- जटासिंहनन्दि के वरांगचरित के बाईसवें अध्याय में श्रावक
"हिंसासत्यस्तेयाब्रह्मपरिग्रहाच्च बादरभेदात्। के बारहव्रत गिनाये हैं, किन्तु मूलगुणों का कोई उल्लेख नहीं है
द्यूतान्मांसान्मद्यद्विरति गृहिणोऽष्ट सन्तथमी मूलगुणाः ॥" और न मूलगुणों के अन्तर्गत वस्तुओं का ही प्रकारान्तर से कोई
अर्थात् स्थूल हिंसा, स्थूल झूठ, स्थूल चोरी, स्थूल अब्रह्म उल्लेख है। दान, पूजा, तप और शील को श्रावकों का धर्म बतलाया | और स्थल परिग्रह तथा जुआ, मांस और मद्य से विरति, ये गृहस्थों गया है।
के आठ मूलगुण हैं। रविषेण वि.सं.734 के लगभग ने अपने पद्मचरित्र के | आशाधर 13 वीं शती ने अपने सागार धर्मामृत तथा उसकी चौदहवें पर्व में श्रावक धर्म का निरूपण किया है। उसमें बारह | टीका में भी महापुराण के उक्त मत का निर्देश किया है और व्रतों का ही निरूपण किया गया है। मधु, मांस, जुआ, मद्य, रात्रि- टिप्पणी में उक्त श्लोक उद्धत किया है, किन्तु जिनसेन कृत महापुराण भोजन और वेश्या-संगम के त्याग को नियम कहा है, किन्तु | में उक्त श्लोक नहीं मिलता और न उक्त श्लोक के द्वारा कहे गये मूलगुणों का स्वतन्त्र रूप से कोई उल्लेख नहीं है।
आठ मूलगुण ही मिलते हैं । अड़तीसवें पर्व में व्रताचरण क्रिया का आगे इसका विवेचन करते हुए रात्रिभोजन वर्जन पर बहुत | वर्णन करते हुए लिखा है कि मधु और मांस का त्याग, पांच जोर दिया गया है। आगे लिखा है कि जो मनुष्य मांस, मद्य, उदुम्बर फलों का त्याग और हिंसादि का त्याग ये उसके सार्वकालक रात्रिभोजन, चोरी और पर स्त्री का सेवन करता है वह अपने इस सदा रहने वाले व्रत हैं। इसमें अष्टमूलगुण शब्द का व्यवहार नहीं जन्म और पर जन्म को नष्ट करता है।
किया गया है और मधु के त्याग का विधान किया है, जबकि मद्य जिनसेन ने वि.सं. 840 में अपने हरिवंशपुराण के अठारहवें को नहीं गिनाया है। अतः चारित्रसार में उद्धत उक्त श्लोक के सर्ग में श्रावकधर्म का वर्णन करते हुए पद्मचरित्र की तरह श्रावक साथ इसकी संगति नहीं बैठती। के बारह व्रतों को गिना कर अन्य में लिखा है मांस, मधु, मद्य, द्यूत
आ. अमृतचन्द ने पुरूषार्थसिद्धयुपाय में लिखा है कि और उदुम्बरों को छोड़ने तथा वेश्या और पर स्त्री के साथ भोग का हिंसा से बचने की अभिलाषा रखने वाले पुरूषों को सबसे पहले त्याग करने आदि को नियम कहते हैं। इसके पूर्व दसवें सर्ग में भी मद्य, मांस, मधु और पांच उदुम्बर फलों को छोड़ने से ही मनुष्य गृहस्थ के पांच अणुव्रतों को बतलाकर दान, पूजा, तप और शील की बुद्धि निर्मल होती है और तभी वह जैन धर्म के उपदेश का को गृहस्थों का धर्म बतलाया है । यद्यपि ऊपर कहे गये नियम में पात्र होता है। यद्यपि इन्हें ग्रन्थकार ने मूलगुण नहीं कहा, किन्तु मूलगुणों की परिगणना हो जाती है, किन्तु मूलगुण रूप से उल्लेख उन्हें अभीष्ट यही प्रतीत होता है कि ये श्रावक के मूलगुण हैं। हरिवंशपुराण में भी नहीं है। कार्तिकेयानुप्रेक्षा में धर्मानुप्रेक्षा का वर्णन करते हुए ग्यारह
प्राचार्य, स्नातकोत्तर संस्कृत महाविद्यालय,
जयपुर (राज.)
क्रमशः... -अगस्त 2003 जिनभाषित "
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काव्य, दर्शन और अध्यात्म की अन्यतम उपलब्धिः
मूकमाटी
डॉ. के.एल. जैन
आचार्य विद्यासागर जी ने विपुल साहित्य का सृजन किया । मन में 'नर्मदा के नरम कंकर' को शंकर बनाने की बात मन में है, जिसमें जनकल्याण और लोककल्याण की भावना समाहित | आयी होगी। तोता' को रोता हुआ देखकर कवि का मन करूणा है। उन्होंने शास्त्रों के अथाह सागर से विशेषतः कविता के मोती | से भर उठा होगा, यह सोचकर की आँसुओं के जल से अंतर की
चुनने का जो भगीरथ प्रयास किया है, वह काफी अद्भुत और | मलिनती जाती रहती है और मन प्रभु भक्ति के लिए निर्मल हो विस्मयकारी है। काव्यशास्त्र की दृष्टि से ऐसा माना गया है कि | जाता है। वह (कवि) प्रभु के गुणों का गान करता हुआ चेतना अनुभूति की घनीभूत तीव्रता ही कविता को जन्म देती है। भावों | की गहराईयों में उतरा होगा, जहाँ केवल समर्पण की सच्ची साधना की यही तीव्रानुभूति आचार्य श्री की कविताओं में भी देखने को | के मर्म की अनुभूति हुई होगी। परमात्मा की सत्ता में अपने अस्तित्व मिलती है । यद्यपि वस्तुतत्व की दृष्टि से इन कविताओं का मूलस्वर | के विसर्जन का भाव जाग्रत हुआ होगा। ऐसी स्थिति में 'डूब भले ही आध्यात्म रहा हो, लेकिन इन कविताओं में जीवन के | जाने की आशंका जाती रही होगी। केवल प्रभु की भक्ति रूपी जिन उदात्त आदर्शों का निरूपण किया गया है, वास्तव में वही | जल में 'डुबकी लगाने का भाव ही शेष रहा होगा। यहाँ आकर कविता का प्राणतत्व माना गया है। क्योंकि कविता के मूल में कवि भक्ति के सागर में अवगाहन करता है और इस संसार में मानव जीवन और उसके अन्तः करण में उठने वाले भावों को ही | भटक रहे प्राणियों को भी आनंद के सागर में डुबकी लगाने की कवि शब्द-बद्ध करता है और यही कार्य आचार्य श्री ने भी किया है। | सलाह देता है। सृष्टि के कण-कण में सुख, शांति और समृद्धि
यहाँ पर हम आचार्य श्री द्वारा विरचित 'मूकमाटी' के | फैलने लगे। सृष्टि से सारे संताप दूर हो जायें और कण-कण में सम्बन्ध में कुछ कहें, इसके पूर्व हम आचार्य श्री के उस काव्यात्मक मुस्कान विखर जाये। जड़ पदार्थ भी चेतन हो उठे। माटी महकने अवदान की संक्षेप में चर्चा करेंगे जिसके कारण 'मूकमाटी' की | लगे। उसमें भी स्पंदन शुरू हो जाय, तो मानो कवि का प्रयोजन रचना संभव हो सकी। फिर आचार्य श्री की 'मूकमाटी' ही एक | सिद्धि को प्राप्त कर ले। और फिर ऐसा ही हुआ- 'मूकमाटी' के ऐसी अनुपम कृति है जो उनकी अक्षयकीर्ति को युगों-युगों तक | रूप में। आचार्य श्री की कवि कलम के स्पर्श से माटी बोल उठी। अक्षुण्ण बनाये रखने में समर्थ होगी। दूसरे शब्दों में हम यह भी 'मूकमाटी' तो बोली ही, लगता है असंख्य हृदयों में धर्म की कह सकते हैं कि 'मूकमाटी' एक ऐसी कालजयी कृति है, जिसे | अनुगूंज के स्वर गुंजायमान होने लगे। 'मूकमाटी' ने साहित्यसमय की पर्ते उसके जनकल्याणकारी वैभव को कभी भी धूमिल | जगत को आंदोलित कर दिया। एक ऐसी हलचल पैदा कर दी कि नहीं बना सकेंगी।
विद्वान, कवि, आलोचक और साहित्य प्रेमी इस 'मूकमाटी' के कहा गया है कि कविता मन की अतल गहराइयों से | स्पंदन को सुनने और समझने के लिए लालायित हो उठे। आज उठती हुई अनुभूतियों की तरंग है। यही तंरगें जब शब्दों के | यह कृति साहित्य जगत में उस स्थान की अधिकारिणी माने जाने माध्यम से व्यक्त होकर जन-जन के हृदय को अनुरंजित करती हुई लगी जहाँ कवि प्रसाद की 'कामायनी', दिनकर की 'उर्वशी' और अतीन्द्रिय आनंद की अनुभूति कराती है तो कविता धन्य हो जाती पंत का 'लोकायतन' हुआ था। इसलिए कि महाकाव्य की सम्पूर्ण है। कविता को यह गौरव 'मूकमाटी' के माध्यम से आचार्य श्री ने विशेषताओं के साथ-साथ इस कृति में आधुनिक युग की उन नाना रूपों में प्रदान किया है।
मूलभूत समस्याओं का उचित समाधान किया गया है, जो कृति के अनेक कवियों ने कविता का जन्म वेदना और पीड़ा से | कालजयी होने के लिए आवश्यक है। माना है। 'पंत' ने भी कहा है- "वियोगी होगा पहला कवि, जहाँ तक साहित्य जगत् में किसी रचनाकार की पहचान आह ! से निकला होगा गान । उमड़कर आँखों से चुपचाप, वहीं | का प्रश्न है तो हम यही कह सकते हैं कि किसी कवि या साहित्यकार होगी कविता अनजान।"............. यहाँ पर भी कवि के मन में | की वे कुछ एक रचनाएँ ही हुआ करती हैं जो उसकी पहचान को सांसारिक भोंगों में लिप्त मानव के अंतहीन दुःखों के प्रति वेदना कायम करती हैं। इस दृष्टि से यदि हम अतीत की ओर झांके तो की हूक उठी होगी और करुणा के बादल कवि के अंतस्लोक में | ज्ञात होगा कि जायसी की पहचान के लिए 'पद्मावत', तुलसी घुमड़ने लगे होंगे। आहों की बिजलियाँ चमकी होंगी और अंतर | की पहचान के लिए 'रामचरित मानस' केशव की पहचान के लए का कोना-कोना पर्वत की पीर की तरह पिघल कर अनजान झरने | 'रामचंद्रिका', प्रेमचंद्र की पहचान के लिए 'गोदान', रेणु की की तरह कविता के रूप में प्रवाहित हुआ होगा, तभी तो कवि के | पहचान के लिए 'मैला आँचल', प्रसाद की पहचान के लिए
10 अगस्त 2003 जिनभाषित
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'कामायनी', निराला की पहचान के लिए 'राम की शक्ति पूजा', छा जावे सुख छाँव, दिनकर की पहचान के लिए 'उर्वशी', पंत की पहचान के लिए सबके सब टलें 'लोकायतन', और इसी प्रकार आचार्य श्री की साहित्य जगत में अमंगल भाव, पहचान 'मूकमाटी' के द्वारा कायम हुई। 'मूकमाटी' आधुनिक सबकी जीवन-लता काल का ऐसा महाकाव्य है जिसने जनमानस को आंदोलित किया हरित-भरित विहंसित हो है। 'मूकमाटी' आने वाले समय में भारतीय संस्कृति को अक्षुण्य गुण के फूल विलसित हों बनाये रखने के लिए एक थाती का कार्य करेगी। यह कृति कवि, नाशा की आशा मिटे मनीषी, संत और आध्यात्म के क्षेत्र में शिखर ऊँचाईयों को प्राप्त आमूल महक उठे कर चुके उस महान् कवि का अनुभूतिगम्य निचोड़ है जो कि
............. बस।" साधना के उच्चतम सोपानों को प्राप्त करने के पश्चात प्राप्त होता है। मूकमाटी में (का पूरा कथानक) माटी के उद्धार की 'मूकमाटी' के अनुपम उपहार को साहित्य जगत् जिस कृतज्ञ भाव | कथा काव्य-रूप में है। यहाँ माटी आत्मा की प्रतीक है, जो भवसे ले रहा है वह नि:संदेह अत्यंत शुभ संकेत है।
भटकन से मुक्ति के लिए सच्चे गुरू की शरण में स्वयं साधनालीन वास्तव में देखा जाय तो 'मूकमाटी' केवल एक काव्य | | हो सुख-शांति के पथ पर चल कर स्वयं परमात्मा बनती है। कृति ही नहीं, वरन् एक ऐसा महाकाव्य है जिसमें भक्ति, ज्ञान | अर्थात् माटी अपने संकर दोषों से विरत होकर मंगल-कलश के और कविता की त्रिवेणी का संगम सबको पावन बना देता है।| रूप में ढलती है। इसके पहले यह नीति नियमों की रीति से आचार्य श्री ने स्वयं इस महाकाव्य के उद्देश्य पर प्रकाश डालते गुजरकर अग्नि परीक्षा देती हैहुए लिखा है- "जिसने वर्ण, जाति, कुल आदि व्यवस्था विधान "मेरे दोषों का जलाना ही को नकारा नहीं है, परन्तु जन्म के बाद आचरण के अनुरूप उसमें मुझे जिलाना है उच्च-नीचता रूप परिवर्तन को स्वीकारा है। इसलिए संकर दोष स्व पर दोषों को जलाना से बचने के साथ-साथ वर्ण लाभ को मानव जीवन का औदार्य व परम धर्म माना है संतों ने।" ' साफल्य माना है। जिसने शुद्ध सात्विक भावों से संबंधित जीवन अग्नि परीक्षा के बाद पका हुआ कुम्भ अपनी महिमा के को धर्म कहा है। जिसका प्रयोजन सामाजिक, शैक्षणिक, राजनैतिक | यश में अपने आप को नहीं भूलता है। वह तो माँ धरती, धृतिऔर धार्मिक क्षेत्रों में प्रविष्ट हुई कुरीतियों को निर्मूल करना और | धरणी, भूमा का ही बना ही रहना चाहता है जो इस बात का युग को शुभ संस्कारों से संस्कारित कर भोग से योग की ओर | द्योतक है कि हम कितने ही वैभवशाली बनें, मगर अपनी संस्कृति, मोड़कर वीतराग श्रमण-संस्कृति को जीवित रखना है।" । अपनी सभ्यता और माटी को न भूलें
आचार्य श्री का यह महाकाव्य जैन दर्शन के धरातल पर "धरती की थी, रहेगी माटी यह समकालीन परिप्रेक्ष्य में काव्य शास्त्र की एक नवीन भाव-भूमि
किन्तु को प्रस्तुत करता है। 'माटी' को आधार बनाकर 'मुक्त छंद' में पहिले धरती की गोद में थी भाव, भाषा और शैली की दृष्टि से आचार्य श्री का यह अनुपम आज धरती की छाती पर है और स्तुत्य प्रयास है जिसमें कवि की दृष्टि पतित से पावन बनाने कुंभ के परिवेश में।" की ओर दिखाई देती है। आचार्य श्री का यह महाकाव्य मानव यहाँ पर मूकमाटी महाकाव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह सभ्यता के संघर्ष और सांस्कृतिक विकास का दर्पण है। यह कृति ] है कि निर्जीव प्रतीक भी सजीव पात्र बनकर हमारे सामने ऐसे मानवता को असत्य से सत्य की ओर, हिंसा से अहिंसा की ओर, | प्रस्तुत होते हैं जैसे कि साक्षात् वार्तालाप हो रहा हो। यहाँ पर अशांति से शांति की ओर और बाह्य से अन्तर की ओर ले जाने | महाकवि ने स्वर्णकलश को आतंकवाद और पूंजीवाद का प्रतीक वाली ऐसी अन्यतम रचना है जो एक साथ अनेक प्रसंगों को | माना है, जबकि कुंभ कलश तो दीपक के समान पथ निर्देशन लेकर चली है। जिस तरह से बट-बीज से बट का विशाल वृक्ष | करने वाला हैबनता है ठीक उसी तरह से नर भी नारायण बनता है और यह "हे स्वर्ण कलश सच्ची साधना उपासना से ही सम्भव है। इसी लक्ष्य को लेकर तुम तो हो मशाल के समान महाकवि ने इस महत् कार्य को काव्य रूप में संस्कारित किया है, कलुषित आशयशाली जिसका औदात्य भाव हम 'मूकमाटी' की निम्न पंक्तियों में देख
और सकते हैं
माटी का कुंभ है "यहाँ .......................... सबका सदा
पथ-प्रदर्शक दीप-समान जीवन बने मंगलमय
तामश-नाशी
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साहस सहंस स्वभावी।"
इस तरह हम देखते हैं कि आचार्य श्री की यह कृति 'मूकमाटी'का कवि'संत' और 'साधक' होते हुए जनवादी अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। समकालीन समय में जीवन में है। कवि ने सामाजिक अव्यवस्थाओं का यथार्थ संकेत करने के | उत्पन्न हो रही नानाविध समस्याओं का समाधान कवि ने जिस साथ-साथ उनका आदर्श परक समाधान भी सहज रूप में प्रस्तुत सरलता से इस कृति में किया है वह अपने आप में एकदम किया है
सामयिक और सार्थक है। दूसरी ओर इसमें समकालीन समय के "अब धन संग्रह नहीं
जिन शाश्वत मूल्यों के संकट को उठाकर उनका समाधान किया जन संग्रह करो
गया है वह भी एकदम सामयिक है। आज हम देखते हैं कि चारों
ओर जीवन-मूल्यों का जिस तीव्रता के साथ हास हो रहा है उसके बाहुबल मिला है तुम्हें
रोकने के लिए आचार्य श्री की यह कृति अपने अनूठे उपायों का करो पुरूषार्थ सही
अनुक्रम करती है। मूकमाटी पाश्चात्य सभ्यता के कारण पनप रहे पुरूष की पहचान करो सही,
भौतिकवाद को रोकने का एक सशक्त माध्यम भी है, जो इस बात परिश्रम के बिना तुम
की ओर संकेत करती है कि जीवन का सार भोग में नहीं योग में नवनीत का गोला निगलो भले ही,
हैं, आसक्ति में नहीं विरक्ति में है, विराधन में नहीं आराधना में है कभी पचेगा नहीं वह
और यही कारण है कि मूकमाटी साहित्य जगत् में कालजयी होने प्रत्युत जीवन को खतरा है।"
की सशक्त दावेदार रचना बन गई है। मूकमाटी में समकालीन राजनीति, राजनैतिक दलों, न्याय-
आचार्य श्री की 'मूकमाटी' आधुनिक हिन्दी कविता के व्यवस्था, भाग्य, पुरूषार्थ, नियति, काल, संस्कार, मोह, स्वप्न | क्षेत्र में जिन बिंदुओं को लेकर उपस्थित हुई है, उसने जीवन में कला, जीव, अध्यात्म, दर्शन, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की हताशा, पराजय और कुण्ठा के स्थान पर जिस आशा, पुरूषार्थ व्याख्या सामयिक संदर्भो में की गई है। यहाँ तक की कवि ने और स्थाई मूल्यों का संचार किया। वह अपने आप में अन्यतम ही समकालीन समय में बढ़ते हुए आतंकवाद पर अपनी गहरी चिंता माना जायेगा। 'मूकमाटी' हमें आदर्शवादी समाज की संरचना की व्यक्त की है
दृष्टि देती है, सदाचरण की शिक्षा देती है और साथ ही साथ एक "जब तक जीवित है आतंकवाद
ऐसी जीवन दृष्टि भी प्रदान करती है जिससे व्यक्ति साधक की शांति का श्वास नहीं ले सकती
श्रेणी में पहुँच जाता है। "आधुनिकता की परम्परा से हटकर धरती यह, ये आँखे अब
मूकमाटी महाकाव्य ने सामुदायिक चेतना की पृष्ठ भूमि में आतंकवाद को देख नहीं सकती
आध्यात्मिक अभ्युत्थान को जिस रूप में उन्मेषित किया है वह ये कान अब
वास्तव में बेजोड़ है।" इस रूप में 'मूकमाटी' नई कविता का आतंक का नाम नहीं सुन सकते ।
एक सशक्त हस्ताक्षर है। यह जीवन की कृत संकल्पित है कि
कुल मिलाकर मूकमाटी के विषय में इतना कहना ही उसका रहे या इसका
पर्याप्त होगा कियहाँ अस्तित्व एक का रहेगा।"
1. मूकमाटी आधुनिक युग का एक ऐसा महाकाव्य है हम देखते हैं कि आज यह सम्पूर्ण सृष्टि अनेक संकटों के | जिसमें सामयिक समस्याओं का समाधान अत्यंत सरलता के साथ दौर से गुजर रही है। जिसमें विश्वास का संकट सबसे बड़ा संकट | किया गया है। हे। अराजकताओं की जननी एक प्रकार से अविश्वास ही है। | 2. विज्ञान के इस विनाशकारी युग में इस कृति के माध्यम आचार्य श्री ने 'विश्वासभाव' को हृदय में भरने के लिए प्रेरित | से ऐसे सूत्रों का सूत्रपात हुआ है जिसे अंगीकार कर इस विश्वव्यापी किया है
विनाश को रोका जा सकता है। विश्व शांति स्थापित करने में यह "क्षेत्र की नहीं
कृति मूलमंत्र का काम करेगी। आचरण की दृष्टि से
3. मूकमाटी को पढ़ने के उपरांत विकार युक्त हृदय भी
निर्मल बन जाता है। ऐसी स्थिति में भौतिकता के कीचड़ में फंसी शब्दों पर विश्वास लाओ,
यह सृष्टि इस कृति के द्वारा अपना आत्म कल्याण कर सकती है। हाँ। हाँ।
4. मूकमाटी के माध्यम से आचार्य श्री ने सत्यम्, शिवम् विश्वास को अनुभूति मिलेगी
ओर सुन्दरम् की विराट् अभिव्यक्ति के मुक्ति द्वार खोलने में जिस मगर
कलात्मकता का परिचय दिया है उससे सरल हृदयों में, धर्म, मार्ग में नहीं, मंजिल पर।"
दर्शन, कर्म, संस्कृति और आध्यात्म के पावन पंचामृत की
12 अगस्त 2003 जिनभाषित
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स्वाभाविकता की सहज अनुभूति होने लगती है।
कि उनके अक्षर-अक्षर में शब्दत्व की अनुगूंज सुनाई पड़ती है। 5. इस धरित्री के वे 'संत' महान् हैं जो अपनी रचना | उन्होंने शब्दों को नये अर्थ, नये परिवेश के रंग-विरंगे परिधान धर्मिता के द्वारा इस सांसारिक जगत् के समस्त संतापों से मुक्त | पहनाये हैं। इसलिए उन्हें 'शब्दों का जादूगर' कहा गया है। मूकमाटी करने के लिए भगीरथ प्रयत्न कर रहे हैं। इस दृष्टि से 'मूकमाटी' मात्र एक कृति ही नहीं सम्पूर्ण सृष्टि का वह सारतत्व है, जिसे के द्वारा जिनवाणी के प्रसाद को यदि हम सब सम्पूर्ण भारत वर्ष में | आज तक कोई साहित्यकार किसी एक रचना में संयोजित करने बाँटने के लिए कृत संकल्प हो जायें तो इस सृष्टि का कल्याण होने का दुर्लभ प्रयास नहीं कर सका और न कर पायेगा। में देर नहीं लगेगी।
संक्षेप में बस इतना ही कहना चाहूँगा कि 'मूकमाटी' एक 6. मूकमाटी के माध्यम से 'ज्ञान जागरण' का ऐसा संदेश ऐसी रचना है जिसने साहित्य जगत् की मनीषा को झंकृत करने के द्वार-द्वार तक पहुँचना चाहिए जिससे कि संसार के दिग्भ्रमित साथ-साथ इस बात पर विचार करने के लिए साहित्यकारों को प्राणी सही दिशा प्राप्त कर सकें। यदि ऐसा हुआ तो निःसंदेह | विवश किया है कि आज तक किसी साहित्यकार की किसी कृति सदियाँ आचार्य श्री के इस अवदान को कभी विस्मृत नहीं कर | पर इतना विचार-विमर्श नहीं हुआ जितना कि 'मूकमाटी' पर । पायेंगी।
सच तो यह है कि 'मूकमाटी' ने लोगों को इतना अधिक बोलने 7. जब एक कुशल रचनाकार जीवन और जगत की मार्मिक | पर विवश किया है कि जिसका कोई अंत नहीं। इसीलिए वर्तमान संवेदनाओं की अतल गहराईयों में उतर जाता है तब उसकी रचना | समीक्षकों के द्वारा 800 से अधिक मूकमाटी' पर समीक्षाएँ लिखे फिर किसी 'कोश' का अनुशरण नहीं करती । वरन् कोशकारों के | जाने के बावजूद भी विद्वान यही कहते हैं 'न इति, न इति' अर्थात् लिए एक नई शब्दावली प्रदान करती है। मूकमाटी में आचार्य श्री | अभी भी काफी कुछ कहना शेष है। बस। की रचनात्मक अतलता को देखकर ऐसा लगता है कि वे विपुल
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष - हिन्दी विभाग और विस्मयकारी शब्द-भण्डार के स्वामी हैं और यही वजह है
शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
टीकमगढ़ (म.प्र.)
