Book Title: Anusandhan 2007 01 SrNo 38
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 9
________________ अनुसन्धान-३८ यतः न विणा तित्थं नियंठेहिं नातित्था य नियंठया । छक्कायसंजमो जाव ताव अणुसज्जणा दोण्हं ॥१०॥ तम्हा आयरिया वि हु संति नत्थि त्ति जे वियारंति । तं मिच्छा जओ जणे तेच्चिय सुत्तत्थदायारो ॥११॥ बहुमुंडे अप्पसमणे य इय वयणाओ य संति आयरिया। जेसि पसाया सड्ढा धम्माधम्म वियाणंति ॥१२॥ जह दिणरत्तिं सम्म मिच्छं पुन्नं तहेव पावं च । तह चेव सुगुरु कुगुरु मन्नह मा कुणह मय(इ)मोहं ॥१३।। चरणस्स नव य ठाणा इह य पमत्तापमत्तअहिगारो । तत्थ अपमत्तविसयं कह लम्बेइ इत्थ एगविहं ॥१४॥ होइ पमत्तम्मि मुणी चउक्कसायाण तिव्वउदयम्मि । स पमत्तो तेसिं चिय अपमत्तो होइ मंदुदए ॥१५॥ पमत्ते नोकसायाण उदएणं इत्थ चरणजुत्तो वि । अट्टज्झाणोवगओ तेण विणा होइ अपमत्ते ॥१५॥ नाणंतरायकम्मं लम्बेइ तिविहं पमत्त-अपमत्ते । बीयं छच्चउ पण नव-भेएहिं बंधुदयसंते ॥१६।। तेरिकारस जोगा हेउणो पुण हवंति छ चउवीसा । लेसाओ छच्च तिने य हुंति पमत्तापमत्तेसु ॥१७।। अविरय विरयाविरएसु सहसपुहुत्तं हवंति आगरिसा । विरए य सयपुहुत्तं लब्भेति पमायवसगेण ॥१९॥ यतः ठिइठाणे ठिइठाणे कसायउदया असंखलोगसमा । अणुभागबंधठाणा इय इक्किक्के कसाउदए ॥२०॥ कम्मस्स य पुण उदए अवराहो होइ नेव तव्विरहे । इय जाणिऊण सम्मं मा कुज्जा संजमे अरुइं ॥२१॥ अपमत्तपमत्ते सुं अंतमुहुत्तं जहक्कम कालो । समणाण पुव्वकोडी ता लब्भइ कह ण एगविहं ॥२२॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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