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कवि ऋषभदास कृत श्रीमल्लिनाथनो रास
सं. साध्वी दीप्तिप्रज्ञाश्री
'कवि ऋषभदास' ए मध्यकालना साहित्य-जगतनुं बहु ज जाणीतुं नाम छे. आ जैन श्रावके ३२ थी वधु रासाओ रच्या छे, अने लघु रचनाओ पण घणी रची छे.
सत्तरमा सैकाना, खम्भात-जेने कवि 'त्रंबावती'ना नामे ओळखावे छे (क. १२९) - त्यां तेमणे आ रास सं १६८५ना वर्षे पोष शुदि १३ने रविवारे (क. २९०) रच्यो छे. ते समये खम्भातमा ८५ जिनालयो अने ४२ पौषधशालाउपाश्रयो हता एम कवि निर्देश आपे छे. (क. २८६)
आ कविनी घणी रासादि रचनाओ प्रगट छे, प्रख्यात पण छे. तेमना विषे श्रीवाडीलाल जीवाभाई चोकसीए Ph.D. माटेनो शोधनिबन्ध आलेख्यो होवा- पण जाणवा मल्युं छे. ए निबन्ध प्रकाशित थाय तो कवि विषे घणी घणी जाणकारी प्राप्त थाय ए निःसन्देह छे.
आ रचना जैन १९मा तीर्थंकर मल्लिनाथ भगवानना जीवनचरित्रनुं वर्णन करे छे. कविए ज निर्देश्युं छे तेम (क. २७८) जैन आगम-अंगसूत्र ज्ञाताधर्मकथाङ्गना आधारे तेमणे आ रास रच्यो छे. अर्थात् ते आगममां वर्णवेल 'मल्लिज्ञात'- गुजराती निरूपण ते आ रास एम समजी शकाय छे. दूहा, चोपई, ढाल वगेरेमां पथरायेला आ रासमां २९७ कडी छे. तेनी एक हस्तप्रति बोटादना 'आ. श्रीविजयलावण्यसूरिचित्कोश' माथी झेरोक्स नकलरूपे प्राप्त थई छे, जेना आधारे आ सम्पादन करेल छे. मने जाणवा मल्युं छे के आ प्रति ते कवि ऋषभदासे स्वहस्ते लखेली प्रति छे. ए जाणतां मने अनहद हर्ष अनुभवायो छे. मल्लिनाथ भगवाननुं जीवन होय, ते पण कविना हस्ताक्षर परथी ऊतारी तैयार करवानुं होय, तो केटलो आनन्द होय ! १४ पत्रोनी आ प्रतनी नकल आपवा माटे ते श्रीलावण्यसूरिचित्कोश-बोटादना कार्यकर्ताओनो हुँ अहीं आभार मानुं छु.
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अनुसन्धान- ५०
आ रचना विषे कांई पण लखवुं ते मारा माटे गजा बहारनुं छे. छतां एटलुं जणावीश के कर्ता कवि पोते जे प्रकारे बोलता - लखता हशे तेवीज भाषा तेमणे आमां उपयोगमां लीधी छे. जेमके ओहालास (उल्लास), उशभ (अशुभ) इत्यादि. भाषाविदो माटे आ बाबत रसप्रद अने अभ्यासनो विषय बने तेम छे. कविनी आवी भाषाना कारणे घणा शब्दो समजाता नथी, ए पण जणाववुं जोईए. आवां अमुक स्थानोए (?) एम चिह्न मूक्युं छे.
"
कविए क्यांक क्यांक मूकेलां सुभाषितो पण मजानां छे. मूळ संस्कृतनां सुभाषितोने सहजभावे भाषामां अवतारवानुं काम मजानुं थयुं छे. जेमके - क. ८३ क्रमांकमां श्लोक ( शलोक) जुओ : "कामारथी तस कीतो लया...' 'कामार्थिनां कुतो लज्जा ?' ए पद्म तरत ज याद आवी जशे. ए ज प्रमाणे क. १३२-३३ना दूहा अने क. १३४ मी गाथा पण वेधक सुभाषितो लागे छे. क. १६३ थी १७२ क्रमांकना दोहरा पण एवांज सरस सुभाषितो छे, जे 'भोज' राजाना नामोल्लेख साथे होई भोजप्रबन्धमांथी अवतारेल छे तेम तुरत जणाई आवे छे.
क. १९१ मां भैरव, कल्याण, नट रागनो उल्लेख कविना संगीतज्ञाननी तथा प्रेमनी शाख पूरे छे. इतिहासनी नजरथी जोवामां आवे तो, तपागच्छनी बे शाखा थई, ते वखते आणसूर शाखाना मूळ आचार्य श्री विजयानन्दसूरिना राज्यमां कविए आ रास बनाव्यो छे (क. २७६). त्रंबावतीखम्भातनुं वर्णन करतां त्यांना विशिष्ट गृहस्थ श्रावको अने तेमनां सुकृतोनुं कवि सुन्दर वर्णन कर्तुं छे. पारेख वजीओ - राजीओ (बे भाई हता), जेणे साडा त्रण लाख रूपियानुं सुकृत करेलुं (क. २८०); ओसवालवंशीय सोनी तेजपाल, जेणे शत्रुंजय अने गिरनारना तीर्थोद्धार कराव्या (क. २८१), अने बे लाख ल्याहरी (चलण) खरची हती; संघवी सोमकरण-उदयकरण, ओसवाल राजा श्रीमल, ठक्कुर जयराज जसवीर, ठक्कुर कीका - वाघा इत्यादिनां नामो नोंधीने कविए तत्कालीन खम्भातनी ऐतिहासिक स्थितिनुं चित्र आप्युं छे. खम्भातमां जीवदयानी संस्था ते काले पण हती ते पण (क. २८४-८५) अहीं नों धायुं छे.
छेवटे वीसा पोरवाड वंशना महीराज संघवीना पुत्र संघवी सांगणना
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पोते पुत्र छे, बार व्रतधारी श्रावक छे, एम वर्णवी रास पूर्ण थाय छे. (क. २९२-९३). क. २८८मां वर्णन छे ते प्रमाणे कविनुं घर, दुकान ने उपाश्रय नजीक नजीक हता, तो साधुओने पण निर्दोष आहार तथा निर्जन - निर्जीव स्थण्डिलभूमि आ गाममां सुलभ होवाथी आ क्षेत्रमां रहेवानुं मुनिराजो खास मन राखता, तेम पण निर्देश मळे छे.