बोधकथा
सौदा न पटा
किसी गांव में एक पुराने सेठ रहते थे। वह एक बार | मोल बता।" बकरीवाले ने अंगूठी देख ली और जान गया कि कहीं बकरियों की खोज में निकले। किसीने बताया कि अमुक | ऐसा संकेत इसने मुझे अंगूठी दिखाने के लिए ही किया है। गाँव के अमुक आदमी के पास बकरियाँ हैं। वहीं वह चल दिए। | उसने मन ही मन कहा कि बड़ी शान दिखाता है अंगूठी की! जिसके पास वे बकरियाँ थीं, वह मामूली आदमी था। वह सेठ | उसके दाँतों पर सोने की फूली थी। उसने इस तरह कहने को को नहीं पहचानता था। इसलिए उसने उनकी विशेष आवभगत | मुंह खोला कि दांत दिखाई दें और कहा, "पच्चीस रुपया।" नहीं की। उसने सोचा, यहाँ बहुत से व्यापारी आते हैं। होगा | सेठ समझ गए कि दांत की फूली दिखाना उनकी अंगूठी कोई ऐसा ही । इसलिए उसने उनसे तम्बाखू पाने की भी न | दिखाने का जवाब था। वहाँ पर एक दूसरा आदमी भी बैठा था। पूछी। सेठजी को बहुत बुरा लगा, पर दूसरे के घर पर क्या | उसने सोचा, यह तो कोई अंगूठी दिखा रहा है, कोई फूली, मैं कहते ? उन्होंने बकरियाँ दिखाने को कहा। बकरियोंवाला उनको | क्या इनसे कम हूँ! उसके कानों में बालियां थीं। जैसे ही बकरी गोठ में ले गया। सेठ ने बकरियाँ देखीं और कहा, 'तो कहो | वाले ने बकरी की कीमत पच्चीस रुपया बताई, उसने सिर मोल।' बकरी वाले ने कहा, "मोल तो हो ही जायगा। लेकिन | हिलाया, "नहीं ज्यादा कह रहे हो।" और उसकी बालियां ध्यान रखना कि मैं उधार नहीं दूगा।" सेठ को बुरा लगा। हिलती हुई दीखने लगीं। उन्होंने सोचा, यह आदमी मुझे क्या समझता है ! उनके हाथ में बस, फिर बकरी का मोल कहाँ होना था ! वे अपनीसोने की अंगूठी थी । वह बता देना चाहते थे कि वह सेठ हैं, पर | अपनी शान दिखाने लगे। उनका सौदा क्यों कर पटता! मुंह से कहना उन्होंने ठीक न समझा। इसलिए उन्होंने उस उंगली से, जिसमें अंगूठी थी, संकेत किया, "इस बकरी का
लघु लोक कथाएँ : गोविन्द चातक
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ज़रा सोचिये!
पद्मचन्द शास्त्री
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क्या जैन जिन्दा रह सकेगा?
मकानों, कोठियों, बंगलों और यहाँ तक कि वह बकिंघम पैलेस जैसे चन्द लोग इकट्ठे होते हैं और आकाश गुंजाने को जोर |
जैसे महलों में रहने के स्वप्न देखता और वैसे प्रयत्न करता है। से नारा लगाते हैं- 'जैन धर्म की जय।' नारे से आकाश तो गंजता | जिसे दीक्षा के पूर्व ख्याति, पूजा-प्रतिष्ठा की चाह न थी, वह है, पर, क्षण भर में वह गूंज कहाँ विलीन हो जाती है ? इसे सोचिए
उत्सवों, कार्यक्रमों आदि के बहाने बड़े-बड़े पोस्टरों में बड़ीकहीं वह अस्तित्व रखते हुए भी अरूपी आकाश में तो नहीं समा | बड़ी पदवियों सहित अपने नाम फोटो और वैसी किताबें छपाना जाती। इसी प्रकार आज जैन को ढूंढना भी मुश्किल है, वह भी
| चाहता-छपाता है। जिसे दीक्षा पूर्व लोग जानते भी न थे-कोने में चूर-चूर होकर बिखर चुका है? शायद कहीं वह भी तो अरूपी बैठा रहता हो वह दीक्षा के बाद सिंहासनारूढ़ होकर सभाओं में आकाश में नहीं समा गया? देखिए, जरा गौर से-यदि ज्ञान-दीपक | अपने जयकारे चाहता है। जो घर से सीमित परिवार का मोह त्याग लेकर ढूंढे तो शायद मिल जाय!
वैराग्य की ओर बढ़ा था वह उपकार के बहाने सीमित की बजाय आप किसी मंदिर में जाइए वहाँ आप समवसरण के कीमती | श्रावक-श्राविका और सेठ-साहूकारों जैसे बड़े परिवारों के फेर में से कीमती वैभव को देख सकेंगे, पाषाण-निर्मित प्रतिबिम्बों को
फँस जाता है, उनके वैभव से घिर जाता है । ये सब तो ग्रहण करने देख सकेंगे- वे बिम्ब चाँदी, सोने, हीरे और पन्नों के भी हो सकते
के चिन्ह हैं और ग्रहण करने में जैन कहाँ? जैन तो उत्तरोत्तर त्याग हैं, आप आसानी से देख सकेंगे। पर जैन आपको अपनी आँखों या
में है, आकिंचन्य में है। हाँ, सच्चे त्यागी होंगे अवश्य-उनको भावों से कदाचित् ही दिखें।
खोजिए, जहाँ वे हों, जाइए और नमन कीजिए, इसमें आपका भी ऐसे ही किसी त्यागी समाज में जाकर देखिए वहाँ आपको | भला है। लाल, गेरुआ, पीत, श्वेत या दिगम्बर चोला तो दिखेगा, पर, जिसे
श्रावकों की मत पूछिए, वे भी कहाँ, कितने हैं? होंगे आप खोज रहे हैं वह 'जैन' न मिलेगा। ऐसे ही किसी पण्डित के | बहुत थोड़े कहीं- किन्हीं आकाश प्रदेशों में, श्रद्धा और विवेकपूर्वक पास जाइए उसे सुनिए : आपको सिद्धान्त और आगम की लम्बी
| श्रावक की दैनिक क्रियाओं में लीन। वरना, अधिकाँश जन चौड़ी व्याख्याएँ मिलेंगी, क्रिया-काण्ड मिलेगा पर, 'जैन' के
समुदाय तो इस पद से अछूता ही है- रात्रि-भोजी और मकारदर्शन वहाँ भी मुश्किल से हो सकेंगे। धन-वैभव में तो जैन के
सेवी तक। जिन्हें हम श्रावक माने बैठे हैं, तथोचित सर्वोच्च जैसे मिलने का प्रश्न ही नहीं-जहाँ लोग आज खोजते हैं।
सम्मान आदि तक दे रहे हैं, शायद कदाचित् उनमें कुछ श्रावक आप पूछेगे भला, वह जैन क्या है, जिसे देखने की आप
हों, तो दैनिक क्रियाओं की कसौटी पर कस कर उन्हें देखिए। बात कर रहे हैं? आखिर, उस जैन को कहाँ देखा जाय? तो | वरना, वर्तमान वातावरण से तो हम यह ही समझ पाए हैं कि इस सुनिए
युग में पैसा ही श्रावक और पैसा ही प्रमुख है- सब उधर ही दौड़ 'जैन' आत्मा का निर्मल, स्वाभाविक रूप है, वह सरल | रहे हैं। आत्माओं के भावों और आचार विचारों से मुखरित होता है। जहाँ | पण्डित, 'पण्डा' वाला होता है और 'पण्डा' बुद्धि को मलीनता, बनावट और दिखावा न हो वहाँ झलकता है। आप देखें | कहते हैं - 'पण्डा' बुद्धिर्यस्यस: पण्डितः अर्थात् जिसमें बुद्धि ये जो कई श्रावक हैं. पण्डित हैं. त्यागी और नेता हैं. इनमें कितने, | हो वह पण्डित है । आज कितने नामधारियों में कैसी बुद्धि है, इसे किस अंश में मलीनता, बनावट और दिखावे से कितनी दूर हैं? | जिनमार्ग की दृष्टि से सोचिए। जब जिनमार्ग विरागरूप है तब जो इनमें जैन हो। क्या कहें? आज तो त्याग की परिभाषा भी
| वर्तमान पीढ़ी में कितने नामधारी, पं. प्रवर टोडरमल जी, पं. बदली जैसी दिखती है। त्याग तो जैन बनने का सही मार्ग है और
बनारसीदास जी और गुरुवर्य पं. गोपालदास जी बरैया, पं. वह मार्ग अन्तरंग व बहिरंग दोनों प्रकार के परिग्रहों को कृश करने
गणेशप्रसाद वर्णी जैसे सन्मार्ग राही और अल्प सन्तोषी हैं? जो और परिग्रहों के अभाव में मिलता है। अर्थात् परिग्रह की जिस
उक्त परिभाषा में खरे उतरते हों या जो लौकिक लाभों और भयों स्थिति को छोड़कर व्यक्ति घर से चला हो उस स्थिति की अपेक्षा
की सीमा लांघे-बिना किसी झिझक के सही रूप में जिनवाणी के परिग्रह में हीनता होते जाना त्याग की सच्ची पहिचान है। पर, अनुसर्ता या उपदेष्टा हों? कडुवा तो लगेगा, पर, आज के त्यागी आज तो परिस्थिति अधिकांश ऐसी है कि जो पुरुष दीक्षा-नियम | वर्ग की शिथिलता में कुछ पण्डितों, कुछ सेठों या श्रावकों का से पूर्व किसी झोपड़ी, साधारण से सुविधारहित कच्चे-पके घर में | कुछ हाथ न हो-ऐसा सर्वथा नहीं है। कई लोग हाँ में हाँ करके रहता था वह त्यागी नामकरण होने के बाद सुन्दर,स्वच्छ, सुविधायुक्त | (भी) मार्ग बिगाड़ने में सहयोगी हों तब भी सन्देह नहीं। कुछ 14 अगस्त 2003 जिनभाषित -
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पंडितों की अहं पण्डा (बुद्धि) के कारण, उनके सहयोग से मूल | ऐसा बहुमुखी है जो चाहे जिधर मोड़ा जा सकता है- नेता अच्छों आगम रूप भी बदलाव पर हो तो भी सन्देह नहीं। हम आगम के के भी हो सकते हैं और गिरों के भी, धर्मात्माओं के भी हो सकते पक्षपाती हैं। हम नहीं चाहते कि कोई अपनी बुद्धि से आगमों में | हैं। पर, यहाँ 'मोक्ष मार्गस्य नेतारं' की नहीं, तो कम से कम जैन परिवर्तन लाए। हम तो पूर्वाचार्यों की चरण-रज -तुल्य भी नहीं, समाज और जैन धर्म के नेताओं की बात तो कर ही रहे हैं कि वे जो उनकी भाषा में किन्हीं बहानों से परिवर्तन लाएँ- आचार्यों ने | (यदि ऐसा करते हों तो) केवल नाम धराने के उद्देश्य से दिखावा किस शब्द को किस भाव में कहाँ, किस रूप में रखा है इसे वे ही | न कर जनता को धर्म के मार्ग में सही रूप में ले चलें और स्वयं जानें- इस विषय को आचार्यों की स्व-हस्तलिखित प्रतियों की | भी तदनुरूप सही आचरण करें। जिससे जैन धर्म टिका रह सके। उपलब्धि पर सोचा जा सकता है, पहिले नहीं। जैसा हो, विचारें। यदि ऐसा होता है तो हम कह सकेंगे- हाँ, जैन जिन्दा रह सकेगा।
अब रह गये नेता । सो नेताओं की क्या कहें? वे हमारे भी | असलियत क्या है ? जरा सोचिए! नेता हैं। गुस्ताखी माफ हो, इसमें हमारा वश नहीं। नेता शब्द ही ।
सिद्धान्त समन्वय सार
ब्र. शान्ति कुमार जैन परम आराध्य देव श्री नेमीनाथ जी तीर्थंकर भगवान् की । था। मांस खिलाने वाले राजा की कन्या से विवाह सम्बन्ध को दीक्षा में वैराग्य के विषय में कुछ नवीन चिन्तन है। विद्वत् वर्ग | स्वीकार ही नहीं किया जा सकता है। निष्पक्ष विचार करें। अच्छी लगे तो ग्रहण करें अन्यथा छोड़ देवें।। | नेमीनाथ के साथ शक्ति परीक्षण में कृष्ण जी का पराजित मेरा कोई हठाग्रह नहीं है।
| होने के पश्चात् विवाह के लिए उन्हें तैयार करने का कार्य तो तृण भक्षी शाकाहारी अनेक प्रकार के पशुओं को देख कर | वसन्त की वन क्रिड़ाओं में अपनी रानियों के द्वारा करा ही दिया भगवान् के मन में जिज्ञासा का होना स्वाभाविक है। विवाहोत्सव | गया था। उस प्रकरण में भी जलक्रीड़ा के अनन्तर गीले कपड़ों में कन्या पक्ष में अतिथि मेहमान अनेक आते हैं। बराती भी अनेक | को निचोड़ने के लिए कृष्ण जी की प्रियतमा रानी जाम्बुवती के आये। आने वाले वाहनों पर आए तो वाहनों के लिए अवस्थान | | प्रति संकेत करना भी अनावश्यक लगता है। कारण गृहस्थावस्था का स्थान भी मार्ग के किनारे पर ही बनाया जाता है। शाकाहारी | में तो तीर्थंकर देवों के द्वारा लाये गए वस्त्राभूषण पहनते हैं एवं पशुओं को ही वाहनों के रुप में प्रयोग किया जाता है। आहारादि ग्रहण करते हैं तपि राजा महाराजाओं के पास इन
वे सारे पशु अनेक जाति के हो सकते हैं। जिसके पास | कार्यों के लिए दास दासियाँ अनेक होती हैं। नेमीनाथ के द्वारा जैसा जो वाहन रहा तो लेकर आयेगा। अब एक स्थान पर अनेक | कृष्ण जी की नागशय्या पर चढ़ कर शंखनाद करने के प्रकरण के तरह के बड़ी संख्या में पशुओं के एकत्रित होने पर उनसे निकली | अवतरण के लिए यह प्रसंग असंगत जैसा लगता है। भाभियों के हुई आवाजें, कोलाहल, आपस में लड़ना-भिड़ना तो होते ही | द्वारा छेड़छाड़ तो देवर के प्रति होती ही रहती है। अन्य किसी बात रहता है।
पर नेमीनाथ जी को क्रोध आना सम्भव हो सकता था। उसी रास्ते से नेमी कुमार जी का रथ भी आया तो उन | यह नूतन चिन्तन का अभिप्राय विसंगति को सिद्धान्त के पशुओं को देखकर उनके मन में करुणा-दया का उद्रेक हुआ। परिप्रेक्ष में समन्वय करना मात्र है। इस सद् प्रयास में कोई भूल हो पशुगति के दुःखों का स्मरण हुआ तो वैराग्य आ गया। गई हो तो हम आचार्य महाराज एवं विद्वत् वर्ग से क्षमा प्रार्थी हैं।
उनके स्वयं के पास अवधिज्ञान था पर उसका प्रयोग भी | उत्तरपुराण में यही प्रसंग भिन्न रूप से है। कृष्ण जी ने नहीं किया, आवश्यकता भी नहीं थी। तो फिर सारथी को पूछना | हिरणों को एकत्रित कराकर एक स्थान पर रखवा दिया था। क्षेत्र एवं सारथी के द्वारा दिया गया उत्तर असंगत सा लगता है। रक्षक को कह दिया था कि नेमिकुमार के पूछने पर मांस भोजन मांसाहारी अतिथियों को शाकाहारी मांस खिलावे तदर्थ तृणभोजी | की व्यवस्था के लिए रखा गया है, ऐसा कह देवें। वैसा ही ज्ञात पशुओं की हत्या करने की व्यवस्था करें, यह बात गले नहीं | होने पर भी नेमीकुमार जी ने अपने ज्ञान से यह जान लिया था कि उतरती । राजुल आर्यिका बनी थी, तो उनका पिता ऐसा कार्य करे, | यह सब कृष्ण जी की मायाचारी एवं कपट नीति का ही कार्य है, यह भी ठीक नहीं लगता। ऐसा तो आज भी सद् गृहस्थ श्रावक | जो कि राज्य प्राप्ति के लिए मुझे वैराग्य भावना की उपलब्धी के के घर विवाहादि आयोजनों में नहीं होता। किसी की दुरभिसंधी | लिए किया गया है। विवाह किए बिना ही वे अपने स्थान पर लौट से प्रेरित होकर एक सामान्य सारथी राजकुमार नेम कुँवर के | गये एवं वैराग्य भावना का चिन्तवन करने लगे, तो लोकान्तिक समक्ष मिथ्याभाषण करे, यह भी उचित नहीं लगता। आगंतुक | आदि देवों ने आकर दीक्षा महोत्सव, तप कल्याणक सम्पन्न सभी वाहनों के पशु वहाँ रखे ही जा रहे थे, यह स्पष्ट दिख रहा | किया था।
अगस्त 2003 जिनभाषित 15
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सिद्ध तीर्थ कुण्डलपुर
कैलाश मड़बैया बुन्देलखण्ड के "बड़े बाबा" नाम से देश भर में ख्यात । वीं सदी की एक प्रतिमा का प्रमाण मिलता है। सन् 1126 की श्री जैन तीर्थ कुण्डलपुर वर्तमान मध्यप्रदेश के दमोह जिले में अवस्थित | मनसुखजी द्वारा कराई गई प्रतिष्ठा के बाद केवल 1532 का एक है। मध्य रेलवे के बीना जंक्शन से कटनी की ओर जाने वाली प्रतिमा लेख उपलब्ध होता है, शेष प्रतिमाएँ उसके बाद की रेलगाड़ी से दमोह उतरकर मात्र 40 किलो मीटर पक्के मार्ग से | कालावधि की हैं। ग्राम पटेरा के निकट ही स्थित इस जैन तीर्थ पर पहुँचा जा सकता भट्टारकों के भट्टासीन होने के लेख भी प्रमाण स्वरूप है। जबलपुर से बस द्वारा भी पहुँचना आसान है। वस्तुतः धार्मिक उपलब्ध हैं। तथा सन् 1742 में श्री महाचन्द्र भट्टारक और सत्रहवीं
और पुरातात्विक तीर्थ के साथ यह पर्यटन योग्य भी रमणीक | सदी में श्री सुरेन्द्र कीर्ति स्वामी भट्टारक ने कुण्डलपुर का जीर्णोद्धार स्थल है। जहाँ सभी आधुनिक सुविधाएँ प्रायः उपलब्ध हैं। कराया और अपनी साधना का स्थल बनाया था। इसी परम्परा में
कुण्डल के आकार की गोलाकार पर्वत श्रृंखला होने के | सुचन्द्रकीर्ति और ब्र. नेमिसागर ने यहाँ पुनर्निर्माण कराया जिसके कारण कहलाया तीर्थ कुण्डलपुर, प्रकृति की पावन, प्रांजल और | लेख भी उपलब्ध हैं। सुखद हरीतिमा के बीच विद्यमान है। कुल 63 प्राचीन मंदिरों ने | जैन तीर्थों में कुण्डलपुर जैसे ऐसे विरल ही पुण्य स्थल हैं, इस तीर्थ को अद्भुत गरिमा प्रदान की है। बीच में जड़े पावन | जहाँ जैनेतर राजाओं ने अपनी मन्नतें पूरी होने पर जीर्णोद्धार "वर्धमान सागर" नाम के सरोवर ने तीर्थ की सुन्दरता को और | कराया हो। इतिहास साक्षी है कि "बुन्देल केसरी" छत्रसाल (जो अधिक आकर्षक बनाया है। ईसवी पूर्व छठवीं सदी में चौबीसवें प्रणामी धर्मानुयायी थे) जब विदेशी मुगल आतताइयों से सब तीर्थंकर महावीर स्वामी का समवशरण यहाँ आया था और अंतिम कुछ हार चुके थे तो जंगलों में भटकते भटकते यहाँ"बड़े बाबा" केवली भगवान् श्रीधर स्वामी की निर्वाण भूमि होने से यह सिद्ध से मन्नत मांगने आ पहुँचे। और कहते हैं जब उन्हें बन्देलखण्ड तीर्थ के रूप में मान्य है। जैसा कि "बड़े बाबा" के सामने स्थित का राज्य पुनः वापस मिल गया तो "बड़े बाबा" के प्रति अगाध चरण चिन्ह के सामने ही अंकित है- "कुण्डल गिरौ श्री श्रीधर श्रद्धा से वे विव्हल हो उठे थे। तब महाराजा छत्रसाल ने सत्रहवीं स्वामी" इसकी पुष्टि प्राकृत ग्रन्थ " श्री तिलोयपण्णति" से होती सदी में न केवल बड़े बाबा के मंदिर पर सोने चांदी का घण्टा और
