Book Title: Yashodharcharitam
Author(s): Rajsuri, Pannalal Jain
Publisher: Shivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan

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Page 10
________________ एकीभाव) के प्रकाशन में श्री नेमिचन्द्रजी आदि पाच सुपुत्रों ने अपने पिताजी की स्मृति में पांच हजार रुपयों का आर्थिक सहयोग किया एतदच वे धन्यवाद के पात्र हैं। प्रास्ताविक लेख में स्वर्गीय डा. नेमिचन्द्रजी ज्योतिषाचार्य के तीर्थकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा' के तृतीय भाग से यथेच्छ-आवश्यक सामग्री ली गयी है अतः उनका आभारी हूँ। डॉ. चेतनप्रकाश जी पाटनी जोधपुर, जिनवाणी के प्रकाशन में महत्वपूर्ण सहयोग करते हैं अतः उनका आभार मानता हुआ उनके दीर्थ जीवन की कामना करता हूँ। ग्रन्थ के अनुवाद और सम्पादन मे त्रुटियों का रह जाना सम्भव है। ८५ वर्ष की अवस्था में अब पूर्वलेखन को पुनः देखने की क्षमता प्रायः समाप्त हो चुकी है अतः विद्वज्जनों से क्षमाप्रार्थी हूँ। शरीर की स्थिति देखते हुए लगता है कि यह मेरी अन्तिम रचना होगी। वर्णी दि. जैन गुरुकुल विनीत पिसनहारी की माया पन्नालाल जैन साहित्याचार्य जबलपुर (म. प्र.) अहिंसैय जगन्माताऽहिंसैवानन्द-पद्धतिः। अहिंसैव गतिः साध्वी श्रीरहिंसैव शाश्वती ।। अहिंसैव शिवं सूते दत्ते च त्रिदिवश्रियम्। अहिंसैव हितं कुर्याद् व्यसनानि निरस्यति।। Pri ----ग्यारह -

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