॥ अं नमः ॥
॥ श्री मल्लीनाथनो रास ॥
दू
सरस सकोमल सुदरी सुगणि सारसरूप ॥ सीहलंकी तु सरस्वती समरइ तुझ जिन भुप ॥१॥ गणधर गुण तुझ गावता त्हारो सघलइ वास । गुणीअण गुण तुझ समरता पुरइ पुरुषनी आस ॥२॥ वचन दीओ वाघेस्वरी देवी पूरे आस । मल्लीनाथ जिनवरतणो रंगिं गास्युं रास ॥३॥
चोई ॥
रास रचु हुं रंगिं करी प्रथम भुप यम सुर म्हाहरी । पश्चीम माहावदेमांहि जोय शालीलांवती वीजइ त्यांहा होय ||४|| वीतशोका नगरी ते माहि म्हाबलं न (ना) मिं राजा त्याहिं । सबल प्रतापी ज्यम रवी देव अनेक भुप करइ तस सेव ॥५॥ वसन सात नीवारइ त्यांहि अकर अन्या नही ते पूरमाहिं । पालइ लोकनिं प्रेमई करी देस वदेसि कीरति वीसतरी ॥६॥ सुरवीर पंडीत दातार वीबुध पूरषनो जे आधार । कवीत काव्य गाथानो जाण पूरष वीनोधी वलभ प्राण ॥७॥ दान सील कुल ज्ञानि करी अनेक पूरष सेवइ तस पुरी । सात मंत्र ते सुदर हुआ तेहेना जीव नही जुजूआ ॥८॥ सातइ सात सायर परि भय सातइ स्त्री सुदर जोई वर्या ।
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अनुसन्धान-५०
सातइ न्हाना सातइ गुणी सातिं सात नरगगति हणी ॥९॥ सातइ चालइ एकइ च्यंत ज्यम तरणीना अश्व अत्यंत । रूप कला विलछी जेह तेणइ करी सातइ सरखा तेह ॥१०॥ सातइ मत्री छइ ख्यत्री ग्नाति रहइ एगठा दीन नि राति । एक एक पाखइ न विसरइ प्राहिं भोजन भेला करइ ॥११॥
॥ दूहा ॥ भोजन करी करावीइ दूख सुख सूणी कहंत । दीजइ लीजइ प्रेमस्यु मेत्री एम वध्यंत ॥१२॥ वचन वाद निं, स्त्री एकात वणजह दुरि गया य । अवसरी चूक लोभई पड्यो मंत्री एम पलाय ॥१३॥
॥ चोपई ॥ छइ दोष टालइ नर सार मंत्री राखइ सात कुमार । अचल धर्ण दीठइ आणंद पूरण वसू वेसमण अभीचंद ॥१४॥ म्हाबल राजा ते सातमो मंत्री-मेलो पूंनि हवो । सातइ साधकइ सुणता धर्म जाग्या टालवा पूर्वकर्म ॥१५॥ वरधर्म मुनीकइ दीक्षा लीइ अग्यार अंग गुरुं त्यांहांकणी दीइ । अनेक शास्त्र बीजां पणि भणइ करइ सझाय निं पातीक हणइ ॥१६॥ साति नर साथिं संचरइ विहारकरम महीमंडली करइ । सातइ राख्यो अस्यो वीचार सरखो तप करवो नीरधार ॥१७|| सरखो तप सहुंइ आदरइ माहाबल रषि त्याहा माया करइ । कहइ मस्तग दूखइ छइ अती तेणइ छठ करस्यु रे जती ॥१८॥ मन च्यंतइ हुं मोटो अही परभवि मोटो थाउं तही । एणइ ध्यानि तप अदीको करइ नारीवेद ऊपरयो सरइ ॥१९॥ माया कपट म करस्यो कोय क्रोध लोभ मानि तप खोय । तजी ईरख्या साधइ धर्म जाय मुगतिम्हा टाली करम ॥२०॥ मुगतिपंथ म्हाबल साधेह थानक केटलां आराधेह । तीथंकर नामकरम वली जेह तेणइ थानकई नीकाचइ तेह ॥२१॥
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पणि माया तप महीमा जुयो त्रीजइ भवी स्त्रीवेदई हुवो । तेणइ माया म म करयो कोय कपट तजइं सुखशाता होयं ॥२२॥ मुकी कपट छइ तप करइ माहाबल ते माया मनि धरइ । चोरासी लखि पूर्व आय सातइ जीव ते सुरपति थाय ॥२३॥ पाम्या सखरूं जइअंत वीमान बत्रीस सागर आउं नीध्यान । काईक हीण छर्नु ज कहीश मल्लीतणुं पुरु बत्रीश ॥२४॥ चव्या देव ने पूरी आय एक अयोध्यानगरी राय । नामि नृप हुंओ प्रतीबुध पालइ राज न गमइ ज अस्युध ॥२५॥ अंगदेसम्हां चंपा जुओ बीजो अंगमहीपति हुओ । कासीदेस नयर कासीह शंखराय त्रीजो हुओ सीह ॥२६॥ कुंणाला नगरी छइ ज्याहि चोथो रूपी राजा त्याहिं । अदिनशत्रु पंचम रीधि घणी हस्तनागपूरनो ते धणी ॥२७॥ पंचालदेस कांपीलपूर ज्याहिं यत्रस्युत्रु छठ्ठो हुओ त्याहिं । माहाबल जीव चवइ सातमो मलीनाथ जीनवरनि नमो ॥२८॥ जंबुद्वीप अनोपम ज्याहिं भरतखेत्र वसंतुं माहिं । वीदेहदेसनि मीथुलापूरी राजा कुभ सरगिं यम हरी ॥२९॥ प्रभावती पटराणी जेह संसारसुख वलसंती तेह । फागण शुदि चोथिंसु चवइ, राणी कुखि ऊपनो हवइ ॥३०॥ स्यूपन चऊद देखइ नृपनारि गज वृषभो सही लछि वीचारि । कुंशम-दाम चंदो निं सुर धजा कुभ शर जल-भरपूर ॥३१॥ सागर देव-व्यमान सुमार रत्नरेढ अग्यनी ज अपार । चऊंद स्युंपन ए नारी लहइ जागी कंत तणइ जई कहइ ॥३२॥ कुंभराय कहइ सुत बलवंत होसइ चक्री के अरीहंत । अस्युं वचन भाखइ मुखि राय वाहाणइ तेड्या पंडीत राय ॥३३॥ छोडी पूस्तग बोल्या तेह चक्र कइ जिन होसइ एह । सुण वचन नि हरख्यो राय पंडीतनि कीधो ज पसाय ॥३४॥ नव महीना दीन उंपरि सात जातइ जाया सुता वीख्यात । मागशर शुदि अग्यारसि गणो जनम हुओ ज जिनेस्वरतणो ॥३५॥
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अनुसन्धान-५०
छपन कुमारी आवी ज्यांहि जिन माता नवराव्यां त्याहिं । भूषण वस्त्र पिहइरावी करी रख्यापोटली बाधी फरी ॥३६॥ पछइ ईद्र सुरगीर लेई जाय चोसठि ईद्रनि हाथे नाही । एक कोडि कलसा लखी साटि करी सनाथ लहइ शुभ वाटि ॥३७॥ चीवर कुडल देई करी जिनवरनि घरि मुकइ फरी । नंदीस्वर सुर यात्रा करी देवलोकमा पोहोता हरी ॥३८॥ प्रभावती जागी जेटलइ सूता पूजी दीठी तेटलइ । कुभ पीता खरचइ बहु दाम मलीनाथ पाड्यु त्याहा नाम ॥३९।। सूगंध कुशमनी माला बहु बीजा गंध भला जे सहु । एवी सेय सुगंधी जाय प्रभावती सुवा मंन थाय ॥४०॥ मली नाम ते माटइ धरयुं बीजु कार्ण ए आदरयुं । जीपसइ जीन मोहादीक मल । तेणइ नाम मली जीन भल ॥४१॥ अनुकरमई योवनवइ थाय नीलवरण दीपइ जिनराय । धनुष पंचवीस जेहनी काय लंछन कलस अछइ जीन पाय ॥४२॥ लख्यण एक सहइस नि आठ सबल रूप सुदर देह घाट ।। काशपगोत्र निं ईक्षाकवंश मेल्यां बहु त्याहा गुणनां अंश ॥४३।। मलीतणुं जग जंपइ नाम रूपिं नारि हरावइ काम । भ्रह्मचारणी न वरइ कहुं त्रणि ज्ञानिं जाणइ सहुं ॥४४॥ मिं पूरविं माया तप कर्यो तेणइ करमिं स्त्री-वेद ज वर्यो । पूर्व मंत्र म्हारा नर जेह सूंधो तप करता वली तेह ॥४५॥ छइ जीव ते राजा हुआ राज करइ ते सहुं जुजूआ । ते प्रतिबोधाई ज्यम सवे सोए ऊंपाय करुं हुं हवे ॥४६।। सोवनमइ प्रतीमा एक सार कीधो पोतानो आकार । पोली माथइ छीदर करइ एक कवल नीत्य मांहि धरइ ॥४७॥ एवइ नगर अयोध्या धणी प्रतिबध राजा अत्य गुणी । पदमावती राणी तस जोय तेहनो नाम-मोहोछव होय ॥४८॥ तीहा फूल तणो एक दडो कीधो पंचवरणनिं वडो । देखी राय रलीआयत थाय अशो दडो नही दुजइ ठाय ॥४९॥