चवर-छत्र चढ़ाया वरन् मंदिर के तालाब का जीर्णोद्धार भी कराया पुरातत्व
था। यह उल्लेख बुन्देलखण्ड के इतिहासकारों ने तो किया ही है। मूल पुरातत्त्व तो छठवीं शताब्दी का प्रतीत होता है परंतु | "बड़े बाबा" के मंदिर में स्थित शिलालेख भी यह प्रमाणित निकट स्थित "बर्रट" नाम के गांव को श्री कृष्ण के तत्कालीन विराट नगर काल से जोड़ा जाता है। यहाँ अनेक प्राचीन मूर्तियाँ
"श्री महाराजा धिराज्ञः श्री छत्रसालस्य महाराज्ये प्राप्त हुई हैं और अभी भी शिल्पावशेष विद्यमान हैं। कुण्डलपुर में
सकल सम्पत्संयुम्त प्रजाजनस्य चैत्यालयस्य निर्मापितम्" अवसर अवसर पर अनेक जीर्णोद्धार हुये हैं परंतु विगत 300
छत्रसाल कालीन कुछ बर्तन तो अभी भी सुरक्षित बताये 400 वर्षों में ही अधिकांश निर्माण किये गये हैं। वर्तमान वास्तुशिल्प जाते हैं। शिलालेख के अनुसार वि.सं. 1757 की माघ सुदी 15 मराठा कालीन ही अनुमानित है।
सोमवार को तत्कालीन पंचकल्याणक सम्पन्न हुआ था, जिसमें यहाँ उपलब्ध दो मठ पुरातत्व के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं | महाराज छत्रसाल स्वयं पधारे थे। उसी परम्परा में कुण्डलपुर में जिनमें एक ब्रह्म मठ अभी भी शासन के पुरातत्व विभाग द्वारा आज भी माघ सुदी में इस जनपद का विशाल मेला भरता है। संरक्षित किया गया है और दूसरा रूक्मणी मठ लगभग समाप्त प्राय [ विशेषाकर्षण है। जहाँ धरणेन्द्र पद्मावती को एक वृक्ष के नीचे दर्शाये जाने | कुण्डलपुर जैन तीर्थ का अर्थ है वहाँ स्थित "बड़े बाबा" वाला एक महत्वपूर्ण शिलाखण्ड अभी भी विद्यमान है। इस वृक्ष का प्रमुख रूप से दर्शन करना। 1500 वर्षों से अधिक प्राचीन यह के ऊपर तीर्थंकर पार्श्वनाथ का अंकन है।
पद्मासन प्रतिमा 3 फुट ऊँचे आसान पर 12 फुट उतुंग, देश में इतिहास
अपने तरह की अद्वितीय रचना है। ऐसा सिद्ध, सौम्य और सुन्दर मूर्ति रचना की दृष्टि से पुरातत्वविदों द्वारा कुण्डलपुर का शिल्प-सृजन देश में अन्यत्र दुर्लभ है। प्रतिमा के सिंहासन में शिल्प छटी-आठवीं सदी का माना जाता है। यह उत्तर गुप्तकाल
गौमुख यक्ष, देवी चक्रेश्वरी और काँधों तक बिखरे केशों से यह के बाद का निर्माण होना चाहिए। हालाकि मूर्ति लेख से केवल 12 प्रमाणित हो सका कि यह प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ अर्थात्
आदिनाथ स्वामी की ही मूर्ति है। 16 अगस्त 2003 जिनभाषित -
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"चिरं सपस्यतो यस्य जटा मूर्ध्नि बमुस्तरम। से मैंने अपनी शंका भी व्यक्त की कि "बड़े बाबा" की मूर्ति की ध्यानाग्नि दुग्ध कन्ध निर्मद धूम शिखर इव" जगह ही पुराने मंदिर के स्थान पर, नया मंदिर क्यों नहीं बनाया जा
(आदि पुराणपर्व। श्लोक १) | रहा है? मूर्ति स्थानांतरण करते समय यदि पहले आई दरार, बढ़ चूंकि बड़े बाबा की मूर्ति में तीर्थंकर की पहचान का कोई | गई और अभूतपूर्व बड़े बाबा की मूर्ति को कोई नुकसान पहँचे तो चिन्ह नहीं है इसलिये सिंहासन पर बने शेरों, शिखर पर उत्कीर्ण
क्या होगा? इंजीनियर एवं समाज के लोगों ने बताया कि सिंह और महावीर स्वामी के बिहार स्थित जन्म-स्थल कुण्डपुर भूगर्भशास्त्रियों एवं संबंधितों से परामर्श कर लिया गया है, कोई (कण्ड ग्राम) से नाम में साम्य होने आदि के कारण, वर्षों तक | क्षति नहीं होगी। इन्हें महावीर स्वामी ही माना जाता रहा। परंतु पुरातत्त्वविदों के
कारण कि "बड़े बाबा" की मूर्ति यहाँ ही स्थाई रूप से सूक्ष्म परीक्षण उपरान्त महावीर स्वामी के शासन देवों गजारूढ़ | निर्मित नहीं की गई थी वरन प्राचीन काल में भी अन्य स्थान से मातंग यक्ष व सिद्धायिका देवी नहीं पाये जाने एवं अन्य सभी ऊपर
लाकर यहाँ अवस्थित की गई थी। इससे अब निकट के बड़े वर्णित लक्षण आदिनाथ के होने के कारण, अवधारणा स्पष्ट हो
जिनालय में भी स्थानांतरित की जा सकती है। क्षति का प्रश्न ही सकी। यों भी परम्परा से बड़े बाबा प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को
नहीं उठता। बुन्देलखण्ड की संस्कृति पर वर्षों से काम करते हुये कहा जाता रहा है। हांलाकि अब अधिकांश तीर्थों पर बड़ी मूर्ति
मुझे "बुन्देल केसरी" छत्रसाल के रचे निर्माण को नष्ट होते हुये को ही बड़े बाबा कहने का प्रचलन चल पड़ा है।
देखकर आत्मीय पीड़ा हो रही थी पर जब ज्ञात हुआ कि भूकंप से तीर्थ वन्दन
बचाने और भविष्य की सुरक्षा के लिये यह आवश्यक है। विशाल भूभाग के अधिपत्य वाले इस जैन तीर्थ की
गर्भ गृह को आगत की दृष्टि से व्यापक विस्तारित करने वंदना यहाँ स्थित सरोवर में स्नान करके ही प्रारंभ करने की
के लिये ही आधुनिकतम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। बड़े परम्परा है परंतु अब सरोवर को स्वच्छ रखने की दृष्टि से यह
बाबा को क्षति भी नहीं होगी और 108 मुनिवर आचार्य श्री प्रतिबंधित है। अपने ठहरने के स्थानों यथा धर्मशाला या विश्राम
विद्यासागर जी का आशीर्वाद प्राप्त हो गया है। तब वह पीड़ा उस गृहों से ही नहा-धोकर पहाड़ की वंदना करने भक्तगण निकलते
माँ के प्रसव पीड़ा जैसी प्रतीत हुई जिससे एक होनहार महान् जीव हैं। यहाँ पर्वत की चढ़ाई कठिन न होकर बहुत आसान और
का नवागमन होता है। हम आप क्या अपने पूर्वजों के बनाये कच्चे उत्साह वर्धक है। सर्वप्रथम सबसे ऊंचे छहयरिया मंदिर के दर्शन
मिट्टी के घर मिटाकर बंगले या बहुमंजिला भवन नहीं बनाते हैं? से ही वंदना प्रारंभ होती है और “ससुर-दामाद" नामक मंदिर
तो फिर भगवान के लिये हमारे पूर्वाग्रह क्यों ? हमारे पूर्वजों के आदि के दर्शन पंक्तिबद्ध करते हुये पहाड़ी और तलहटी के प्राकृतिक
बनाये कच्चे घर, हमारी सांस्कृतिक धरोहर नहीं थे? उनमें रंगोली. पर्यावरण का प्रांजल परिवेश देखते ही बनता है। वर्धमान सरोवर'
नक्काशी, टिकाउपन और कलाकृतियाँ नहीं थी ? जब उसकी में मंदिरों के विशाल बिम्ब तैरते से प्रतीत होते हैं । सूर्य की सुनहरी
जगह नये निर्माणों ने ले ली है तो हमारे आराध्य पीछे क्यों रहें? आभा से यह दृश्य और अधिक लुभावना हो, मन मोहता है।
फिर बड़े बाबा तो बड़े बाबा हैं। अनेक अतिशय उन्होंने दिखाये सुबह की मदमस्त हवा, वंदना (दर्शनयात्रा) को और अधिक
हैं, प्रासंगिक और आधुनिक परिवर्तन के लिये यह चमत्कार भी आनंदित कर स्फूर्तमय बनाती है। "जयकारा" बोलते हुए दर्शनार्थी
| दिखायेंगे। जैसे ही बड़े बाबा के सामने पहुँचता है तो हतप्रभ हो उठता है
कहते हैं सदियों पहले औरंगजेब ने जब बुतों के विध्वंस ऐसी मूरत कभी न देखी जैसी आज लखी है,
की हवश में "बड़े बाबा" को नष्ट करने के लिये सेना भेजी थी सचमुच बड़े-बड़े बाबा हैं सूरत बड़ी भली है।
तब "जब जब होय धरम की हानि" के अनुरूप "बड़े बाबा" "बड़े बाबा" के दोनों और समान ऊँचाई की तेइसवें
की सिद्धता ने ही रक्षा की और आक्रमणकारियों द्वारा अंगूठे पर तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमायें कायोत्सर्ग मुद्रा में अवस्थित हैं।
प्रथम चोट करते ही दूध की धारा वहाँ वह निकली थी। जब भित्तियों पर अन्य प्राचीन प्रतिमायें भी जड़ी हैं। आदिनाथ स्वामी
शहंशाह स्वयं भंजन करने आये और मधुमक्खियों का जो प्राकृतिक की मूर्ति के ऊपर विद्याधरों की श्रीमाल लिये उड़ती हुई मुद्रा में,
आक्रमण मुगलों पर हुआ तो आतताइयों को प्राणों की भीख हर्षोल्लास व्यक्त करते हुये चमरेन्द्र आदि भी अंकित हैं। लाल
मांगकर ही भागना पड़ा था। यदि इस अतिशय पर हमारी आस्था बलुआ पत्थर से निर्मित दिव्य मूर्ति का सिंहासन दो हिस्सों को
है तो "बड़े बाबा" के लिये हमारी चिन्ता करना, नादानी होगी। जोड़कर बनाया गया सा लगता है। कहते हैं कभी भूकम्प के आने
तीर्थ की तलहटी के मंदिर भी प्राचीन, विशाल, भव्य और से ही कदाचित "बड़े बाबा" का सिंहासन एक ओर थोड़ा दब
वंदनीय हैं। जल मंदिर में एक चौमुखी (सर्वतोभद्र) प्रतिमा गया है । मूर्ति में ऊपर की ओर एक दरार आई दिखती है। विगत
महत्वपूर्ण है जो उल्लेखनीय है ।"बड़े बाबा" को हमारे अनन्तानन्त वर्ष मुझे जब अपने ज्येष्ठ पुत्र मनीष के संबंध करने के लिये पटेरा
नमन और साथ ही सद्प्रयासों के लिये अशेष शुभ मंगलकामनाएँ। जाने पर वर्षों बाद कुण्डलपुर दर्शन का सौभाग्य मिला तो यह जानकर आश्चर्य हुआ कि पुराने मंदिरों को तोड़कर एकदम नया
मडबैया सदन, 75, चित्रगुप्त नगर,
कोटरा, भोपाल-3 और विशाल जिनालय बनाया जा रहा है। वहाँ कार्यरत इंजीनियर
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चतुर्विध संघ शांति-समृद्धि-साधना पद्धति में
सहायक है : वास्तुविज्ञान
जैन सुधीर कासलीवाल
किसी भी कार्य की सिद्धि के लिये द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव । निर्धारित करना चाहिये ? और भाव इन पांच समवायों की आवश्यकता होती है, इनमें से उत्तर - नैऋत्य या दक्षिण या पश्चिम दिशाओं में। क्षेत्र को व्यवस्थित करना ही 'वास्तु' कहलाता है। वर्तमान में हीन प्रश्न - जहाँ संघ रुकता है (वसतिका) उससे शौच एवं संहनन एवं साक्षात् तीर्थंकर भगवान् जेसे निमित्तों के अभाव में | लघुशंका का स्थान किस दिशा में होना चाहिये? कमजोर उपादान लड़खड़ा जाता है। संवर, निर्जरा .... साधना उत्तर - वायव्य या नैऋत्य (पश्चिम के बीच में) की मार्ग में उपयोगिता महसूस हुई मोक्षमार्ग के कारण-का-कारण तरफ। वास्तु-विज्ञान की 'पहला सुख निरोगी काया' 'काया राखे धर्म' प्रश्न - शौच एवं लघुशंका करते समय साधक का मुंह 'न धर्मो धार्मिकैर्विना' आदि कुछ सूक्तियाँ मेरे लिये प्रेरणादायी | किस दिशा में होना चाहिये ? बनी और लिखने बैठ गया।
उत्तर - उत्तर या दक्षिण में। श्रमण संस्कृति के अनुयायियों के लिये, धर्मात्माओं के प्रश्न - आहार करते समय साधक का मुंह किस दिशा में लिये यानि चतुर्विध संघ को दृष्टि में रखकर निष्काम भावनाओं से | होना चाहिये? . भरकर वास्तु सम्बन्धी तथ्यात्मक एवं प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत उत्तर - सर्वश्रेष्ठ पूर्व दिशा, उत्तर भी हो सकती है, ध्यान करने का मेरा मन बना। साधकों का स्वास्थ्य, साधना, स्वाध्याय | रखें मुख्यद्वार की ओर आहार करते समय पीठ नहीं होनी चाहिये। एवं जमकर धर्मप्रभावना हो, स्वयं के आत्मोत्थान का मार्ग प्रशस्त प्रश्न - रात्रि विश्राम के समय साधक के पैर किस दिशा हो तथा समाज हमारे आदर्शों से सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान- | में होने चाहिये? सम्यक्चारित्र का पाठ सीखे और स्वयं "गृहस्थो मोक्ष मार्गस्थो" | उत्तर - पूर्व की तरफ पैर हो । उत्तर की तरफ भी किये जा के सूत्र पर चलें, ऐसी अन्त:करण की भावना से प्रेरणा मिली। | सकते हैं।
__ अधिकांश जनों की एक ही धारणा है कि कर्मोदय ही सब प्रश्न - संघ के अस्वस्थ साधक किस स्थान पर रुकें? कुछ है, किन्तु आगम ग्रंथों में कर्मों की उदीरणा, अपकर्षण, उत्तर - पूर्व, पश्चिम अथवा उत्तर दिशाओं में रुकें, संक्रमण जैसी अनेकों दशायें वर्णित हैं यानि मात्र कर्मोदय कहकर | विदिशाओं वाले कमरों में न रुकें। हम जीवन के बहुमूल्य एवं स्वर्णिम क्षणों को यूं ही न जाने दें | प्रश्न - प्रवचन व स्वाध्याय करते समय वक्ता का मुंह वरन रचनात्मक दिशा में आहूत करें।
किस दिशा में हो? जैन सिद्धान्त में आचार्य वीरसेन स्वामी ने वास्तु का उल्लेख उत्तर - प्रवचन करते समय उत्तर में या पूर्व में तथा करते हुये कहा है- "थल गया णाम... वत्थु-विज्ज भूमि ... स्वाध्याय करते समय पूर्व की ओर मुंह होना चाहिये। संबंध मण्णं पि सुहासुह - कारणं वण्णेदि अर्थ-स्थल गता, चूलिका प्रश्न - आर्यिकाजी, क्षुल्लिकाजी एवं ब्रह्मचारिणी बहनें वास्तु विद्या और भूमि संबंधी दूसरे शुभ-अशुभ कारणों का वर्णन अशुद्ध अवस्था में किस दिशा वाले कमरे में रहें? करती है"
उत्तर - वायव्य दिशा वाले कमरे में, सोते समय पैर उत्तर धवला पुस्तक 1, पृष्ठ 114 | दिशा की तरफ हों। आईये हम वास्तु विज्ञान से सम्बन्धित कुछ जानकारियाँ
प्रश्न - वस्त्रधारी साधक वस्त्र बदलते एवं धोते समय हासिल करें
अपना मुंह किस दिशा में करें? प्रश्न - संघ के प्रमुख साधक को किस दिशा में दिन एवं
उत्तर - पूर्व दिशा में सर्वश्रेष्ठ है, उत्तर में भी मुंह कर रात्रिकालीन स्थान का चयन करना चाहिये और उस कमरे में भी
कमर म भा | सकते हैं किंतु धोते वक्त पूर्व दिशा ही उत्तम है। कहाँ बैठे?
प्रश्न - जिस भवन में साधक रुके हों यदि वह तिरछा उत्तर - नैऋत्य दिशा में । दक्षिण में बैठे उत्तर की ओर मुंह | बना है या दिशा तिरछी पडती है तब दिशा का निर्धारण कैसे करके । पश्चिम में बैठे पूर्व की ओर मुंह करके।
करें? प्रश्न - जहाँ संघ रुके वह स्थान नगर की किस दिशा में
उत्तर - विदिशा वाले भवनों में दिशा का निर्धारण सीधा 18 अगस्त 2003 जिनभाषित -
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ही करें अर्थात् स्वयं तिरछे ना बैठे। ईशान दिशा की ओर मुंह | नया निर्माण किया जाएगा तो उसका फल विपरीत मिलेगा, अरिष्ट करके अध्ययन आदि कार्य करें।
होगा, असमय आयु का नाश होगा, पुत्र क्षय, कुल क्षय और प्रश्न - वसतिका की छत दक्षिण और पश्चिम की ओर | मनसंताप होगा। लोभ के वशीभूत होकर मंदिरों के बाह्य भागों, ढलान पर है तो क्या करें?
धर्मशालाओं के आगे पीछे (सुविधानुसार) और मकानों के कमरों उत्तर - ढ़लान दक्षिण में हो तो पश्चिम में बैठे, यदि ढ़लान | की दीवारें तोड़कर दुकानें बनाई जा रही हैं। किरायेदार रखने के पश्चिम में हो तो दक्षिण में बैंठे।
लोभ से या भाईयों के आपसी वैमनस्य से मकान आदि के बीच प्रश्न - वसतिका में साधक किस क्रम में बैठे ? | यद्वा-तद्वा इच्छानुसार कहीं भी दीवार खड़ी करके विभाजन
उत्तर - यदि नैऋत्य से दक्षिण दिशा में कमरे, आग्नेय | किये जा रहे हैं। प्राचीन मन्दिरों के स्तंभ तोड़कर उसकी जगह कोण तक बने हों तो बड़े साधक से क्रमश: छोटे साधक बैठे, | लोहे की गार्डर डालकर अपने को धन्य माना जा रहा है। लोहा ठीक इसी तरह नैऋत्य से पश्चिम होते हुये वायव्य की ओर के | और सीमेन्ट की अनुकम्पा से नवीन मंदिर (गुम्बज युक्त) गोदाम कमरों में उपरोक्त क्रम ही जानें।
सदृश बनाए जा रहे हैं। विधान के विपरीत कार्य करने के फलस्वरूप प्रश्न - सल्लेखना में स्थित क्षपक को वसतिका में किस | ही चारों ओर मार-काट वैमनस्य, दुर्घटनाएँ और आग लगाकर दिशा में रहना चाहिये, किस दिशा में मुंह करके बैठना चाहिये अथवा गोलियाँ खाकर आत्म हत्याएं हो रहीं हैं। जहाँ सुख-चैन एवं किस दिशा में सिर करके लेटना चाहिए?
