Book Title: Anusandhan 2007 01 SrNo 38
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 41
________________ 36 अनुसन्धान-३८ दंपति विषयक सुख भोगवें कांई जोगवें राम जिम शीत हो । जी० एक दिन परम आनंदसुं सुख सेजें पोढ्यां नहि भि(भी)त हो ॥९॥ जि० चउद सुपन देखें भला ए तो विष्णुदेवी महामन्त्र हो । जि० तेहवि सूरलोकथी चवी प्रभु विष्णुमाता कुखें ऊतपन्न हो ॥१०॥ लीलाई सुपन देखी करी संभलावें निज पति पास हो । जि० निजमति अनुसारें कहे सुत होसे त्रिलोकी प्रकाश हो ॥११॥ जि० अनुक्रमे गर्भ वधतें थकें पुर्ण हुआ शुभ नव मास हो । जि० उपरि षट् दिन व्यतिक्रम्यई फागुण वदि द्वादशी खास हो ॥१२॥ जि० अद्ध निशि श्रवण नखत्तें मकरे स्थित रोहिणी कंत हो । जि० तेहवें जिनजी जनमीया तिहां वरत्या शुभ विरतंत हो ॥१३॥ जि० जन्म कल्याणक सुर करें सोहंमादि चोसठि इंद हो । जि० तिम निज पूरी शिणगारिने जन्मोत्सव करइं नरेंद हो ॥१४॥ जि० असूचि टालीनें नाम ठवें श्रेयांस कुमर दयाल हो । जि० बुध चतुरसागर गुरु सेवथी शिश कहें जिनगुण रसाल हो ॥१५॥ जि० ॥ सर्वगाथा-१८ ॥ ॥ दूहा ॥ अविनासी इग्यारमो मतिश्रुतअवधि निधान । ___ जन्मजात त्रय ज्ञानमय तारण भवनिधि सोपान ॥१॥ पंच धावि लालिजतां वधे जिम सूरतरू छोडि । दिन दिन कोडि वधामणी सूरनर करें मन कोडि ॥२॥ इक्षा वंशें उपना काश्यप गोत्रं सदैव । सोवनवान देह जलहलें लंछन खडगी अतिव ॥३॥ एक सहस नई अड अधिक लक्षण अंगें जगीश । उछेह अंगुल इंसी धनुष आत्मंगुल एकसो वीस ॥४॥ अनंत बल लक्षण अधिक जोवन वय जब लीध । ___ मातपिता अति नेहसुं विवाह सामग्रि कीध ॥५॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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