Book Title: Bai Ajitmati aur Uske Samkalin Kavi
Author(s): Kasturchand Kasliwal
Publisher: Mahavir Granth Academy Jaipur
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बाई अजीतमति एवं उसके समकालीन कवि
२७३
चन्द्रमती महिष योनि पायी । तिहां थी कुकडा हवां बेह ।। वत्रिम जीव हिंसा फल पाम्य ! भवि भमता नहीं लेह ।सा०||२६।।
कोटबाल का संसार से भय
तब कोटवाल प्राचंभ मनि पाम्यो । काप्यो थर थर देह ।। राक्ष राक्ष करुणा करी मनीवर । किम होसि पाप छेह ।सा ॥२७॥
कोटवाल मुनी पायं सीर नामी । वरत मागि मनि सुद्ध। समकित सहित श्रावक वत रुद्रां । मुनी करुणा करी दीघ ।सा॥२८।। तब ब्रह्म वेहू कूकडे महु सुरण्यू । घर मनि भवांतर सार ।। जाती समर ऊपनू' सही । ब्रह्म पण लीषा वरत भवतार सा०||२६||
जाती समर वली वरतज पाम्यां । हरष ऊपनो अपार ।। कुकू कूकू इम मधुरज वास्यां । मारीदस सुगरे वीचार सा०॥३०॥
कुसुमावली सूरगि रमतां । काने पडयो ब्रह्म साद ।। जूउ जूज सबद बेधी बाण मूकनू' । बारण लीचू करी वाद ।सा०॥३१।।
वारण देगि राजाइ मूक्यू । मूकमो अह्म तव प्राण ।। कुसुमावली गरभे ऊपना । जोडुन त प्रमाण सा०॥३२॥
कोटवाल मुनीवर पद नांदी । स्तवन करघ मन रंग ।। धन्य धन्य मुनीवर तह्म तरणी वाणी । नौरमल गंग तरंग सा ||३||
पापकलंक महारा पखन्नाया । तुम वाणी जल पूर ।। मझ मन पाप कादव सह सूको । मुनिवर दीठ सूर सा॥३४॥
संसार सागरि बूडतां । मुभा तह्म दीध हाथ ॥ हूं पाप लहिरी झंपायु घणीयिरे । मोहि प्रावो अनाथ ।सा।।३।। प्राज चितामणि रत्न मैं पाम्यू। पाम्यो धर्म कल्पवृक्ष ।। जिनवाणी जिनमत जिनशासन । जिणि जाग्यो ते दक्ष ।सा ॥३६।। जुहूं नीच कुल अवतरघु । तु मुझ भाग्य त्रिसाल । समकित रयरा धरम मिल हयो । जीव दया गुणमाल सा०॥३७॥ कोटवाल मुनी नमी निज स्थान के । पोहोतो मुनी गुण गातो।। मुनीवर मोटो गरुद्ध महंत । रहयो चीद्रूप घ्यातो ।सा०।।३।।

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