Book Title: Vaktritva Kala ke Bij
Author(s): Dhanmuni
Publisher: ZZZ Unknown

View full book text
Previous | Next

Page 815
________________ इन्द्रिय-दमन 4. दुद्दता इंदि पंच, संसाराए सरीरिणं । ते चंच णियमिया संता, ऐज्जाणाए भवन्ति हि ॥ -ऋषिभाषित १६१ दुन्ति, इन्द्रिया प्राणियों को संसार में मामला है एवं वे ही संयमित होने पर मोक्ष को हेतु बन जाती हैं। २. सारथीव नेतानि गहेत्या, इन्द्रियानि रक्खम्ति पण्डिता । -दीघनिकाय २०७१ जिस प्रकार सारपि लगाम पकड़कर रथ के घोड़ों को अपने वश में किये रहता है, उसी प्रकार ज्ञानी-साधक शान के द्वारा अपनी इन्द्रियों को वश में रखते है। ३. कद अल्फ हमन् जक्का हा । -कुरान निश्चय ही उस आदमी का जन्म सफल हुआ, जिसने अपनी इन्द्रियों को पवित्र किया । ४. इन्द्रियों को वश करना सुशपुरुषों का काम है और उनके वश हो जाना मूखों का काम है। -एपिवटेट्स x. वशे हि यस्येन्द्रियागि, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता। ___ - गीता २०६० जिस पुरुष के इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है । २७६

Loading...

Page Navigation
1 ... 813 814 815 816 817 818 819 820 821 822 823 824 825 826 827 828 829 830 831 832 833 834 835 836 837