Book Title: Yashodharcharitam
Author(s): Rajsuri, Pannalal Jain
Publisher: Shivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan

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Page 43
________________ छिद्रों-धायों में रस छोड़ने वाले इस कृष्णमूख नीलकमल के द्वारा आज तुम इतनी पीड़ित हो गयी कि मृत्यु निकट आ गयी। हे चतुरे! वह मृत्यु किसी दैव के द्वारा रोक दी गयी, यह अच्छा हुआ । १७१।। इस प्रकार, रात्रि के वृत्तान्त को सूचित करने वाले वचन लेकर उसने रानी को प्रतिबोधित किया। पश्चात् उद्वेग की अधिकता से जो अव्यवस्थित सा हो रहा था ऐसा वह राजा माता के पास गया ।।७२।। जिसका मस्तक विनय से नम्रीभूत हो रहा था तथा जो खुले हुए दोनों नेत्रों से आदरपूर्वक माता के दर्शन करना चाहता था ऐसे पुत्र को देखकर माता चन्द्रमती के स्तनों से अत्यधिक दूध झरने लगा। वह निकट बैठे हुए पुत्र का मस्तक सूंघ कर बहुत भारी हर्ष को प्राप्त हुई।।७३ ।। कुलवती स्त्रियों के साथ उस सती चन्द्रमती ने रत्नों के पात्र से पुत्र के मस्तक पर नवीन दुर्वा और अक्षतों का समूह निक्षिप्त कर यह आशीर्वाद दिया कि तू हाथ में धारण की हुई तलवार से शत्रुसमूह को नष्ट करता हुआ दीर्घ काल तक समस्त पृथिवी की रक्षा कर ।।७४ ।। ___अपनी स्त्री के दुराचार की चिन्ता के भार से जिसका मुखकमल मुरझा रहा था ऐसा राजा यशोधर लम्बी तथा गर्म-गर्म सांस लेकर जब बैठ गया तब चन्द्रमती, अहंकारी शत्रुओं के नाश से प्राप्त विजयलक्ष्मी के द्वारा जिसे कीर्तिस्पी पताका दी गयी थी ऐसे अपने उस इकलौते पुत्र से मोहवश इस प्रकार के वचन बोली ।।७५ ।। इस प्रकार श्रीमद्वादिराजसूरि विरचित यशोघरचरित नामक महाकाव्य में दूसरा सर्ग समाप्त हुआ।

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