Book Title: Anusandhan 2007 01 SrNo 38
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 31
________________ 26 अनुसन्धान-३८ विभो ! जनास्ते जगति प्रधानाः ये त्वां भजन्ते दलिताभिमानाः । सम्प्राप्तसंसारसमुद्रतीरं सम्मोहधूलीहरणे समीरम् ॥२॥ केनाऽपि जिग्ये नहि मोह-भूपः प्रकाममुद्दामतमःस्वरूपः ॥ विना भवन्तं भुवनैकवीरं मायारसादारणसारसीरम् ॥३|| सुवर्णसद्वर्णलसच्छरीरं __ सिद्धार्थभूपालकुलाम्रकीरम् । औदार्य-धैर्यादिगुणैर्गभीरम् नमामि वीरं गिरिसारधीरम् ॥४॥ अन्यां विहाय महिलां महिमाभिरामा भेजे जिनेश ! भवता किल मुक्तिरामा ॥ कैवल्यनिर्मलरमासुषमानवेन भावावनामसुरदानवमानवेन ॥५॥ सन्नाकिनायकनिकायशिरांसि यानि ब्रह्मादिदैवतगणेन मनाग् नतानि । त्वत्पादनीरजरजः स्पृहयन्ति तानि चूलाविलोलकमलावलिमालितानि ॥६॥ तापापहा भविकभृङ्गविराजमाना मूर्तिस्तव प्रवरकल्पलतोपमाना ॥ दत्ते जगत्त्रयपते ! सुमनःसमूहै: सम्पूरिताभिमतलोकसमीहितानि ॥७॥ येषामधो नवसुवर्णसमुद्भवानि ___ सञ्चारयन्ति विबुधा नवपङ्कजानि ॥ भूपावकानि रजसा किल तावकानि कामं नमामि जिनराज ! पदानि तानि ॥८॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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