Book Title: Mallinath no Ras
Author(s): Diptipragnashreeji
Publisher: ZZ_Anusandhan

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Page 3
________________ ११३ डिसेम्बर २००९ पोते पुत्र छे, बार व्रतधारी श्रावक छे, एम वर्णवी रास पूर्ण थाय छे. (क. २९२-९३). क. २८८मां वर्णन छे ते प्रमाणे कविनुं घर, दुकान ने उपाश्रय नजीक नजीक हता, तो साधुओने पण निर्दोष आहार तथा निर्जन - निर्जीव स्थण्डिलभूमि आ गाममां सुलभ होवाथी आ क्षेत्रमां रहेवानुं मुनिराजो खास मन राखता, तेम पण निर्देश मळे छे. ॥ अं नमः ॥ ॥ श्री मल्लीनाथनो रास ॥ दू सरस सकोमल सुदरी सुगणि सारसरूप ॥ सीहलंकी तु सरस्वती समरइ तुझ जिन भुप ॥१॥ गणधर गुण तुझ गावता त्हारो सघलइ वास । गुणीअण गुण तुझ समरता पुरइ पुरुषनी आस ॥२॥ वचन दीओ वाघेस्वरी देवी पूरे आस । मल्लीनाथ जिनवरतणो रंगिं गास्युं रास ॥३॥ चोई ॥ रास रचु हुं रंगिं करी प्रथम भुप यम सुर म्हाहरी । पश्चीम माहावदेमांहि जोय शालीलांवती वीजइ त्यांहा होय ||४|| वीतशोका नगरी ते माहि म्हाबलं न (ना) मिं राजा त्याहिं । सबल प्रतापी ज्यम रवी देव अनेक भुप करइ तस सेव ॥५॥ वसन सात नीवारइ त्यांहि अकर अन्या नही ते पूरमाहिं । पालइ लोकनिं प्रेमई करी देस वदेसि कीरति वीसतरी ॥६॥ सुरवीर पंडीत दातार वीबुध पूरषनो जे आधार । कवीत काव्य गाथानो जाण पूरष वीनोधी वलभ प्राण ॥७॥ दान सील कुल ज्ञानि करी अनेक पूरष सेवइ तस पुरी । सात मंत्र ते सुदर हुआ तेहेना जीव नही जुजूआ ॥८॥ सातइ सात सायर परि भय सातइ स्त्री सुदर जोई वर्या ।

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