Book Title: Setubandhmahakavyam
Author(s): Pravarsen, Ramnath Tripathi Shastri
Publisher: Krishnadas Academy Varanasi

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Page 663
________________ ६४६ ] सेतुबन्धम् [पञ्चदश [ उत्खातभुजङ्गरत्नं निपातितनन्दनवनं प्रलोटितशैलम् । आत्मानं वा न जानासि समं समस्तस्य त्रिभुवनस्य भरसहम् ।।] हे तात ! त्वमात्मानं वा न जानासि स्वं न परिचिनोषि । यदप्रतियोगिना मानुषेण समं युयुत्सुरसीति भावः । किंभूतम् । सममेकदैव समस्तस्य त्रिभुवनस्य भरसहम् । त्रैलोक्यमप्येकत्र भवति तथापि त्वया समं न पारयतीत्यर्थः । तदेवोपपादयति-पुनः किंभूतम् । उत्खातमुत्पादितं भुजंगस्य शेषादे. फणारत्नं येनेति पातालस्य, विच्छिच निपातितं नन्दनवनं येनेति स्वर्गस्य, प्रलोठितः परिवर्तितः कलासः शैलो येनेति मत्यंस्य, परिभावकत्वमुक्तम् ॥२८॥ विमला-शेषनाग के रत्नों को आपने खींच कर बाहर निकाला, नन्दनवन को नष्ट-भ्रष्ट किया, कैलास गिरि को उलट-पुलट दिया। ज्ञात होता है कि समस्त त्रिभुवन-भार को एक समय में ही सहने वाले आप अपने को नहीं जानते हैं ( इसी से एक मनुष्य से युद्ध करने की इच्छा करते हैं ) ॥२८॥ रामेण समुद्रो बद्ध इति महत्त्वमाशङ्कम तत्प्रतिक्षेपपरं तदाहकि णिहणेमि रणमुहे सरेक्सोसविपसापरं रहणाहम् । ओ सत्त विभज्नं चित्र वलन्सबरवामुहे मलेमि समुद्दे ॥२६॥ [किं निहन्मि रपमुखे शरकशोषितसागरं रघुनाथम् । उत सप्ताप्यच वलदडवामुखान्मृद्गामि समुद्रान् ।।] . शरैरेक: शोषितः सागरी येम तं रधुनाथं किं रणमुखे निहन्मि मारयामि । उत पक्षान्तरे अद्यैव सप्तापि समुद्रान् मृद्गामि व्याकुलयामि । किंभूतान् । वलद्दिशि दिशि गच्छदडवामुखमौर्वानलो येषु तानिति क्षोभाधिक्यमुक्तम् । एकसमुद्राभिभावका. द्रामादुभयपक्षणाप्यहमधिकः स्यामिति भावः । शरैकेन शोषित इति वा ॥२६॥ विमला-बाणों से एक समुद्र को सुखाने वाले रघुनाथ को युद्ध में मार अथवा चारो ओर फैले हुये बडवानल वाले सातो सागरों को इसी समय व्याकुल करूं ॥२६॥ अथ युग्मकेनेन्द्रजितो रथारोहणमाहइन विष्णविदहमुहो पच्छिमसारहिकरविअसीसक्को। प्राबद्धकव प्रमन्थरपअविक्कमभरणमन्तकिस्थ अतरिमम् ॥३०॥ धअसिहर ठिअजलहरमुच्चन्तासणिपडिप्फलिअसूरकरम् । समरतुरिओ विलग्गइ रहं सुआसण्णरामधणुणिग्धोसो ॥३१॥ ( जुग्गअम्) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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