Book Title: Anusandhan 2005 06 SrNo 32
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसन्धान ३२
गौमुत्रमांहे चोवीस पोहर, समुछिम जीव उपजें ते जोर ।। सोल पोहरनी भेसनी नीती मांहें, समुर्छिम जीव उपजें ते मांहे ॥२७॥ द्वादश पोहर बकरी नीति मांहें, आठ पोहर गाडरनीती ज्यांहें एहमां समुर्छिम उपजे सही, एह बात गुरुमुखथी लही ॥२८।। ए सुतकनो कह्यो विचार, थोडामांहें भाष्यो सार । सुतकविचार आगममांहे कह्यौ, जिनेश्वरमुखथी सुधो लह्यो ।।२९।। सोहमसुद्धपरंपरा जांण, तेजे करी दिपें जिम दिनभाण । श्रीअचलगछे वांदु अणगार, श्रीपुंण्यसिंधुसूरीश्वर सार ॥३०॥ भणे सांभलें जे नरनार, चाले ते तो शुद्धाचार ।। अनुक्रमें अमरविमांने सोहाय, रयण आभुषण धरी मुक्तं जाय ॥३१।। संवत ओगणीश छीलोतरा (१९०६) सार, श्रावणकृष्ण पंचमी कही हितकार। श्रीजखौबिंदर चोमासुं करी, चोपई सुतकनी कही थिर करी ॥३२॥ श्रावक श्राविका पालस्ये जेह, श्रीजिन आणांई चाले तेह। सर्वारथसिद्धतणां सुख सार, वली मुक्तितणां सुख लहेस्यें निर्धार ॥३३॥
॥ इति श्रीसुतकनी चोपई संपुर्ण ।।
कडी क्र.
कठिन शब्दो
अर्थ जुगुप्सनीय-जुगुप्साजनक
११,१२
शब्द दुगंछनीक सुधा पडिकमण मृत्युक वीहाया छाली समुछिम नीती
प्रतिक्रमण- जैन धर्मनी आवश्यक क्रिया मृतक/मरनार वींयाय, प्रसूति करें बोकडी / घेटी स्वयमेव उद्भवतां जन्तुओ मूत्र / लघुनीति
९. इति श्रीसुतक छंद संपूर्णम् ।। संवत् १९०६ श्रावण वद ५ तिथौ ॥ अ. ॥
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