Book Title: Anusandhan 2007 01 SrNo 38
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 19
________________ - अनुसन्धान-३८ ॐ ई .) गुरुगुणरत्नाकर, जै.साहित्यनो संक्षिप्त इतिहास, मो.द.देसाई सं. आ.श्री मुनिचन्द्रसूरि, ई.स. २००६, पेरा ७ मो, पृ. ३२७ "इति श्रीऋषभदेवस्तोत्रं श्री पण्डितमहीसमुद्रगणिपादविरचितम्" ला.द. भे. सू. ३००५० नी झेरोक्ष कोपी. स्तम्भतीर्थमां शाणराजे वि.सं. १५०८ मां विमलजिनप्रासाद बंधाव्यो. श्रीरत्नसिंह सूरिए प्रतिष्ठा करावी. वि.सं. १५१७ मां शाणराजे विनंती करवाथी विमलनाथ चरित्रनी रचना करी-विमलनाथ चरित्र भाषांतर, मो.द. देसाई, जै.सा.नो संक्षिप्त इतिहास सं. आ.श्री मुनिचन्द्रसूरि. ई.स. २००६, पेरा ७१९. रघुवंशपदद्वयसमस्यानिबद्धं युगादिजिनस्तवनम्, तदवचूरिश्च अथाभ्यर्च्य विधातारं, शर्मणस्त्वत्पदाम्बुजम् । [A 1-25-1] स्निग्धगम्भीरनिर्घोषं रचयामि तव स्तवम् ॥१॥ [B 1-35-2) अथः प्रजानामधिपः प्रभाते । [A 2-1-1] _ यस्ते सपर्यां विधिवत् तनोति ॥ एका तपत्रं जगतः प्रभुत्वं प्राप्नोत्यावद्भुतभाग्यसिन्धुः(?) ॥२॥ निदानमिक्ष्वाकुकुलस्य सन्तते- [A 3-1-1] र्यस्त्वां नयेद् दृष्टिपथं गरिष्ठधीः ॥ दिनेषु गच्छत्सु नितान्तपीवरं [B 3-8-1] श्रेयो निवासं विदधाति तद्गृहे ॥३॥ स्तुत्यं स्तुतिभिरर्थ्याभि-र्यस्त्वां स्तौति प्रशस्तगीः ॥ [A 4-6-3] स हि सर्वस्य लोकस्य मान्यतामेति मानवः ॥४॥ [B 4-8-1] कल्येन वाचा मनसा च शश्वत् [A 4-4-1] प्रभोरुपास्ति तव यस्तनोति ॥ कॉलोपपन्नातिथिभागधेयं तन्मन्यिरे न क्षयमेति पृतम् ।।५।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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