Book Title: Anusandhan 2007 01 SrNo 38
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 20
________________ जान्युआरी-2007 परार्ध्यवर्णा स्तरणोपपन्नं [A 6-4-1] न के श्रयन्ते भविनो भवन्तम् ॥ तं प्राप्य सर्वावयवानवद्यं [B 6-69-1] यदीशोऽहं जिन ! का गतिर्मे (?) ॥६॥ उद्भासितं मङ्गलसंविधाभि: [A 7-16-3] स्वर्गं समासाद्य सुखानि भुङ्क्ते ॥ महार्हसिंहासनसंस्थितोऽसौ [B7-18-1] क्रमाच्छिवं याति तवार्चनेन ॥७॥ अनपायपदोपलब्धये [A 8-17-1] हृदा(दि) ये त्वां दधते पुराविदः ॥ भगवन् ! परवानयं जनो [B 8-81-2] भवभोगैकरतिः करोमि किम् ॥८॥ प्रौढप्रियानयनविभ्रमचेष्टितानि [A 9-58-4] ध्यानानि चेतसि तवापि पुरः स्थितेन ॥ 23 24 प्रोवाच ! कोशलपतिप्रथमापराधः [B 1-19-4] क्षन्तव्य एष करुणाम्बुनिधिर्यतोऽसि ॥९॥ किञ्चिदूनमनूनद्धे ! स्वामिन्नद्यापि वर्त्तते ॥ [A 10-1-3] उदधेरिव रत्नानि त्रीणि' प्राप्तानि यत् प्रभोः ||१०|| [B 10-30-7] गैन्धवद् रुधिरचन्दनोक्षितां [A 11-20-3] मूर्तिमीश ! तव पश्यतां नृणाम् ॥ पक्ष्मपातमपि वञ्चनां मनो [B 11-36-4] मन्यते नलिननेत्र ! नेत्रयोः ॥११॥ सा पौरान पौरकान्तस्य पुनाति तव गीरियम् ॥ [A 12-3-3] नभो - नभस्ययोर्वृष्टिं या जिगाय त्वदीरिता ॥ १२॥ [B 12-29-3] सेवाविचक्षणहरीश्वर ! दत्तहस्त ! श्रेयोऽर्पणे सुकृतिनां शरणं श्रये ते ॥ इक्ष्वाकुवंशगुरवे प्रयतः प्रणम्य [B 13-70-1] तुभ्यं विभो ! परमहं नैं भजामि किञ्चित् ॥१३॥ विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः [A 14-62-4] 15 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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