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बोल्यो तव सुबधी परधान भुपति तुम म करो अभीमान । दादुर जलि ऊंदकतो अती जाणइ कुप समुं को नथी ॥५०॥ त्यम तूम राय वखाणो दडो मिं दीठो छइ एहथी वडो । मली-म्होछविं दीठो तदा वरसगाठि हुई स्त्री जदा ॥५१॥ नारि कुमारी जाणी करी राइं मंत्रीनिं पूछयुं फरी । ते नारिनुं कस्युं सरुप मंत्री कहइ यम देवीरूप ॥५२॥
॥ दूहा ॥ गाहा-गाथइ नवि रीझीओ । रीषभ कहइ रागेण । रंभा-रूप्य न भेदीओ जोगी के दरीद्रेण ॥५३॥
॥ चोपई ॥ दारीद्री न लहइ रसभेह सुणी वात राजा हरखेह । नारी रूप लडं अद्भुत मीथलाम्हा मोकलीओ दुत ॥५४॥ एणइ अवसरि चंपानो धणी दूतो(?) मोकलइ कंन्या भणी । सोय कथा सूणतां स्युभ थाय घणा कालनुं पातिग जाय ॥५५॥ अरहनक श्रावकम्हा शरइ चंपामाहा ते रहइवू करइ । धन काजि ते चढीओ वाहाणि इंद्र वखाणइ बहु गुण जाणि ॥५६।। समकीतस्युं जेहनि वरत बार पडीकमणा पूजा वीवहार । न चलइ धर्मथी घणो ववेक सुणी देवता आव्यो एक ॥५७।। काउछर्ग ध्यानि श्रावक रहइ आवी देव तस एहेवू कहइ । मुक्य धर्म खोटो शु करइ श्रावक वात हईइ नवि धरइ ॥५८॥ आकाशमाहिं ऊछालु वाण ध्यान न चूकइ श्रावक जाण । देविं परीसहि कीधो धणो धर्म न मुकइ ते आपणो ॥५९॥ ऊतम साध तणी ए सीम विरि मरइ नवि खंडइ नीम । स्त्रीअक्रपा रोवत शणगार (?) बीहीकिं नवी छंडइ व्रत-भार ॥६०॥
॥ दूहा ॥
वीरवचननि जाणतो सकल भाव समझेह । अस्यो साध बहु पूरषना बहुअ वचन खमेह ॥६१॥
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न चल्यो नवी कोप्यो तही भषइ जाम सीआलि । अहो अहो दूखर करइ अवंती ज सुकमाल ॥६२॥ श्रावक दूखर देख्य करि तुठो सुरवर सार । खुसी थईनं आपतो मणिमइ कुडल च्यार ॥६३॥ श्रावक सोय मीथलां गयो मल्यो कुभनि मानि । कुडल दो तीहा दीइ घाल्या मली कानि ॥६४॥ श्रावक त्याहाथी संच आव्यो चंपामाहि । अंगरायनिं ते मल्यों कुडल आप्यां त्याहि ॥६५॥ भूपिं साहा संतोषीओ पूछी अचरीत वात ।
कहइ मली कुमरीतणुं दीठू रूप वीख्यात ॥ ६५ | (६६)|| नारि ध्यननिं कारणं जण जो णासो जाय ।
सुणी भुप विल हुआ दुत पाठवइ राय ||६६ । (६७)॥ ॥ चोपई ॥
एणइ अवसरि कुंणाला राय रूंषी (पी) भुपना सहु गुण गाय । नारी धारणी तेनिं कही बिटी सबाहु सुदर लही ||६७ | (६८) | वरसगाठि दिन पुत्रीतणो घरि ओछव तव माड्यो घणो । पूत्रीनिं शणगारइ माय खोलइ बइसारइ तव राय ॥६८॥ (६९)| पूछइ सवी स्यभा ते माहिं अस्युं रूप दीठं कुणि हि । बइ करजोडी बोल्यो दूत मलीरुप जगम्हा अदभुत ||६९| (७०) || नारी अंब ईखुरस वाढ वातिं नरनी गलती डांढ ।
रूपिराय हुई ईच्छया घणी दूत मोकल्यो मीथला भणी ॥७०॥ (७१) ॥ मलि कानिं कुडल हवइ दोय साधि उंषडी तेहनी जोय । सोनीनं तेडइ तेणइ ठाय मेल्यों साधि कहइ कुभराय ॥ ७१ ॥ ( ७२)। एनी साधि मेली नवी जाय कोहो तो नवा नींपाईई राय ।
एणइ वचने खीयो भुपाल पूर बाहिर काढ्यो समकाल ॥७२।(७३)॥ शंखराय कइ आव्या तेह भाख्यं वीतक हुतुं जेह ।
रूप वखाणुं मली तणुं वातिं मोह्यो राजा घणुं ॥७३|(७४||
धन नारी परनंद्या मान न दीइ त्याह जोगेदर कान ।
बीजानुं मन न रहइ ठामि दूत मोकल्यो मली कामि ॥७४|(७५)॥
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वली अधीकार सूणो नरजन मली भ्रात छइ मली दीन । चीत्रशाल क्रीडानो ठाम आव्यो नर मलपंतो ताम ॥७५।(७६)।। मली बिहइनिनुं दीठू रूप नरखी पांछो वलीओ भुप । मनि लायो कही आव्यो अही त्यारइ धव्य बोली वली तही ॥७६।(७७)। ए मलीनो हइ, लुघ भुप(?) ए मलीकुमरीनुं रूप । सुणता खीयो सोय कुमार कुण चीतारो एह गुमार ॥८८।(७८)। अणतेड्यो आव्यो क्यम आहि मली रूप नरख्युं तेणइ क्याहिं । आणो बाधी आणइ ठामि राखो जीवतो ते कुण कामि ॥७८।(७९)। आण्यो बाधी नर ततकाल करइ वीनति सूण्य भुंपाल । मली तणो देखी अंगुष्ट लख्यु रूप थयो जख्य तुष्ट ॥७९।(८०)॥ लखी रूप देखाडइ तही रायरोस ऊतरीओ नही ।। संडासो छेदाव्यो त्याहि चीतारो कोप्यो मन माहि ॥८०(८१)।। वण ऊपराधि दीधी डंड करइ राय क्यम एह अखंड । जख्य आराध्यो जई बहु भाति वर दीधो तव डाभइ हाथि ॥८१।(८२)॥ मली तणुं पटी लख्युं सरूप भेट्यो अदीनस्यत्रु भुप । पट देखाडी उंभो रह्यो राजा तव कामातुर थओ ॥८२।(८३)।।
शलोक - ॥ कामारथी तस कीतो लया मंश-आहारी तश कीतो दया । मदिपानी तस कीतो सउच दारद्री तस कीतो कीया (?) ॥८३।(८४)॥
दूहा ॥ कामारसिं राजा हुओ दूत पाठवइ त्याहि । छठो दूत हवइ आवतो सुणो कथा कहुं आहिं ॥८४(८५)।
ढाल |
कान वजाडइ वासली । कथा कहु मली तणी जस गुण ब्यह होय । एक वार एक तापसी त्याहा आवी जोय ॥८५।(८६)।
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कुंमरी सूधी श्राव्यका तस नवी बोलावइ । चरचा कीधी धर्मनी तव ते दूख पावइ ॥८६॥(८७)|| हरीहर भ्रह्मा थापती सीतापती राम ।
अनुसन्धान-५०
जग सघलइ वापी रह्या परमेश्वर नाम ॥ ८७ (८८)|| मली कहइ सुणि तापसी जो सघलइ सांई । अस्युच वस्तम्हां ते थयो एम न मलइ कांई ॥८८|(८९)| जो सहुनइं सांईइं घडयां शा न्हाना मोटा ।
एक सुखीआ सरया कसई एकनई नही रोटा ||८९ । (९) ॥ ईसि नारि न ओलखी वर आपी भागो ।
सुतमुं सीस वडारीउं शिरि हाथ्य न लागो ||९० | (९१)॥ बली द्वारिकां कहाननी गोपी लुटाई ।
बालिक परि बाली तणां चीवर लेई जाई ॥९१॥ (९२) ॥ ए परमेस्वर ताहरो मुझ जीनवर देवो ।
अनंतज्ञान नारी नही सूर करतां सेवो ॥ ९२ ॥ (९३)॥ करता थापइ करमनिं तु न लहइ मरम । मानभीष्ट थई तापसी काई न रही शरम ॥ ९३ ॥ (९४) ॥ द्वेष धरी त्याहा चीतवइ जोगिण धुतारी । हुं परणावुं एहनिं ज्याहां होइ बहु नारी ॥ ९४ | (९५)॥ चोखा क्यंपिलपुर्य गई यतशत्रु राजा । सहइस नारि तेहनिं घरी ब्यहुत दीवाजा ॥ ९५|(९६)॥ चोखा नृपनिं जई मली नृप दइ बहुमान । अंतेवर देखाडीओं पुछई देई दान || ९६ । (९७)॥ अंतेवर आवुं वली तिं दी क्याहि ।
मुखि मरकलडो मुकती हसती मन मांहि ॥९७ (९८)| नालीद्वीपना मानवी भखि श्रीफल त्याहि ।
एह व्यनां मनि चीतवइ नही खावुं क्याहिं ॥ ९८| (९९) ॥ त्यम तुं राजा चीतवइ अंतेवर सारूं ।
