Book Title: Path Ke Fool
Author(s): Buddhisagarsuri, Ranjan Parmar
Publisher: Arunoday Foundation

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Page 136
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir भाषा तो केवल संकेत स्वरूप होने के कारण देश वकाल के संयोगवश विभिन्न विविध भाषाओं के वप में प्रकट होती हैं । वैसे ही सर्व जीव देश व कालानुसार जीवित... प्रसारित भाषा में कोइ ज्ञ भी बात भलीभाँति समझ सकते हैं । परिणाम स्वरूप तीर्थंकर भगवंत भी उसका अनुसरण कर प्रायः अर्ध प्राकृत मिश्रित भाषा में उपदेश प्रदान करते हैं ऐसा करने से उनके केवलज्ञान को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचती । प्राचीन भाषा एवं प्राचीन भाषा में आलेखित अमूल्य ग्रंथ-निधि का संरक्षण व संवर्धन करना कभी नहीं भूलना चाहिए । वल्कि उसके लिए सदैव सावजानी बरतनी चाहिए। भाषीय पांडित्य का कदापि अहंकार नहीं करना चाहिए । मस्तिष्क रूपी संदूकची में भाषा के शब्द रूपी दानों को भरना व मंगाने मात्र से ही यदि पांडित्य की प्राप्ति होती हो तो रेलगाडी को भी पांडित्य - प्राप्ति हो सकती है | । वास्तव में शब्दों द्वारा विवेक - ज्ञान प्राप्त कर आत्मीय सद्गुण प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए । शुद्ध प्रेम, मित्रता, भावना, क्षमादि सद्गुण-प्राप्ति जिससे संभव बन जाए तो निहायत वह उक्त भाषा की सफलता मानी जाएगी । वैसे देखा जाय तो भाषा के बनिस्बत आंतरिक सद्गुणों की स्फूर्ति... स्फुरण विशेष महत्त्व रखती हैं । क्योंकि गुण- लालित्य की तुलना में भाषा - लालित्य का कोई महत्त्व नहीं हैं । - ११७ For Private and Personal Use Only

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