Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 10
________________ पूर्वोपार्जित कर्म के उदय के अनुसार जो प्रभाव / संस्कार / व्यवहार पड़ने वाला है वे ही क्रियाशील रहें । वे गुणसूत्र व डीएनए (Deoxy Ribonueleic Acid) के द्वारा उन्हीं गुणों को दिखाने वाले परमाणु या अभिलाक्षणिक समूह (Atoms or Functional Groups) को मुक्त रखता है तथा जो गुण / संस्कार प्रगट (दिखाने) नहीं करने होते हैं (क्योंकि उनके उदय रूप कर्म प्रकृति नहीं बंधी हैं।) उन्हीं में बंधन (Bonds) बनकर उन्हें सुरक्षित या अप्रभावी या निष्क्रिय कर देते हैं । अर्थात् किसी विशेष गुण/ संस्कार को प्रगट करने वाला एटम या Functional Group (वे ही अपनी विभिन्न संरचना से विभिन्न गुण प्रदर्शित करने के लिये उत्तरदायी होते हैं), सत्ता रूप में होते हुए भी बन्ध को प्राप्त होने से अप्रभावी हो जाते हैं। इसी प्रभावी व अप्रभावी अवस्था को जैन दर्शन कर्म का उदय व अनुदय संज्ञा से निरूपित करता है । इसके कारण ही एक ही रचना में तनिक या अंतर हो जाने पर गुणों में अंतर आ जाता है। रासायनिक सूत्रों से इसे निम्न प्रकार से समझा सकते हैं - बैंजीन (Bengene CH) में सक्रिय रचना होती है तथा इसके 6- Corbon Atoms को 1 से 6 की संख्या से सामान्यतः इस प्रकार दिखाते हैं - था CHECH H1 उपरोक्त A व B रचनाएं समान हैं क्योंकि इस चक्रीय रचना में एकल (-) व द्वि बंध (=) निरन्तर घूमते रहते हैं। जिन्हें अनुनाद संरचना कहते है। यदि इस बैंजीन में क्रम संख्या 1 कार्बन की हाइड्रोजन विस्थापित (हटकर या सबस्टीट्यूट) होकर क्लोराइड (-1) या नाइट्रो (-NO,) समूह आ जाये तब उनकी रचना निम्न होगी - No N020 el SH 5 der {nitrobenzene tant tha (Chlorobenzeme) क्लोरोबैंजीन में क्लोराइड समूह के कारण तथा नाइट्रोबेंजीन में नाइट्रो समूह के कारण भिन्नभिन्न यौगिक आ गये हैं। माना इन यौगिकों में पुनः कोई रासायनिक प्रतिक्रिया सम्पन्न कराकर कोई नया यौगिक उत्पाद बनाया जाये तब समीकरणों से निम्न प्रकार का अन्तर आ जाता है। जैसे H,SO की क्रिया से Sulphonic acid Group जोड़ने पर - 10 अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011

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