Book Title: Anusandhan 2002 09 SrNo 21
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 71
________________ ६६ (७) Jain Temples ले. एल. एम. सिंघवी, छबीकार : तरुण चोपरा प्रकाशन : Luxor Foundation, दिल्लीना सहयोगथी 'हिमालयन बुक्स, दिल्ली, ई. २००२ अनुसंधान- २१ भगवान महावीरना २६००मा जन्मकल्याणकवर्षना उपलक्ष्यमां तथा तेनी मधुर स्मृतिरूपे, इंग्लंडमां भारतना राजदूत तरीके रही चूकेला डॉ. सिंघवी आ ग्रंथ निर्माण करेल छे. तेमां देशना तेमज विदेशना अनेक जैन तीर्थो, मंदिरो, प्रतिमाओनी उत्तम तसवीरो पण विपुल मात्रामां छे. दर्शनीय ग्रंथ. (८) नियति द्वात्रिंशिका ( गुजराती अनुवाद : विवरण सहित ) कर्ता : श्री सिद्धसेन दिवाकरसूरि, अनुवादक : मुनि भुवनचंद्र नियतिवादना सिद्धांतनुं निरूपण करती, दिवाकर भगवंतनी बत्रीशीना रहस्यने पकडवानुं विकट काम अनुवादके अहीं सुपेरे पार पाड्युं छे. पाठशोधन तथा पाठनिर्णय माटे पण सारो प्रयास कर्यो छे. प्रकाशक : जैन साहित्य अकादमी, गांधीधाम- कच्छ, ई. २००२ (९) ' शतक 'नामा पंचम कर्मग्रंथ ( गुजराती सचित्र विवरण ) ग्रंथकार : श्रीदेवेन्द्रसूरिजी अनुवाद : रम्यरेणु प्राप्तिस्थान : पार्श्वभक्तिनगर, भीलडियाजी, उ.गु. ई. २००२ अगाउ प्रथमना चार कर्मग्रंथोनां विवरण प्रकाशित थयां छे. ते श्रेणिमां आ पांचमुं पुस्तक छे. कर्मसाहित्यना अध्येताओ माटे सुंदर प्रयास. (१०) नन्दनवनकल्पतरु : ( संस्कृत भाषामय अयनपत्र ) अंक आठमो ई. २००२ सं. कीर्तित्रयी. प्रकाशक : जैन ग्रंथ प्रकाशन समिति, खंभात ११. मूलशुद्धिप्रकरणम् विभाग १-२ • प्रणेता : श्री प्रद्युम्नसूरि, संपादक : आ. धर्मधुरंधरसूरि एवं पं. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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