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पंचम - अध्याय
नय और प्रमाण प्रमाण और नय के द्वारा जीवादि पदार्थों का ज्ञान होता है। जो पदार्थ प्रमाग और नय के द्वारा सम्यक् रीति से नहीं जाना जाता, वह युक्त होते हुये भी अयुक्त की तरह प्रतीत होता है ।२ प्रमाण और नय के स्वरूप का निश्चय होने पर वस्तु का निश्चय होता है । जो नय-दृष्टि से मिहीन हैं उन्हें वस्तु के स्वरूप का ज्ञान नहीं हो सकता ।
जैन दार्शनिकों के उपर्युक्त कथनों से स्पष्ट है कि वस्तु के ज्ञान में नप का उतना ही महत्व है जितना प्रमाण का | वस्तु का ज्ञान नय और प्रमाण दोनों के द्वारा प्राप्त होना चाहिये । नय ज्ञान का क्या तात्पर्य है' यदि प्रमाण के धारा सत्य ज्ञान प्राप्त होता है तो नय ज्ञान का क्या औचित्य है' तथा नय का प्रमाग से क्या भेद है' अथवा क्या संबंध है। ये सभी प्रश्न विचारणी हैं।
जैन दार्शनिक इस तथ्य पर विचार करते हैं कि सामान्यतः मनुष्यों के वस्तु प्रत्यक्षीकरण में भिन्नता दिखायी पड़ती है। यहाँ तक कि विरोधी प्रत्यक्षा भी होते हैं। स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि वस्तु एक होते हुये भी उसमें 'विरोधी धर्मों की प्रती ति क्यों होती है। एक तरफ तो इसका तात्पर्य है कि पस्त में परस्पर विरोधी धमों का अस्तित्व संभव है और दूसरी तरफ वस्तु - प्रत्यक्षीकरण सिर्फ वस्तु-सापेक्ष ही नहीं प्रतीत होता बल्कि - उत्त प्रत्यक्षा में ज्ञाता की स्थिति भी प्रभावी होती है।
जैनाचार्य वस्तु की विरुद्ध-धर्मता का समर्थन करते हुये कहते हैं जिस वस्तु को एक भाग में देख उसी को अन्य भाग में नहीं देखा - ऐसा स्पष्ट व्यवहार लोक में देखा जाता है और इस व्यवहार के कारण भागभेद से एक ही वस्तु में दर्शन और अदर्शन इन दो विरुद्ध धर्मों का समावेश स्वीकार किया जाता है और इस प्रकार एक परतु में विस्व एवं विभिन्नस्यता भी संभव होती है। देश, काल और पुरुष के अपेक्षा-भेद से एक ही वस्तु में विद्धता एवं विभिन्न रूपता अत्यन्त