असी नारि क्याहिं नही ध्यन जीवत म्हारूं ॥ ९९| (१००) |
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पणि मली स्त्री आगलिं अंतेवर हारइ । ते नारि तुझ धरि नही तो स्यु छइ त्याहरइ ॥१००।(१०१)। सूणता ईछ्या उंपनी नृप को वीचार । एक अद्भुत नारी भली मुझ कसी हजार ॥१०१।(१०२)॥
कुडलीओ ॥ राय कहइ पटणि रहीइ कइ वनमांहि वास । एक मित्र राजा भलो कइ जोगीनो दास । कइ जोगीनो दास एक वरि सूदर नारी । कइ दरि लीजइ जाय छत्र एक कइ व्यापारी । सोईइ सोवन-ढोलीइ कइ भुडी भोमिज ग्रहीइ । मंदीर केअ मसाण, राय कहइ पटणि रहिइ ॥२।(३) ॥
॥ चोपई ॥ वसीइ म्होटा नगर मझारि धरणि तोह अनोपम नारि । अस्यु चीतवी राजा त्याहिं दूत पाठव्यो मीथलामांहि ॥३।(४)।। छइ दुत मल्या तेणइ ठाय समकालिं वीनवीओ राय । पुत्री मागइ जुजूआ राय कुंभरायनइं चढ्यो कषाय ॥४(५)। वर कन्यानि मागइ जेह अधम पूरष जगि कहीइ तेह । काढी मोकल्या सघले दूत छइ रायनि वलगां भुत ॥५॥(६)॥ हडसेल्या हाक्या दूतडा वल्यां सोय भइरव भुतडा । पोताना राजानि मलइ करइ वात घणु कलकलइ ॥६(७)।। नरपति नारि कथा मुकीइ कन्यानही पणि गाल्यो दीइ । छइ दूतनिं कऱ्या फजेत नवि साखइ नर जेह सचेत ॥७(८)॥ सुणि वचन नृप खीया त्याहि दूत मोकल्या माहोमाहि । आपणि जावू मिथला भणी कुभ तणइ करस्यु रेवणी ॥८(९)। कटीक सज छइ त्याहा करइ मीथला उंपरि ते संचरइ । आवी वीट्यों नगरी-कोट कुंभराय परि देता डोट ॥९।(१०)॥ कुंभराय करइ संग्रांम छइ राय दल झूझइ ताम । वढता कुभ न चांलइ जसिं भंडी पोलि गढम्हा रह्यो तसिं ॥१०(११)॥
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अनुसन्धान-५०
वीटी कोट रह्या षट राय आकल-वाकल सहु को थाय । ईधण पाणि जोईइ अन किम रहइ थीर लोकोनां मन ॥११।(१२)॥ कुभराय संकटमां पडइ धरि धीर्य साहामो नवी भडइ । लाजइ मुख देखाडउ नही ख्यत्रीनिं लया छइ अही ॥१२।(१३)। वाणिग वायदइ लया थाय दाता लज कुण भुख्यो जाय । पंडीत लाज ऊतर नवी थयो ख्यत्री लया न्हासी गयो ॥१३।(१४)।। कुभराय शंकाणो जसई मली बुधि वीमासइ तसई । पीता तणइ कहइ म करो खेद च्यता हवडा करस्यु छेद ॥१४॥(१५)। दूत मोकलो विरी कनिं आवे पूत्री देस्युं तनि । एक एक मानवी जाणइ जेम छइ तणइ कहइ वरीवो तेम ॥१५।(१६)। दूत मोकल्यो मन ओहोलासिं अ(आ)व्यो नृप विरीनिं पासि । का तुम्यो छाना आवज्यो मलीनि परणी जाअज्यो ॥१६॥(१७)। छइ तणइ छा- एम कर्दा परणेवा मनडुं गहिगर्दा । को कोहोनि न जणावइ वात राति छइ नगरम्हा जात ॥१७।(१८)। कुभरायनि मलीआ त्यांहिं छइ नइं घाल्या ओरडामाहिं । परभाति उंठइ नरभुप नरखइ मली प्रतिमारूप ॥१८(१९)। देखी हरखइ हईआ मझारि एवं रूप नही संसारिं । नागकुमारी कइ क्यनरी वीद्याधरी कइ सूरसूदरी ॥१९।(२०)। ए कन्या वरसइ जो आज जाणुं पाम्यो त्रीभोवन राज । एम चीतवता सघला राय मली कुमरी परगट थाय ॥२०।(२१।। मलीरूप दीठु जेटलइ प्रतीमारूप घट्युं तेटलइ । हंसगति हीडइ काम्यनी चंदमुखी सुदर भाम्यनी ॥२१॥(२२)। मृगनयणीनिं कुडल कानिं चीत्रालकी नीलइ वानि । सोवनमेखला नेवर पाय देखी चकीत थया त्याहां राय ॥२२।(२३)। ज्यारइ रागी हुआ घणुं ऊघाड्युं प्रतिमा ढाकणुं । दूरगंध गंधमाहिथी उंछलइ छइ राय तव पाछा टलइ ॥२३।(२४)। भोगी छइ सुगंधी सदा दूरगंध माहिं वशा नही कदा । अकलाणा दइ पाछा पाय मेलां एगठा सघलां राय ॥२४(२५)।
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करो दूगंछा का तम्यो राय ए तो छइ सोवन प्रतिमाय ।
अमृत आहार करूं हुं जदा एक कवल देउं प्रतिमा तदा ॥ २५ ॥ (२६)॥ तेणि गंधिं तुम पाछा खसो चरम शरिरिं किम ओहोलसो । शरीरबंध हुउं सातइ धाति सुणो सोय नर ऊत्म जाति ॥२६।(२७)॥ रस लोही माटी निं मेद असथी मंजा शक्रसु भेद ।
एणइ सातिं बंधाई देह ऊत्म त्याहा क्यम धरइ सनेह ||२७| (२८)॥ चरम - कोथली माहिं हाड नरनिं दूरगतिं पडवा खाड ।
नथी पूरषनो वाक लगार मोहिं कीधा जाण गुमार ||२८| (२९) | जेनिं मोह ल्यख्यमीनो घणो छलिं करी द्रव्य लइ परतणो । जेनिं मोह घणो नीजकाय ते परजीव हणीनिं खाय ॥ २९ ॥ (३०)॥ जेहनिं मोहो नारि उंपरि लया अलगी मुकइ धरिं ।
करी जाचना बल करी वरइ जोगी थई स्त्री पुंठि फरइ ||३०| (३१)॥ जाणइ सारम्हा सार छइ एह पणि ए सबल दूध देह । ऊपरि सुदर, माहिं असार जशो चीत ठंडील ठार ||३१| (३२) |
॥ दूहा ॥
अभ्यंतर वीष सम जाणीइ बाहइरि अमृत उदार ।
गुजा - फल सम जाणवा स्त्रीना भाव वीकार ||३२| ( ३३ ) || मीडानी परी वाटली राखडी राखी म जोय । नारी शिरि दीवो धरइ दूरगति पडवा तोय ||३३| (३४) ॥
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गाथा ॥
जलकी भीति पवनका थंभा देवल देखी हुआ अशंभा । बाहइरि भीतर गंध दुगंधा तो कां भुलो मुरिख अंधा ||३४| (३४) ॥
॥ दूहा ॥
कामभोग वीषशल समा वंछिं सुखनी हाणि ।
मल्ली कहइ नर सेवता लहीइ दुरगति खाणि ॥३५॥ (३६) | ईसिं आगममाहा कहयुं ते अदीका संसारि ।
छता भोग छाडी करी नीज मन आणइ ठारि ॥३६।(३७)|
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अनुसन्धान-५०
कशा भोग मानव तणा भोग भला सुरमाहिं । तीहइ भोग तुम भोगव्या तोहुं भुख्यां तुम आहि ॥३७(३८)॥
॥ चोपई ॥ आणइ ठामि तुम ईछो भोग जो तुम पाम्या सुर संयोग । बत्रीस सागर न्युन्य काई आय एक हाथ सुदर यहो काय ॥३८॥(३९)। काम कुचेष्टा ज्याहाकणि नही सुखभरि काल गमाडइ तही । साह्यबि सेवक नहि तेणइ ठारि माखण सरखो फरस वीचारि ॥३९।(४०)। पाचे विमानि उपजइ जेह सप्तलवी सुर केता तेह । ज्ञाति लवनु अदीकुं आय तो ते देवता मुगतिं जाय ॥४०।(४१)। पंचम विमानि उपजइ जेह एक अवतारी होइ तेह । च्यार विमानमाहिं अवतरइ भव संख्याता ते पणि करइ ॥४१।(४२)। पाच विमान नि नव ग्रीवेय्य वचनवाद तीहा नही रेख । लेशा एक सकल छइ सदा ते मृतलोक्य न आवइ कदा ॥४२।(४३)। अनुतर पाच विमानिं जोय चोसठि मणनां मोती होय । बीजइ ठामि कुभप्रमाण नादि लीणा रहइ सुर जाण ॥४३।(४४)।।
॥ ढाल ॥
