Book Title: Jinabhashita 2008 09
Author(s): Ratanchand Jain
Publisher: Sarvoday Jain Vidyapith Agra

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Page 9
________________ प्रवचन (गतांक से आगे) सत्य की छाँव में आचार्य श्री विद्यासागर जी वक्ता के भी कुछ विशेषण होते हैं। दानदाताओं। सोचेगा कि यह जो नवागन्तुक नारकी है, कहाँ से आया के भी कुछ विशेषण होते हैं। मुनि महाराज की परीक्षा | है? इस प्रकार सोचने के उपरान्त वह उससे लड़ना की जाती है, उसी प्रकार जिनवाणी की भी आज परीक्षा | प्रारम्भ कर देगा। पूर्व बैर होने के कारण उसका उपदेश हो रही है। वहाँ पर कुछ काम नहीं करेगा। पूर्व बैर होने के कारण जो कोई भी व्यक्ति आज स्वाध्याय, प्रवचन यद्वा- | आपके वचनों से उसका क्रोध और भड़क उठेगा। तद्वा करते जा रहे हैं, उसके फलस्वरूप अर्थ का अनर्थ | 'परस्परअनुग्राह्यअनुग्राहकभावाभावात्' । भी खूब हो रहा है। कई समस्यायें आज समाज के | आपस में नारकियों में अनुग्राह्य और अनुग्राहक समक्ष आ रही हैं। भाषा का बोध हो, उस विषय संबंधी | भाव तीन काल में नहीं बन सकता, क्योंकि वहाँ अनकम्पा, जानकारी हो, गुरुओं के सान्निध्य में अध्ययन अनुभव | दया का अभाव है। दया कब आ सकती है? जब सत्य प्राप्त किया हो, तो बात अलग है। ज्ञानार्णवकार ने एक | धर्म का अनुपालन हो। हम स्वयं संयम का अनुपालन स्थान पर लिखा है करें, तब कहीं दूसरे के ऊपर हमारा प्रभाव पड़ सकता न हि भवति निर्विगोपक्रमनुपासितगुरुकुलस्य विज्ञानम्।। है। यदि आपका पुत्र स्मोकिंग कर रहा है, और आप प्रकटितपश्चिमभागं पश्यन्नृत्यं मयूरस्य॥ उसे रोकना चाहते हैं, तो सर्वप्रथम आपको यह देखना देख लीजिए आज गुरुकुल की पद्धति समाप्त हो | होगा कि मेरे पास तो यह दुर्गुण नहीं है, तब आप उससे गई। स्वाध्याय का भी कोई क्रम नहीं रहा। दो दिन | कहेंगे, तो वह मान जायेगा। 'सत्य का केवल व्याख्यान ही पढ़ा नहीं और लेख लिखना प्रारम्भ कर देता है। करने मात्र से समाज का कल्याण तीन काल में संभव यह सब गलत है, स्वाध्याय अपने आप नहीं हो सकता। नहीं है, किन्तु सत्य पर चलने से ही होगा।' ज्ञानार्णवकार मयूर का नृत्य बहुत अच्छा लगता है, लेकिन वह शृंगार | आचार्य शुभचन्द्र जी कहते हैंरस के साथ-साथ वीभत्स रस को भी प्रदर्शित कर देता | 'अपृष्टैरपि वक्तव्यं' है। यह नहीं होना चाहिए। वीरसेन स्वामी ने एक स्थान | बिना पूछे कहना आवश्यक है। यदि सत्य का पर लिखा है, कि सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के लिए उपदेश लोप हो रहा हो, क्रियाओं में कमी आ रही हो, तो बिना देना या श्रवण करना आवश्यक होता है। नरकों में भी | पूछे सत्य (तथ्य) को रखना चाहिए। आज जो साहित्य, सम्यग्दर्शन होता है, और वहाँ भी देव आकर सम्यग्दृष्टि | हमारी समाज के सामने आ रहा है, वह देखकर लगता बनाते हैं। हाँ, बिल्कुल ठीक है। तीसरे नरक तक जाकर | है कि इनके माध्यम से समाज किस ओर जायेगी। जैनधर्म उपदेश देते हैं, फिर इसके उपरांत क्यों नहीं देते हैं? ] में भगवान् की मूर्ति का अभिषेक करना कोई आवश्यक इसके उपरान्त देव नहीं जाते, तो नहीं सही, लेकिन | नहीं है, 'इस प्रकार की पुस्तकें आज लिखी जा रही सातों पृथ्वियों में सम्यग्दृष्टि जीव पहले से ही हैं, वे | हैं, और उनमें कई मूर्धन्य विद्वानों की सम्मतियाँ भी सब मिलकर जो मिथ्यादृष्टि नारकी हैं, उन्हें सम्यग्दृष्टि | छपी हुई हैं। आप आज की नई पीढ़ी को धर्म की बना देते? 'तत्थत्थसम्माइट्ठि धम्मसवणादो पढमसम्मत्तस्स | ओर आकृष्ट करना चाहें, तो कैसे करें? इस प्रकार का उप्पत्ति किण्ण होदि त्ति वुत्ते, ण होदि, तेसिं भवसंबंधेण | साहित्य उन्हें भ्रम में डाल देता है। पुव्वबैरसंबंधेण वा परोप्पर विरुद्धाणं अणुगेज्झणुग्गाह- आज के स्वाध्याय का यही प्रतिफल है। सत्य भावाणमसंभवादो। वहाँ के सम्यग्दृष्टि नारकी मिथ्यादृष्टि को जानते हुए भी लोभ, भीरुता और विषयों के वशीभूत नारकियों को सम्यग्दर्शन उपलब्ध क्यों नहीं करा सकते? | होकर स्वाध्यायप्रेमी, उसे उद्घाटित नहीं कर पाते। जिनेन्द्र इसमें क्या कारण है? भगवान्, सच्चे देव-शास्त्र-गुरु यह व्यवहार से हैं। ये 'पूर्वबैरसम्बन्धात्।' हमारे लिए कार्यकारी नहीं हैं। यह आज के विद्वानों पूर्व बैर का संबंध होने से। सर्वप्रथम नारकी यही सितम्बर 2008 जिनभाषित 7 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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