Book Title: Anusandhan 2003 12 SrNo 26
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 4
________________ निवेदन आ अंकमां छपायेली विज्ञप्ति प्रमाणे " जैन साहित्यनो संक्षिप्त इतिहास" तेना विद्यमान रूपमां ज पुनर्मुद्रित थवा जई रह्यो छे, ते प्रसंगे सहेजे ज सद्गत प्रा. जयन्तभाई कोठारीनुं स्मरण थाय छे. 'जैसासंइ' ए मोहनलाल दलीचंद देशाईनुं एक गंजावर तथा मातबर काम तो खरुं ज, पण साथे साथे एक ऐतिहासिक, दस्तावेजी अने शकवर्ती काम पण खरुं ज. एक ज व्यक्ति आटलुं मोटुं अने आलुं बधुं सुग्रथित काम करी शके, एवी कल्पना करवानुं पण अशक्य लागे. विद्वान् होवानो जरा पण दमाम- देखाडो राख्या विना, सर्वथा प्रतिकूल जीवन - संजोगोनी सामे झूझतां-झझूमतां रहने, मो. द. देशाईए जे साहित्यसेवा तथा जैन धर्मनी सेवा करी छे, ते अद्भुत छे, अपूर्व छे. मो. द. देशाईना 'जैन गूर्जर कविओ' नुं पुनः सर्जननी कक्षानुं सम्पादन जयन्त कोठारीए कर्यु. ते पछी 'जैसासंइ' नुं पण पुनः सम्पादन करवानी तेमनी अभिलाषा हती. पोतानी नाजुक तबियतने कारणे केटलोक वखत तेमना मनमां आ कार्य परत्वे अवढव अवश्य रही, परन्तु छेवटे तेमनामां बेठेलो सम्पादक जीत्यो हतो, अने आ कार्य हाथ पर लेवानो तेमणे निर्धार कर्यो हतो. आ माटे करवी घटे ते समग्र पूर्व तैयारी तेमणे करी हती; ग्रन्थनी नकलो प्राप्त करवी, ग्रन्थना अक्षरश: वांचनमांथी पसार थवा साथे ते अंगे घटती नोंधो करवी, सम्पादनमां उपयुक्त सामग्री एकत्र करवी, अने विविध विद्वानोने आ ग्रन्थना सम्पादन अंगे तेमज पोतपोतानी दृष्टिए करवा घटता सुधारा- वधारा-फेरफार वगेरे अंगे सूचनो मोकलवा माटे परिपत्रो पाठववा वगरे घणी घणी पूर्वक्रियाओ जयन्तभाईए आदरेली. पोताना परिपत्रनो, एक के बे अपवादने बाद करतां, जवाब पाठववानी पण कोईए दरकार न लीधी होवा विषे फरियाद पण तेमणे करेली. पण अफसोस ! आ कार्य पूर्ण गतिए आरंभाय ते पहेलां ज जयन्तभाईनो देहविलय थई गयो ! तेमना हाथे आ कार्य थयुं होत तो, 'जैगूक'ना नवसंस्करणमां आपणने जेम अनेक नवां वानां लाध्यां, तेम आ ग्रन्थमां पण अनेक प्रकारनुं दृष्टिसम्पन्न संमार्जन, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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