की बंशी बजनी चाहिए थी वहाँ परिवार अपनी पुत्रवधुओं को उत्तर - अ. सल्लेखना में स्थित क्षपक को वसतिका में | आग लगाकर उनकी हत्याएँ कर रहे हैं। ठीक पूर्व दिशा की तरफ वाले कमरे में रहना चाहिए। ऐसा संभव
वत्थुविजा, पृष्ठ चार-पांच नहीं हो तो उत्तर एवं वायव्य के बीच में यदि कोई कमरा हो तो
| कुछ बातें..... जिनका ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए वहाँ भी रहा जा सकता है।
1. भवन अथवा कमरे के प्रवेश द्वार के ठीक सामने न बैठे, न ब."पाची णाभि मुहो वा उदीचि हुत्तो व तत्थ सो ढिच्चा।" सोवें।
2031 भगवती आराधना 2. लोहे की गार्डर या आर.सी.सी. बीम, टांड के नीचे न कभी अर्थ- पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके क्षपक संस्तर पर बैठे, न सोवें। बैठता है।
3. आप यदि मंदिर परिसर में रुके हैं तो जिन प्रतिमा की पीठ स. "उत्तर सिर मधव पुव्वसिर"
जिधर पड़ती हो ऐसे कमरे में कदापि न रुकें। 2030 भगवती आराधना |4. गैर पिच्छिका धारी (जिनकी भूमिका है) ऐसे साधक जो अर्थ - क्षपक का सिर पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर
विद्युत के यंत्रों का प्रयोग करते हैं वो यंत्र (बल्ब, ट्यूब, रहे।
पंखा आदि) उनके ठीक ऊपर नहीं होना चाहिए। प्रश्न- वसतिका से निषीधिका किस दिशा में होनी चाहिये?
ऐसा परिसर जहाँ तलघर हो अगर वहाँ रुकते हैं तो तलघर उत्तर- जा अवरदक्खिणाए व दक्खिणाए व अहव अवराय।
सम्पूर्ण परिसर के पूर्व-उत्तर (ईशान) दिशा में होना चाहिए। वसधीदो विरज्जड़ णिसीधिया सा पसस्थति।
जाप्य, ध्यान अथवा पूजन जिनप्रतिमा के सम्मुख करने से 1964 भगवती आराधना | अर्थ - निषीधिका क्षपक के स्थान से पश्चिम-दक्षिण दिशाओं का दोष नहीं होता है, लेकिन वसतिका/घर में पूर्व दिशा (नैऋत्य) में या दक्षिण दिशा में या पश्चिम दिशा में हो तो
अथवा उत्तर में ही करना चाहिये। उत्तम होती है।
7. गुरु जो वर्तमान में मौजूद हैं उनकी तस्वीर ईशान में किन्तु प्रश्न - स्नान करते समय मुंह किस दिशा की ओर होना
जो समाधिस्थ अथवा निर्वाण को प्राप्त हो चुके हैं उनकी चाहिये?
तस्वीर नैऋत्य या दक्षिण में लगाएँ। उत्तर - स्नान करते समय मुंह पूर्व दिशा की ओर सर्वश्रेष्ठ | 8. झूठे बर्तन मकान परिसर से बाहर और बाउण्ड्री वाल के माना जाता है।
भीतर अथवा रसोई के बाहर ही रखना व साफ करना चाहिए। पद्मपुराण, पर्व 80 श्लोक 73 | दिशाएँ कैसे ज्ञात करें: प्रश्न - आर.सी.सी. के मंदिर निर्माण, मन्दिरों के जीर्णोद्धार
उत्तर अथवा सामाजिक सम्पत्ति में परिवर्तन हेतु आपकी प्रेरणा एवं सान्निध्य, यदि किसी वास्तु विशेषज्ञ के निर्देश में नहीं हो तो क्या
वायव्य
ईशान हानि हो सकती है?
पश्चिम उत्तर- शास्त्र प्रमाण के बिना यदि देवालय, मंडप,
नैऋत्य
आग्नेय धर्मशालाओं, गृह, दुकान और तलभाग आदि का विभाजन एवं
दक्षिण
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वस्त्र परिवर्तन करने का मुहूर्त :
पश्चिम एवं मंगल तथा बुधवार को उ. फाल्गुनी नक्षत्र में उत्तर नक्षत्र -- रेवती, उ. फाल्गुनि, उत्तराषाढ़ा, उ.भाद्रपद, रोहिणी, | दिशा की ओर नहीं जाना चाहिये। पुष्य, पुनर्वसु, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा,
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा, पुष्य, धनिष्ठा।
रेवती, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा उत्तम हैं । तिथि 2/3/5/7/10/11/13 वार- बुध, गुरु, शुक्र, रवि
केवलज्ञानप्रश्नचूड़ामणि पृष्ठ 175 तिथि - 2/3/5/6/7/8/10/11/12/13/15 -
उपरोक्त बिन्दुओं के माध्यम से कोशिश की गई है कि केवल ज्ञान प्रश्नचूड़ामणि (पृष्ठ 178 पर) यात्रा मुहूर्त :
आपके दैनन्दिनी जीवन में वास्तु सम्बन्धी सभी जिज्ञासाओं का सब दिशाओं में यात्रा के लिये नक्षत्र-हस्त, पुष्य, अश्विनी,
समाधान हो। मुझे अत्यन्त हर्ष होगा जब आप उपरोक्त वास्तु अनुराधा चारों दिशाओं के लिये शुभ होते हैं परन्तु मंगल, बुध, | विज्ञान से सम्बन्धित नियमों की अनुपालना कर बोधि और समाधि शुक्रवार को दक्षिण में नहीं जाना चाहिये।
की प्राप्ति करें। इस अकिंचन को विज्ञजन सुझाव दें। वार शूल और नक्षत्र शूल
"नमन वास्तुकला" ___ ज्येष्ठा नक्षत्र - सोमवार और शनिवार को पूर्व, पूर्वाभाद्रपद
835, मोहन वाटिका के पीछे नक्षत्र और गुरुवार को दक्षिण शुक्रवार को और रोहिणी नक्षत्र को
महावीर नगर, जयपुर 302018 (राज.)
बोध कथा
कपट का फल
__एक बार कोई गीदड़ रात के समय जंगल में से भागकर | आज्ञा का पालन करना होगा। जो मेरी आज्ञा न मानेगा, वह | किसी गाँव में आ गया, और जब उसे कहीं बाहर जाने का रास्ता दण्ड का भागी होगा।' न मिला तो एक घर में घुस गया। गीदड़ को घर में देखकर सब जानवरों ने सोचा- बात तो ठीक मालूम होती है। इसका लोग उसे मारने दौड़े। गीदड़ भागता भागता घर के बाहर आया, | रंग-ढंग हम लोगों से भिन्न है, इसके ऊपर कोई दैवी कृपा जान परन्तु वहाँ कुत्ते उसके पीछे लग गये, और वह एक नील के | पड़ती है। कुण्ड में गिर पड़ा।
जानवरों ने कहा, 'महाराज, आपने बड़ी कृपा की जो | नील कुण्ड में पड़ा हुआ गीदड़ बार-बार ऊपर चढ़ने | यहाँ पधारे। हम सब आपके नौकर हैं, कहिए क्या आज्ञा है?' का प्रयत्न करता, मगर फिर नीचे गिर पड़ता। अन्त में एक ज़ोर | खसद्रुम ने उत्तर दिया, 'तुम लोग मेरे लिए फ़ौरन ही की छलाँग मारकर वह कुण्ड के बाहर निकल आया। कुण्ड से | हाथी का प्रबन्ध करो।' बाहर निकलते ही गीदड़ जंगल की ओर भागा।
जानवर एक हाथी को पकड़ लाये। खसद्रुम बड़ी शान नील कुण्ड में पड़े रहने के कारण उसका सारा शरीर | से हाथी पर बैठकर जंगल में घूमने लगा। नीले रंग में रंग गया था। इसलिए मार्ग में उसे रीछ, गीदड़ आदि । एक दिन रात के समय सब गीदड़ रो रहे थे। खसद्रुम जो जानवर मिलते, उससे पूछते, 'यह तेरा रूप-रंग कैसे बदल भी उनके स्वर में स्वर मिलाकर रोने लगा। हाथी को जब गया है?'
मालूम हुआ कि कपटी गीदड़ उसकी पीठ पर चढ़ा फिरता है गीदड़ जवाब देता, 'जंगल के समस्त प्राणियों ने मिलकर | तो उसने उसे अपनी सूंड में लपेट, नीचे गिराकर मार डाला। मुझे खसद्रुम नामक राजा बनाया है। अब तुम सब लोगों को मेरी
"दो हजार वर्ष पुरानी कहानियाँ"डॉ. जगदीशचन्द्र जी
20 अगस्त 2003 जिनभाषित
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वाग्वर क्षेत्र का सुन्दर सृजन: वाग्वर सम्मेद शिखर
पर्वत रचना
राजस्थान के बांसवाड़ा-डूंगरपुर जिले में बना वाग्वर क्षेत्र प्राचीनकाल से धर्म से युक्त प्राचीन जिनालयों से विभूषित पांडवों की जोगस्थली माही, अनास नदियों की रंग स्थली, चर्तुविध संघों की चातुर्मास स्थली, स्नेहीजनों की आवास स्थली के रूप में प्रसिद्ध है। इसी वाग्वर क्षेत्र के बांसवाड़ा जिले के नौगामा ग्राम में सुक नदी व नाला की संगम स्थली पर प्राचीन पाषाण निर्मित नसियाजी मंदिर है। मंदिर में श्याम पाषाण का प्राचीन स्तूप दर्शनीय है, जिसके ऊर्धभाग पर सिद्ध परमेष्ठी, मध्य भाग में अरहंत परमेष्ठी व अधोभाग में आचार्य, उपाध्याय व साधु परमेष्ठी के आकार अंकित हैं। स्तूप पर सं. 1591 के लेख व जैनाचार्यों के नाम अंकित हैं। निकट ही सोलह पगी छतरी के सोलह खम्भों पर जैनाचार्यों के आकार अंकित हैं।
नौगामा दिगम्बर जैन समाज द्वारा इस प्राचीन क्षेत्र पर वाग्वर सम्मेद शिखर पर्वत रचना करने का निर्णय किया गया। क्षेत्र पर कृत्रिम रूप से 25 टोंकें ऊँची नीची पहाड़ियों पर बनाये गये। इन्हीं पहाड़ियों में ही गन्धर्व नाला, शीतल नाला की रचना की गई। सम्मेद शिखर की तरह ही जलमंदिर व मानतुंगाचार्य, गुणभद्राचार्य, भद्रबाहु आचार्य व पार्श्वनाथ गुफा का निर्माण हुआ। इस क्षेत्र पर वंदना करते हुए यात्री कई बार भ्रम में पड़ जाता है कि कहीं वह वास्तविक रूप से शिखरजी की यात्रा कर रहा है। शीतल जल के फुब्बारे से सज्जित जल मंदिर हिरण, शेर, सूखे पेड़ पर बैठे वानर की प्रतिकृति, शीतल छाँव से युक्त गुफाएँ आदि देखकर यात्री भाव-विभोर हो जाते हैं और उन कारीगरों की भूरी-भूरी
नरेन्द्र जैन
प्रशंसा करने लगते हैं, जिन्होंने अपने हाथों से पत्थर को भी मोम बना दिया है।
एक किवदन्ती के अनुसार यहाँ जो भक्त अपनी मनोकामना मांगता था वह पूरी हो जाती थी जिससे यह क्षेत्र आसपास के जैन जैनेतर समाज में अगाध श्रद्धा का केन्द्र बन गया है।
क्षेत्र परिसर में आसपास छितराई हुई काली चट्टानें, जलमंदिर के पीछे की ओर कल-कल बहती सरीता द्वय, आस्ट्रेलियन घास युक्त पुष्पपाटिका, शीतल जल युक्त गंधर्व नाला, शीतल नाला, गुलाब, जुही, मोगरा पुष्पों के सुवासित महक, टोंकों के शिखर से गूंजती घण्टियों की मधुर खनक, क्षेत्र परिसर में बहती शीतल बयार, पहाड़ियों के आसपास उगी लताकुंज, वृक्ष आदि से ऐसा लगता है मानो प्रकृति यहाँ पर टूट पड़ी हो। भगवान् महावीर की श्यामवर्ण प्रतिमा, मानस्तम्भ, कलात्मक रूप से बना चुग्गादाना, स्तम्भ आदि इस क्षेत्र की सुंदरता में चार चाँद लगा देते हैं। प्रकृति की गोद में बसा नसीबाजी अतिशय क्षेत्र "वाग्वर सम्मेद शिखर पर्वत रचना" के नाम से जैन तीर्थ के नक्शों में अपनी अमिट छाप छोड़ रहा है।
आग्रह है पूज्य संतगण, श्रद्धेय विद्वत्जन व श्रीमंत श्रेष्ठी वर्ग से कि वे ' वाग्वर सम्मेद शिखर रचना' के विकास में सार्थक पहल कर एवं इसे पुष्पित, पश्चिवित करने में अपनी सार्थक भूमिका का निर्वहन करें। क्षेत्र पर धर्मशाला, संत निवास, प्रवचन हाल के निर्माण की योजनाएँ प्रस्तावित हैं ।
नसीया टेलिकाम सेंटर, नौगामा
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जिज्ञासा-समाधान
पं. रतनलाल बैनाड़ा
प्रश्नकर्ता - एच.डी.बोपलकर, उस्मानाबाद
श्री धवला पुस्तक-9 गाथा 120 में इस प्रकार कहा हैजिज्ञासा - किसी तीर्थंकर का तीर्थकाल कब से माना
छासट्ठिदिवसावणयणं केवलकालम्मि किमठें करिये। जाना चाहिए?
केवलणाणे समुप्पण्णे वि तत्थ तित्थाणुप्पत्तीदो॥ समाधान - उपरोक्त विषय पर श्री तिलोयपण्णत्ति गाथा
अर्थ - केवलज्ञान की उत्पत्ति हो जाने पर भी 66 दिन 1285 में इस प्रकार कहा है
तक उनमें तीर्थ की उत्पत्ति नहीं हुई थी, इसलिए उनके केवलीकाल इगवीस-सहस्साणिं, दुदाल वीरस्स सो कालो॥1285॥ में 66 दिन कम किए जाते हैं। अर्थ- वीर भगवान् का तीर्थकाल इक्कीस हजार व्यालीस
उपरोक्त श्री धवला व श्री कषायपाहुड़ के मतानुसार तीर्थ वर्ष प्रमाण है ।। 1285 ।। अर्थात् भगवान् महावीर का छदमस्थकाल | की उत्पत्ति अथवा तीर्थकाल का प्रारंभ दिव्यध्वनि के आरंभ से 12 वर्ष और केवलज्ञान काल 30 वर्ष है (देखें श्री तिलोयपण्णत्ति है। बहुत से आचार्यों एवं विद्वानों के मुख से भी भगवान् महावीर गाथा नं. 685) अर्थात् चतुर्थकाल के 42 वर्ष + 3 वर्ष साढ़े 8 के तीर्थ की उत्पत्ति श्रावण वदी एकम ही सुनते आए हैं। तीर्थ की माह शेष रहने पर भगवान् की दीक्षा हुई थी और पंचमकाल के | | उत्पत्ति दीक्षाकाल से होती है ऐसा कभी सुनने में नहीं आया। फिर तीन वर्ष साढ़े 8 माह शेष रहने पर धर्म की व्युच्छित्ती हुई थी।। भी श्री तिलोयपण्णत्तिकार का उपरोक्त मत विद्वानों के द्वारा ध्यान अतः उपरोक्त गाथा से स्पष्ट होता है कि तीर्थकाल का प्रारंभ दीक्षा | में रखने योग्य है। लेते ही मानना चाहिए।
जिज्ञासा- हींग भक्ष है या अभक्ष ? परन्तु श्री धवलाकार एवं श्री कषायपाहुड़कार का मत
समाधान - ईरान, काबुल आदि स्थानों में एक वृक्षों की इससे भिन्न है। जैनेन्द्र सिद्धान्त कोष भाग-3, पृष्ठ 291 पर तीर्थ / जाति ऐसी है, जिनमें चीरा लगाने से दूध की तरह एक वस्तु उत्पत्ति के संबंध में श्रीधवला पुस्तक-1 का प्रमाण इस प्रकार टपकती है। नीचे गठ्ठा कर दिया जाता है, जिसमें यह दूध-सा दिया है
पदार्थ इकट्ठा होता रहता है, इसी पदार्थ को हींग कहते हैं। इस इम्मिस्से वसिप्पिणीए चउत्थ-समयस्य पिच्छमे भाए। वस्तु को जब गड्ढे से निकाला जाता है तब यह लिवलिवे की चोत्तीसवाससेसे किंचिविसेसूणए संते ॥ 55॥| शक्ल में होता है। ईरान के लोग इस पदार्थ को बकरे की खाल में वासस्स पढममासे पढमे पक्खम्हि सावणे बहुले।। पैक करते हैं और काबुल के लोग प्लास्टिक या टाट की पैकिंग में पाडिवदपुव्वदिवसे तित्थुप्पत्ती द अभिजिम्हि ।। 56॥| पैक करते हैं। काबुल या ईरान से भारत आने तक यह पदार्थ सावण बहुलपडिवदे रुद्दमुहुत्ते सुहोदये रविणो। सूखता नहीं है बल्कि लिवलिवे की शक्ल में बना रहता है। यहाँ
अभिजिस्स पढमजोए जत्थ जुगादी मुणेयव्वो॥ 75।। आने पर उन बोरों या बकरे की खाल को बड़े-बड़े चाकुओं से
अर्थ- इस अवसर्पिणी कल्पकाल के दुःषमा सुषमा नाम काटकर इस लिवलिवे पदार्थ को सुखाया जाता है। हाथरस आदि के चौथे काल के पिछले भाग में कुछ कम 34 वर्ष बाकी रहने स्थानों पर इस गीली हींग को सुखाने की बहुत सारी फैक्ट्रियाँ हैं। पर, वर्ष के प्रथम मास अर्थात् श्रावण मास में प्रथम अर्थात् कृष्णपक्ष | इसको सुखाकर फिर इसकी पैकिंग की जाती है। प्रतिपदा के दिन प्रात:काल के समय आकाश में अभिजित नक्षत्र बाजार में हींग दो प्रकार की बिकती है। एक तो वह है जो के उदित होते रहने पर तीर्थ की उत्पत्ति हुई। 55-56॥ श्रावण | एक इंची-डेढ़ इंची के टुकड़ों में आती है और जिसे उत्तर प्रदेश कृष्ण प्रतिपदा के दिन रुद्रमुहूर्त में सूर्य का शुभ उदय होने पर और | में हड्डा हींग कहा जाता है। इसका रंग कत्थे जैसा गहरा होता है अभिजित् नक्षत्र के प्रथम योग में जब युग की आदि हुई तभी तीर्थ | यह ईरान से आई हुई बकरे की खाल वाली हींग है। यदि इसको की उत्पत्ति समझना चाहिए (श्री धवला पुस्तक-9 गाथा 29/120, | सूंघा जाए तो इसमें खाल की बदबू भी आती है और यदाकदा तथा श्री कषाय पाहुड़ पुस्तक-1, गाथा 20/74 पर भी इसी प्रकार | बकरे के बाल भी दिखाई देते हैं। दूसरी हींग वह है जो चूरे की कहा है)।
शक्ल में बिकती है और जिसे हींगड़ा के नाम से पुकारा जाता है।
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यह दाने के रूप में बिकती है इसका रंग हरा होता है यह वह है | आयु बयालीस हजार वर्ष प्रमाण होती है। शेष तिर्थयों की उत्कृष्ट जो काबुल से प्लास्टिक या टाट की पैकिंग में आती है इसका | आयु एक पूर्वकोटि प्रमाण है। 285॥ भाव वर्तमान में 240 रुपया प्रति सौ ग्राम है।
श्री राजवार्तिक में अध्याय-3 के अंतिम सूत्र 'तिर्यग्योनिउपरोक्त दोनों प्रकार की हींगों में से ईरान वाली हींग तो | जानां च' ।। 39 ॥ की टीका करते हुए श्री अकलंक देव ने इस अभक्ष ही है वह हमको नहीं खानी चाहिए। परन्तु जो चूरा हींग | प्रकार कहा हैआती है उसमें कोई दोष दिखाई नहीं पड़ता। यह चूरा हींग भक्ष पञ्चेन्द्रियाणां पूर्वकोटिनवपूर्वाङगानि द्विचत्वारिंशद् है। पू. मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज से जब वे बिहार करते | द्वासप्ततिवर्ष= सहस्त्रणि त्रिपल्योपमा च ।।। पञ्चेन्द्रियाः तैर्यग्योनाः हुए हाथरस पधारे थे तब मैंने स्वयं हाथरस जाकर, वहाँ की कई | पञ्चविधा: जलचराः, परिसर्पाः, उरगाः, पक्षिणः, चतुःपादश्चेति । फैक्ट्रियों के मालिकों से स्वयं मिलकर उपरोक्त जानकारी प्राप्त तत्र जलचराणमुत्कृष्टा स्थिति: मत्स्यादीनां पूर्वकोटी। परिसर्पाणां करके उनको बताई। पूज्य मुनिश्री का कहना था कि यह पदार्थ गोधानकुलादीनां नव पूर्वाडगानि । उरगाणां द्विचत्वारिंशद्वर्षसहस्त्राणि । कई माह तक गीला सा रहता है, इसमें भी तो त्रस जीवों की | पक्षिणां द्वासततिवर्षसहस्त्राणि । चतुः पदां त्रीणि पल्योपमानि। सर्वेषां उत्पत्ति हो जाती होगी। इस संबंध में जानकारी करने हेतु आगरा तेषां जघन्या स्थितिरन्तर्मूहर्ता। के एक प्रसिद्ध डॉ. अनिल कुमार जैन की मैंने सहायता ली। डॉ. । अर्थ- पंचेन्द्रिय तिर्यंचों की उत्कृष्ट आयु एक पूर्वकोटि, साहब ने गीली हींग का पैथोलोजी लैब में जाकर माइक्रोस्कोप | नौ पूर्वांग, 42000 वर्ष, 72000 वर्ष और तीन पल्य है ।।5।। द्वारा अच्छी प्रकार टैस्ट किया और बताया कि यह हींग तो वैक्टीरिया | | पंचेन्द्रिय तिर्यंच पाँच प्रकार के हैं- जलचर, परिसर्प, सर्प, को नष्ट करने वाली वस्तु है। इसमें माइक्रोस्कोप से देखने पर एक | पक्षी और चतुष्पद (चार पैर वाले पशु) इनमें जलचरों की उत्कृष्ट भी वैक्टीरिया दिखाई नहीं पड़ता है। कल्चर करके देखने पर भी | आयु मच्छ आदि की एक करोड़ पूर्व है। परिसर्प, गोह, नकुल एक भी वैक्टीरिया दिखाई नहीं पड़ता है। अतः यह चूरा हींग आदि की नौ पूर्वांग है, सो की 42000 वर्ष, पक्षियों की 72000 (अपनी बुद्धि से देखने पर तो) भक्ष प्रतीत होती है। यदि सूक्ष्म वर्ष और चतुष्पदों की तीन पल्य है। सबकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त दृष्टि से कोई दोष हो तो वह हमारे इन्द्रिय ज्ञान से अतीत है। है।
निष्कर्ष यह है कि हड्डा हींग जो कत्थे जैसे रंग वाली है, उपरोक्त प्रमाण से यह स्पष्ट होता है कि उत्तम भोगभूमि में वह अभक्ष है और चूरा हींग जो हरे रंग वाली है, उसे भक्ष मानना पाये जाने वाले हाथी आदि पशुओं की आयु तीन पल्य और चाहिए।
पक्षियों की आयु 72000 वर्ष माननी चाहिए। किन्हीं विद्वानों के नोट - इस संबंध में कोई और विशेष बात हो तो पाठकगण मुख से ऐसा सुना जाता है कि उत्तम भोगभूमि के सभी तिर्यंचों की मुझे लिखने का कष्ट करें।
आयु तीन पल्य होती है परन्तु वह कथन आगम सम्मत प्रतीत नहीं जिज्ञासा - भोगभूमि में जलचर जीव तो पाये नहीं जाते | होता। उपरोक्त राजवार्तिक के कथनानुसार पक्षियों की आयु 72000 केवल थलचर व नभचर जीव पाए जाते हैं। तो इन थलचर व | वर्ष से अधिक नहीं होती। श्लोकवार्तिक के महान टीकाकार पं. नभचर जीवों की उत्कृष्ट आयु कितनी माननी चाहिए? माणिकचंद जी कोंदेय ने श्लोकवार्तिक पंचम खण्ड, पृष्ठ 395 समाधान- श्रीमूलाचार गाथा 1113 में इस प्रकार कहा पर लिखा है "पक्षियों की उत्कृष्ट आयु 72000 वर्ष है, भोगभूमि
में पाये जा रहे पक्षियों में यह आयु संभवती है।" अतः उत्तम पक्खीणं उक्कस्सं वाससहस्सा बिसत्तरी होति। भोगभूमि के चतुष्पद पशुओं की आयु तीन पल्य और पक्षियों की ' एगा यपुवकोडी असण्णीणंतह यकम्मभूमीणं॥1113॥
आयु 72000 वर्ष मानना उचित है। अर्थ- पक्षियों की उत्कृष्ट आयु बहत्तर हजार वर्ष है तथा जिज्ञासा - केवली भगवान् के नौ भेद किस प्रकार हैं, असंज्ञी जीव और कर्मभूमि जीवों की उत्कृष्ट आयु एक कोटिपूर्व | समझाइये? वर्ष है। 1113 ॥
समाधान - आगम में केवली भगवान् के नौ भेद इस श्री तिलोयपण्णत्ति अधिकार-5, गाथा 285 में इस प्रकार | प्रकार कहे हैंकहा है
1. पाँच कल्याणक वाले तीर्थंकर बाहत्तरि बादालं वास-सहस्साणि पक्खि-उरगाणं।
2. तीन कल्याणक वाले तीर्थंकर अवसेसा-तिरियाणं, उक्कस्सं पुव्व-कोडीओ॥285|
3. दो कल्याण वाले तीर्थंकर अर्थ- पक्षियों की आयु बहत्तर हजार वर्ष और सर्पो की ।
4. अन्तः कृत केवली
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5. उपसर्ग केवली
भोजन करता है तो दोष का भागी होता है। 6. समुद्घात केवली
व्याख्या - साधु के हाथ में पड़ा हुआ आगम से अविरुद्ध 7. मूक केवली
योग्य आहार (भोजन का ग्रास) किसी दूसरे को देने के योग्य नहीं 8. सामान्य केवलो
होता। यदि वह साधु अपनी रुचि तथा पसन्द न होने के कारण 9. अयोग केवली
उसे स्वयं न खाकर किसी को देता है या किसी अन्य को खाने के जिज्ञासा - क्या मिथ्यादृष्टि जीव सौधर्म स्वर्ग की उत्कृष्ट निमित्त कहीं रख देता है तो उस साधु को फिर और भोजन नहीं आयु प्राप्त कर सकता है?
