Book Title: Bhuvanabhanukevalicariya
Author(s): Indahansagani, Ramnikvijay Gani
Publisher: L D Indology Ahmedabad
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भुवणभाणुकेलिचरियं
सारं सरीरमेअं जेहि हवइ 'रूवजुव्वणवएहिं । कुट्ठजराईहिं तक्खणेण ताई विणस्संति ॥१६६२।। जो पढमं सुररमणीणं वंछणिज्जो नरो इमो होइ । पच्छा जुगुच्छणिजो तासि चिअ एस थविरत्थे[त्ते ॥१६६३॥ जेसि पडिहाइ मणे लच्छी सारत्तणेण तेसि पि । न मिलइ एसा साहिअकिलेससयगाण लोगाणं ॥१६६४॥ जह कमला संमिलइ अ कयावि केसि पि तहवि नासेइ । परिसाकालसमुन्भवतडि व्व खणदिट्ठनट्ठा सा ॥१६६५॥ लच्छीवंतो जीवो उ वासवाओ वि मन्नए अहिअं। धणरहिओ पुण सो चिअ परगिहदासत्तणं कुणइ ।।१६६६।।
जइ जाउ जाइ जीवंत[य]स्स न जीवस्स जलहिजा नासं । जम्मंतरम्मि गच्छंतस्स उ तस्स न उवेइ समं ॥१६६७।। रजस्स को वि माणो हवेइ सो वि अविवेगआवासो । जेणं पहुत्तभट्ठो भिक्खाए भमइ जीवंतो ॥१६६८॥ एगो रजंकाऊण चक्कवट्टी वि सत्तर्मि पुढर्वि ।। गच्छइ गयसरणो किं तओ अ रजस्स अभिभाणो १ ॥१६६९॥ दिदृता विन्नेआ विनजणेहिं च इत्थ चक्कीणं । भरहाहिवईण सुभूम-बंभदत्ताभिहाणाणं ॥१६७०॥ गयपुरनामनयरवइअणंगवीरिअनिवंगणाभइणी । जमदग्गितावसेणं परिणीआ रेणुआकुमरी ॥१६७१।। भइणीए मिलणत्थं समागया एगया य रिसिकता । नयरे तीए भइणीवइसंबंधे सुओ जाओ ॥१६७२।। सा रेणुआ सपुत्ता आणीआ तावसेण वणमझे । तीए पढमो पुत्तो रामनामेणं अत्थि पुरा ॥१६७३।। तेणं च परसुविजा लद्धा विजाहराउ एगाओ । सो परसुरामनामो विक्खाओ 'मेइणीइ तओ ||१६७४।। अह जाणिऊण अन्नाय मिमं तेणं च मारिआ माया । पुत्तसहिआ निवेण वि विणासिओ आसमो तस्स ॥१६७५।। तावससुएण रुटेण कओ रायस्स मत्थयच्छेओ । गयपुरसामी जाओ रायसुओ कत्तवीरिअओ ॥१६७६।।
१. रूपयौवनवयोभिः ॥ २. वार्धक्ये ॥ ३. यदि जातु याति जीवतः न जीवस्य जलधिजा नाशम् ॥ ४. मेदिन्याम् ॥
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