Book Title: Anusandhan 2007 01 SrNo 38
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 21
________________ अनुसन्धान-३८ स्वकर्मणां शर्मद ! किं करोमि ॥ सम्पत्स्यते ते मनसः प्रसादो [B 14-76-4] यदा तदा सिद्धिसुखं न दूरे ॥१४॥ कृतशीतापरित्यागस्तापोऽपि न विरागवान् ॥ [A 15-1-1] आदिष्टवर्मा मुनिभिः कदा त्वच्चरणं श्रये ॥१५॥ [B 15-10-1] पुरः परॊध्य प्रतिमाऽगृहाया [A 16-39-2] स्थितस्य याते मम नाथ ! तुष्टिः ॥ सा मैंन्दुरा संश्रयिभिस्तुरङ्गैनजैर्नवा वारिविहारवद्भिः ॥१६।। दुरितं दर्शनेन घ्नन् वन्दनेनेहितप्रदः ॥ [A 17-74-1] दूरापवर्जितच्छत्रैः सुरेन्द्रस्त्वमुपास्यसे ॥१७॥ [B 17-19-1] दमान्वितः पद्मदलाभदृष्टि- [A ?] र्गुणाम्बुनिधिर्बुद्धिनिधिविधिज्ञः ॥ पतिः पृथिव्याः कुलकैरवेन्दु- [B ?] युगादिनाथो जयताज्जिनेन्द्रः ॥१८॥ एवमिन्द्रियसुखानि निविश- [19-47-1] न्नप्यधीश्वरनुतिं तनोति यः ॥ तं प्रमत्तमपि न प्रभावतो [B 19-48-3] दुर्णतिः स्पृशति सातमेति च ॥१९॥ श्रीसङ्घहर्षसुविनेय[क]धर्मसिंहपादारविन्दमधुलिण्मुनिरत्नसिंहः । श्रीमयुगादिजिनवर्णनवर्ण्यवर्णं स्तोत्रं चकार रघुवंशपदप्रधानम् ॥२०॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only . www.jainelibrary.org

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