Book Title: Apbhramsa aur Hindia me Jain Rahasyavada
Author(s): Vasudev Sinh
Publisher: Samkalin Prakashan Varanasi
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दोहापाहुड़े महमंदिग मुनि
।। ऊं नमोवीतरागाय नमः ॥
जयत्यशेषतत्वार्थ प्रकाशिप्रथितश्रियः। मोहध्वनौषनिर्भद ज्ञानज्योतिजिनेशिनः ॥१॥ नमोस्त्वनन्ताय जिनेश्वराय............ .....।
.................."॥२॥
बारह विउणाजिण णवमि किय बारह अक्खरक्क । महयंदिण भवियायणहो णिसूणह थिरमणथक्क |॥३॥ भव दुक्खह निविणएम. वीरचंदसिस्सेण। भवियह पडिबोहणकया, दोहाकव्वमिसेण ॥४॥ एक्कु जु आखरु सारु, दुइज जण तिण्णि वि मिल्लि । चउतीसगल्ल तिणिसय, विरचिय दोहा बेल्लि ||शा तेतीसह छह छंडिया, विरचिय सत्रावीस। बारह गुणिया तिण्णिसय, हुअ दोहा चउबीस ॥६॥ कुगुरु कुदेउ कुधम्म जिय, परिहरि कुतउ कुमग्गु । मिच्छाभाव परिच्चयवि, सम्मदंसणि लग्गू ॥१२॥ खीरह मंझहं जेम घिउ, तिलइ मंझि जिम तिलु । कट्ठिउ वासणु जिम बसइ, तिम देहहि देहिल्लु ।।२३।। क्खुद्द भाव जिय परिहरहि, सुहभावहिं मणु देहि । तवं वय णियमहि संजमहिं, दुक्कियकम्म क्खवेहि ॥२४॥ गोरउ कालउ दुब्बलउ, बलियउ एउ सरीरु। अप्पा पुणु कलि मल रहिउ, गुणचंतउ सरीरु ॥४०॥ घोकइ पढइ सुअक्खरइ, अणहकहइविचारि। अप्पणु किंप ण पायरइ, ते हिंडइ संसारि ॥५२॥ चेयणु अप्पा एकु पर, पुग्गलु दव्बु अयाणु । जोइय महयंदिण कहिउ, एउ परमत्थिण जाण ॥६२॥
१. .आमेर शास्त्र भांडार जयपुर में सुरक्षित प्रति से।

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