Book Title: Anusandhan 2002 09 SrNo 21
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 62
________________ ऑक्टोबर २००२ (९७) सूदर(?) : 'सुंदर', 'सूदर' थयुं छे. (१११) जिन नवी भमुं : जिम नवी भमुं (२२२) मथो घलइ : माथो घालइ एकलो चलइ : एकलो चालइ । छंदनी दृष्टिए घलइ, चलइ पाठ खोटो छे. हस्तप्रतमां एम होय तो कविनो लेखनदोष थयो होय, एम मानवू रह्यु. (२८२) दीधो भाग : दीधो माग (२९४) नरको वली : नर को वली (३४१) अद्यु(छयु)त: अहीं 'अद्युत' ज बरोबर छे. स्वरव्यत्यय थई 'उद्योत'नुं 'अद्युत' थयुं छे. (३५२) -गि-य : 'जगि सोय' होवानी संभावना छे. (३९४) विष : 'विर्ष' (वृक्ष) होवानी संभावना छे. (३५९) कुपरखबोलि : कुपुरख-बोलि (कुपुरुषना बोले) सुपर खलोपइ : सुपरख लोपइ (सुपुरुष लोपे) (४४५) यम नाडि : 'यम[ना] नाडि' । (४४७) पाप-कर्म बइ एगठा : पाप-क(ध)र्म बइ एगठा (५२४) माखी अई अलि : माखी अईअलि (माखी-ईयळ) (५२५) अग्यः (आगळ) 'अगि' मांना 'इ'नो 'य' थयो छे. (५९०) सहइ सभग : 'सहइस भग (सहस्र भग) (४४५) मलवढता : मल वढता (मल्ल लडता) (८२८) चीडः चीड(र?) जोडणीभेदने लीधे अजाण्या लागता शब्दोने कारणे शब्दकोश विस्तृत थयो छे. आमां जैन पारिभाषिक शब्दोने संपादके योग्य रीते ज नथी लीधा. आम छतां शब्दकोशमां लेवा जेवा थोडा वीजा शब्दो कृतिमां नजरे चडे छे (१८) वसेको : विशेष (६२२) शमशा : समस्या (२५) फूली : माथा- घरेणुं (७३६) सरीवाहालुलि: ? (४१०) रोटो : गरीब (७४८) पोईशां : ? (४७७) पोढुं : मोटुं (७३६) खलइडां : ? (खलेलां ?) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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