करना चाहिए, यदि वह दूसरा भोजन करता है तो दोष का भागी समाधान - उपरोक्त प्रश्न के समाधान में श्री धवला होता है सम्भवतः 'यथालब्ध' शुद्ध भोजन न लेने आदि का उसे पुस्तक-4 में कहा है कि सौधर्म कल्प में उत्पन्न होने वाले मिथ्यादृष्टि | दोष लगता है। जीव, उत्कृष्ट आयु ढाई सागर प्राप्त नहीं कर सकते। प्रमाण इस
(व्याख्याकार-पं. जुगलकिशोर जी मुख्तार "युगवीर") प्रकार हैं
जिज्ञासा- तिर्यंचों में कितने संस्थान पाये जाते हैं ? क्या ___ "मिच्छादिट्टी जदि सुह महंतं करेदि। तो पलिदोवमस्स
कोई तिर्यंच समचतुरस्त्र संस्थान वाले भी हो सकते हैं। असंखेज्जदिभागेणब्भधियवेसागरोवमाणि करेदि। सोहम्मे
समाधान - उपरोक्त विषय पर श्रीमूलाचार गाथा 1091 उपज्जमाणमिच्छादिट्ठीणं एदम्हादो अहियाउट्ठवणे सत्तीए अभावा।
की टीका में इस प्रकार कहा है..... अंतोमुहुत्तूणड्डाइज्जसागरोवमेसु उप्पण्णसम्मादिट्ठिस्स
हरितत्रसाः प्रत्येकसाधारणवादरसूक्ष्म वनस्पति द्वीन्द्रिय सो हम्मणिवासिस्स मिच्छ तगमणे संभवाभावो.....
त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रयाः, भवणादिसहस्सारंतदेवेसु मिच्छाइट्ठिस्स दुविहाउट्ठिदिपरुवण्णा
णेगसंठाणा-अनेकसंस्थाना नैकमनेकमनेक संस्थानं येषां हाणुबवत्तीदो।"
तेऽनेकसंस्थाना अनेक हुंडसंस्थानविकल्पा अनेकशरीराकाराः । अर्थ - मिथ्यादृष्टि जीव यदि अच्छी तरह खूब बड़ी भी
अर्थ - प्रत्येक, साधारण, वादर, सूक्ष्म वनस्पति, द्विन्द्रिय, स्थिति करे, तो पल्योपम के असंख्यातवें भाग से अभ्यधिक दो
त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रय जीव के शरीर का आकार एक प्रकार का नहीं सागरोपम करता है, क्योंकि सौधर्म कल्प में उत्पन्न होने वाले
है, अनेक आकार रूप है अर्थात् ये सब अनेक भेद रूप हुण्डक मिथ्यादृष्टि जीवों के इस उत्कृष्ट स्थिति से अधिक आयु की स्थिति
संस्थान वाले हैं। पचेन्द्रिय तिर्यंचों के बारे में गाथा नं. 1092 में स्थापन करने की शक्ति का अभाव है। ..... अन्तर्मुहूर्त कम ढाई
कहा है कि पंचेन्द्रिय तिर्यंच छहों संस्थान वाले होते हैं। सागरोपम की स्थिति वाले देवों में उत्पन्न हुए सौधर्म निवासी
श्री सिद्धांतसागर दीपक में भी इस प्रकार कहा हैसम्यग्दृष्टि देव के मिथ्यात्व में जाने की सम्भावना का अभाव है।
मनुष्याणां च पञ्चाक्षतिर श्वां सन्ति तानि षट् । ...... अन्यथा भवनवासियों से लेकर सहस्त्रार तक के देवों में
देवानामादिसंस्थान नारकाणां हि हुण्डकम्॥ 116 ।। मिथ्यादृष्टि जीवों के दो प्रकार की आयु स्थिति की प्ररूपणा हो
द्वित्रितुर्येन्द्रियाणां च सर्वेषां हरिताङ्गिनाम् । नहीं सकती थी।
अनेकाकारसंस्थानं हुण्डाख्यं स्याद् विरूपकम।।117 ॥ जिज्ञासा - वर्तमान में कुछ मुनिराज अपने हाथ में आए अर्थ- मनुष्यों और पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के छहों संस्थान होते किसी मिष्ठान को, किसी अपने भक्त के लिए प्रसाद रूप में देने हैं। देवों के समचतुरस्त्र एवं नारकियों के हुण्डक संस्थान ही होते लगे हैं। क्या उनका इस तरह देना आगम सम्मत है?
हैं ।।116 ॥ द्विन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवों के तथा सम्पूर्ण समाधान - श्री योगसार प्राभृत (ज्ञानपीठ प्रकाशन, पृष्ठ वनस्पतिकायिक जीवों के विविध आकारों को लिए हुए विरूप 183) में आचार्य अमितगति महाराज ने इस प्रकार कहा है- | आकार वाला हुण्डक संस्थान होता है । 117 ।। पिण्डः पाणि-गतोऽन्यस्मै दातुं योग्यो न युज्यते।
उपरोक्त प्रमाणों के अनुसार एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय दीयते चेन्न भोक्त्व्यं भुङ्क्ते चेद् दोषभाग्यतिः।।64॥ | तिर्यंचों के अनेक आकार वाला हुण्डक संस्थान एवं पंचेन्द्रिय
अर्थ- साधु के हाथ में पड़ा हुआ आहार दूसरे को देने के | तिर्यंचों में छहों संस्थान पाए जाते हैं। योग्य नहीं होता (और इसलिए नहीं दिया जाता) यदि दिया जाता है तो साधु को फिर भोजन नहीं लेना चाहिए, यदि वह साधु अन्य |
1/205, प्रोफेसर कॉलोनी,
आगरा-282 002
24 अगस्त 2003 जिनभाषित -
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सांगानेर का सच
निर्मल कासलीवाल, जयपुर पिछले कई माह से श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र मंदिर | काफी काम हुआ है पर यह नहीं लगता कि प्राचीनता का कोई संघीजी के बारे में अनेक पत्र-पत्रिकाओं में निकले लेखों के विनाश यहाँ हुआ हो'। कारण समाज भ्रमित हुई। वास्तव में सच क्या है ? उसे प्रकाशित
उक्त हस्तलिखित टिप्पणी क्रमांक 2 पर संलग्न है।
इसी तरह श्रीमती भावना देवराज चिखलिया, केन्द्रिय नहीं किया गया। ऐसे कुछ व्यक्ति हैं जो समाज के विकास में बाधक बन गये और समाज को बांटने पर तुल गये। संघीजी मंदिर
राज्यमंत्री, संस्कृति एवं पर्यटन विभाग ने भी जीर्णोद्धार के कार्य के जीर्णोद्धार और संवर्द्धन को पुरातत्व से छेड़छाड़ करना बता रहे
को देखकर कहा कि - 'पुरातत्व को देखकर / ध्यान में रखकर हैं, जो असत्य है। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग राजस्थान, जयपुर
ही जीर्णोद्धार कार्य किया जा रहा है, इन निर्माण कार्यों से पुरातत्व के निदेशक ने कमेटी द्वारा जीर्णोद्धार की सहमति मांगे जाने पर
की हानि नहीं हुई है। प्राचीन शिखर यथास्थिति में है'।
उक्त हस्तलिखित टिप्पणी क्रमांक 3 पर संलग्न है। पत्र क्रमांक 882 दिनांक 24 जनवरी 2001 को लिखित पत्र में
इस सन्दर्भ में विरोध के स्वर को पुरातत्व की रिपोर्ट स्पष्ट सहमति जीर्णोद्धार की दी।
देखना चाहिये रिपोर्ट में मंदिर के जीर्णोद्धार की प्रशंसा की गई है। सहमति पत्र क्रमांक 882/24.1.20011 पर संलग्न है कमेटी ने अपने समयानुकूल जब कार्य प्रारम्भ किया तो
ऐसे कुछ बिन्दु है जिससे समाज सत्य क्या है ? असत्य क्या है ? कुछ प्रबुद्ध लोगों ने पत्र - पत्रिकाओं में पुरातत्व का विनाश हो
परख सकती है और दुर्विचार फैलाने वाले विरोध स्वर की असत्यता रहा है ऐसा बताकर कार्य को रूकवाना चाहा। यह जो मंदिर
समझ सकती है। सांगानेर वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध है जिसमें विराजमान श्री
१. पुरातत्व विभाग की जांच रिपोर्ट जो की जिलाधीश आदिनाथ भगवान् की प्रतिमा चतुर्थकालीन सातिशय चमत्कारी
महोदय को भेजी गई थी जिसमें स्पष्ट लिखा हुआ है कि यह मंदिर है, आज तक कई राजाओं ने इसके विध्वंश की सोची पर वे अपने
| पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक नहीं है। शस्त्र डालकर बाबा से क्षमायाचना कर मंदिर का संरक्षण किया
अतः यह मंदिर दिगम्बर जैन समाज का निजी मंदिर है इसके और संवर्द्धन भी किया। जब आज पुनः जीर्णोद्धार की बात चली
विकास कार्यों में सरकार दखल करे यह विधि सम्मत नहीं है।
उक्त जांच रिपोर्ट क्रमांक 4 पर संलग्न है। तो उसका विरोध क्यों ? क्या वास्तव में जीर्णोद्धार करना पुरातत्व
2. विरोध किस बात का, जीर्णोद्धार का या पुरातत्व का। से छेड़छाड़ करना है? इसका उत्तर आगे दिया जायेगा अभी तो
विरोध करने वालों को सोचना चाहिये कि उनकी इस नासमझाी मंदिर की भव्यता और अतिशयता की बात चल रही है। यहाँ की
से समाज बदनाम हुई है। प्रतिमाओं के दर्शन करने मात्र से ही आत्म सन्तुष्टि मिलती है, |
3. पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के दखल की यहाँ जरा चतुर्थकालीन प्रतिमाओं का दर्शन करने से ही हमारे अनेक संताप
| भी गुंजाईश नहीं है फिर भी पुरातत्व विभाग के तकनीकी मिट रहे हैं और लगता है कि आज साक्षात जिनेन्द्रदेव के दर्शन
अधिकारियों ने यहाँ के जीर्णोद्धार कार्य का अवलोकन कर अपने किये हैं। इस सातिशय मंदिर के दर्शन चारित्र चक्रवर्ती आचार्य
पत्र क्रमांक पु.सं. / तक / 2000/1235 दिनांक 31.1.2001 के शान्तिसागर जी महाराज, आचार्य देशभूषणजी महाराज, आचार्य
द्वारा जीर्णोद्धार कार्य को उचित ठहराया। वीरसागरजी महाराज, आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज आदि
उक्त जांच रिपोर्ट क्रमांक 5 पर संलग्न है। अनेक संतों ने, विद्वानों ने, वैज्ञानिकों ने किये और गुण गाये हैं। 4. जीर्णोद्धार की आवश्यकता क्यों हुई - चूंकि मंदिर
श्री मिलापचन्दजी जैन 'लोकायुक्त' राजस्थान सरकार | काफी प्राचीन है, जिसकी घुमटियाँ चूने आदि से बनी हुई हैं। आपने भी सांगानेर संघीजी मंदिर के दर्शन कर कहा कि 'मूलनायक | बरसात के दिनों में इन जीर्णशीर्ण घुमटियों से रिस-रिस कर पानी भगवान् आदिनाथ की प्रतिमा के दर्शन कर मुझे बड़ी शांति मिली, | प्रतिमाओं के ऊपर गिरने लगा और दिवारों पर सीलन आ गई. मंदिर की प्राचीनता भी हृदय को प्रभावित करने वाली है। मंदिर में | आदि अनेक कारणों से मंदिर के जीर्णोद्धार की अतिआवश्यकता
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की।
अब स्थिति सामान्य है, समाज ने भी पहचान कर ली कि सत्य 5. यहाँ जो निर्माण कार्य हुआ है वह प्राचीन शैली का | क्या है ? असत्य क्या है? अनुसरण करके हुआ है जिससे मंदिर की भव्यता में चार चांद लगे हैं, इससे दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ी है।
श्री निर्मल कासलीवाल, 6. विरोध स्वर जरा सोचे यदि किसी ऐसे स्मारक जो मानद मंत्री, प्रबन्ध कारिणी कमेटी, अति प्राचीन है, उनका जीर्णोद्धार न किया जाये तो उसका अस्तित्व श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र मंदिर संघीजी, सांगानेर कब तक? जीर्णोद्धार से संस्कृति और सभ्यता की रक्षा हुई है, जैन मंदिर रोड, सांगानेर (जयपुर) वरना समय के बहाव में यह मंदिर भी गुम हो जाता।
विषय - श्री दिगम्बर जैन मंदिर संघीजी, सांगानेर शिखर 7. पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने भी यहाँ के कार्यों | जीर्णोद्धार/मरम्मत की अनुमति । का अवलोकन किया तो उन्होंने मुक्त कंठ से जीर्णोद्धार की प्रशंसा प्रसंग -आपका पत्रांक जे.एस.एस. /2427 दिनांक
1.1.2001 8. फिर किन कारणों से विरोध स्वर 'जीर्णोद्धार को विरासत महोदय, से छेड़छाड़' कह रहा है? ईर्ष्यावश क्या ?