॥ तो चढीओ घन मान गजे ॥ सुरना सुख छइ अती घणा ए मनमां च्युत्यु थाय तो । रयण विमान छइ स्यास्वता ए काल सुखि त्याहा जाय तो ॥४४।(४५)। रूप सकोमल तेहनां ए अतिहिं सूगंधी देह तो । केस मुछ डाढी नही ए तेजपूज सुर तेह तो ॥४५॥(४६)॥ रुधीर चर्ब नस नख नही ए रोम-रहीत तन जोय तो । परसेवो अंगि नही ए रोगरहीत तन होय तो ॥४६(४७)। जरा न आवइ देवनि ए सूखीआ लीलवीलास तो । मधुर वचन मुख्य बोलता ए सखरी सास उसास तो ॥४७(४८)।। बत्रीस सहिस वरस ज गई ए होइ आहार ईछ्याय तो । सोल मास गया पछी ए सास उसास ज थाय तो ॥४८(४९)। त्रणि ज्ञानना तुम धणी ए पूरविं सुर अवतार तो ।
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छइ मंत्र पूरविं सही ए सातमो हुं नीरधार तो ॥४९॥(५०)॥ माया - तपिं थयो सुदरी ए तुम नरना अवतार तो ।
देव ववेक तुम क्याहा गयो ए ईछो भोग असार तो ॥५०। (५१) ॥ सुणी वचन नृप लाजीआ ए अहीआपोह करेह तो । जातीस्मरण पामीआ ए सुरनो भव देखेह तो ॥५१॥(५२)॥ सुरनां सुख संभारता ए कहइ धीग मानवदेह तो ।
उशभ भोग नारी तणा ए फोकट भोगव्या एह तो ॥५२॥ (५३) मानव भोग अम वोशरे ए ईछं नही सुरलोक तो ।
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मुगति तणां सुख आगलि ए सघलां सुख छइ फोक तो ॥५३॥(५४) अम्यो बुडा संसारमां ए काढ्या मलीई आज तो ।
चरणे सीस नमावता ए नही राजनुं काज तो ॥५४ || (५५) मलीकुमरी कर ग्रहीए आण्या पीतानिं पाश तो ।
चरणे नमीआ नृपतणइए वसस्युं संयम वाश तो ॥५५॥(५६) कुंभ पीता हरख्यो घणुं ए मली बुधि परमाण तो । मोहोत वधारयुं महीअलि ए बुझव्या पुरुष सुजाण तो ॥५६॥(५७) ॥ चोपई ॥
छइ पूरष त्याहा बुझ्या सही कहइ दीख्या लेस्यु गहइगही । मली कहइ देउं वरसीदान धरस्यु छेढइ संयमध्यान ॥५७॥ (५८) जाओ मंत्र घर तुम छइ जही वरस पछी आवेज्यो अही । दीख्या लेस्यु मंत्री सात मोछव करसइ माहारो तात ॥५८॥ (५९) सूणी वचन राजा गया जाम नव लोकांतिक आव्या ताम । बुझी बुझी मली भगवंत लेई संयम तारो जगजंत ॥५९॥(६०) सुणि वचन जिन देता दान एक कोडि अठ लाख नीध्यान । सवा पोर लगइं जिन देह भवि जीव व्यनां नव्य लेह ||६०|| (६१) मणि मोती आपइ दोकडा ल्याहारी रूपईआ रोकडा ।
गज रथ घोडां भूषण देह लेतां लेनारा थाकेह ॥६१||(६२) वस्त्रदान दीइ दातार उजल मुख करतो आवकार ।
हईडइ हरखी आपइ दान, नाचंता माडिं जिन कान ॥६२॥ (६३)
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अनुसन्धान-५०
॥ दूहा ॥
गजवी घोर तडका थकी कजल हुई मस्य वन । एणी परि लाई बापईआ जलोंते जलधर दीन ||६३ || (६४) कालमुह करी वंकमुह रतडमुह करी जास ।
तेइ दीनि ए कवण गुणयु फल दीइ पलास ||६४|| (६५) रीषभ कहइ धन क्यरपीआं अंतिं अवधिं जाय । अंधवणइ उतावलो चगलइ काली गाय ॥६५॥ (६६) बापईडो जल रोई मगइ बिंदु न न लहइ तेइ ठारि । मरूदेसे मेहे चीतवइ पडि आसुं पीउं वारि ॥६६॥ (६७) मरूदेसे नर चालीओ तरु देखी ते धाय ।
दूम तपंता चीतवइ आवइ करइ अम छा ॥६७||(६८) तरशो लुक्यो नर धशो देख नईनुं तीर ।
नई च्यंतइ परसेवथी ताढूं होय शरीर ॥ ६८ ॥ (६९)
भोज कहइ स्युं जनमीओ जाचीक दूबल अंग । ते कहइ ऊदरिं स्यु धरयो करइ जाचना भंग ॥ ६९ ॥ ( ७० ) भोज - परीक्षा - कारणि आव्यो पंडीत एक ।
एक घर लेई नीकल्यो कहइ मुरिख अववेक ॥७०॥(७१) जग सघलो जाच्यो फरी ठेल्यो जोई कपाल ।
भोज अख्यर नवी वाचतो दीइ दान भुपाल ॥७१॥ ( ७२ ) वाको वह(हा) लो नारिनई श्रोता पंडीत लग ।
धीगट वाहालो शाक्यनी दाता वह (हा ) लो जग ॥७२॥ (७३)
॥ ढाल ॥
हु ज अकेली । नीद न आवइ रे ॥
जगनिं वाहालो मली जीणंदो रे । जगनिं कीधो अती आनंदो रे । धनंद समा कीधा जन त्याहिं रे ।
नारी न ओलखि नीजघरमांहि रे ॥७३॥(७४) यम करइ पूरषा अत्यहिं अपारो रे भोलि ! हुं ताहारो भरतारो रे । मली दइ मोहोमाग्युं दानो रे तेणइ वलीआ अम देही वानो रे ||७४||(७५)
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हरखी नारि दि आसीसो रे मली जीवयो कोडि वरीसो रे । षासर पिहइरतो मुझ भरतारो रे तेणइ कीधो सोलइ शणगारो रे ॥७५॥ (७६) मारि साडलइ साधा त्रीसो रे पिरूं पटोलां हवइ नसदीसो रे । पिहइरणि काचली गलीइं बोली रे हवइ हुं पिहरू नवरंग चोली रे ॥७६॥ (७७)
जाडा चरणीआ नि मशवरणा रे पिहइरूं पाच पटाना चरणा रे । चोला बरटी खातां तेलो रे साली दलि हुई हवइ घृतरेलो रे ॥७७॥ (७८) सांठी झुंपडां माहां शो वासो रे रहिवा लीधा सखर आवासो रे । शला खाटला माकण आला रे आण्या ढोलीआ सोवनथाला रे ॥७८॥ (७९) पिहिरइ भूषणनिं आभर्णो रे जाचिक जननो वलीओ वरणो रे । जिन नमिं हुओ जग आनंदो रे वरसीदान दइ मली-जिणंदो रे ॥७९॥(८०) दीख्या-अवसर हुओ यारइ रे छइ राय आव्या नर त्यारइ रे । आल्यां नीज ब्येटानिं राजो रे पोतइ सारइ आतमकाजो रे ॥८०॥ (८१)
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॥ ढाल ॥
॥ बइठो नायक त्याहि ते सबल हरखी ॥ राग - देसाख । आतम काज सारइ जिन मलीनाथो आवइ अंद्र अंद्राणीअ देव साथो । स्यणगारतो नगरीअ नगरनाथो केसर चंदन छांटणां त्याह थातो ॥८१॥ ( ८२) मली दीक्ष लेता ॥ आचली ॥
भंभा भेरीअ नाटीक सबल थाइ
सुर गाद्रप देवता त्याह गाइ । मली मस्तगि खुप ते तव भराइ
जयंती शबकां त्यीहा सज थाइ म० ॥८२॥ (८३)
शबकामांहि बइसतो मलीनाथो
दीइ कुंभना(?) मानव त्याह हाथो ।
पछइ अंद्र सुर सीबीकानिं खंधि लेता
चाल्या पुरुष जिन मल्यनी सूति (स्तुति) करेता ||०||८३||(८४)
गज अस्व रथ पालखी पूठि चालइ
धज चामर छत्र नर सोय झालइ ।
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कनक-कलसला मसतगि धरइ ज नारी
जन बोलता वाणीअं अत्यहिं सारी ॥ म० ||८४|| (८५)
डंडा रस पात्र खेला ज खेलइ
बहु पूरष साथि मीथला मेहेलइ ।
सिहिश्रावनमांहिं स्वामी ज आवइ
दीख्या कारणि ऊतरी सज थावइ ॥ म०||८५|| (८६) अशेख विरख तली आवियो मलीनाथो
नीज मस्तग ऊँपरिं धरत हाथो ।
पंचमुष्ट करतों जिन वन मायों ।
मागशर शुदि एकादसी अत्याो ||०||८६॥(८७) अठमतप पचकता मलीनाथो
पूठई त्रणिसहिं पूरषनो होय साथो ।
प्रथम वइ चारीत्र त्यांह लीधुं
