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ज, कुबत्य काव्य परपरिच्छेदः ११
योग्यता ईप्सित, जिसको योग्यता, देख वृहत्तर कार्य । वे उसके कर्तव्य में, जो दें गुण का कार्य ।।१।। . सभ्यों का सौन्दर्य है, उनका पुण्य-चरित्र ।
रूप जिसे कुछभी अधिक, करता नहीं विचित्र ।।२।। सब से उत्तम प्रोति हो, सब से सद्व्यवहार । आच्छादन पर-दोष का, लज्जा उच्च उदार ।।
पक्ष सदा हो सत्य का, सब गुण हो निर्दम्भ ।
सदाचार के पाँच ही, ये होते हैं स्तम्भ ||३||(युग्म) ऋषियों को ज्यों धर्म है, करना करुणा-भाव । भद्रों का त्यों धर्म है, तजना निन्दक-भाव ११४।।
लघुता और विनम्रता, सबल शक्ति असमान ।
शत्रुविजय में भद्र को, ये हैं कवच-समान ।।५।। जाँचन को नर योग्यता, यही कसौटी एक । लघु का भी आदर जहाँ, होता सहित विवेकः ।।६।।
बढ़ी चढ़ी भी योग्यता, दिखती तब है व्यर्थ ।
सभ्य नहीं वर्ताव जब, वैरी के भी अर्थ ।।७।। निर्धनता के दोष से, होते सब गुण मन्द । फिर भी शुभ आचार से, बढ़ता गौरवकन्द ।।८।।
त्यागें नहीं सुमार्ग जो, पाकर विपदा-कार्य ।
सीमा हैं योग्यत्व की, प्रलयावधि वे आर्य ।।६।। भद्रपुरुष जब त्याग दें, हा हा भद्राचार । तब ही मानव-जाति का, धरिणी सहे न भार ।। १०।।
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