उपरोक्त प्रसंगोक्त पत्र के सन्दर्भ में श्री दिगम्बर जन संघीजी 9. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में जो लेख आये वह अपूर्ण | मंदिर में जीर्णोद्धार / संरक्षण /मरम्मत कार्य पुरातत्व शैली /मूल जानकारी और राजनीति पहुंच, प्रभाव के कारण अनर्गल आये स्वरूप को बनाये रखते हुए कराये जाने में विभाग को कोई जिससे समाज भ्रमित हुई है, बदनाम हुई है।
आपत्ति नहीं है। 10. जब विरोध का स्वर मुखरित हुआ निसंदेह जीर्णोद्धार आवश्यकतानुसार आप मण्डलीय अधीक्षक, पुरातत्व एवं में रूकावट आई। लेकिन प्रशासन, पुरातत्व, जांचदल आदि ने | संग्रहालय विभाग, जयपुर वृत, जयपुर से राय प्राप्त कर सकते हैं। जीर्णोद्धार को कतई गलत नहीं ठहराया। कार्यालय निदेशक पुरातत्व
भवदीय एवं संग्रहालय विभाग के पत्र क्रमांक 6228 दिनांक 26.4.2003
हस्ताक्षर के द्वारा जीर्णोद्धार की लिखित सहमति दी।
निदेशक उक्त पत्र क्रमांक 6 पर संलग्न है। 11. किसी ने सच ही कहा है कि क्रान्ति के बिना परिवर्तन सांगानेर संघीजी के मंदिर के दर्शनों का मुझे आज सौभाग्य नहीं, अत: विरोध स्वर से जीर्णोद्धार को बल ही मिला है। प्राप्त हुआ। मूलनायक भगवान् आदिनाथ की प्रतिमा के दर्शन
यह विरोधी स्वर एक अपराधिक किस्म के एवं अजैन | करके मुझे बड़ी शांति मिली। मंदिर की प्राचीनता भी हृदय को व्यक्ति गुलाबचन्द शर्मा से, जो कि पुलिस उपनिरीक्षक पद से | प्रभावित करने वाली है। मंदिर में काफी काम हुआ है, मुझे यह डिसमिस और अपनी अपराधिक प्रवृत्तियों के लिये मशहूर है, | नहीं ज्ञात होता कि प्राचीनता का कोई विनाश या विध्वंस हुआ है। ऐसे व्यक्ति से सहयोग लेकर तथा गैर पंजीकृत संस्था शिवा जन | यहाँ पर दर्शनार्थियों की संख्या निरन्तर बढ़ती रही है। व्यवस्था समस्या निवारण समिति के माध्यम से न्यायालय में जीर्णोद्धार के | भी अच्छी है । दर्शनों का लाभ पाकर जीवन में सभी को सुख व विरोध में जनहित याचिका लगाकर विघ्न डालने का कुप्रयास शांति मिलती है। जीवन सफल होता है। किया है। जो कि इस अल्पसंख्यक जैन समाज के लिये बहुत ही
हस्ताक्षर
लोकायुक्त राजस्थान गम्भीर और सोचनीय विषय है कि इसके आगामी परिणाम कितने भयानक हो सकते हैं।
आज दिनांक 4.6.2003 को श्री दिगम्बर जैन अतिशय हमारा विरोध स्वर करने वालों से कोई द्वेष नहीं है।।
क्षेत्र मंदिर संघीजी सांगानेर में विराजित प्रतिमा के दर्शन कर उनकी महत्वकांक्षा की आपूर्ति न होने पर ये स्वर उद्घोषित हुआ |
आत्म शांति मिली । भगवान् आदिनाथ के दर्शन कर अभिभृत हुई इससे समाज को असहनीय हानि उठानी पड़ी, समाज भ्रमित हुई।
| हूँ। और इस अवसर पर दर्शन कर यही कामना करती हूँ कि विश्व
26 अगस्त 2003 जिनभाषित
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में शांति हो। यहाँ पर हुए जीर्णोद्धार के कार्य को भी देखा जो कि पुरातत्व को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। इन निर्माण कार्यों से पुरातत्व की हानि नहीं हुई है। प्राचीन शिखर यथा स्थिति में है, पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को भी देखा उस रिपोर्ट में भी मंदिर के जीर्णोद्धार की प्रशंसा की गई है। हम भी इस जीर्णोद्धार की प्रशंसा करते हैं पुरातत्व संरक्षण के लिये जो कार्य मंदिर समिति के द्वारा करवाये जा रहे हैं इसका वास्तव में जीवन्त स्वरूप देखना हो तो सांगानेर दिगम्बर जैन मंदिर संघीजी में देखा जा सकता है ।
यहाँ मुख्य मूर्ति आदिनाथ भगवान् की पुरा महत्त्व की है। और लगभग 4000 वर्ष से भी पूर्व की बताई गई है ऐसा मुझे भी प्रतीत होता है।
प्रबन्धकारिणी के पदाधिकारियों को मौके पर बतला दिया गया है कि देवालय के जीर्णोद्धार में देवालय के मूल स्वरूप में किसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया जावे तथा जो कार्य मंदिर के मूल भाग से संबंधित हो उसके बारे में पुरातत्व विभाग से राय प्राप्त की जावे, जिसके बारे में प्रबंधकारिणी के सदस्य सहमत हैं।
हस्ताक्षर श्रीमती भावना चिखलीया केन्द्रीय राज्यमंत्री संस्कृति एवम् पर्यटन तथा संसदीय कार्य भारत सरकार, नई दिल्ली
कृपया वस्तुस्थिति अवलोकनार्थ एवं अग्रिम कार्यवाही हेतु प्रस्तुत है।
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श्री निर्मल कासलीवाल,
मानद मंत्री, प्रबन्धकारिणी कमेटी,
श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र मंदिर संभीजी, सांगानेर विषय श्री दिगम्बर जैन मंदिर संघीजी, सांगानेर के शिखर व अन्य जीर्णोद्धार मरम्मत की अनुमति ।
महोदय,
उपरोक्त विषय में अधीक्षक, पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, जयपुर व्रत जयपुर के सुझावानुसार आप निर्माण कार्य करा सकते हैं।
हस्ताक्षर निदेशक
भवदीय हस्ताक्षर निदेशक
मंत्री,
श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र मंदिर संघीजी, सांगानेर। विषय : श्री दिगम्बर जैन मंदिर संपीजी, सांगानेर के संरक्षण कार्य बावत्।
प्रसंग : आपका पत्र क्रमांक 9136 दिनांक 21.06.2003 महोदय,
उपर्युक्त विषयान्तर्गत आपके प्रसंगोक्त पत्र के साथ प्रस्तुत परियोजना के पेज संख्या 19 से 22 पर प्रस्तावित संरक्षण कार्यों की सहमति इस कार्यालय के पूर्व पत्र क्रमांक 882 दिनांक 24.01.2001 तथा 1235 दिनांक 31.01.2001 के क्रम में, निम्नांकित शर्तों पर दी जाती है
1. स्मारक का संरक्षण कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व वर्तमान स्थिति के फोटोग्राफ्स उपलब्ध कराने होंगे, उसके पश्चात् ही व्यवहारिक रूप में संरक्षण कार्य प्रारम्भ कराया जायेगा ।
2. स्मारक के संरक्षण कार्य में लाई जाने वाली सामग्री स्मारक में मूल प्रयुक्त निर्माण सामग्री के अनुरूप ही काम में ली जावेगी।
3. स्मारक के मूल स्वरूप के स्थापत्य के अनुरूप संरक्षण कार्य कराना होगा।
4. उक्त कार्य विभाग की तकनीकी समिति के अधिकारियों की देखरेख में / निर्देशानुसार कराना होगा और कार्यों की गुणवत्ता संतोषप्रद नहीं होने या निर्माण सामग्री सही नहीं होने पर विभागीय प्रतिनिधि द्वारा कभी भी कार्य रूकवाया जा सकेगा।
5. कराये जाने वाले संरक्षण कार्यों का समस्त व्यय प्रन्यास को वहन करना होगा।
उपर्युक्त सहमति माननीय मंत्री, कला, संस्कृति एवं पुरातत्त्व की अनुमति आई.डी. संख्या 219/एम./ए. एण्ड सी./ 03 दिनांक 26.06.2003 के अनुसरण में जारी की जाती है।
हस्ताक्षर निदेशक
राजस्थान सरकार
पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, जयपुर
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निदेशक,
गुमटियों से ऊंचाई में अधिक है। सारे मंदिर में जहाँ-जहाँ भी नया पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग,
निर्माण कराया हुआ है उसमें लाल पत्थर का है उसको पके रंग से राजस्थान, जयपुर।
पोता हुआ है। विषय : श्री दिगम्बर जैन मंदिर संघीजी सांगानेर शिखर उक्त स्थिति विभाग से राय लेने से पहले की है। अब आगे व अन्य के जीर्णोद्धार / मरम्मत की अनुमति।
कराये जाने वाले कार्यों में मंदिर ट्रस्ट से कार्य कराने के सुझाव महोदय,
निम्न प्रकार हैं, जिनका मौके पर विचार-विमर्श किया गयाश्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र मंदिर श्री संघीजी सांगानेर 1. ट्रस्ट द्वारा चौक में पत्थरों को (कोटास्टोन) हटाकर विभागीय राय से पूर्व निर्माण की स्थिति इस प्रकार है :- नया आंगन कराने की इच्छा जाहिर की है। अतः उन्हें अडंगा
मंदिर पर प्रवेशद्वार के जगती भाग पर से ऊपर तक आदिनाथ | मार्बल के पत्थर पूर्व परम्परानुसार कम से कम तीन इंच (चार के जीवन चित्रण लाल पत्थर में उत्कीर्ण नया कराया जाकर प्लेटे | अंगुल) मोटाई में विभिन्न साईजों में पुराने तरीके से लगवाने के मय लेख पट्टिकाएँ (देवनागरी लिपि) में सीमेंट से चिपकाकर लिए सुझाव दिया गया है। जिस पर उन्होंने सहमति प्रकट की है। निर्माण किया गया है। यह कार्य प्रवेशद्वार के बाई तरफ करवा | इस कार्य से मंदिर के पुराने कार्य के स्वरूप से मेल बना रहेगा। रखा है दूसरी तरफ की दीवार को भी इस कार्य के लिए तैयार 2. सभी पत्थर जो लाल हैं उनका लाल रंग व सफेदी किया जा रहा है। मंदिर के प्रवेशद्वार पर अडंगा पत्थर (| हटाया जाकर मूल स्वरूप बनाया जाये । मूल स्वरूप हेतु सहमति मार्बल) से उत्कीर्ण चौखट द्वारा बना हुआ है जो पुराना यथावत | प्रकट की गई। है। अन्दर चौक में प्रवेश करने पर बाईं तरफ सीढ़ियाँ लाल पत्थर 3. मंदिर के अन्दर के मार्ग में काले पत्थर वाले भागों पर के कटहरे की कटिंग के साथ नई बनाकर ऊपर जाने का रास्ता | पूर्वानुसार आराइशी कार्य कराया जाना पूर्वानुसार की सहमति बनाया गया है।
प्रकट की गई है। इससे मूलस्वरूप यथावत रहेगा। देवकुलिकाओं ___दाहिनी तरफ एक ग्रेनाइट लगाकर ग्लास फिट करके | में बनी चिप्स सफेदी सीमेन्ट हटा दी जायेगी। काउन्टर बनाया गया है। चौक में जैन प्रतिमाएँ (चौबीसी) विभिन्न | 4. मुख्य परिसर का बड़ा किवाड़ व मंदिर के सभी किवाड़ ताकों में एल्यूमीनियम धातु के फ्रेमों में कांच के ग्लासयुक्त किवाड लकड़ी-पीतल के काम के (मुगली जोड़ियों) में बनवाया जाय लगाये हुए हैं। चौक में आंगन में कोटा स्टोन लगा हुआ है। मंदिर | तथा वर्तमान एल्यूमीनियम का ज्यादा बढ़ावा नहीं देंगे। चूंकि के मुख्य भाग चौक के बीच में मंदिर का मूल ढांचा है। पूर्वानुसार | एल्यूमीनियम धातु पूजा में वर्जित है। इस पर सहमति प्रकट की मौजूद है, जो अडंगा मार्बल से कलात्मक ढंग से बना हुआ है गई। लेकिन इसके चारों तरफ के बरामदे सलेटी पत्थर राजगढ़ (बाड़ा | मूल मंदिर के पुराने आठ शिखर हैं। उनके बीच-बीच में बड़कोल) खान का है जिसमें देव कुलिकाओं की ताकें बरामदे 2 गुमटी हटाकर नये 12 शिखर और पूर्व शिखरों के अनुरूप के खम्भे आदि समस्त भाग इस पत्थर का बना हुआ है। बरामदे बनायेंगे जिसका एक नमूना (श्री हरफूलसिंह व श्री पंकज धीरेन्द्र में लाल पत्थर के नये तोरण बनाये गये हैं। पीछे के भाग में ताकों | की रिपोर्ट में वर्णित उचित है) का निर्माण कराया जायेगा। सहमति को बंद कर जैन प्रतिमाएँ विराजमान कर चिप्स आदि की हुई है। प्रकट की गई है। अत: कार्य मौके पर चालू रखने की व कार्य मंदिर की द्वितीय मंजिल छत पर लाल पत्थर से नये बरामदे | कराने के सुझाव प्रस्तुत हैं। बनाकर उनमें जैन प्रतिमाएँ संगमरमर की एल्यूमीनियम के ग्लास । उक्त कार्यों के सम्बन्ध में समय-समय पर आवश्यकतानुसार फिटेड दरवाजों के अंदर रखी गई है। आंगन में प्रथम चौक के | मंदिर ट्रस्ट को निम्नहस्ताक्षरकर्ता की राय उपलब्ध कराने का कह बरामदे निर्माण में अडंगा मार्बल की फर्श बनाई गई है। मूल मंदिर | दिया गया है। की छत पर चारों कोनों पर चार व चार अन्य शिखर बंद बने हुए सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रस्तुत है। हैं, जो काले पत्थर के बने हुए हैं। उनका अराइशी काम खराब हो
भवदीय गया है। इन शिखरों के बीच छोटी-छोटी चूने पत्थर की शिखर
हस्ताक्षर नमूने बाद में बने हुए हैं। इनमें से एक गुमटी बाईं तरफ पुराने
अधीक्षक, शिखरों से मेल खाती हुई नमूने बतौर बनाई हुई है। जो चूने वाली
पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग,
जयपुर वृत्त, जयपुर
28 अगस्त 2003 जिनभाषित
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समाचार
जब
। पहुँच कर मैं अपना सौभाग्य मनाता हूँ। उनकी भौतिक-देह से
अनेक मार्गदर्शन मिल रहे हैं, आत्मतत्व के उजास से तो सीधी, प.पू. आचार्य शिरोमणि विद्यासागर महाराज का | मोक्ष मार्ग की, दिशा मिल सकेगी। उनके पूजनीय गुरु आचार्य 36 वाँ दीक्षा-दिवस
विद्यासागर जी का आज 36 वाँ दीक्षा-दिवस-समारोह के अवसर जंगल वाले बाबा के नाम से सम्पूर्ण देश में प्रख्यात पू. | पर मुझे भी आमंत्रित किया गया, अतः उपस्थित मुनिश्रेष्ठ श्री चिन्मयसागरजी महाराज ने बड़े फुहारे के समीप
भारतभूषण जैन विशाल धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए बतलाया कि सम्पूर्ण
अ.भा. शाकाहार क्रांति परिषद विश्व में भारत को धर्म प्रधान प्रमुख राष्ट्र माना जाता है, यहाँ बड़े--
293, सरल कॉलोनी, गढ़ाफाटक, जबलपुर बड़े संत और साहित्यकार हुए हैं। मुनिवर ने प्रातः स्मरणीय श्री
श्री अ.भा.दि. जैन विद्वत्परिषद् की कार्यकारिणी तुलसी दास जी की दो पंक्तियां सुनाते हुए कहा- 'सुख, दारा और लक्ष्मी पापी के भी होय। संत-समागम, हरिकथा तुलसी दुर्लभ
बैठक सम्पन्न दोय।' संत समागम इसलिये महत्वपूर्ण है कि संत सत्य को नहीं | बुरहानपुर। श्री अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत्परिषद् छोड़ता और सत्य के बिना कोई संत नहीं कहला सकता। आप | की कार्यकारिणी की बैठक श्री दि. जैन श्रमण संस्कृति संस्थान, सभी ने संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के दर्शन किये हैं, | सांगानेर (जयपुर), राजस्थान में दि. २५ को श्रीमान् डॉ. फूलचन्द परन्तु सत्य यह है कि आप उनके वास्तविक दर्शन नहीं कर पाये
| जैन प्रेमी (वाराणसी) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। बैठक में वित्त हैं, यदि किये होते तो आप भी उनकी तरह हो लिए होते। मैंने किये वर्ष २००३-०४ के लिये नये बजट का निर्धारण एवं विगत वर्ष के हैं. अत: मैं उनके पथ पर चल रहा हूँ, आपने किये होते तो आप
आय-व्यय का विवरण प्रस्तुत किया गया है। बैठक में अनेकान्त भी इस पथ पर दिख रहे होते।
मनीषी डॉ. रमेशचंद जैन, डॉ. शीतलचन्द जैन, डॉ. नेमिचन्द जैन, संसारी-आदमी मकान देखने की तरह संतों को देखने
डॉ. जयकुमार जैन, डॉ. विमला जैन, डॉ. सुपार्श्वकुमार जैन, डॉ. लगा है वह रंग, रूप, कद पर भर ध्यान देता है, संत के अंतर में
उर्मिला जैन, पं. अरूणकुमार जैन, डॉ. अशोक कुमार जैन, प्रेमचन्द समाये हुए सूर्य को देखने का प्रयास नहीं करता। आज राष्ट्र संत पृ. आचार्य श्री के इस दीक्षा-दिवस-समारोह पर आप सब जन
जैन, डॉ. विजयकुमार जैन, डॉ. सनतकुमार जैन, पं. कैलाशचंद संतों के अंतरंग के सूर्य का दर्शन करने का प्रयास करें और उनके
मलैया, श्रीमती इन्द्रा जैन आदि विद्वानों एवं विदुषियों ने भाग लेकर दर्शन को लेकर जीवन-यात्रा पर चलें।
समाज एवं धर्म विषयक सार्थक विचार-विमर्श में भाग लिया। मुनि चिन्मय सागर से पूर्व मुनि श्री पावन सागर जी महाराज
बैठक के उपरान्त विद्वत्परिषद् के विद्वानों ने श्री दि. जैन ने कहा कि पूज्य श्री को दीक्षा ग्रहण किये 35 वर्ष पूर्ण हो गये, वह | मंदिर संघीजी में विराजमान परम जिनधर्म प्रभावक, तीर्थोध्दारक. शब्द 'दीक्षा' उन्हें अध्यात्म की ओर ले गया। इस शब्द में पांच पुरातत्वीय विरासत के परम संरक्षक, मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी अक्षर और मात्राएँ गुम्फित हैं जो अनेक लोग नहीं जानते, ये पांचों महाराज, पू. क्षु. श्री गम्भीरसागर जी महाराज, पृ. क्षु. श्री धैर्यसागर पंच परमेष्ठी के द्योतक हैं। दीक्षा को धारण कर आत्मा में रमण जी महाराज के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर करना ही उसकी सार्थकता है। इसलिए 'दीक्षा' प्राप्त व्यक्ति ही | पर ब्र. संजय भैया एवं ब्र. जिनेश भैया भी उपस्थित थे। विद्वत्परिषद साधु कहलाता है। इसे क्रोध, माया, मान, लोभ आदि विकारी तत्वों
के विद्वानों के साथ एक साक्षात्कार में मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी का त्याग कर, तपश्चर्या धारण करनी होती है। बंदेलखण्ड का
महाराज ने कहा कि जिनधर्म, जिनागम एवं जिन चैत्यों के संरक्षण सौभाग्य है कि पू. आचार्य श्री ने अपने संघ को यहाँ ही विशाल
हेतु विद्वानों को समाज का मार्गदर्शन करना चाहिए। उन्होंने जैन रूप दिया था। दीक्षा के क्षण हर संत को जीवन भर, हर समय, याद
मंदिरों में बन्द होती जा रही शास्त्र स्वाध्याय/वचनिका की परम्परा रहते हैं फलतः वह अपनी चर्या बढ़ाता जाता है। समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित विद्वान--
पर चिन्ता व्यक्त की और कहा कि जो विद्वान जिस स्थान पर रहते लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री सुशील तिवारी ने अपने उद्बोधन में |
हैं, उन्हें वहाँ के मंदिरों में प्रतिदिन रात्रिकालीन शास्त्र स्वाध्याय की कहा कि गतवर्ष मंडला के जंगलों में संयम और तप की कहानी
परम्परा प्रारंभ करना चहिए। लिखने वाले महान् संत श्री चिन्मय सागर जी के विचार जानने जब
बैठक से पूर्व दिगम्बर जैन वानप्रस्थ आश्रम के उद्घाटन उनके पास भास्कर-सम्पादक के रूप में पहँचा, तो उनकी दैनिक- के अवसर पर मुनिश्री संघ के सान्निध्य में श्री अ.भा.दि. जैन चर्या से बहुत प्रभावित हुआ और उनके वात्सल्य में बंध गया। विद्वत्परिषद् के मुखपत्र विद्वद-विमर्श का विमोचन श्री मदनलाल यद्यपि बार-बार उनसे मिलना न हो सका किन्तु आज उनके समीप । जैन ने किया।
-अगस्त 2003 जिनभाषित
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(नागौर) की भावैशिष्य
डॉ. अशोक कुमार जैन पुरस्कृत
जैनधर्म सम्बन्धी कृतियाँ मँगवायें जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य वि.वि.), लाडनूं (नागौर) | प्राच्य विद्या अहिंसा शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित जैन धर्म राज, के जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म-दर्शन विभागाध्यक्ष तथा की मौलिक विशेषताएँ (मूल्य ६० रुपये) जलगालन विधि और अ.भा.दि. जैन शास्त्रि परिषद् के उपाध्यक्ष, प्रख्यात जैन दर्शन | उसका वैशिष्य (मूल्य १२ रुपये), श्रावक धर्म (मूल्य १२ रुपये) मनीषी, शास्त्रीय प्रवचनकार श्रीमान् डॉ. अशोक कुमार जैन एम.ए.,
पासणाहचरिउ एक समीक्षात्मक अध्ययन (मूल्य ५० रुपये) तथा जैनदर्शनाचार्य,(वरिष्ठ सम्पादक-पार्श्व ज्योति) को श्री स्याद्वाद
जैन पर्व (मूल्य ३० रुपये) आदि कृतियाँ ।
सम्पर्क सूत्र महाविद्यालय, वाराणसी की ओर से उनकी महत्त्वपूर्ण शोधकृति
डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन, 'आचार्य श्री ज्ञान सागर जी महाराज का दार्शनिक अवदान' पर
सचिव पार्श्वज्योति मंच, एल-६५. ५१०१/- रुपये के पुरस्कार से मुनि श्री सुधासागर जी महाराज, क्षु.