खीरिं पारणु मीथलांमाहि कीधुं ॥८७॥ (८८) अश्वसेन घरि पारणुं सोय थाइ
पंचदीवस्यु दुदभी देव वाहइ । गुणग्राम दातारना देव गाइ वीश्वसेन त्रीजइ भवि मोक्ष जाइ ॥
दाता मोक्ष होई |आचली ॥८८॥ (८९)
अनुसन्धान-५०
मोटो दान-महीमाय ते कह्यो न जाइ कर्ण कृष्णनिं वीक्रमो भोजराइ ।
हरीचंद बलि जाचतां दरीद्र जाइ
जस जेहनो आज अदीको गवाइ ॥ दाता०॥८९॥(९०)
दानिं दरीद्रपणुअ ते अवश जाइ
हिहीषता हाथीआ घरि बंधाइ ।
छइ खंडनो राय ते आप थाइ
छत्ररत्न सिर उंपरिं सही धराई || दा० ॥९०॥(९१)
नर पायका कोडि आगलउं जाइ
गुण जाच्यका पंडीता सोय गाइ ।
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कलावंत ते जोत्यस्यु जंत्र वाहइ भइरवराग कल्याण निं नट थाइ ॥दा०॥९१।।(९२) चापेल चापि अनि तुझ चोलाइ करइ खाडनी खइलनिं पूरष नाहइ । लुवा आणता अतलस बलीअ लाहइ ढोलि बीजणउ भीअ नारिवाइ (?) ॥९२॥(९३) वसत्र भुषणइं वाधती नर सोभाइ । दूध साकर कढी अनि सुभट पाइ । बइठो मालीइ सुखडी सखर खाइ । चावइ पान कपूर कफ कहीइं न थाइ । दा० ॥९२॥(९४) सदाकाल ते सुखभरि सोय जाइ आण्यां सोवन ढोलीआ नर सुवाइ । तलाई तेणइ गलगली दीलि थाइ चापइ पध्यमनी पुरुषना सोय पाइ ॥दा०॥९३।।(९५) चंदन केसर घसी अनि अंगि लाइ मोटा मोहोत आपइ छत्रपतीअ राइ । अंद्री नीरमल रूपनि दीरघ आइ घरि दूझती महइ खीआ सुंदर गाइ ॥दा०॥९४॥(९६) भव चढत चढता नर तास जाइ हरि चक्रधर ईभ नर सोय थाइ । अस्यो दानमहीमा कहइ जिनराइ वीश्वसेननी सीधगती सोय थाइ ।
दाता मोक्ष होई ॥९५॥(९७)
॥ दूहा ॥ मुगति पंथ दाता लहइ जिनवर दान पसाय । ज्याहा ज्याहां होइ प्रभु पारणुं दुंदभी नाद ज थाय ॥९६॥(९८)
॥ ढाल ॥
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अनुसन्धान-५०
॥ चालि-चतुर चंद्राननी ॥ थाय आनंद ते अतीघणो मली धरत शुभ ध्यान रे । तेणइ दीन त्याह उंपाउं भलुं केवलन्यांन रे ॥९७॥(९९)
दीइ जानवर तीहा देसना ॥ आचली ॥ समोसर्ण सुर त्याहा रचइ मली परषदा बार रे । मली जिणंद दीइ देसना धर्मभेद कहइ च्यार रे ॥दी०॥९८॥(२००) दान निं सील तप भावना आराधे सहु कोय रे । दसवीधि धर्म यती तणो व्यवरी कहइ सोय रे ॥दी०॥९९।।(२०१) साध ख्यमा धरइ अती घणी आरजवपणुं अ अपार रे । मान निं लोभ दुरिं करइ तपभेद कहुं बार रे ॥दी०॥२००॥(२०२) संयम सती राखइ सदा आतम नीरमल हाडि रे । कोडी एक राखइ नही भ्रह्मवरत नव वाडि रे ॥दी०॥१॥(३) जल माटी नवि चापीइ वीगइ नही नरच्यार रे । आप वखाण नंध्या नही नही पाप व्यापार रे ॥दी०॥२॥(४) मुड मुडाव्यु ति वली जो मुगतिनइ कामि रे । नारी सहु माता जसी मन राखजे ठामि रे ॥दी०॥३।।(५) वाटिं वात न कीजीइ कथा परहरी च्यार रे । ईछ्या मन रूधे मुनी लेजे नीरस आहार रे ॥दी०॥४॥(६) डंभ आडंबर म म करे बाजी टोलि तजि हाश रे । (?) नीमताने मुल मंतर कही (?) वसइ दुरगति वाश रे ॥दी०॥५॥(७) आस तजे परब मोहोछविं मम रहइ एक ठामि रे । जोह मस्तग मन मुडीउं नीज आतमा कामि रे ॥दी०॥६॥(८) सार असार लख वली पेट भरीअ म खाय रे ।। आलि भाडं नीज देहनिं यम चाल्युंअ जाय रे ॥दी०॥७॥(९) उंखाल पुखाल धोवू नही रातिं रखि म म खाय रे । दीवश नीद्रा रखे तु करइ लीधी जोह दीख्याय रे ॥८॥(१०) सीद वधारतो रोमनि ऊपाडइ कस्यु सावरे । मुगती नोहि तुझ त्याहा लगइ नावइ जव्य समभाव रे ॥दी०॥९॥(११)
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मीही कपडा नहु पिहइरणा नासइ दुरि याहा नारि रे । याहा दुख पामइ आग्यलो न रेवु तेणइ ठारि रे ॥दी०॥१०॥(१३) बाहिरि भीतरि रहइ ऊजलो गुण ढाकतो आप रे । गुण बोलइ नर अवरना तजइ थोडुइ पाप रे ॥दी०॥११॥(१३) सधइणा नही धर्मनी अन्य दइ ऊपदेस रे ।। बुझवी मोख्यमा मोकलइ पोतइ नरगि परवेस रे ॥दी०॥१२॥(१४) ताढि तडको खमइ मन व्यना आपइ आहार सहु कोय रे । मुरिख ए मन चीतवइ एथी दुरगति होय रे ॥१३।।दी०॥(१५) जिन कहइ कपट माया तजी करो साधन सोय रे ।। मुगति देसइ तुझ आतमा दुजो नही कोय रे ॥दी०॥१४॥(१६)
॥ ढाल ॥ गुरु गीतारथ मारगी जोता सूणी देसना जीनवर केरी । लि नर बहु दीख्याइ मलीनाथनि प्रथम समे(मो)सर्णि । संघ थापना थाइ ॥ हो जीनजी ।
मीठी मधुरी वाणी । आचली ॥१५॥(१७) भीसम परमुख्य मुनीवर मोटा, गणधर अठावीस । साध भलेरा संयमधारी संख्या सहिस च्यालीस । हो जीनजी०मी० ॥१६॥(१८) साधवी बंधमती जे परमुख पंचावन हजार । एक लख्य त्राहासी सहइस भणीजइ श्रावकनो परीवार ॥१७॥(१९) त्रण लख्य सात हजार श्रावीका चोथो शघ ससारो । बावीस सहइं जस केवलन्यांनी मलीतणो परीवार हो जी० ॥१८॥(२०) मनपर्याय मुनीस्वर मोटा सतरसहिं पंचास । बावीस सहिं जस अवधिज्ञानी हुं तस पगले दास ।हो जी०॥१९॥(२१) छ सहि अडसठी पूर्वधर पेखो चउंद सहिं वादी मान । सहिं ओगणत्रीस मुनीवर मोय वईकरी लबधी-नीध्यान होजी०॥२०॥(२२) सहिस अठावीस आठ सहइ चोपन सेष साध नीत्य वंदु ।। च्यालीस सहिस प्रतेकबुध हुआ नमिं नीत्य आनंदु ।होजी० ॥२१॥(२३)
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अनुसन्धान-५० रजुप्रज्ञा मुनी एनिं कहीइ (होइ) वरत धरइ ते च्यार । पंचवरण चीवर वण मानि सचेलकलप नर सार हो जी ॥२२॥(२४) बि प्रतीक्रमण कह्यां जिनशाशनि दूषण लागि करता । घणो काल रहइ मुनि एक थलि दोष लही रहइ फरता ॥२३॥(२५) मलीइं नव तत्त्व प्रकाशां त्रीण तत्त्व पणि भाख्यां । सतरभेद संयमना भाख्या च्यार सामाईक दाख्यां हो जी० ॥२४॥(२६) आवश्यक षट जीनशासनमाहिं धर्मभेद कह्या चार । दोय भेद धर्मना कहइ तो श्रावकनां व्रत बार हो जी० ॥२५॥(२७) चारीत्र त्रणी कह्या तेणइ थानकी आठ मास तप सार । ऊपकरण जिन सोय प्रकासइ जीनकलपीनिं बार । होजी० ॥२६॥(२८) थीवरकलपनि चऊद प्रकाशां अजीआनि पचवीस । अस्यो पंथ प्रकासइ स्वामी व्याहार करइ जगदीस हो ॥२७॥(२९) देवदुक्ष एक लक्ष सोवन- सदाकाल ते होई । ऊपसर्ग नही ए त्रीननि एकुं परमादकाल न कोई । होजी० ॥२८॥(३०) अढार दोष नही जीन पासई वाणी गुण पातीस । प्रातीहार आठइ नीति होई अतीसहि जस चोतीस हो जी ॥२९॥(३१)
