Book Title: Anusandhan 2007 01 SrNo 38
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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जान्युआरी-2007
रघुवंशपदत्रयसमस्यानिबद्धं
__ श्रीवीतरागस्तवनम् रघुवंशादिसर्गस्य पदत्रयसमस्यया । कुर्वे स्तोत्रं जगद्भर्तुः समीहितफलप्रदम् ॥१॥ लोकान्तरसुखं पुण्यं स्मृत्वा सपदि सत्वरः । A 1-69-1]
[B ?] स्निग्धगम्भीरनिर्घोषं वितनोमि विभोः स्तवम् ॥२॥ [C 1-36-1]
भीमकान्तैर्नृप ! गुणैस्तनुवाग्विभवोऽपि सन् ।
[A 1-16-1 ___B 1-9-2] [C 1-13-3]
आत्मकर्मक्षम देहं स्तवं कृत्वा पुनाम्यहम् ॥३॥
अनिन्द्या नन्दिनी नाम वागर्थप्रतिपत्तये ।
[A 1-82-3 _B 1-1-2] [A 1-61-1]
तव मन्त्रकृतो मन्त्रै-दुःसाधैरलमेव च ॥४॥
सो हमिज्याविशुद्धात्मा प्रार्थनासिद्धिशंसिनः ।
[A 1-68-1] B1-42-3] [C 1-2-3]
तितीपुर्दुस्तरं मोदा-पंगमात् ते. श्रये क्रमौ ॥५॥
औं समुद्रक्षितीशानां माननीयो मनीषिणाम् । [A 1-5-1]
[B 1-12-2] अदूरवर्तिनी सिद्धि विधेहि भगवन् ! मम ॥६॥ [A 1-87-1]
सरसीष्वरविन्दानां यर्थी कालप्रबोधिनाम् । [A 1-43-1]
B 1-6-4] सोहमाजन्मशुद्धानां गम्योऽसि ज्ञानभास्करः ॥७॥ [C 1-5-11
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