न्यू इन्दिरा नगर, ए, बुरहानपुर (म.प्र.) श्री गम्भीर सागर जी महाराज, क्षु. श्री धैर्यसागर जी महाराज, ब्र. संजय भैया, श्री अ.भा.दि. जैन विद्वत्परिषद् कार्यकारिणी समिति
पंचम आत्म-साधना शिक्षण शिविर के विद्वान- सदस्यों एवं महती धर्मसभा के मध्य पुरस्कृत किया
अत्यन्त हर्ष का विषय है कि दिनांक 30.11.2003 से गया।
14.12.2003 तक परमपूज्य आचार्य 108 श्री विद्यासागर जी
महाराज के आशीर्वाद से सिद्धक्षेत्र श्री सम्मेद शिखरजी के पादमूल डॉ. रमेशचन्द जैन की कृति का राज्यपाल द्वारा विमोचन | में स्थित, प्राकृतिक छटा से विभूषित, परम पूज्य क्षुल्लक 105 श्री
ललितपुर । (उ.प्र.) में परमपूज्य आचार्य श्री विराग सागर गणेश प्रसाद जी वर्णी की साधना स्थली उदासीन आश्रम, इसरी जी महाराज द्वारा प्रदत्त २१ दीक्षाओं के दीक्षामण्डप में राजस्थान बाजार में पं. श्री मूलचन्दजी लुहाड़िया, मदनगंज (किशनगढ़) के राज्यपाल महामहिम श्री निर्मल चन्द जैन ने अनेकान्त मनीषी बाल ब्र. पवन भैया, कमल भैया, ब्र. पंकजजी, ब्र. चक्रेशजी, ब्र. डॉ. रमेशचन्द जैन, (पूर्व अध्यक्ष श्री अ.भा.दि. जैन विद्वत्परिषद्)
रविन्द्रजी आदि के सान्निध्य में पंचम आत्म-साधना शिक्षण शिविर बिजनौर (उ.प्र.) की प्रकाशित कृति 'जैनधर्म की मौलिक विशेषताएँ'
का आयोजन होने जा रहा है। का विमोचन किया।
समस्त इच्छुक धर्मानुरागी भाई बहनों से अनुरोध है कि
15.11.2003 तक आश्रम में लिखित आवेदन भेजें ताकि आवास, विद्वत्संगोष्ठियाँ आयोजित करें
भोजन आदि की समुचित व्यवस्थाएं की जा सकें। दिगम्बर जैन संतों के चातुर्मास काल में जैनधर्म दर्शन एवं
निवेदक साहित्य के विविध पक्षों पर संगोष्ठियाँ एवं प्रवचन, विधान, शिक्षण
अधिष्ठाता - श्री ओमप्रकाश जैन (रेवाड़ीवाले)
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन शांति निकेतन उदासीन आश्रम शिविर आदि आयोजित करने हेतु श्री अ.भा.दि. जैन विद्वत्परिषद्
इसरी बाजार-(गिरिडीह) झारखंड-825107 के मंत्री डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन, के पते पर सम्पर्क करें ताकि 'विद्वत्परिषद्' के विद्वानों की सहभागिता सुनिश्चित की जा सके। जैन सन्त 108 श्री समाधि सागरजी महाराज द्वारा चातुर्मास का समय धर्मप्रभावना के लिए विशेष अवसर होता है, | अनिश्चित कालीन निर्जल मौन अनशन आंदोलन जिसका लाभ समाज को उठाना चाहिए।
अभी तक बेमुदत मौन निर्जल अनशन आंदोलन महाराज प्रतिष्ठाचार्य प्रकोष्ठ का गठन
जी ने पांच बार किए। पांचवी बार में काफी हद तक सफलता श्री अ.भा.दि. जैन विद्वत्परिषद् के शताधिक प्रतिष्ठाचार्य
मिली। महाराष्ट्र में सदा-सदा के लिए रामनवमी को कत्लखाने, विद्वान् विधि-विधान, पंचकल्याणक प्रतिष्ठा आदि आयोजनों में
मांस ब्रिकी बंद का अध्यादेश मुंबई शासन ने निकाला। महाराष्ट्र अत्यधिक सक्रिय, सार्थक भूमिका का निर्वाह करते आ रहे हैं।
(अपने अपने राज्य) तथा संपूर्ण भारत देश में पुनश्च गौवंश समाज के व्यापक सम्पर्क हेतु श्री अ.भा.दि. जैन विद्वत्परिषद्
हत्या, दारूबंदी आदि की पूर्ती हेतु मुनि श्री द्वारा मौन निर्जल प्रतिष्ठाचार्य प्रकोष्ठ का गठन किया जा रहा है, फिलहाल इसके अनशन 31 आगस्त 2003 गणेश चतुर्थी दोपहर से करने की संयोजक श्री पं. विनोदकुमार जैन, प्रतिष्ठाचार्य, रजबांस एवं | संभावना है। उसके समर्थनार्थ मुनिश्री ने आव्हान किया है कि सहसंयोजक पं. पवनकुमार 'दीवान' मुरैना बनाये गये हैं। प्रकोष्ठ 12/8/2003 रक्षा बंधन से सामूहिक मुंडन जन-जागृति तथा सरकार हेतु अपनी सेवाएं देने के इच्छुक विद्वान अपना नाम, योग्यता, | को जगाने हेतु करें। विशेष अभिरुचि का क्षेत्र, अनुभव आदि के विवरण सहित।
ब्र. चांदमल जैन आवेदन पत्र मंत्री कार्यालय में भिजवायें ।
भारतीय संस्कृती बचाओ मंच, जालना
महाराष्ट्र
30 अगस्त 2003 जिनभाषित
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विनम्र निवेदन
(नवनिर्माणाधीन) भी है, जिसे भव्य स्वरूप प्रदान करना है। हम देश विदेश के लोग जिस पर्यटन स्थल को पसंद करते है, | ग्वारीघाटवासी सकल दिगम्बर जैन समाज के अल्प संख्यक वह स्वर्ण भूमि है गोवा। गोवा एक ऐसा राज्य है, जहाँ सालभर
निवासी, जैन समाज, जबलपुर से श्री जिन मंदिर निर्माण को पूरा पर्यटकों का आना-जाना रहता है।
करने में सहयोग हेतु गुहार करते हैं । हिन्दू समाज के भव्य मंदिरों गोवा के इतिहास में जैन धर्म को बहुत बड़ा स्थान दिया
के बीच हमारा जिन मंदिर भी अपना भव्य स्वरूप लिए हमारे जैन गया है। कदंब राजा के कार्यकाल में जैन धर्म को स्वर्णकाल प्राप्त
समाज को गौरवान्वित करे, ऐसी हमारी अभिलाषा है। श्री पिसनहारी . हुआ था, लेकिन पोर्तुगीज के आक्रमण और अत्याचार की वजह
मढ़िया जी, नन्दीश्वर दीप जिनालय एवं दयोदय तीर्थ के पश्चात् से गोवा में जैन धर्म का ह्रास हो गया।
श्री जिन मंदिर दर्शन ग्वारीघाट, नर्मदा तट का नौका विहार एवं गोवा में दिगम्बर जैन समाज ने संघटित होकर नव निर्माण
स्वच्छ पर्यावरण से परिपूर्ण क्षेत्र का आनंद अवकाश के क्षणों में दिगम्बर जैन मंडल की स्थापना की है। इस मंडल का मुख्य
जैन समाज जबलपुर के लिए आकर्षण का केन्द्र होगा। हम उद्देश्य गोवा में ऐसा दिगम्बर जैन मंदिर बनाना है, जो सभी
ग्वारीघाट वासी जैन समाज के नागरिक गण "जबलपुर जैन सुविधाओं से परिपूर्ण हो। र्धमशाला, विश्रांतीगृह, समाज मंदिर,
समाज" जैन सामाजिक संस्थायें एवं प्रतिष्ठित दानवीर परिवारों त्यागी निवास आदि सुविधाएँ उपलब्ध हों।
के ट्रस्टों से विनम्र निवेदन करते हैं कि श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन गोवा आने वाले जैन धर्म के यात्रियों के लिए, जैन मंदिर |
नवनिर्माणाधीन जिनालय के निर्माण में तन, मन, धन से भाव तथा धर्मशाला की कमी महसूस होती है। इस कमी को दूर करने
सहित सहयोग, दान प्रदान कर नींव से शिखर तक की यात्रा के की हमारी कोशिश है। परन्तु इसके लिए आपकी सहायता की साक्षी बनें।
सपर्क सूत्र एवं निवेदक जरूरत है, मंदिर सभी दिगम्बर जैन समाज का होगा। गोवा में
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन रहनेवाले दिगम्बर जैन समाज की संख्या बहुत कम है। इसलिए
नवनिर्माणाधीन जिनालय समिति, यह जरूरी है कि इस धार्मिक और सामाजिक कार्य के लिये आप
ग्वारीघाट, जबलपुर अपना योगदान दें। आपकी जो भी स्वीकृति हो, या आप इस के बारे में
सूचना संपर्क करना चाहते हों, तो कृपया नीचे दिये हुए पते पर संपर्क
श्री दिगम्बर सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर की दान रसीद करें और स्वीकृति भेज सकते हैं।
बुक, रसीद नम्बर 1501 से 1550 तक की एक हैण्ड बेग के साथ
दमोह से कुण्डलपुर के बीच में गुम हो गई है, जिस किसी सजन नवनिर्माण दिगम्बर जैन मंडल, मडगांव, गोवा, ट्रस्ट द्वारा
को मिले, कृपया नजदीक के जैन मंदिर में जमा करने की कृपा श्री भारत रामचंद दोशी, घर नं. 233, मालभाट, मडगांव
करें। पिन -403602, अथवा रत्नाकर बैंक लिमिटेड, मडगांव शाखा,
सूचित किया जाता है कि रसीद नम्बर 1505 से 1550 बचत खाते क्र.1591 में जमा कर सकते हैं।
तक की कोरी रसीदें ट्रस्ट द्वारा केन्सिल कर दी गई हैं, उक्त रसीद
आपके धर्मप्रेमी श्री भारत रामचंद दोशी, फलटण (अध्यक्ष)
को वैध नहीं माना जावेगा। श्री विजय रामगौडा पाटील, सांगली (सचिव) । उपरोक्त रसीद नम्बर की बुक के द्वारा आपसे कोई दान - श्री महावीर काप्पा जगदेव, बेडकिहाल (खजिनदार) | प्राप्त करने आये तो उसे धोखा समझें, दान नहीं देवें।
रमेशचन्द्र काला, कोषाध्यक्ष श्री दिगम्बर जैन समाज से एक निवेदन
श्री दिगम्बर जैन रेवातट सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र, नेमावर परम पूज्य 108 संत शिरोमणि जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से ग्वारीघाट जबलपुर में नर्मदा के
बाल संस्कार शिविर का आयोजन सुरम्य तट के समीप 50-60 वर्ष पूर्व के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर
श्री मक्सी पार्श्वनाथ - दिगम्बर जैन पार्श्वनाथ गुरुकुल में जैन मंदिर के नवनिर्माणाधीन जीर्णोद्धार जिनालय का निर्माण दिनांक 26.7.03 से दिनांक 2.8.03 तक श्री कुन्दकुन्द प्रवचन कार्य विगत डेढ़ वर्ष से चल रहा है। प्रवचन हॉल, वेदी हॉल प्रसारण संस्थान उज्जैन द्वारा 7 दिवसीय बाल संस्कार शिविर का निर्माण के पश्चात् श्री जिन मंदिर "गुम्बज शिखर" निर्माण की आयोजन किया गया। बाट जोह रहा है। इस निर्माण कार्य को जबलपुर के जैन समाज
दिनेश जैन
अधिष्ठाता को संकल्पित होकर पूर्ण करना है। आज जबलपुर में 38 जिनालय
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन गुरुकुल, मक्सी हैं, उनमें ग्वारीघाट का श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन जिनालय |
-अगस्त 2003 जिनभाषित
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वर्षायोग : चातुर्मास 2003
साहित्यमनीषी ज्ञानवारिधि दिगम्बर जैनाचार्य प्रवर श्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज के द्वारा दीक्षितशिक्षित जैन श्रमण परम्परा के आदर्श सन्तशिरोमणि जैनाचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज तथा उनके द्वारा दीक्षित शिष्यों का वीर निर्वाण संवत् 2529 विक्रम संवत् 2060, सन् 2003 का वर्षायोग चातुर्मास विवरण :
संतशिरोमणि आचार्य 108 श्री विद्यासागरजी महाराज, मुनिश्री समयसागरजी महाराज मुनिश्री योगसागरजी महाराज, मुनिश्री पवित्रसागरजी महाराज, मुनिश्री विनीतसागरजी महाराज, मुनिश्री निर्णयसागरजी महाराज, मुनिश्री प्रवचनसागरजी महाराज, मुनिश्री प्रसादसागरजी महाराज, मुनिश्री अभयसागरजी महाराज मुनिश्री अक्षयसागरजी महाराज, मुनिश्री प्रशस्तसागरजी महाराज, मुनिश्री पुराणसागरजी महाराज, मुनिश्री प्रयोगसागरजी महाराज मुनिश्री प्रबोधसागरजी महाराज, मुनिश्री प्रणम्यसागरजी महाराज, मुनिश्री प्रभातसागरजी महाराज, मुनिश्री चन्द्रसागरजी महाराज, मुनिश्री सम्भवसागरजी महाराज, मुनिश्री अभिनन्दनसागरजी महाराज मुनिश्री सुमतिसागरजी महाराज, मुनिश्री पद्मसागरजी महाराज, मुनिश्री चन्द्रप्रभसागरजी महाराज, मुनिश्री पुष्पदन्तसागरजी महाराज, मुनिश्री श्रेयांससागरजी महाराज, मुनिश्री पूज्यसागरजी महाराज मुनिश्री विमलसागरजी महाराज, मुनिश्री अनन्तगः रजी महाराज मुनिश्री धर्मसागरजी महाराज, मुनिश्री शान्तिसागरजी महाराज, मुनिश्री कुन्थुसागरजी महाराज, मुनिश्री अरहसागरजी महाराज, मुनिश्री महिसागरजी महाराज मुनिश्री सुव्रतसागरजी महाराज, मुनिश्री नमिसागरजी महाराज, मुनिश्री नेमीसागरजी महाराज,
,
कुल : 35 (1 आचार्य श्री 34 मुनिराज ) एवं 30 ब्रह्मचारीगण ।
आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के द्वारा दीक्षित प्रायः सभी साधुगण बाल ब्रह्मचारी हैं। जैन श्रमण परम्परा के ज्ञात इतिहास/जानकारी में यह प्रथम श्रमण संघ हो सकता है जिसमें वर्तमान दीक्षित 180 साधु एवं आर्यिकाएँ भी प्रायः बाल ब्रह्मचारिणी हैं 1 आचार्य श्री द्वारा ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण करने वाले देश के विभिन्न नगरों में लगभग 100 बाल ब्रह्मचारी भाई एवं 300 बाल ब्रह्मचारिणी बहनें भी चातुर्मास कर रही हैं। आचार्य श्री प्रतिदिन प्रातः काल 'कररावपाड़' पुस्तक द्वितीय संघस्थ साधुओं के लिए एवं अपराह्न काल 'रत्नकरण्डक श्रावकाचार' का स्वाध्याय श्रावकों को कराते हैं।
अगस्त 2003 जिनभाषित
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प्रत्येक रविवार एवं विशिष्ट पर्व के दिनों में आचार्य श्री जी का सार्वजनिक प्रवचन मध्याह्न में 3 बजे से होता है। कटनी बिलासपुर रेलखण्ड पर अमरकण्टक के लिए निकटवर्ती रेलवे स्टेशन पेण्ड्रारोड 45 कि.मी. है। बिलासपुर से 101 कि.मी., डिण्डोरी से 80 कि.मी., बुढार से 85 कि.मी. पर अमरकण्टक है। दक्षिण भारत से आने वालेयात्री नागपुर बिलासपुर पेण्ड्रारोड, उत्तरभारत/दिल्ली आदि की ओर से आने वाले यात्री बीना-कटनी पेण्ड्रारोड होकर अमरकण्टक पहुँच सकते हैं। भोपाल से अमरकण्टक एक्सप्रेस सायं 4 बजे छूटती है ।
अमरकण्टक नैसर्गिक सौंदर्य, प्राकृतिक मनोरम दृश्य हरीतिमा के साथ ही सुप्रसिद्ध नर्मदा, सोन एवं जुहिला नदियों की उद्गम स्थली तथा हिल स्टेशन भी है। चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन सर्वोदय तीर्थ, अमरकण्टक 484886 जिला शहडोल (मध्यप्रदेश ) 8:07629-269450, 269550 चेतन एस.टी.डी. 269612, 269619, 269620
सम्पर्क सूत्र (1) कार्यकारी अध्यक्ष प्रमोद जैन, अंकुर इंटरप्राइजेज, विनोबानगर, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 2: 07752-220076 (नि.) 220075 (का.) फेक्स 231422 (2) महामंत्री पी. सी. जैन 223688 (3) धर्मेश जैन, पेण्ड्रा 07751-254308 (4) वेदचन्द्र जैन पत्रकार पेण्ड्रारोड 250680 (5) डॉ. सुनील जैन डिण्डोरी - 07644-234149 (6) मनीष जैन बुढार 07652250110, 251120
मुनिश्री नियमसागरजी महाराज मुनिश्री अपूर्वसागरजी महाराज, मुनिश्री पुण्यसागरजी महाराज, मुनिश्री वृषभसागरजी महाराज, मुनिश्री सुपार्श्वसागरजी महाराज कुल : 5 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण ।
चातुर्मास स्थली : श्री नेमीनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, मु.पो. तेरदाल - 587315 तालुका- जमखंडी जिला बीजापुर (कर्नाटक)
संपर्कसूत्र : (1) बालगोंडा एम.पी. (2) चन्द्रकान्त जैन, सदलगा
: 08353-3355091 : 0831-651006
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10.
मुनिश्री क्षमासागरजी महाराज : मुनि श्री भव्यसागर जी महाराज, (दीक्षा गुरु-ऐलाचार्य श्री नेमीसागर जी महाराज) 8. कुल : 2 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण। चातुर्मास स्थली: श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर बाजार नं. 1, रेलवे स्टेशन के पास, रामगंज मण्डी, कोटा (राजस्थान) 3265193: कार्या. 07459-221769 संपर्क सूत्र - (1) अध्यक्ष राजमल लोहाडिया (2) केवलचंद लुहाडिया - 2:220171, 220571 (3) अजित जैन सेठी - 220022 मुनिश्री गुप्तिसागरजी महाराज : कुल : 1 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण। चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन धर्मशाला, गांधी रोड़, देहरादून - 248001 (उत्तरांचल) सपंर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष चन्द्रसेन जैन : 01352654506 (2) सुरेश चंद जैन 2625823 मो. 98370 88002
मुनिश्री सुधासागर जी महाराज : शुलक श्री गम्भीरसागरजी महाराज, क्षुल्लक श्री धैर्यसागरजी महाराज। कुल : 3 (1 मुनिराज, 2 क्षुल्लक, ब्रह्मचारीगण) चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन चन्द्रप्रभु चैत्यालय केकड़ी- 305404 जिला अजमेर (राजस्थान) संपर्क सूत्र : (1) श्रीपाल कटारिया, सरावगी मोहल्ला | 11. केकड़ी : 01467-220114, 220414(2) शीतल कुमार कटारिया, गणेश प्याऊ के पास, केकड़ी: 220060 मुनिश्री समतासागरजी महाराज : मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज, ऐलकश्री निश्चयसागरजी महाराज। कुल : 3 (2 मुनिराज, 1 ऐलक, ब्रह्मचारीगण) चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र बहोरीबंद 483330 जिला कटनी (मध्यप्रदेश) : 07624261736
12. संपर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष सिंघई केवलचंद जी, सिंघई पेपर मार्ट कमानिया गेट जबलपुर :0761-2345931 (2) मंत्री - नरेन्द्र जैन, बाकल 07624-261010 (3) महावीर जैन, सिहोरा-07624-230460 (4) सेनकुमार खितौला स्टेशन 07624-231141 (5) कमल कृषि विकास, कटनी 07622-231023 मुनिश्री स्वभावसागरजी महाराज : कुल : 1मुनिराज, ब्रह्मचारीगण। चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन मंदिर कुरवाई - 464224 जिला विदिशा (म.प्र.)।
| 13. सम्पर्क सूत्र (1) चांदमल जैन 3:07593-247256 (2) डॉ. चांदमल जैन कठरया (3) शिवकुमार गुडा247252 (4) संतोष कुमार गुडा - 244252 (5) |
244250 मुनिश्री समाधिसागरजी महाराज : कुल : 1 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण। चातुर्मास स्थली : श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर 308, जवाहर नगर, रोड नं. 16, गोरेगाँव पश्चिम, मुम्बई-400 062 (महाराष्ट्र) : 022-28730249 सम्पर्क सूत्र : (1) अशोक भाई एस. शाह फोन : 022-28727192 (2) मयंक जैन मो. 9820382158 मुनिश्री सरलसागरजी महाराज : कुल : 1 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण। चातुर्मास स्थली: श्री नाभिनंदन दिगम्बर जैन मंदिर बड़ी बजरिया, बीना-470113 जिला सागर (म.प्र.) संपर्क सूत्र :(1)अध्यक्ष-अभय सिंघई : 222459, 222759 (2) मंत्री- विभव कोठिया- 220333 (3) इंजी. सुभाष जैन - 221038, 220056 मुनिश्री आर्जवसागरजी महाराज : कुल : 1 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण। चातुर्मास स्थली: श्री दिगम्बर जैन पार्श्वनाथ मंदिर, कपड़ा बाजार, कोपरगाँव-423601 जिला अहमदनगर (महाराष्ट्र) सम्पर्क सूत्र : (1) प्रदीप गंगवाल : 02423-225505 (2) नितिन कासलीवाल - 223303 मुनिश्री उत्तमसागरजी महाराज : मुनिश्री पायसागरजी महाराज, मुनिश्री सुपार्श्वसागरजी महाराज कुल : 3 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण। चातुर्मास स्थली - श्री नेमीनाथ दिगम्बर जैन मंदिर मु.पो.- अब्दुल ललाट - 416 103 तालुका शिरोल जिला कोल्हापुर (महाराष्ट्र) सम्पर्क सूत्र : (1) कल्लप्पा गिरमल : 02322254360 (2) चन्द्रकान्त जैन, सदलगा-0831-651006 मुनिश्री चिन्मयसागरजी महाराज : मुनिश्री पावनसागरजी महाराज। कुल : 2 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण। चातुर्मास स्थली : पंचायती दिगम्बर जैन मंदिर शहपुरा भिटौनी - 483119 जिला जबलपुर (म.प्र.) संपर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष - कैलाश चंद गुमास्ता फोन 3:07621-230207, 230607 (2) मंत्री- राजेन्द्र कुमार जैन, संतोष कुमार जैन-230326 (3) सतेन्द्र जैन - 230264 (4) नरेन्द्र जैन- 230307 (नि.), 230543 (दु.) (5) सुशील जैन लम्हेटा- 230307 मुनिश्री सुखसागरजी महाराज : कुल : 1 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण। चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन मंदिर चिपरी - 416103 तालुका - शिरोल जिला कोल्हापुर (महाराष्ट्र)
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14.
15.
16.
17.
संपर्क सूत्र (1) अरविंद मजलेकर
: 02322255007 (2) 224503 (3) चन्द्रकान्त जैन सदलगा 0831-651006
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मुनिश्री मार्दवसागरजी महाराज: कुल : 1 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण ।
:
चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन शहर मंदिर, यस स्टेण्ड के पास, देवरी कलाँ - 464774 जिला सागर (म.प्र.) सम्पर्क सूत्र : पूरनचंद बजाज- : 07586-250457 (2) राजकुमार बजाज 220136 (3) प्रकाशचंद गंजवाले 250320 (4) सुरेश पाण्डे - 250445 मुनिश्री प्रशान्तसागरजी महाराज :
मुनिश्री
निर्वेगसागरजी महाराज ।
कुल : 2 मुनिराज, ब्रह्मचारीगण ।
चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन प्राचीन मंदिर खुरई 417117 जिला सागर (मध्यप्रदेश)
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संपर्क सूत्र (1) अध्यक्ष जिनेन्द्र कुमार गुरहा, गुरहा भवन, खुरई : 07581-240480 241958 (नि.) 240306, 240457 दुकान (2) हेमचन्द्र बजाज 232045, 32135 (3) सुनील जैन साइकिल वाले - 240912 (नि.) 240580 (दुकान)
मुनिश्री प्रबुद्धसागरजी महाराज : कुल 1 मुनिराज ब्रह्मचारीगण ।
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चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन अहिंसा भवन, मेन रोड बुढार 484 110 जिला शहडोल (मध्यप्रदेश) संपर्क सूत्र : अध्यक्ष राजेन्द्र बैसाखिया : 07652260190 (2) उपाध्यक्ष- स. सिं. विमल जैन - 260108 (3) मंत्री - धन्यकुमार बड़कुल (4) आशीष जैन 260773 मुनिश्री अजितसागरजी महाराज : ऐलक श्री निर्भयसागरजी महाराज ।
कुल 1 मुनिराज 1 ऐलक, ब्रह्मचारीगण ।
चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन धर्मशाला, शारदा विद्यापीठ के बाजू में, संजय चौक, पथरिया 470666 जिला दमोह (मध्यप्रदेश)
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संपर्क सूत्र (1) अध्यक्ष पदमचंद फट्टा- 2: 242262 (2) नरेन्द्र जैन करबना वाले 242279 (3) ऋषभ सिंघई -0760-242375 (4) ताराचंद जैन 242286 18. क आर्यिका श्री गुरुमतिजी आर्यिका श्री उज्जवलमतिजी.