॥ ढाल ॥ ॥ तुगीआगिर सीखरि सोहइ ॥ (राग परजीओ) ॥ चोतीस अतीसहि मल्ली केरा प्रथम रूप अपार रे । स्वेद मल नही रोग अंगि देह सुगंधी सार रे ॥३०॥ (३२)
चोतीस अतीसहइ मल्ली केरा । आचली । सास निं ऊसास सखरो ऊजल आमिष सार रे । रूधीर जिन गोखीरधारा अद्रीष्टि आहार नीहार रे । चो०॥३१॥(३३) कोडाकोडि सुर मर्नु पसुआ जोयनमाहिं समाय रे । वाणि जोयन लगि सुणीइ बुझइ सुरनर गाय रे ॥चो० ॥३२॥ (३४) भामंडल जीन पूठि प्रगट्युं रविमंडलथी सार रे ।। जोअण सवासो लगइ भाई रोग नही ज लगार रे ॥चो०॥३३॥(३५) वइरवीरोध नही मानुवमनुमा बइसइ गज निं गाय रे ।
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सातइ ईत माहां नहीअ कोए मारी मरगी जाय रे ॥चो०॥३४॥(३६) अतिवृष्टि अनावृष्टी नही जगि दुरभख्य रे । भि नही स्वचक्र-परनो श्रीजिनगुण तुझ लख्य रे ॥चो०॥३५॥(३७) धर्मचक्र आकाशि चालइ चामरधर सुर ईस रे । रत्न सीघासण पादपीठो छत्र त्रणि तुह सिस रे ॥चो०॥३६।।(३८) ईद्रध्वज आकासि उंचो कमल नव जिन पाय रे । रूप कनक निं रत्नमणिमिइ रचइ गढ सुर राय रे ।चो०।३७॥(३९) समोसरणि चोरूप सुदर अशोखतरूअ भजंत रे । अधोमुख ते कहुं कंटीक सकल वीरख नमंत रे ।चो०॥३८॥(४०) दुदुभी आकाशी वाजइ अनकूल वाइ वाय रे ।। परदक्षण पंखीआ देता शुकन बोलता य रे ॥ चो०॥३९॥(४१) गंधोदक होइ पुफवीष्टी पंचवर्ण फूल रे ।। देव ढीचण लगइ रचता जोअण एक असुल रे ।चो०॥२४०॥(२४२) डाढी मुछ नख केस न वधइ अणहुतइ सुर कोडि रे । रति छइ अनकुल इंद्री नमु जिन कर जोडि रे ॥चो०॥४१॥(४३)
॥ दूहा ॥ अतीसहइ बहु जनवर तणा मल्या देह शुभ अंश । काशप गोत्रे उपनो ईक्ष्याग जेहनो वंश ॥४२॥(४४)
॥ चोपई ॥ वंश वेडी मलि जिनराय सुरगति पामइ मातपीताय । महिंद्र देवलोंक चोथु य्याहि सुरनां सुख भोगवतां त्याहिं ॥४३॥(४५) कुबेर जक्ष जिन सेवइ पाय वेरुट्टा जक्षणी गुण गाय । ए श्री जिनवरनो परीवार जिन करता जगनिं उंपगार ॥४४॥(४६) विहार करंता आवइ त्याहि समेतशखर परबत छइ ज्याहि । मास एक अणसण आदरइ काओत्सर्गमुद्रा जिनवर धरइ ॥४५॥(४७) फागण शुदि बारसि दीन जसिं मोक्ष पहुता जिनवर तसिं । पंचसहिं मुनीनो परीवार मुगतीपूरी-गढ पाम्यां सार ॥४६॥(४८) जनम जरा मरण ज्याहां नहीं रोग शोग भि भुख न तही ।
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अनुसन्धान-५०
पंचवरण काया नही रूप ज्ञानिं नरखइ सकल सरूप ॥४७॥(४९) अनंत सुखमाही झीलइ तेह ते सुखनो नवि आवइ छेह । अझरामर पडवू नही कदा अनंतु बल दरसण छइ सदा ॥४८॥(५०) एहेतुं सीधपणुं जव थाय चोसठि इद्र आव्यां अही धाय । नीरवाण मोहोछव करता देव काया दिहइन करइ ततखेव ॥४९॥(५१) सीबका एक चंदननी करइ सनान करावी जिननि धरइ । बिसारि चंदन चोपडइ मोहिं सुर देवी त्याहा रडइ ॥५०॥(५२) वायत्र वागति लेई जाय चीता रची छइ जेणइ ठाय । जिननि पोढाडइ पगि लागि अग्यनकुमार मुकंता आगि ॥५१॥(५३) वायंकुमार वाइरो करइ केसर चंदन अंबर धरइ ।। अगर कपुर चुआ त्याहा धरीइ देह दइहइन एणी परि करी ॥५२॥(५४) मेघकुमार सुर आव्यो हवइ करी छटानि चहइ ओहोलवइ । डाढां उपली जिननी जेह सुधर्म ईश्यांणेद्र लइ तेह ॥५३॥(५५) डाढ हेठली लइ चमरेद्र डाभी डाढा लीइ बलेद्र । पूजी पखाली डाबडइ धरई कामभोग तीहा नवि करइ ॥५४॥(५६) डाढा नीर छाटइ लवलेस रोग शोग दूख दुरि कलेस । बीजा सुर हरी सुखनि कामि हाड दंत लीइ तेणइ ठामि ॥५५॥(५७) श्रावक अग्यनीनिं पूजेह केता नर रिक्षानि लेह । केता भसम लगावइ अंगि जिननुं नाम जपइ मनरंगि ॥५६॥(५८) सुरवर थुभरत्न नमइ करइ नंदीस्वर द्वीपिं संचरइ । जिन पूजी निं टालई शोष गया देव करी पूण्यपोष ॥५७॥(५९) मलीनाथ जे मुगति गया एकसो वरस घरि जिनवर रह्या । चोपन सहिस नवसहिंज वरीस संयम पालइ जिन यगदीस ॥५८॥(६०) चोपन हजार नवसहि वर्ष जोय एक दीन उंणो भालुं सोय । एटलुं जिन केवलपरयाय सहइस पंचावन वरस, आय ॥५९।।(६१) लही केवल मुगतिं संचरइ रीषभ कवी गुणमाला करइ । करम खपइ पूण्य होइ घणुं समकीत नीरमल ते आपणुं ॥६०॥(६२) एक गुण राजादीकना गाय ते नर सुखीआ आहाकणि थाय । प्राहिं पामइ परभवि हाणिं लोभिं अधम कर्यो गुणखाणि ॥६१॥(६३)
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डिसेम्बर २००९
एक वखाणइ नारि सरूप आहा सुख नही परभवि दुखकुप । रगत मंश हाडना खंड सोय वखाणी अमृतकंड ||६२|| (६४) एक तो वेसर जोडइ आहिं अही कणि दुखीओ होइ प्रांहिं । परभवि दुख पामि नीरधार सार पूरष निं करइ असार ||६३ || (६५) एक मुरिख जोडइ गुण भाड आभवि परभवि तस मुखि खाड । ढाक्या बोल परगट उंचरइ थाइ भाड चोगतिम्हां फरइ ||६४ || (६६) कुगुरु कुदेव तणा गुण गाय अर्थ सीध कसी नवि थाय ।
सुगुरु सुदेवनी नंद्या करइ धरम उंथापी चोगति फरइ ॥६५॥ (६७) अशा ककव्य हुआ जगि बहुं कवतां पार न पाम्या कहुं । सुगुरु सुदेव तणा गुण गाय आ भवि परभवि सुखीओ थाय ॥६६॥ (६८) स्तुति करतां लहइ लागी जोय इंद्र तणी पदवी तो होय ।
वाधी लहइ तो गणधर थाय तीवर रागि हुआ जिनराय ॥६७॥ (६९) लहि लागानुं थानक एह जिनवरना गुण स्तविइ जेह ।
रावण परि तीर्थंकर थाय करम खपी निं मुगतिं जाय ॥६८॥ ( ७० ) एवा जिन स्तुतिना गुण लही मल्लीनाथ मिं स्तवीं सही । पूरव पात्तिक चाल्यां वही सकल सीध नीज मंदिर थई ||६९|| (७१) पूरविं तु न दीठो क्याहि तो जीउं फरतो चोगतिमाहि ।
कहीइं न वंद्या ताहारा पाय तो सीधगति मुझ क्याहाथी थाय ॥७०॥ (७२) ताहरा गुण नवि बोल्यो कदा तो क्यम जाइ भवआपदा ।
कहीइं न कीधो ताहारो धर्म तो क्यम त्रुटइ आठइ करम ॥७१॥(७३) स्युपनिं तुं दीठो जो हंत तो मुझ भवनो आवत अंत । ताहारो धरम अनमोध्यो हंत तो मुझ सुखीओ थाअत जंत ॥७२॥ (७४) अनंतकाल मुझ पुरविं गयो ताहारा नाम विनां अही रह्यो ।
हवइ मुझ सीधां सघलां काम पाम्यो मल्ली जिनेस्वर नाम || ७३ ॥(७५) स्तवतां सुखशाता मुझ अंगि जईन धर्म साधु मनरंगि ।
जस कीरति जगम्हा बोलाय मलीनाथ त्हारो महीमाय ||७४ || (७६)
तु ठाकुर हुं ताहारो दास मिं कीधो तुझ गुणनो रास ।
गुणि भण[इ] सुणइ साभलइ तेनिं बारि स्युभ - सुरतरू फलइ ॥७५॥ (७७)
