Book Title: Apbhramsa aur Hindia me Jain Rahasyavada
Author(s): Vasudev Sinh
Publisher: Samkalin Prakashan Varanasi
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अपभ्रंश और हिन्दी में जैन रहस्यवाद
जोणीरुसिद्धहं साईयउ अरिज्भिय तं भाएहि ।
मोखु महापुरु णीयडउ आणन्दा ! भव दुहु पाणिय देहि || १४ || जिणु असमत्युवि मुग्ण भणइ, तारण मल्लु न होई ।
मारगु तिहुवण प्रक्खियउ, अणन्दा ! अप्पा करइ सु होई ॥१५॥ जिम वइसार कट्ठमहि कुसुमइ परिमलु होई ।
सिंह देह मइ बसइ जिव, प्राणन्दा ! बिरला बूझइ कोई ||१६|| हरिहर बंभु वि सिव णही मणु बुद्धि लक्खिउण जाई ।
मध्य सरीरहे सो बसइ अणन्दा ! लीजहिं गुरुहिं पसाई ॥ १८ ॥ फरस रस गन्ध वाहिरउ रुब बिहूणउ सोई ।
जीव सरीरहं विणु करि अणन्दा ! सदगुरु जाणई सोई ॥ १९ ॥ देउ सचेयणुत्साइयाई तंजिय परि विवहारु ।
एक समईत्साणा रहहिं अणन्दा ! धग धग कम्म पयालु ॥२०॥ जा पर बहु तब तवई तो विण कम्म हणेई ।
एक समउ अप्पा मुणइ आणन्दा ! चउ गइ पाणिउ दोई ||२१|| सो अप्पा मुणि जीव तुन्हु अणहंकरि परिहारु ।
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सहज समाधिहिं जाणियई प्राणन्दा ! जे जिण सासणि सारु ॥२२॥ अप्पा संजमु सील गुण अप्पा दंसण णाणु ।
वउ तउ संजम देउ गुरु प्राणन्दा ! ते पावहि णिव्वाणु ||२३|| परमप्पउ जो झावइ सो साच्चउ विवहारु ।
सम्म बोधइ बाहिरउ प्राणन्दा ! कण विणु गहिउ पयालु ||२४|| माय बकुल जाति विणु णउ तसुरोसुण रांव ।
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सम्यक् दिठ्ठिहि जाणियइ आणन्दा ! सदगुरु करई समाउ ||२५|| परमाणन्द सरोवरहं जे मुणि करइ पवेस ।
अमिय महारसु जई पिबई आणन्दा ! गुरुस्वामिहि उपदेसु ||२६|| महि साहि रमणिहिं रमहिं रमहिं जे चक्काहि हवेइ |
ाबले जिणेव मुणि आणंदा ! सिवपुरि णियेडा होहि ||२७|| सिक्ख सुणइ सदगुरु भाई परमानंद सहाउ ।
परम जोति तसु उल्हसई आणंदा ! कीजइ णिम्मलु भाउ ॥ २९ ॥ इंदिय मण बिछोहियउ चेतणु करइ प्रवेसु ।
उदय करंत उवारियउ आणंदा ! सुणउ जाणण देउ ||३०|| गयकू भत्थलि जेम दिढ केसरि करई पहारु ।
परम समाहि ण भुल्लाह आणंदा ! दहियउ दुइ णिरकारु ||३१|| पुव्व किय मल खिज्जुरई गया ण होणई देइ |
. अप्पा पुणु मणु रंगियउ आणंदा ! केवलणाण हवेई ||३२|| देव बजावहि दुन्दहिहिं थुणहिं जि बंभु मुरारि ।
इंद फणिदवि चक्वइ आणंदा ! तिणिवि लागइ पायाई ॥ ३३ ॥ केवलणाणवि उपज्जई सदगुरु वचन पसाउ ।
जग सु चराचर सो मुणौ प्रामंदा ! - रहरजु सहजु सुभाई ॥ ३४॥

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