Book Title: Satik Gacchachar Prakirnak Sutram
Author(s): Purvacharya, Danvijya Gani
Publisher: Dayavijay Granthmala

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Page 15
________________ RMANESANATANISHKAHANE नूए अस्थि विस्संति, केइ तेलुक्कन मिथकमजुअला । जेसि परहिथकरणिक-बजलक्खाण वोलिही कालो ॥ ३६॥ तीबाणागयकाले, केई होहिंति गोयमा सूर। । जोस नामग्गहणे वि, होश नियमेण पच्चित्तं ॥३॥ जयो, सयरी नवंति अणविक्खयाइ, जह निच्चवाहणा लोए । पमिपुच्छाहिं चोयण, तम्हा उ गुरू सया जयश् ॥ ३० ॥ जो उ पमायदोसेणं, आलस्सेणं तहेव य । सोसवग्गं न चोएइ, तेण आणा विराहिया ॥ ३ ॥ संखेवेणं मए सोम. वन्नियं गुरुलक्खणं । गच्चस्स लक्खणं धीर, संखेवेणं निसामय ॥४०॥ भूताः सन्ति भविष्यन्ति,केचित् त्रैलोक्यनतक्रमयुगलाः येषां परहितकरणैकबद्धलक्षाणां व्यतिचक्राम कालः॥३६॥१०६ अतोतानागतकाले, केचिद्भविष्यन्ति गौतम ! सूरयः । येषां नामग्रहणेऽपि, भवति नियमेन प्रायश्चित्तम् ॥ ३७॥१०७ यतः स्वेच्छाचारीणि भवन्ति, अनपेक्षया यथा भृत्यवाहनानि लोके । प्रतिपृच्छाभिश्चोदनाभिः,तस्मात्तु गुरु:सदा भजते यस्तु प्रमाददोषेणालस्येन तथैव च । शिष्यवर्ग न प्रेरयति तेनाज्ञा विराधिता ॥ ३९ ॥ संक्षेपेण मया सौम्य ! वर्णितं गुरुलक्षणम् । गच्छस्य लक्षणं धीर ! संक्षेपेन निश्शामय ॥ ४०॥

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