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अनुसन्धान-५०
फलों मनोरथ सघलों आज श्रीगुरुं नामि सीधा काज । विजयानंदसुरिस्वर नाम जेहना जग बोलइ गुणग्राम ॥७६॥(७८) तेह तणइ चरणे अनुसरि मलीनाथ गुण वेली करी । सकल कवीनिं नामी सीस मिं गायो जिनवर ज्यगदीस ॥७७॥(७९) ज्ञाताधर्मकथांग सुसार छठइ अंगिं एह वीचार । समध सोय त्याहाथी मई ग्रही रास रच्यो हईअडइ गहइगही ॥७८॥(८०) त्राबावतीम्हा गायो रास ज्याहा छइ अढार वरणनो वास । ज्ञाति चोरासी वाणिग वसइ दान पूण्य करता ओहोलसइ ॥७९॥(८१) पारिख वजीओ नि राजीओ जस महीमा जगम्हा गाजीओ । अऊठलाख रूपक पूण्य ठामि अमारि पलावी गामोगामि ॥८०॥(८२) ओसवंसि सोनी तेजपाल शेत्रुज गीर ऊधार वीसाल । ल्याहारी दोय लाख खरचेह त्राबावतीनो वासी तेह ॥८१॥(८३) सोमकरण संघवी ऊदइकरण अध लख्य रूपक ते पुण्यकरण । उसवंसि राजा श्रीमल अधलख्य रूपकि खरचइ भल ॥८२॥(८४) ठकर जइराज अनि जसवीर अधलख्य रूपक खरचइ धीर । ठकर कीका वाधा जेह अधलख्य रूपक खरचइ तेह ॥८३॥(८५) अस्युं नगर त्रंबावती सार रत्नहेम रूपक दातार । भोगी पूरषनि कृरणावंत वाणिग छोडइ बाध्यां जंत ॥८४॥(८६) पसु पूरषनी पंडा हरइ मादा नरनिं साजा करइ । अजा महीषनी करइ संभाल श्रावक जीवदया प्रतिपाल ॥८५॥(८७) पंचासी जिनना प्रासाद धज तोरण तीहा घंटानाद । बिहइतालीस याहा पोषधशाल करइ वखाण मूनी वाचाल ॥८६॥(८८) पोषध पडीकमणु पुजा य पूण्य करंतां दाढा जाय । प्रभावना वाख्यानि ज्याहि शामीवाछिल होइ प्राहि ॥८७॥(८९) ऊपाशरो देहेरं नि हाट अत्यंत दूरि नही ते वाट । ठंडिल गोचरि सोहोली आहि मुनि रहिवा हीडइ अही प्राहि ॥८८॥(९०) अस्युं नगर त्रंबावती खास मि जोड्यो मलिनाथनो रास । कोण संवछर मास दीन वार गुढपणइं कीजइं वीस्तार ॥८९।।(९१)
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डिसेम्बर २००९
संवत बोण सीधी ट चंद' पोस मासि हुओ आनंद । ऊजल परवी तेरसि रविवार रास तणो कीधो वीस्तार ॥९०॥(९२) प्रागवंसि वीसो वीख्यात मिहइराज संघवी मुख्य कइहइ वात । संघवी सागण सुत तस होय द्वादश वरतनो धोरी सोय ॥ ९१ ॥ (९३) तास पूत्र पूरइ मन आस कवीता श्रावक रीषभदास । गायो मलिनाथनो रास सकल संघनी पोहोती आस ॥ ९२ ॥ (९४)
कडी क्र.
४
४
॥ ढाल ॥
दीठो रे वामा को नंदन दीठो । राग
mococ
आसो रे मूझ आज फलि मन आसो भ्रह्मसुता चरणे नमि कीधो, मल्लीनाथनो रासो रे । मूझ पोहोती मननी आसो ॥ आचली ॥ २९३ ॥ (२९५)
मेर मही सायर ससी ज्यांहिं जब लग सूर प्रकासो ।
जव लग सीधशला सुरनां घर तव लग रिहइज्यो रासो रे || मूझ० || ९४ ॥ (९६) सूणी साभली जि नर चेत्या छुटी भवनो पासो ।
रीषभ कहइ ए रास सूणंता अनंत सुखम्हा वासो रे ॥९५॥(९७)
मुझ पोहोती मननी आसो ॥
६
-
शब्द
धन्यासी ॥
माहावदेमांहि
वीज
वसन
इती श्री मल्लीनाथ रास संपूर्ण ॥
शुभ भवतू ॥ कल्याणमस्तुं । छः ॥
गाथा
१३७
२९५।।(२९७)।।
कठिन शब्दार्थ
अर्थ
महाविदेह (क्षेत्र)मां विजय (क्षेत्र विशेष)
व्यसन
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अनुसन्धान-५०
अकर
अन्या वीनोधी
मंत्र
च्यंत ख्यत्री ग्नाति
मंत्री
कर-रहित अन्याय विनोदी मंत्री/मित्र चिन्ता-विचार क्षत्रिय ज्ञाति मैत्री धरण ऊपार्यो जैन धर्म-प्रसिद्ध २० स्थानक सुदृढ करे जयंत (विशेष नाम) सागरोपम (काल-माप) निदान
धर्ण
ऊपरयो
थानक
नीकाचइ
जइअंत सागर नीध्यान यत्रस्युत्रु सही
सिंह
चक्र लखी साटि सनाथ सेय काउछर्ग विरि दूखर धव्य जख्य संडासो लया अस्युच
ढगलो चक्री ६० लाख स्नात्र-स्नान स्वेद (?) कायोत्सर्ग ? वैरी? दुष्कर धाव (?)
यक्ष
अंगुठो लज्जा
अशुचि
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डिसेम्बर २००९
कडी क्र.
८९
९६
९८
१०२
१०८
१०९
११५
१२६
१२६
१२७
१३१
१३३
१३४
१३५
१४०
१४२
१४२
१४६
१५१
१५२
१५३
१५६
१५९
१६०
१६५
शब्द
सरया
अंतेवर
नालीद्वीप
दर
रेवणी
कटीक
विरीं
ओहोलसो
ऊत्म
शक्र
ठंडील ठार
वाटली
भीति
शल
सप्तलवी
ग्रीवेय्य
शा
च
अहीआपोह
उशभ
वोश
मोहोत
लोकांतिक
व्यना नव्य लेह
क्यरपीआं
अर्थ
सरज्यां
अन्तःपुर
नालिकेरद्वीप
गुफा
रेवडी
कटक-सैन्य
वैरी
उल्लासो
उत्तम
शुक्र-वीर्य
स्थंडिल (शुद्ध भूमि) रूप
स्थान
वर्तुलाकार-गोळ (?)
भींत
शल्य (सल्लं कामा, विसं कामा नो सन्दर्भ)
'लवसत्तम' नामनो देव - प्रकार ग्रैवेयक नामे देवलोक - प्रकार
लेश्या
चरबी
ऊहापोह
१३९
अशुभ
विसर्जित थाव
महत्त्व
९ लोकान्तिक, देवजाति
विना नहि ले
कृपण
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१४०
कडी क्र.
१६६
१६९
१७५
१७८
१८०
१८२
१८२
१८२
१८३
१८५
१८५ १८६
१८७
१८७
१८८
१९३
१९९
२०१
२०२
२०३
२०८
२१०
२१२
२१८
२२०
२२०
२२२
शब्द
बाईडो
जाचीक
षासर
शलां
यारइ
गाद्रप
खुप
शबकां
सूति
डंडारस
सिहिश्रावन
अशेख विरख
पचकता
वइ
दीव
पध्यमनी
व्यवरी
भ्रम वरत
नरच्यार
मुड
उंखाल पुखाल
मींहीं
सधइणा
शघ
वईक
नीध्यान
रजुप्रज्ञा
अर्थ
पैयो- चातक
याचक
खासडां-जूतां
सडेलां
ज्यारे
गांधर्व
शिबिका
स्तुति (?)
दांडियारास
सहस्राम्रवन
अशोकवृक्ष
पच्चक्खाण लेता
वये-उमरे
दिव्य
पद्मिनी
विवरी - विवरण सहित
ब्रह्मचर्य व्रत निरतिचार-दोषमुक्त
मुण्ड-माथु
अनुसन्धान-५०
?
?
?
संघ
वैक्रिय
निधान
ऋजु-प्राज्ञ
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________________ डिसेम्बर-२००९ 141 कडी क्र. शब्द जीनकलपी 226 227 227 227 थीवरकलप अजीआ व्याहार देवदुक्ष 228 234 235 दुरभख्य 235 भि 238 238 240 अर्थ जिनकल्प-एक साधना विशेष, ते करनार साधु स्थविरकल्प-साधुओनी आचरणा आर्या-साध्वी विहार देवदूष्य वस्त्र ईति-उपद्रवो दुर्भिक्ष-दुकाळ भय कंटक वृक्ष शूळ विनानां ऋतु निरखे रक्षा-भस्म अहीं कने प्रायः अहीं भांड कुकवि संबंध पीडा दहाडा-दिवसो वाट 241 247 कंटीक वीरख असुल रति नरखइ रिक्षा आहाकणि प्राहिं आहा भाड ककव्य समध पंडा 256 261 262 264 266 278 285 287 दाढा 288 वाठ C/o. देवीकमल जैन स्वाध्याय मन्दिर ओपेरा, पालडी, नवा विकासगृह रोड, अमदावाद-७