Book Title: Vagbhattalankar
Author(s): Vagbhatt Mahakavi, Satyavratsinh
Publisher: Chaukhamba Vidyabhavan

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Page 97
________________ ..बाभटालाकार। टिप्पणी-कारूप नवयौवना बाला के गान में युक्ति और मिरह के कारण गीत फूट पड़ने से यहाँ पर 'वैतु' कार माना गया है ।। १०५॥ विससोअरो मिअङ्को काअन्तआसाइ आगओ पक्षणो । जाइपलासो सिहरी पहिए मारन्ति ते दाणि ।। १०६ ।। [विषसोदरो मृगाः कृतान्तदिश मागतः पवनः । जातिपलाश: शिखरी पथिकान्मारयन्त्येत इदानीम् ॥] मृगाको विषसोदरः । चन्द्रविषयोरेकनोल्पनत्वात् । कृतान्तदिश आगतः पवनः । शिखरो राक्षो जातिपलाशा, पते प्रयोऽपि पथिकानिदानी मारयन्ति । अत्र मरणस्य हेतुरमी । एको विषसोदरः, स्न्यो यमाशानिवासी । अपरम्नु पलाशः पक्षे वृक्षः ॥ 36 || विष का सहोदर चन्द्रमा (क्योंकि दोनों की उपसि समुद्रमन्यम के समय समुद्र से हुई थी), यम की दिवा (दक्षिण)से बाती हुई वायु और नवीस पत्रों से लदा हुआ (अथवा जो मांस का अभिलाषी है) वृक्ष-ये तीनों पक्षिकों का संहार करते हैं। ___टिप्पणी-विष का साहोहर होने के कारण चन्द्रमा में मार डालने की चमता, दक्षिण दिशा से मायके भाग वा शासका सागरी से लदे होने के कारण पुष के द्वारा मारा जाना हेसुयुक्त है। अतएव यहाँ पर 'हेतु' । मलकार है। १०३॥ पर्यायोक्तिलक्षणमा- अत्तत्परतया यत्र जल्प(ल्प्य)मानेन वस्तुना ! विवक्षितं प्रतीयेत पर्यायोक्तिरियं यथा ॥ १०७ ।। पर्यायेणान्यवचनेन वचनमुक्तिः पर्यायोतिः। अन्न विवक्षित बमिट अतस्परतया न विवक्षितपरतया जल्प(शाय)मानेन वस्तुनार्थेन प्रतीयेत श्य पर्यायोक्तिः ॥ १० ॥ जा विवरित अर्थ के प्रतिपादक कादों के न रहने पर भी विवचित अर्थ का बोध हो जाता है यहाँ पायोति अधार माना जाता है। १०७ ॥ पर्यायोनिमुदाहरतित्वासैन्यवाहनियहस्य महाइवेषु द्वेषः प्रभो रिपुपुरन्ध्रिजनस्यांचासीत् । एकः खुरहुलरेणुतति चकार तां सखहार पुनरगुजालैयदन्यः ॥१०॥ प्रभो, रणेषु स्वत्सैन्यवाहनिबदस्य रिपुपुरन्धिअनस्य च देष प्रासीत् । एको वाइसमूहः सुरेभरेणुवति चकार । मन्यो योषाननो यत्पुनरसजस्ता रेणतानि संजहार । मा विवक्षितोऽयों पः। अस्य जरुप(य)मानेनान रेणुना महजलेन च प्रतीतिर्न विववित्तपरतया यत्तो मक्ता रिपयो मारिता स्पेतन प्रतीवेत सा अतस्परा ॥ १०८ ॥

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