Book Title: Anusandhan 2002 09 SrNo 21
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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ऑक्टोबर २००२
महत्तराश्रीचारित्रचूलाविज्ञप्तिः संखतुषारसमाणभूरिगुणकलियसुदेहा बहुविहआगमअत्थसत्थंसंवासियमेहा । भवभावणकयनिय[य]चित्तकरुणारससा(स)हिया महतरसिरिचारित्तचूलपय पणमउ भविया ॥१॥ सतरभेयचारित्तजुत्त सम्मत्तपवित्ता मुत्ताहलकप्पूरतुल्लजसधवलिय गुत्ता । दुग्गइकारणअट्टरुद्ददुगझाणनिवारणि महिमंडलि जा चंदसूर नंदउ सा साहुणि ॥२॥ पावतिमिरसंहारकारिवरभासुरवयणा गुरुजणपालियपवरआण संसाहियजयणा । रंकमहेसरलोयजायसमचित्तसहावा जय समणीगणविहियसेव गयदुहसंतावा ॥३॥ सावियजणपुरकहियचारुसिद्धंतवियारा निज्जियतिहुयणखोहकारपरउल्लणमारा । गामनगरबहुदेसभावजुयविहियविहारा पणमह सा साहुणि तिकाल भविया अवियारा ।।४।। तिहुयणवत्तिअणेगजीववियरियऽभयदाणा भवसायरनिवडतजंतुमंडलकयताणा । अइदुक्करतवकम्मकरणनासियदुक्कम्मा जयसि सयाऽऽसवरहियकायनिम्मियजिणधम्मा ।।५।। कोहविणासणि तीवकुडिलमायानिन्नासणि माणगइंदसु सिंहकप्प जिणसासणि भासणि । भवछेयगवेरग्गवारसंपूरियगत्ता नय(जय) सुहकारिणि ! जय सया वि साहुणि भयमुत्तां ॥६।।
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