Book Title: Anusandhan 2007 01 SrNo 38
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसन्धान-३८
विभो ! जनास्ते जगति प्रधानाः
ये त्वां भजन्ते दलिताभिमानाः । सम्प्राप्तसंसारसमुद्रतीरं
सम्मोहधूलीहरणे समीरम् ॥२॥ केनाऽपि जिग्ये नहि मोह-भूपः
प्रकाममुद्दामतमःस्वरूपः ॥ विना भवन्तं भुवनैकवीरं
मायारसादारणसारसीरम् ॥३|| सुवर्णसद्वर्णलसच्छरीरं
__ सिद्धार्थभूपालकुलाम्रकीरम् । औदार्य-धैर्यादिगुणैर्गभीरम्
नमामि वीरं गिरिसारधीरम् ॥४॥ अन्यां विहाय महिलां महिमाभिरामा
भेजे जिनेश ! भवता किल मुक्तिरामा ॥ कैवल्यनिर्मलरमासुषमानवेन
भावावनामसुरदानवमानवेन ॥५॥ सन्नाकिनायकनिकायशिरांसि यानि
ब्रह्मादिदैवतगणेन मनाग् नतानि । त्वत्पादनीरजरजः स्पृहयन्ति तानि
चूलाविलोलकमलावलिमालितानि ॥६॥ तापापहा भविकभृङ्गविराजमाना
मूर्तिस्तव प्रवरकल्पलतोपमाना ॥ दत्ते जगत्त्रयपते ! सुमनःसमूहै:
सम्पूरिताभिमतलोकसमीहितानि ॥७॥ येषामधो नवसुवर्णसमुद्भवानि
___ सञ्चारयन्ति विबुधा नवपङ्कजानि ॥ भूपावकानि रजसा किल तावकानि
कामं नमामि जिनराज ! पदानि तानि ॥८॥
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