आर्यिका श्री चिन्तनमतिजी, आर्थिकाश्री सूत्रमतिजी आर्यिका श्री शीतलमतिजी, आर्यिका श्री सारमतिजी, आर्यिका श्री साकारमतिजी, आर्थिकाश्री सौम्यमतिजी आर्यिका श्री सूक्ष्ममतिजी, आर्यिका श्री शांतिमतिजी, आर्यिका श्री सुशान्तमतिजी ।
अगस्त 2003 जिनभाषित
:
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(ख) आर्यिका श्री दृढ़मतिजी आर्यिका श्री पावनमति जी, आर्यिका श्री साधनामतिजी, आर्यिका श्री विलक्षणामतिजी, आर्यिका श्री वैराग्यमतिजी, आर्यिका श्री अकलंकमतिजी, आर्यिका श्री निकलंकमति जी, आर्यिका श्री आगममतिजी. आर्यिका श्री स्वाध्यायमतिजी, आर्यिका श्री प्रशममतिजी, आर्यिका श्री मुदितमति जी, आर्यिका श्री सहजमतिजी, आर्यिका श्री संयममतिजी आर्यिका श्री सत्यार्थमतिजी, आर्यिका श्री समुन्नतमतिजी, आर्यिका श्री शास्त्रमतिजी, आर्यिका श्री सिद्धमतिजी ।
,
(ग) आर्यिका श्री ऋजुमति जी : आर्यिका श्री सरलमतिजी. आर्यिका श्री शीलमतिजी ।
19.
:
(घ) आर्यिका श्री तपोमतिजी आर्यिका श्री सिद्धान्तमतिजी आर्यिका श्री नम्रमतिजी, आर्यिका श्री पुराणमतिजी, आर्यिका श्री उचितमतिजी ।
(ङ) आर्यिका श्री अनन्तमतिजी आर्यिका श्री विमलमतिजो आर्यिका श्री निर्मलमतिजी, आर्यिका श्री शुक्लमतिजी, आर्यिका श्री अतुलमतिजी, आर्यिका श्री निर्वेगमतिजी. आर्यिका श्री सविनयमतिजी, आर्यिका श्री समयमतजी आर्यिका श्री शोधमतिजी, आर्यिका श्री शाश्वतमतिजी, आर्यिका श्री सुशीलमतिजी, आर्यिका श्री सिद्धमतिजी आर्थिका श्री सुधारमतिजी ।
(च) आर्यिका श्री उपशान्तमतिजी आर्यिका श्री ऊँकारमतिजी । (छ) आर्यिका श्री अकम्पमतिजी आर्यिका श्री अमूल्यमतजी, आर्यिका श्री आराध्यमतिजी, आर्यिका श्री अचिन्त्यमतिजी, आर्यिका अलोल्यमति जी आर्यिका श्री अनमोलमतिजी, आर्यिका श्री आजामति जी. आर्यिका श्री अचलमतिजी आर्यिका श्री अवगतमतिजी ।
"
कुल 60 आर्यिकाएँ 55 बाल ब्रह्मचारिणी बहनें। चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन चंद्रप्रभ जिनालय, भण्डार वसदि, जैन मठ श्रवण बेलगोला हासन (कर्नाटक) :573135
सम्पर्क सूत्र : (1) जिनदत्तराय 08176-657235, (2) 657276, 557170, 657176, 657274, 657270
आर्यिका श्री मृदुमतिजी : आर्यिका श्री निर्णयमतिजी. आर्यिका श्री प्रसन्नमतिजी
:
:
:
:
कुल : 3 आर्यिकाएँ, ब्रह्मचारिणी बहनें ।
चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र क्षेत्रपाल जी सिविल लाइन्स, स्टेशन रोड, ललितपुर 284403 (3. .): 05176-276508
संपर्क सूत्र : (1) आनंदकुमार जैन सिमरावाले फोनः : 05176 272587, 275261, 275262 (2) अनिल जैन प्रेसवाले 273945 (3) अनुराग जैन अन्नू
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20.
273348 (4) मनोज कुमार घीवाले - 274885
आर्यिकाश्री अन्तरमति जी, आर्यिकाश्री अनुनयमतिजी, आर्यिकाश्री सत्यमतिजी : आर्यिका श्री सकलमति जी आर्यिकाश्री अनुग्रहमतिजी, आर्यिकाश्री अक्षयमतिजी, कुल : 2 आर्यिकाएँ , ब्रह्मचारिणी बहनें।
आर्यिकाश्री अमूर्तमतिजी, आर्यिकाश्री अखण्डमतिजी, चातुर्मास स्थली: श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र आर्यिकाश्री अनुपममतिजी, आर्यिकाश्री अनर्घमतिजी, आदीश्वरगिरि, नोहटा 477204 जिला दमोह (म.प्र.)
आर्यिकाश्री अतिशयमतिजी, आर्यिकाश्री अनुभवमतिजी, संपर्क सूत्र : (1) डॉ. संतोष गोयल,: 07606
आर्यिकाश्री आनन्दमतिजी, आर्यिकाश्री अधिगममतिजी, 257224, 257222 (2) भाटिया जी - 257261
आर्यिकाश्री अमन्दमतिजी, आर्यिका श्रीअभेदमतिजी, आर्यिकाश्री गुणमतिजी : आर्यिकाश्री कुशलमतिजी , आर्यिकाश्री उद्योतमतिजी। आर्यिकाश्री धारणामतिजी, आर्यिकाश्री उन्नतमतिजी
कुल 17 आर्यिकाएँ , ब्रह्मचारिणी बहनें, 80 प्रतिभा कुल : 4 आर्यिकाएँ , ब्रह्मचारिणी बहनें।
मण्डल की ब्रह्मचारिणी बहनें। चातुर्मास स्थली: श्री दिगम्बर जैन मंदिर शिवनगर चातुर्मास स्थली : श्री शान्तिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, कॉलोनी, दमोह नाका, जबलपुर - 462002, फोन : सदलगा - 591 239 जिला बेलगांव (कर्नाटक) : 2640064
0831-2651006 संपर्क सूत्र : (1) सुनील जैन मंगलाहार : 0761- संपर्क सूत्र : सुरेन्द्र ए. प्रधाने,:: 0831-651678(नि.) 2645697 (नि.), 265847 0(दु.),ब्र. मणिबेन, ब्राह्मी 651730 (का.) 651730 फेक्स (2) महावीर प्रसाद विद्या आश्रम, मढ़ियाजी, फोन: 5018312 (3) अमित अष्टगे 662244 (3) रवीन्द्र प्रधाने 651102, 651618 जैन पड़रिया - फोन 2341948, 2342661, मो 9425 (4) महावीर प्रसाद जैन माचिसवाले, नई दिल्ली: 151695
011-3973893, 39935682 मो. 9810053632 आर्यिकाश्री प्रशांतमतिजी : आर्यिकाश्री विनम्रमतिजी, | 25. आर्यिका श्री प्रभावनामति जी : आर्यिका श्री भावनामति आर्यिकाश्री विनयमतिजी, आर्यिकाश्री अनुगममतिजी, जी, आर्यिका श्री सदयमति जी। आर्यिकाश्री संवेगमतिजी, आर्यिकाश्री शैलमतिजी, कुल: 3 आर्यिकाएँ , ब्रह्मचारिणी बहनें। आर्यिकाश्री विशुद्धमतिजी।
चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन छोटा मंदिर, सिरोंज कुल : 7 आर्यिकाएँ , ब्रह्मचारिणी बहनें।
-464 228 जिला विदिशा (मध्यप्रेदश) चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन मंदिर बाजार मुहल्ला संपर्क सूत्र : शीलचन्द्र जैन बगरौदा वाले, किराना व्यापारी, पनागर - 483220 जिला जबलपुर (म.प्र.)
छोटा बाजार, .. फोन : 253068(दु), 253328 (नि.) संपर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष - सुरेन्द्र जैन कटंगहा : (2) जितेन्द्र कुमार जैन कोठावाले, कठाली बाजार : 0761-2350074, 2350086, 2350335 (2) मंत्री - 07591-252881 (नि.), 253293 (दु.) (3) भूपेन्द्र रवि बड़कुल - 2350055 (3) फत्ती जैन हलवाई - कुमार जैन, चाँदनी चौक, जवाहर बाजार फोन: 253050 2350086 (4) संतोष चौधरी - 2350022, 2350005 (नि.), 253850 (दु.) (4) रवीन्द्र जैन विजयराजआर्यिकाश्री पूर्णमतिजी : आर्यिकाश्री शुभ्रमतिजी, 252696(नि.), 253237(दु.) आर्यिकाश्री साधुमतिजी, आर्यिकाश्री विशदमतिजी, | 25. आर्यिकाश्री आलोकमतिजी: आर्यिकाश्री सुनयमतिजी आर्यिकाश्री विपुलमतिजी, आर्यिकाश्री मधुरमतिजी, कुल: 2 आर्यिकाएँ , बाल ब्रह्मचारिणी बहनें। आर्यिकाश्री कैवल्यमतिजी, आर्यिकाश्री सतर्कमतिजी
चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन मुख्य मंदिर बाजार कल : 8 आर्यिकाएँ , ब्रह्मचारिणी बहनें।
मुहल्ला, ढाना - 470228 जिला सागर (म.प्र.) चातुर्मास स्थली: श्री दिगम्बर जैन धर्मशाला, मेन मार्केट, सम्पर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष - डॉ. रमेश जैन फोन :: कोतवाली के पास, छत्तरपुर - 471001 (म.प्र.) : 07582-285258, 285238 (2) मुकेश जैन, पत्रकार - 07682-248824
मो. 94251 71196 संपर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष - शिखरचंद जैन-2: | 27. आर्यिकाश्री अपूर्वमतिजी : आर्यिकाश्री अनुत्तरमतिजी 07682-241314 (2) मंत्री - अशोक कुमार जैन (3) कुल : 2 आर्यिकाएँ , ब्रह्मचारिणी बहनें। देवराज जैन - 244741, 241741 (4) राजेश जैन,
चातुर्मास स्थली: श्री चन्द्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर बिलहारा 248715 (5) सुनील जैन- 245926 (6) प्रदीप जैन - राजा- 470051 जिला सागर (म.प्र.) 241703
संपर्क सूत्र : (1) प्रकाशचन्द्र नीलेश कुमार जैन, कपड़ा 24. आर्यिकाश्री आदर्शमतिजी : आर्यिका श्री दुर्लभमतिजी, व्यापारी : 07584-248344 (2) शीतलचंद्र बड़कुल
-अगस्त 2003 जिनभाषित 35 in Education International
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248329 (3) अध्यक्ष
आर्यिका श्री श्वेतमतिजी:
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कुल : 1 आर्यिका, ब्रह्मचारिणी बहनें ।
चातुर्मास स्थल : श्री दिगम्बर जैन ब्राहमी विद्या आश्रम, पिसनहारी की मढ़िया, जबलपुर 482003 (म.प्र.) सम्पर्क सूत्र : ब्र. मणिबेन : 0761-5018312 संतोष भाई जी (नि.) 2312509 (का.) 2311384
ऐलक श्री दयासागरजी महाराज:
कुल : 1 ऐलक, ब्रह्मचारीगण ।
चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन त्यागी भवन, मोठे जैन मंदिर के निकट, इतवारी, नागपुर
440002
ऋषभ बजाज
(महाराष्ट्र ) : 0712-2769237
संपर्क सूत्र (1) श्री कुमार जैन डॉनगांवकर (0712) 2770566 (2) राजेश जेजानी, 2765472 ऐलक श्री निःशंकरसागरजी महाराज: कुल : 1 ऐलक, ब्रह्मचारीगण ।
चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन मंदिर, छत्रपति नगर इन्दौर - 452011 (म. प्र. )
संपर्क सूत्र (1) अध्यक्ष डॉ. जिनेन्द्र जैन (2) चातुमांस समिति, देवेन्द्र जैन : 0731-2530792 (3)2410503 (4) संजय जैन मेक्स 2537522 f. 2539160
ऐलक श्री उदारसागरजी महाराज : कुल : 1 ऐलक, ब्रह्मचारीगण ।
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चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन खण्डेलवाल मंदिर, बसंत टॉकीज के पास, अकोला 444001 (महा.) संपर्क सूत्र : (1) सोहनलाल बिलाला (2) महावीर बिलाला 2437630 (3) संदीप जैन मो. 94221-64211
2437254
ऐलक श्री सिद्धान्तसागरजी महाराज : कुल 1 ऐलक, ब्रह्मचारीगण ।
चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन मंदिर, बडोदिया 327604 जिला बांसवाड़ा (राजस्थान)
संपर्क सूत्र (1) जयंतीलाल जैन : 02962261019 (2) कांतिलाल जैन 261047 ऐलक श्री सम्पूर्णसागरजी महाराज : कुल : 1 ऐलक, ब्रह्मचारीगण ।
चातुर्मास स्थली - श्री दिगम्बर जैन मंदिर, सराय मुहल्ला, सिविल रोड, रोहतक 124004 (हरियाणा)
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संपर्क सूत्र : (1) प्रधान विजय कुमार जैन : 012622242529 (नि) 2248098 (कार्या.) (2) मंत्री - बवली जैन (3) पिंकी जैन, उषा इलेक्ट्रिकल्स, सिविल रोड, रोहतक - 2243408 (हरियाणा) ऐलक श्री नम्रसागरजी महाराज : कुल : 1 ऐलक, ब्रह्मचारीगण ।
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चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन पार्श्वनाथ मंदिर, बड़ी बामौर - 473990 तह. खनियाधाना जिला शिवपुरी (म.प्र.)
संपर्क सूत्र : (1) अध्यक्ष सुदेश कुमार जैन : 07497254144 (2) विनोदकुमार जैन बिसनपुरा वाले फोन: 254169
क्षुल्लक श्री ध्यानसागरजी महाराज : कुल : 1 आर्यिका ब्रह्मचारीगण ।
चातुर्मास स्थली श्री दिगम्बर जैन बाहुबली व्यायाम शाला भगवान् महावीर अहिंसा ट्रस्ट सेक्टर- 25, निगड़ी, पूना 411044: 020-7656451 संपर्क सूत्र (1) शांतिनाथ एम. मदुन्नावद आर. एच. 95/3, शाहूनगर, चिंचवड, पूना 9 महाराष्ट्र : 0207493244 (2) एस. एन. पतजल 7655428 (3) अध्यक्ष अजित पाटिल
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7656451
क्षुल्लक श्री नवसागरजी महाराज कुल : 1 क्षुल्लक, ब्रह्मचारीगण ।
चातुर्मास स्थली : श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, गोतगंज, छिंदवाड़ा (म.प्र.) 480001
संपर्क सूत्र : (1) सुनील गोयल : 07162-242268 (2) अशोक बाकलीवाल 241726 (नि.) मो. 98270
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क्षुल्लक श्री पूर्णसागरजी महाराज : कुल : 1 क्षुल्लक, ब्रह्मचारीगण ।
चातुर्मास स्थली : श्री दिगम्बर जैन मंदिर लकलका तह.तेंदूखेड़ा जिला दमोह (मध्यप्रदेश )
संपर्क सूत्र (1) अध्यक्ष कडोरीलाल : 07603204247 (2) शीलचंद 204255 (3) सुमेरचंद सिंघई तेंदूखेड़ा 07603-263816 (नि.) 263723 (दुकान) वर्तमान में आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज से दीक्षित 58 मुनि महाराज, 109 आर्यिकाएँ 8 ऐलक महाराज तथा 5 क्षुल्लक महाराज जी। कुल 180
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जापान में प्रचलित येन मत और जैनधर्म
'दिनमान' के 1.10.77 के अंक में 'धर्म-दर्शन' खंड में प्रकाशित 'आत्मानुकूल पथ' नामक शीर्षक में बताया गया है कि जीन कारपेंतियरने अपने एक भाषण में येन मतको बौद्ध धर्मकी एक शाखा बताया है। परंतु यह कुछ बातों में बौद्ध धर्म से बिलकुल भिन्न है। |
येन मत पूर्णत: आत्मानुभूति पर आधारित है। इसमें गुरु के उपदेश तथा प्रवचन को कोई स्थान नहीं है। इसे सभी अपना सकते हैं। यह एक प्रकार का स्त्र- अनुशासन है। इस मत में सभी धर्मों के मिश्रण की अभूतपूर्व संभावनायें हैं। योग विज्ञान तथा अनुशासनका इतना सुन्दर समन्वय अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। यह मत इतना व्यापक है कि रूढ़िवादी अर्थों में बौद्ध धर्म की श्रेणी में नहीं आता। यह मुख्यतः ध्यान मुलक धर्म है। इसमें ध्यान के केन्द्रीयकरण को एक निश्चित बिन्दु तक पहुचाने की आवश्यकता है। यह मनोविज्ञान से जुड़ा हुआ है और रहस्यमय है । यह धर्म और समाज में सन्तुलन लाता है। यह मत उपनिषद् धर्म के अधिक समीप लगता है।
डॉ. कारपेंतियरने अनेक प्राचीन धर्म ग्रन्थों के आधार पर यह भी प्रमाणित किया है कि बौद्ध धर्म पर ही येनमतकी पपड़ी है।हरणार्थ, योग में चित निरोध, आत्मानुभूति समय और धार्मिक क्रियायें येनमत की हो विशेषतायें हैं, बौद्ध धमकी नहीं।
मुझे पन्द्रह वर्ष पूर्व येनमत के विषय में जानकारी प्राप्त हुई थी। मैंने अनेक विदेशमन्ताओं से इसके विषय में विशेष जानकारी चाही थी, पर उनका विश्वास था कि जापान में तो बौद्ध धर्म हो है, येन जैसा कोई पृथक धर्म नहीं है। अपने शोधकों के प्रसाद से मैं इस विषय पर विस्तृत विचार नहीं कर पाया। लेकिन डॉ. कारपंतियर के विवरण से इस विषय में जो तथ्य सामने आते हैं। वे मेरी दृष्टि से निम्न है:
येनमत जैनधर्म की शाखा सम्भावित है क्योंकि इसमें वर्णित स्वानुभूति ही सम्यग्दर्शन है और स्व अनुशासन ही निश्रय चारित्र है। इन दोनों का संबंध आत्माश्रयी है वाहासोती नहीं। इसमें अनेक धर्मों के मिश्रण की संभावनायें इसके अनेकान्तवादी दृष्टिकोण को व्यक्त करती हैं। इसका ध्यान जैनधर्म में मोक्ष या निर्वाण या आत्मानुभूतिका साधन बताया गया है। जैनधर्म भी आत्मा को शुद्ध, बुद्ध मानता है और
पं. जगन्मोहन लाल शास्त्री कटनी
निर्वाण को ईश्वर कृपा पर निर्भर नहीं मानता। येनके समान ही जैनधर्म भी दरबारी धर्म नहीं रहा । यह बौद्धधर्म से पूर्ववर्ती भगवान् पार्श्वनाथ के समय में भी प्रचलित था। इसमें वीतरागता और आत्मानुभूतिको उच्च स्थान प्राप्त है। जैनधर्म में समय पर भी बल दिया गया है।
इस प्रकार येन और जैनधर्म में न केवल नाम साम्य है. अपितु उसके सिद्धान्त भी समान हैं। क्या ऐसा माना जा सकता है कि सहस्रों वर्ष पूर्व जब बोद्ध चिन्तक एशियाई देशों में धर्म प्रचार हेतु गये थे, तब जैन चिन्तक भी गये हों ? उस समय जहाँ जैनधर्म का अधिक प्रभाव पड़ा हो, वे आज भी येन कहलाते हों ? यह विचार मात्र भावनात्मक नहीं हो सकता, इस विषय में शोधकों को विचार करना चाहिये ।
जैनधमांनुयायी वाणिज्यिक रहे हैं और आज भी उनका इसी ओर झुकाव है। इसलिये उनसे इस प्रकार की खोज की क्या आशा की जावे ? इनकी अनेक संस्थाओं को तो अपने देश में ही अपने धर्म और समाज पर वात्सल्य नहीं है, फिर विदेशों की तो बात हो क्या? क्या सराक जाति संबंधी शोध से हमारी समाज या संस्थायें प्रभावित हुई हैं? संस्कृतज्ञ विद्वानों को भी पारस्परिक शास्त्रार्थ में ही विश्वास है। मैं इस लेख द्वारा समाज के प्रबुद्ध वर्ग तथा धार्मिक वर्ग का ध्यान इस प्रकार की शोधों की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। उन्हें आज की आवश्यकता को समझने तथा अनुदार वृत्ति को छोड़ने का आग्रह करना चाहता हूँ। इसके बिना धर्म की उन्नति प्रभावना प्रचार-प्रसार व कालान्तर स्थायित्व कुछ भी नहीं हो सकता।
मेरे ध्यान में हमारे प्रमाद के अनेक उदाहरण हैं। एक बार एक प्रभावी राजनीतिक नेता ने भूतपूर्व सिन्ध प्रान्त में जैनधर्म और उसके तीर्थकरों के विषय में एक लेख लिखा था। वह बड़ा ही रोचक एवं ऐतिहासिक विषय था। लेकिन उसपर भी हमारा ध्यान नहीं गया। यही नहीं, कभी-कभी तो हम शोधकों को हतोत्साह भी करते हैं। एक बार इलाहाबाद के सुप्रसिद्ध अजैन विद्वान ने हुकुमचन्द्र अभिनन्दन ग्रन्थ के लिए एक जैन इतिहास से सम्बन्धित गवेषणापूर्ण लेख भेजा था। वह लेख प्रकाशित तो नहीं ही किया गया, उसे लौटाया भी नहीं गया। इसीलिए एक बार जब मैंने उन्हें महावीर जयन्ती पर कटनी आमन्त्रित किया, तो उन्होंने नकारात्मक उत्तर देते हुए लिखा, "मुझे जैनों से जुगुप्सा हो गई है।"
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________________ रजि.नं. UP/HIN/29933/24/1/2001-TC डाक पंजीयन क्र.-म.प्र./भोपाल/588/2003 S बिन्ध्यगिरि, श्रवणबेलगोल का विहंगम दृश्य स्वामी, प्रकाशक एवं मुद्रक : रतनलाल बैनाड़ा द्वारा एकलव्य ऑफसेट सहकारी मुद्रणालय संस्था मर्यादित, जोन-1, महाराणा प्रताप नगर, JAINE भोपाल (म.प्र.) से मुद्रित एवं सर्वोदय जैन विद्यापीठ,1/2058 प्रोफेसर्स कालोनी, आगरा-282002 (उ.प्र.) से प्रकाशित | Mainelibrary.oral