Book Title: Anusandhan 2002 09 SrNo 21
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 32
________________ २७ ऑक्टोबर २००२ ससहरकरहरनिय(य)कित्तिपूरियभूमंडल, बहुविहलद्धिसमिद्धिसिद्ध-सरणागयवच्छल । रत्तुप्पलसमपाणिपायजुयलक्खणसोहण, नंद मुणीसर मुणियविस्स विसमायुधचूरण ॥२॥ कुमयपरुवगविविहवाइकरिभेयणपणमुह, विणयजुत्तनयसीसराय दूरीकयभवदुह । कसमलनासणपवधम्मदेसणकरसायर, पणमह सिरिगुरु भवियलोय भत्तिहिं अइमणहर ॥३॥ वाणिविणिज्जियअमयखंड-पावियबहुमंडल मोहमहाबलफलयवायु म(मु)णिजणआखंडल । कयछव्विहजी(जि)यताण माणभंजण भवतारग जय जय मुणिवर जि(जी)यमाय जिणआगमपारग ॥४॥ दुद्धरभावमहारिवारअग्गंजिय-रंजियवरमाणयभूपालमाल सिंधुरगयगामिय । सिद्धिरमणिकयनिय(य)चित्त चारित्तविभूसिय गत्तसुसत्त-जईसपाय पणमउ(ह) बहुभत्तिय ॥५॥ पंचसमइसंजुय नियमइनिज्जियसुरगुरु चत्तभया ऽऽमयरहियअंग तियगुत्तिहिं सुंदर । पंचिंदियवसकार तारसमलछि(च्छि)अलंकिय को न हु पणमइ तुह मुणीस ! विगहाइविमुक्किय ॥६।। अंतिमजलनिहितुल्लमुल्लगंभीरिमसंजय मुणिजणपालियआण भाणुसम महीयलि विस्सुय । दस-अडदोसविमुक्क रोसदावानलजलहर मेरुमहीधरधीर वीरसामियनयगणहर ॥७॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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