Book Title: Jain Kala Ka Avdan Author(s): Marutinandan Prasad Tiwari Publisher: Z_Jain_Vidya_evam_Prakrit_014026_HR.pdf View full book textPage 3
________________ जैनविद्या एवं प्राकृत : अन्तरशास्त्रीय अध्ययन मूर्ति अवशेषों में महाविद्याओं, २४ यक्षियों, आयागपट, जीवंतस्वामी महावीर, जैन युगल आदि की मूर्तियाँ नहीं प्राप्त होती हैं । ज्ञातव्य है कि उत्तर भारत में इनकी अनेक मूर्तियाँ हैं ४० उत्तर भारत में ऋषभनाथ की सर्वाधिक मूर्तियाँ हैं । इसके बाद पार्श्वनाथ, महावीर और नेमिनाथ की मूर्तियाँ हैं । पर दक्षिण भारत में महावीर और पार्श्वनाथ की सर्वाधिक मूर्तियाँ बनीं । ऋषभनाथ की मूर्तियाँ तुलनात्मक दृष्टि से नगण्य हैं । उत्तर भारत में चक्रेश्वरी, अम्बिका एवं पद्मावती यक्षियों की सर्वाधिक मूर्तियाँ हैं । पर दक्षिण भारत में चक्रेश्वरी के स्थान पर चंद्रप्रभ की यक्षी ज्वालामालिनी की सर्वाधिक मूर्तियाँ बनीं । ज्वालामालिनी के बाद अम्बिका एवं पद्मावती की सर्वाधिक मूर्तियाँ हैं । यक्षों में दक्षिण भारत में गोमुख, कुबेर, धरणेन्द्र एवं मातग की मूर्तियाँ मिली हैं। उत्तर भारत में दिगम्बर और श्वेतांबर दोनों ही परम्परा की मूर्तियाँ बनीं, जबकि दक्षिण भारत में केवल दिगम्बर परम्परा की ही मूर्तियाँ हैं । जैन कला की चर्चा के प्रारम्भ में जैन धर्म में मूर्ति पूजन की प्राचीनता पर विचार करना भी प्रासंगिक होगा। भारत की प्राचीनतम सभ्यता सैन्धव सभ्यता है, जिसका काल ल. २५०० ई. पू. है । सैन्धव सभ्यता के अवशेष हमें मुख्यतः हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त होते हैं । मोहनजोदड़ो से हमें ५ ऐसी मुहरें मिली हैं जिन पर कायोत्सर्ग मुद्रा के समान ही दोनों हाथ नीचे लटकाकर खड़ी पुरुष आकृतियाँ बनीं हैं । हड़प्पा से भी एक पुरुष आकृति ( कबन्ध ) मिली है ।" उपर्युक्त उदाहरण सिन्धु सभ्यता के ऐसे अवशेष हैं जो अपनी नग्नता और मुद्रा ( कायोत्सर्ग के समान) के सन्दर्भ में परवर्ती जिन मूर्तियों का स्मरण कराते हैं । किन्तु सिन्धु लिपि के पूरी तरह पढ़ जाने तक सम्भवतः इस सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक कुछ भी कहना उचित नहीं होगा । जैन धर्म में मूर्तिपूजन की प्राचीनता पर विचार करते समय हमें जैन ग्रंथों में वर्णित जीवंतस्वामी मूर्ति की परंपरा पर भी विचार करना होगा, जिसके अनुसार महावीर के जीवनकाल ( छठीं शती ई. पू. ५९९-५२७ ई. पू.) में ही उनकी एक प्रतिमा का निर्माण किया गया था । यहाँ ज्ञातव्य है कि महावीर से पूर्व तीर्थंकर मूर्तियों के अस्तित्व का कोई भी साहित्यिक या पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है । जैन ग्रंथों में महावीर की यात्रा के संदर्भ में उनके किसी जिन-मंदिर जाने, या जिन मूर्ति के पूजन का अनुल्लेख है । इसके विपरीत महावीर के यक्ष- आयतनों एवं यक्षचैत्यों (पूर्णभद्र और मणिभद्र ) में विश्राम करने के उल्लेख प्राप्त होते हैं । ७ परिसंवाद ४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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