Book Title: Anusandhan 2007 01 SrNo 38
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

View full book text
Previous | Next

Page 14
________________ जान्युआरी-2007 "मइभेयाऽसच्चग्गह २ संसग्गीए ३[य] अभिणिवेसेणं ४ । चउहा खलु मिच्छत्तं साहूणमदंसणेणऽहवा ॥७९॥" जिणवयणं दुन्नेयं अइसयनाणीहिं नज्जए सम्म । ववहारो पुण बलवं न निसेहो अत्थि साहूणं ॥८॥ मन्निज्ज चरणधम्म मा गविज्जा गुणेहि नियएहि । न य विम्हओ वहिज्जइ बहुरयणा जेण महपुढवी ॥८१।। यतःमा वहउ कोइ गव्वं इत्थ जए पंडिओ अहं चेव । आसव्वत्रुमयाओ तरतमजोगेण मइविहवा ॥८२।। भत्तीसु अभत्तीसु य गुरुनिन्हवणे य इत्थ दिटुंता । सिरिइंदभूइ - मंखलिपुत्तोरगसूयरो य तहा ॥८३।। गुरुनिन्हवणे विज्जा गहिया वि बहुज्जमेण पुरिसाणं । जायइ अणत्थहेऊ रयने उरपवरमल्लुव्व ॥८४।। "विणओवयार माणस्स भंजणा पूयणा गुरुजणस्स । तित्थयराणं आणा सुयधम्माराहणा किरिया ॥८५॥" एए छच्चेव गुणा साहूणं वंदणे पुण हवंति । सग्गाऽपवग्गसुक्खं पएसिराउव्व लहइ जणो ॥८६।। एगो जाणइ भासइ बहुयपयं किंतु एगमुस्सुत्तं । एगो एगंतं पि हु सुद्धं जह छलुय मासतुसो ॥८७।। एगे उस्सुयवयणे जंपिए जं हवेइ बहु पावं । तं सयजीहो वि नरो न तीरए कहिउ वाससए ॥८८॥ पढममिह मुसावायं दिट्ठीरागं तहेव मिच्छत्तं । आणाभंगं माणं परओ माया वि मेरुसमा ॥८९॥ सम्मत्तचरणभेओ तस्स य वयणेण होइ संघम्मि । कलहो वि तओ जायइ अप्पा उ अणंतसंसारी ॥१०॥ जे पुण पढंति सुत्तं छज्जीवणियाओ सावया उवरि । सो तेसिमणायारो चउद्दसपुव्वीहिं जं भणियं ॥९१॥ सिक्खाविय साहुविहा उववायगई ठिई कसाया य । बंधता वे यंता पडिवज्जाइक्क मे पंच ।।९२।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78