Book Title: Shastra Sandesh Mala Part 19
Author(s): Vinayrakshitvijay
Publisher: Shastra Sandesh Mala

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Page 230
________________ // 1080 // // 1081 // // 1082 // // 1083 // // 1084 // // 1085 // सप्तात्र पाटकाः सन्ति, तत्राद्ये पाटकत्रये / परमाधार्मिकैरित्थं, जन्यते दुःखसन्ततिः परस्परं च कुर्वन्ति, दुःखमेते निरन्तरम् / षट्पाटकेषु भिद्यन्ते, सप्तमे वज्रकण्टकैः न वक्तुं कोटिजिह्वोऽपि, दुःखमत्र क्षमो भवेत् / एकान्तदुःखसंकीर्णं, तदिदं पापिपञ्जरम् तस्मादेतानि चत्वारि ज्ञातानि भवता यदि / पुराणि न तदा ज्ञेयं, भवचक्रेऽवशिष्यते इति श्रुत्वा प्रकर्षोऽदात्, भवचक्रेऽभितो दृशम् / सम्भ्रान्तोऽथ जगौ नार्यः का एताः सप्त मातुल ! बीभत्सदर्शनाः कृष्णा, लुप्ताशेषमहोभराः / .. लोकानां दारुणाकारा, वेताल्य इव भीतिदाः किंप्रयुक्ताश्च किंवीर्यास्तथैताः किंपरिच्छदाः / . कं निहन्तुं प्रवर्तन्ते, विमर्शोऽभिदधे ततः . जरा रुजा मृतिश्चान्या, खलता च कुरूपता / दरिद्रता दुर्भगता, नामतोऽमूः प्रकीर्तिताः (युग्मम्) मूलभूपस्त्रिया कालपरिणत्या प्रयोजिता / बाह्यहेतुशतैश्चापि, जरा तत्रेह जृम्भते. बलं तेजश्च लावण्यमालिङ्गयेयं विलुम्पति / गाढाश्लेषाम्मनो नृणामस्या वीर्यमदः स्मृतम् वलीपलितवैकल्यबाधिर्यान्ध्यकुवर्णताः / कम्पकार्कश्यशैथिल्यदीनतादन्तहीनताः जरायाः परिवारोऽयमनेन परिवारिता / मत्तेव गन्धकरिणी, सर्वत्र विलसत्यसौ 221 // 1086 // // 1087 // // 1088 // // 1089 // // 1090 // // 1091 //

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