Book Title: Vasupujya Jin Punya Prakash Stavan
Author(s): Shobhna R Shah
Publisher: ZZ_Anusandhan

View full book text
Previous | Next

Page 14
________________ 28 ११७ ११८ ११९ अनुसंधान- ३० इक दिन तस गजनई चढ्योजी अवि दुर्धर तनु ताव | राय सुणी गज पूछिओजी कुण तुझ दुखनो भाव ॥७॥ सहोदर० । औषध विविधा वैधनांजी कीजि जीवनकाजि । गज निज मरणं जाणतोजी कीधुं अनशन काज ॥८॥ सहोदर० । अक्षर लखी जणाविउजी नृप म करिसि मुझ मोह | पुर बाहिर जाइ संठिओजी तिहां बहु अनशन सोह || ९ || सहोदर० । ढाल आवो आवो सित्रुंजइ जईए ॥ १२० - अनशन इम आराधीइ कहइ मुझ खामण तेह रे । जे मई त्रिविध विणासिआ त्रसनई थावर जेह रे ||१|| १२१ पंचाचार विराधीया । मैं भवि भमतां जेह रे । मिच्छा दुक्कड ते हज्यो शरण जिनादिक तेह रे ||२|| अनशन० । अनशन इम आराधीइ । १२२ पाप अढार जे मई कऱ्यां भवि भवि भमतां जीव रे । जीव हण्या त्रस थावरा करता अति दुख राव रे ||३|| अनशन० । १२३ जगि त्रस थावर नई शस्त्राधिकरणुं देह रे । मुझ भवि भमतां जेहवुं मइ वोसिरिडं तेह रे ||४|| अनशन० || १२४ मुझ त्रस थावर जीव तुं धर्मोपगरण देह रे । भवि भमतां जगि जेहवुं हुं अनुमोदु तेह रे ||५|| अनशन० ॥ १२५ अनशन पाली गज गयो सौधरमई सुर लोगि रे । तिहां जिनघर जिन पूजतां हरख रमइ सुर लोग रे ||६|| अनशन० || १२६ राजा गज - दुखि मोहीओ रुदन करइ अति - शोग रे । गज बंधव मुझ विणुं गयो वारइ पुरजन - लोग रे ||७|| अनशन० || १२७ दिइ दरिसन मुझ आपणो तुझ विण मुझ न समाधि रे । असमाधि रे ||८|| अनशन० ॥ गज- देवो अवधि सुणी टालइ नृप Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47